अब सात सप्ताह का कैंसर इलाज सिर्फ 5 सत्रों में? जानिए किस तकनीक से मिल रही नई उम्मीद

Lucknow News: कैंसर के इलाज में एसबीआरटी तकनीक से कुछ मरीजों की रेडियोथेरेपी 1 से 5 सत्रों में संभव है। जानिए किन कैंसर मरीजों को मिल सकता है इसका लाभ।

Newstrack Network
Published on: 2 Nov 2026 11:37 PM IST
अब सात सप्ताह का कैंसर इलाज सिर्फ 5 सत्रों में? जानिए किस तकनीक से मिल रही नई उम्मीद
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फोटो-सोशल मीडिया

Lucknow News: कैंसर के इलाज में आधुनिक रेडिएशन तकनीक ने मरीजों के लिए नई उम्मीद पैदा की है। जिन मरीजों को पहले कई सप्ताह तक अस्पताल जाकर रेडियोथेरेपी करानी पड़ती थी, उनमें से कुछ का उपचार अब केवल एक, तीन या पांच सत्रों में पूरा किया जा सकता है। विशेष रूप से शुरुआती अवस्था के फेफड़ों के कैंसर, मस्तिष्क के कुछ ट्यूमर तथा लिवर और हड्डियों में सीमित कैंसर वाले मरीजों को इसका लाभ मिल सकता है। लखनऊ के कल्याण सिंह सुपर स्पेशियलिटी कैंसर संस्थान की ओर से 31 अक्टूबर और एक नवंबर को आयोजित दो दिवसीय 'यूपीएआरओआईकॉन-2026' सम्मेलन में विशेषज्ञों ने इस तकनीक के उपयोग और संभावनाओं पर चर्चा की। चिकित्सकों के अनुसार, इसमें अत्यधिक सटीकता से रेडिएशन की अधिक खुराक सीधे ट्यूमर तक पहुंचाई जाती है, जिससे आसपास के स्वस्थ अंगों को अनावश्यक रेडिएशन से बचाने में मदद मिलती है। हालांकि, विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि पांच सत्रों में इलाज की सुविधा हर कैंसर मरीज के लिए नहीं है और कम सत्रों में रेडियोथेरेपी पूरी होने का अर्थ यह भी नहीं है कि प्रत्येक मरीज का संपूर्ण कैंसर उपचार समाप्त हो गया। 

क्या है नई तकनीक, कैसे पांच सत्रों में पूरा होता है उपचार?

कल्याण सिंह कैंसर संस्थान के रेडियोथेरेपी विभाग के डॉ. प्रमोद कुमार गुप्ता के अनुसार, आधुनिक तकनीक की सहायता से ट्यूमर के आकार, उसकी स्थिति और आसपास के महत्वपूर्ण अंगों का सटीक आकलन करके रेडिएशन दिया जाता है। इस उपचार को 'स्टीरियोटैक्टिक बॉडी रेडियोथेरेपी' (एसबीआरटी) कहा जाता है, जबकि मस्तिष्क के कुछ ट्यूमर और अन्य लक्ष्यों के लिए संबंधित तकनीक 'स्टीरियोटैक्टिक रेडियोसर्जरी' (एसआरएस) का इस्तेमाल किया जाता है। पारंपरिक रेडियोथेरेपी में कई परिस्थितियों में पांच से सात सप्ताह तक रोजाना उपचार देना पड़ सकता है। लेकिन एसबीआरटी में अधिक सटीकता के साथ प्रति सत्र अपेक्षाकृत ज्यादा रेडिएशन दिया जाता है। इससे चुने हुए मरीजों में एक से पांच सत्रों में उपचार संभव होता है। यह तकनीक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहले से स्थापित है और भारत में भी उपयोग की जा रही है। अमेरिका के नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट के अनुसार, शुरुआती अवस्था के कुछ फेफड़ों के कैंसर में एसबीआरटी का उपचार एक से दो सप्ताह के भीतर एक से पांच सत्रों में दिया जा सकता है। 

