History of Handwashing: वह डॉक्टर जिसने साबित किया कि डॉक्टरों के हाथ ही माताओं की जान ले रहे थे

History of Handwashing: इग्नाज़ सेमेलवाइस ने 19वीं सदी में दिखाया कि डॉक्टर और मेडिकल छात्र अपने हाथों से प्रसूता महिलाओं तक जानलेवा संक्रमण पहुंचा रहे थे।

Yogesh Mishra
Published on: 2 Oct 2026 7:13 PM IST
History of Handwashing
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History of Handwashing

History of Handwashing: आज अस्पताल में डॉक्टर मरीज को छूने से पहले हाथ साफ करे, तो इसमें कुछ खास नहीं लगता। लेकिन 19वीं सदी के बीच में डॉक्टर लाश का पोस्टमार्टम करके सीधे प्रसव कराने पहुंच जाते थे, और किसी को इसमें कुछ गलत नहीं लगता था। इसी दौर में हंगरी के एक युवा डॉक्टर इग्नाज़ सेमेलवाइस ने आंकड़ों से दिखाया कि डॉक्टर खुद अपने हाथों से महिलाओं तक जानलेवा संक्रमण पहुंचा रहे हैं। सेमेलवाइस ने ये भी दिखाया कि क्लोरीन वाले घोल से हाथ धुलवाने पर माताओं की मौतें बहुत घट गईं। फिर भी उनकी बात नहीं मानी गई। सिर्फ 47 साल की उम्र में उन्हें वियना के एक मानसिक अस्पताल में भर्ती करा दिया गया, और करीब दो हफ्ते बाद संक्रमण से उनकी मौत हो गई।

आम किस्सा यह है कि डॉक्टरों ने हाथ धोने की बात कहने पर उन्हें पागल घोषित कर दिया और पागलखाने में मरने छोड़ दिया। लेकिन सच यह है कि चिकित्सा जगत ने उनका तीखा विरोध ज़रूर किया था। लेकिन 1865 तक उनके व्यवहार और दिमागी हालत में गंभीर बदलाव के विवरण भी मिलते हैं। उन्हें सचमुच मानसिक अस्पताल ले जाया गया, वहां उनके साथ मारपीट के ठोस विवरण हैं, और उनकी मौत संक्रमण से हुई। पर उनकी मानसिक बीमारी की असली वजह आज भी पक्की तरह पता नहीं है। इसलिए इसे साज़िश की कहानी बनाना ठीक नहीं।

जिस वार्ड में डॉक्टर थे, वहीं ज़्यादा महिलाएं मर रही थीं

1840 के दशक में सेमेलवाइस वियना जनरल हॉस्पिटल के प्रसूति विभाग में काम करते थे। वहां प्रसव के दो क्लीनिक थे। पहले में डॉक्टर और मेडिकल छात्र सीखते थे, दूसरे में दाइयां। दोनों में एक जैसी महिलाएं आती थीं, फिर भी डॉक्टरों वाले क्लीनिक में प्रसव के बाद होने वाले बुखार (चाइल्डबेड फीवर, यानी प्रसूति ज्वर) से मौतें कहीं ज़्यादा होती थीं। 1841 से 1846 के बीच पहले क्लीनिक में औसतन करीब 9.9 प्रतिशत माताएं मरीं, जबकि दूसरे में करीब 3.4 प्रतिशत। 1846 में फर्क और बढ़ गया: पहले में लगभग 11.4 प्रतिशत और दूसरे में लगभग 2.7 प्रतिशत। महिलाओं को भी यह फर्क पता चल चुका था। सेमेलवाइस ने खुद लिखा कि कई गर्भवती महिलाएं पहले क्लीनिक में भर्ती न होने के लिए गिड़गिड़ाती थीं। कुछ तो अस्पताल पहुंचने से पहले सड़क पर ही बच्चा पैदा कर लेना ज़्यादा सुरक्षित समझती थीं। सवाल सीधा था: एक ही अस्पताल के एक वार्ड में इतनी ज़्यादा मौतें क्यों?

तब बीमारी की वजह ‘बुरी हवा’ मानी जाती थी

उस समय यह नहीं पता था कि बीमारियां जीवाणुओं (बैक्टीरिया) से फैलती हैं। पाश्चर और कॉख जैसे वैज्ञानिकों का काम अभी आने वाला था। उस दौर में ‘मियाज़्मा’ सिद्धांत चलता था, जिसके मुताबिक सड़न, बदबू और खराब हवा से बीमारी पैदा होती है। लेकिन सेमेलवाइस ने कई बातें जांचीं: क्या पहले वार्ड में भीड़ ज़्यादा है, क्या प्रसव का तरीका अलग है, क्या हवा-माहौल का असर है, क्या पादरी के आने और घंटी बजने से महिलाएं डर जाती हैं? कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला। फिर 1847 में एक साथी की मौत ने पहेली सुलझा दी।

दोस्त की उंगली कटी और जवाब सामने आ गया

सेमेलवाइस के साथी और पैथोलॉजी के प्रोफेसर जैकब कोलेत्शका एक पोस्टमार्टम के दौरान घायल हो गए, जब एक छात्र का चाकू उनकी उंगली में लग गया। घाव में संक्रमण हुआ और कुछ समय बाद उनकी मौत हो गई। सेमेलवाइस ने देखा कि उनके शरीर में वैसे ही बदलाव थे जैसे प्रसूति ज्वर से मरी महिलाओं में दिखते थे। तभी उन्हें कड़ी जुड़ गई। पहले क्लीनिक में डॉक्टर और छात्र लाशों का पोस्टमार्टम करके सीधे प्रसूताओं की जांच करने जाते थे। दूसरे क्लीनिक की दाइयां आमतौर पर पोस्टमार्टम नहीं करती थीं। आज हम कहेंगे कि डॉक्टरों के हाथों पर रोगाणु थे। पर सेमेलवाइस के पास बैक्टीरिया की समझ नहीं थी। उन्होंने इसे लाश से चिपके ‘कणों’ (cadaveric particles) की तरह समझा। फिर भी उनका नतीजा सही दिशा में था: डॉक्टर अपने हाथों से शव से कोई जानलेवा चीज़ मां के शरीर तक पहुंचा रहे थे।

साबुन नहीं, क्लोरीन वाले चूने के घोल से हाथ धुलवाए

सेमेलवाइस ने देखा था कि पोस्टमार्टम के बाद हाथों में एक खास बदबू रह जाती है और आम साबुन-पानी से पूरी तरह नहीं जाती। इसलिए उन्होंने आदेश दिया कि प्रसूता की जांच से पहले सब क्लोरीन वाले चूने के घोल से हाथ धोएं। यह नियम मई 1847 के आसपास लागू हुआ, और इसके नतीजे ही उनकी खोज का सबसे बड़ा सबूत बने। एक अध्ययन के मुताबिक जून से अगस्त 1847 के बीच मृत्यु दर 7.8 प्रतिशत से गिरकर करीब 1.8 प्रतिशत रह गई। बाद में उन्होंने संक्रमण के दूसरे स्रोत भी पहचाने और एक मरीज से दूसरे मरीज के बीच भी हाथ धोना ज़रूरी कर दिया। 1848 में पहले क्लीनिक की सालाना मृत्यु दर करीब 1.27 प्रतिशत तक आ गई। पुराने आंकड़ों का आधुनिक सांख्यिकीय विश्लेषण भी यही बताता है कि 1847 में क्लोरीन से हाथ धोना शुरू होने पर मौतें साफ तौर पर घटीं, और उनके वियना छोड़ने तथा व्यवस्था ढीली पड़ने के बाद फिर बढ़ गईं।