फेफड़े, मस्तिष्क और लिवर के कैंसर में विशेष उपयोग

चिकित्सकों के अनुसार, यह तकनीक उन मरीजों के लिए विशेष उपयोगी हो सकती है जिनके फेफड़ों में शुरुआती अवस्था का सीमित आकार का ट्यूमर है, लेकिन अधिक उम्र, कमजोर फेफड़ों या अन्य गंभीर बीमारियों के कारण उनकी सर्जरी जोखिमपूर्ण है। ऐसे मामलों में एसबीआरटी बिना ऑपरेशन के ट्यूमर को नियंत्रित करने का प्रभावी विकल्प हो सकती है। इसी प्रकार मस्तिष्क के कुछ छोटे ट्यूमर, सीमित मस्तिष्क मेटास्टेसिस, लिवर के चुनिंदा कैंसर तथा हड्डियों में सीमित संख्या में फैले कैंसर के लिए भी सटीक रेडिएशन तकनीकों का उपयोग किया जाता है। कुछ परिस्थितियों में किडनी, एड्रिनल ग्रंथि, अग्न्याशय और प्रोस्टेट कैंसर के मरीजों को भी इसका लाभ मिल सकता है। हालांकि, अलग-अलग अंगों में रेडिएशन की खुराक और सत्रों की संख्या समान नहीं होती। ट्यूमर की स्थिति, उसका आकार और महत्वपूर्ण अंगों से उसकी दूरी उपचार का स्वरूप तय करते हैं।

कैसे सुनिश्चित किया जाता है कि रेडिएशन केवल ट्यूमर तक पहुंचे?

इस तकनीक से उपचार शुरू करने से पहले मरीज का सीटी स्कैन, एमआरआई या आवश्यकतानुसार दूसरी इमेजिंग जांच कराई जाती है। इसके आधार पर कंप्यूटर से एक विस्तृत उपचार योजना बनाई जाती है, जिसमें यह तय किया जाता है कि रेडिएशन की कितनी खुराक किस दिशा से और कितने हिस्से में दी जाएगी। उपचार से पहले आधुनिक इमेजिंग प्रणाली से ट्यूमर की स्थिति की दोबारा पुष्टि की जाती है। फेफड़े और पेट के ऊपरी हिस्से में मौजूद ट्यूमर सांस लेने के दौरान अपनी जगह बदल सकते हैं। ऐसी स्थिति में सांस की गति के अनुसार रेडिएशन की योजना बनाने या ट्यूमर की गतिविधि की निगरानी करने वाली तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है। इससे आसपास के स्वस्थ ऊतकों पर रेडिएशन का प्रभाव सीमित रखने में मदद मिलती है। फिर भी इस उपचार में थकान, सूजन और संबंधित अंगों में रेडिएशन से होने वाली क्षति जैसी जटिलताएं संभव हैं। 

वैज्ञानिक अध्ययन में क्या सामने आया?

शुरुआती अवस्था के नॉन-स्मॉल सेल लंग कैंसर में एसबीआरटी के प्रभाव पर हुए अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों ने उत्साहजनक परिणाम दिखाए हैं। विशेष रूप से ऐसे मरीजों में, जिनकी सर्जरी संभव नहीं है, यह उपचार महत्वपूर्ण विकल्प बन चुका है। अमेरिकन सोसाइटी फॉर रेडिएशन ऑन्कोलॉजी के दिशानिर्देश भी चिकित्सकीय रूप से ऑपरेशन के लिए अनुपयुक्त शुरुआती फेफड़े के कैंसर मरीजों में एसबीआरटी के उपयोग का समर्थन करते हैं। हालांकि, फेफड़े के केंद्रीय हिस्से में स्थित या बड़ी रक्तवाहिकाओं के निकट मौजूद ट्यूमर में अधिक सावधानी की जरूरत होती है। कुछ मामलों में चार-पांच या उससे अधिक सत्र देना सुरक्षित हो सकता है। इसलिए केवल ट्यूमर छोटा होने के आधार पर किसी मरीज को इस तकनीक के लिए उपयुक्त नहीं माना जा सकता। 