डॉक्टर सचमुच अपनी मरीजों को बीमार कर रहे थे

यही बात उनकी खोज को इतना अहम और साथ ही इतना असुविधाजनक बनाती थी। सोचिए, आप उस ज़माने के नामी डॉक्टर हैं और बरसों से महिलाओं का इलाज कर रहे हैं। अब एक युवा डॉक्टर कह रहा है कि जिन्हें आप बचाने आते हैं, उनमें से कई की मौत की वजह आपके अपने हाथ हैं। यह बात सिर्फ पुरानी सोच को नहीं, डॉक्टरों की अपनी छवि को भी चोट पहुंचाती थी। पर सिर्फ डॉक्टरों का अहंकार पूरे विरोध की वजह नहीं था। सेमेलवाइस दिखा सकते थे कि क्लोरीन से हाथ धोने पर मौतें घटती हैं, पर यह नहीं दिखा सकते थे कि असल में कौन-सी अदृश्य चीज़ संक्रमण फैला रही है। उनका ‘लाश के कण’ वाला स्पष्टीकरण आज के बैक्टीरिया सिद्धांत जैसा ठोस नहीं था। यानी समकालीनों के सामने एक तरीका था जो काम करता दिख रहा था, पर क्यों करता है, यह कोई समझा नहीं पा रहा था।

सेमेलवाइस खुद भी अपनी बात फैला नहीं पा रहे थे

आम कहानी में सेमेलवाइस को एक शांत वैज्ञानिक की तरह और बाकी डॉक्टरों को खलनायक की तरह दिखाया जाता है। लेकिन असलियत इससे उलझी हुई है। खोज के बाद भी सेमेलवाइस ने बरसों तक उसे ढंग से किताब की शक्ल में नहीं छापा। 1850 के दशक के आखिर में कुछ लेख आए, और 1861 में जाकर उनकी बड़ी किताब 'The Etiology, Concept, and Prophylaxis of Childbed Fever' आई, जिसमें उन्होंने अपने सबूत रखे।

किताब लंबी थी, बातें बार-बार दोहराई गई थीं और लहजा झगड़ालू था। विरोध बढ़ा तो उनका रवैया भी और आक्रामक होता गया। उन्होंने आलोचकों को खुले पत्र लिखे और उन डॉक्टरों पर नैतिक आरोप लगाए जो उनका तरीका नहीं अपना रहे थे। उनकी नज़र में हाथ साफ न करने वाला डॉक्टर उन माताओं की मौत का ज़िम्मेदार था जिन्हें बचाया जा सकता था। उनकी निराशा समझ में आती है, क्योंकि उन्होंने मौतें घटते अपनी आंखों से देखी थीं। लेकिन उनकी तीखी भाषा से कई साथी और दूर हो गए।

क्या चिकित्सा जगत ने उन्हें पूरी तरह ठुकरा दिया था?

सच्ची ये भी है सब डॉक्टरों ने उनकी बात नहीं ठुकराई। कुछ ने उनका समर्थन किया और उनके नतीजों को गंभीरता से लिया। मुश्किल यह थी कि उनके सिद्धांत को व्यापक और जल्दी स्वीकार नहीं मिला, और कई असरदार प्रसूति विशेषज्ञों ने उसका विरोध किया। संक्रमण की बात सोचने वाले सेमेलवाइस अकेले भी नहीं थे। स्कॉटलैंड के डॉक्टर अलेक्जेंडर गॉर्डन ने 18वीं सदी के आखिर में प्रसूति ज्वर के संक्रामक होने की बात लिखी थी, और अमेरिकी डॉक्टर ऑलिवर वेंडेल होम्स ने 1843 में इस खतरे पर अहम लेख छापा था कि डॉक्टर खुद इसे फैला सकते हैं। सेमेलवाइस की असली उपलब्धि यह थी कि उन्होंने एक ही अस्पताल में मौतों के अंतर को व्यवस्थित ढंग से परखा, कारण का अंदाज़ा लगाया, क्लोरीन से हाथ धोने का उपाय लागू किया और फिर मौतों में भारी गिरावट दिखाकर उसे साबित किया।

उनकी दिमागी हालत क्यों बिगड़ी?

1860 के दशक तक सेमेलवाइस के व्यवहार में साफ बदलाव के ऐतिहासिक विवरण मिलते हैं: बेचैनी, अजीब व्यवहार, याददाश्त और स्वभाव में बदलाव। पर उनकी बीमारी का कोई पक्का आधुनिक निदान हमारे पास नहीं है। इतिहासकारों और डॉक्टरों ने डिप्रेशन, बहुत ज़्यादा तनाव, शुरुआती डिमेंशिया, तंत्रिका की बीमारी और उस समय की आम बीमारी - सिफलिस जैसी संभावनाएं सुझाई हैं। लेकिन कुछ पक्के तौर नहीं कहा जा सकता। यह कहना भी गलत होगा कि वे बिल्कुल ठीक थे और डॉक्टरों ने बदला लेने के लिए पागल घोषित कर दिया। इसके पक्के सबूत नहीं हैं। लेकिन उनके साथ आखिर में जो हुआ, वह सचमुच बहुत दुखद और विवादित था। जुलाई 1865 में परिवार और साथियों को उनकी हालत को लेकर गंभीर चिंता थी। इतिहासकारों के मुताबिक उन्हें यह कहकर वियना ले जाया गया कि वे इलाज या आराम के लिए जा रहे हैं। वहां त्वचा रोग विशेषज्ञ और पुराने साथी फर्डिनांड हेब्रा उन्हें एक सरकारी मानसिक अस्पताल ले गए। भर्ती के रिकॉर्ड खुद संदिग्ध हैं। यह साफ नहीं है कि भर्ती के समय उनकी विधिवत जांच किसने की। सेमेलवाइस ने वहां से निकलने की कोशिश की। कर्मचारियों ने उन्हें काबू किया। विवरण हैं कि उन्हें ‘स्ट्रेटजैकेट’ में रखा गया और कई कर्मचारियों ने ज़बरदस्ती दबोचा, और इसी दौरान उनके शरीर पर चोटों का ज़िक्र मिलता है। इसके बाद उनकी हालत तेज़ी से बिगड़ी। 13 अगस्त 1865 को 47 साल की उम्र में उनकी मौत हो गई।

उनके पोस्टमार्टम में गंभीर संक्रमण मिला। दाहिने हाथ की बीच वाली उंगली में संक्रमित घाव और हड्डी का संक्रमण था, और संक्रमण शरीर के दूसरे हिस्सों में भी फैल चुका था। मौत की वजह खून में फैला संक्रमण बताई गई, जिसे तब ‘पायमिया’ कहा जाता था।

ये भी कहा जाता है कि अस्पताल के कर्मचारियों ने उन्हें इतना पीटा कि घाव संक्रमित हो गया और उसी से मौत हुई। इसके समर्थन में ऐतिहासिक विवरण हैं, और आधुनिक समीक्षाएं भी अस्पताल में लगी चोटों को संभावित स्रोत मानती हैं। फिर भी उंगली का घाव कब और कैसे शुरू हुआ, इस पर रिकॉर्ड पूरी तरह साफ नहीं हैं। इसलिए ज़्यादा सही यह कहना है कि अस्पताल में उन्हें ज़बरदस्ती काबू किया गया और शायद चोट भी लगी, मौत गंभीर संक्रमण से हुई, और सबूत इन दोनों बातों के बीच संबंध की ओर इशारा करते हैं। कुछ भी हो, लेकिन विडंबना बहुत बड़ी थी। जिस डॉक्टर ने ज़िंदगी भर यह साबित करने में लगा दी कि शरीर में पहुंचा संक्रमित पदार्थ जान ले सकता है, उसकी अपनी जान भी संक्रमण से गई।

जो वे देख नहीं सके, वह अगली पीढ़ी ने देखा

बाद के दशकों में पाश्चर के प्रयोगों ने रोगाणुओं की भूमिका को पक्का वैज्ञानिक आधार दिया, और जोसेफ लिस्टर ने सर्जरी में रोगाणुनाशक तरीके विकसित किए। तब जाकर डॉक्टरों को समझ आया कि सेमेलवाइस का क्लोरीन से हाथ धोना क्यों काम करता था। वह सिर्फ लाश की बदबू नहीं हटा रहा था, हाथों पर मौजूद रोगाणुओं को खत्म कर रहा था। सेमेलवाइस ने सही असर देख लिया था, पर पूरी प्रक्रिया समझाने वाला सूक्ष्मजीव विज्ञान उनके पास नहीं था। जो चीज़ वे नहीं देख पाए, उसे बाद की पीढ़ी ने प्रयोगशाला में देखा और पहचाना। इसी वजह से उन्हें आज अक्सर "माताओं का रक्षक" कहा जाता है। बुडापेस्ट की प्रमुख चिकित्सा संस्था Semmelweis University उनके नाम पर है।