उत्तर प्रदेश में हर साल सवा दो लाख से ज्यादा नए कैंसर मरीजों का अनुमान

कैंसर के बढ़ते मामलों को देखते हुए कम समय में प्रभावी उपचार उपलब्ध कराने वाली तकनीकों का महत्व बढ़ गया है। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के राष्ट्रीय कैंसर रजिस्ट्री कार्यक्रम पर आधारित सरकारी आँकड़ों के अनुसार, उत्तर प्रदेश में वर्ष 2021 में कैंसर के अनुमानित 2,06,088 नए मामले थे, जबकि 2025 के लिए यह संख्या बढ़कर 2,26,125 अनुमानित की गई। यानी चार वर्षों में लगभग 20 हजार अतिरिक्त वार्षिक मामलों की वृद्धि। पूरे भारत में वर्ष 2022 के लिए करीब 14.61 लाख नए कैंसर मामलों का अनुमान था, जो 2024 में बढ़कर लगभग 15.33 लाख हो गया। ये आँकड़े वास्तविक समय में दर्ज सभी मरीजों की गिनती नहीं, बल्कि कैंसर रजिस्ट्री के आधार पर तैयार अनुमान हैं। 

कम अस्पताल जाना पड़ेगा, लेकिन हर मरीज के लिए उपयुक्त नहीं

संस्थान के निदेशक डॉ. एमएलबी भट्ट के अनुसार, कैंसर के बढ़ते बोझ के बीच आधुनिक उपचार तकनीकों का महत्व लगातार बढ़ रहा है। डॉ. रूमिता सिंह ने स्पष्ट किया कि पांच सत्रों वाला उपचार सभी मरीजों के लिए उपयुक्त नहीं है। इसका निर्णय कैंसर के प्रकार, आकार, स्थान और मरीज की समग्र स्वास्थ्य स्थिति के आधार पर किया जाता है। कम सत्रों में उपचार होने से मरीजों को बार-बार अस्पताल आने की परेशानी कम हो सकती है। दूरदराज से आने वाले मरीजों के लिए यात्रा, ठहरने और कामकाज के नुकसान में भी कमी संभव है। लेकिन सत्र कम होने का अर्थ इलाज का खर्च हमेशा कम होना नहीं है, क्योंकि इस तकनीक में अत्याधुनिक उपकरण, विस्तृत योजना और विशेषज्ञ निगरानी की आवश्यकता होती है।

फ्लैश रेडियोथेरेपी से अलग है यह तकनीक

सम्मेलन में विशेषज्ञों ने एक महत्वपूर्ण अंतर भी स्पष्ट किया। एक से पांच सत्रों वाली एसबीआरटी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अध्ययन की जा रही 'फ्लैश रेडियोथेरेपी' एक ही तकनीक नहीं हैं। फ्लैश रेडियोथेरेपी में अत्यंत कम समय में असाधारण रूप से उच्च डोज रेट पर रेडिएशन दिया जाता है। शोधकर्ताओं का उद्देश्य कैंसर कोशिकाओं को प्रभावित करते हुए स्वस्थ ऊतकों को होने वाले नुकसान को कम करना है। हालांकि, यह तकनीक अभी विभिन्न कैंसरों के लिए अनुसंधान और नैदानिक मूल्यांकन के चरणों में है। इसके विपरीत एसबीआरटी और एसआरएस स्थापित उपचार पद्धतियां हैं, जिनके उपयोग के लिए चिकित्सकीय दिशानिर्देश उपलब्ध हैं।

कैंसर विशेषज्ञों का मानना है कि इन तकनीकों की वास्तविक सफलता केवल सत्रों की संख्या कम होने में नहीं, बल्कि सुरक्षित और प्रभावी उपचार देने में है। मरीज के लिए सही तकनीक का चुनाव, रेडिएशन की खुराक, उपचार के बाद निगरानी और आवश्यकता पड़ने पर सर्जरी, दवा या दूसरे उपचार के साथ समन्वय भी उतना ही जरूरी है। इसलिए कैंसर मरीजों को पांच सत्रों में इलाज पूरा होने के दावे के आधार पर अपना उपचार बदलने के बजाय विशेषज्ञ रेडिएशन ऑन्कोलॉजिस्ट से व्यक्तिगत मूल्यांकन कराना चाहिए।

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