'सेमेलवाइस रिफ्लेक्स'

बाद में "सेमेलवाइस रिफ्लेक्स" शब्द चल पड़ा। इसका मतलब है ऐसी नई जानकारी को लगभग सहज प्रतिक्रिया में ठुकरा देना जो हमारी पुरानी मान्यताओं और स्थापित व्यवस्था के खिलाफ जाती हो। यह कोई मेडिकल बीमारी नहीं, विज्ञान और विचारों के इतिहास में इस्तेमाल होने वाली अभिव्यक्ति है।

फिर भी सेमेलवाइस की कहानी को इस शब्द का बिल्कुल सीधा उदाहरण नहीं मान लेना चाहिए। उनके विरोधियों के पास रोगाणु सिद्धांत का आधार नहीं था, उनके अपने कारण वाले विचार अधूरे थे, उन्होंने छापने में देर की और बाद में उनका लहजा बेहद टकराव वाला हो गया। पर इन सबके बावजूद एक बात नहीं बदलती: उनके पास बहुत मज़बूत व्यावहारिक सबूत था कि हाथ साफ कराने के बाद माताएं बहुत कम मर रही थीं। चिकित्सा जगत को इसे कहीं ज़्यादा गंभीरता से लेना चाहिए था।

यह सिर्फ 'हाथ धोने' की खोज नहीं थी

आज हम उन्हें "हाथ धोना सिखाने वाले डॉक्टर" कहकर छोटा कर देते हैं। असल में उनकी उपलब्धि इससे गहरी थी। उन्होंने चिकित्सा के सामने एक असुविधाजनक बात रखी: डॉक्टर खुद बीमारी फैलाने का ज़रिया हो सकता है। तब माना जाता था कि डॉक्टर इलाज देने वाला होता है। सेमेलवाइस ने दिखाया कि संक्रमण पर काबू न हो तो इलाज करने वाला हाथ ही बीमारी पहुंचा सकता है। आज के अस्पतालों की पूरी संक्रमण-नियंत्रण व्यवस्था, यानी हाथों की सफाई, औज़ारों को रोगाणुमुक्त करना, मरीजों के बीच संक्रमण रोकना और सर्जरी की साफ-सुथरी पद्धतियां, इसी सोच पर खड़ी है। इसलिए उनकी कहानी का सबसे बड़ा सबक उनका दुखद अंत भी नहीं है। असली सबक उस अस्पताल के दो वार्डों में छिपा है। एक में डॉक्टर और छात्र थे, दूसरे में दाइयां। एक में मौतें कहीं ज़्यादा थीं। सेमेलवाइस ने फर्क खोजा, एक सीधा-सा उपाय लागू किया, और मौतें नाटकीय रूप से घट गईं। सबूत सामने था, भले ही उसके पीछे काम कर रहे बैक्टीरिया को वे देख नहीं सकते थे। आज अस्पताल में किसी डॉक्टर को हाथ साफ करते देखकर शायद ही कोई सेमेलवाइस को याद करता हो। पर डेढ़ सौ साल पहले इसी साधारण-सी बात के लिए एक डॉक्टर को अपने दौर की स्थापित मान्यताओं से लड़ना पड़ा था। इसलिए उनकी कहानी हाथ धोने का इतिहास भर नहीं है। यह सबूत और रुतबे के टकराव का इतिहास है, और एक चेतावनी भी: विज्ञान में किसी विचार को सिर्फ इसलिए मत मानो कि वह नया है, लेकिन सिर्फ इसलिए मत ठुकराओ कि वह तुम्हें असुविधाजनक सच बता रहा है।

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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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