सिर्फ समय नहीं, आवाज की तीव्रता भी बिगाड़ती है सुनने की क्षमता; लंबे समय तक हेडफोन इस्तेमाल पर KGMU की चेतावनी

KGMU News: केजीएमयू के अध्ययन में लंबे समय तक ईयरफोन और हेडफोन के इस्तेमाल से सुनने की क्षमता पर संभावित असर के संकेत मिले हैं। तेज आवाज, लंबे समय और बार-बार ऑडियो एक्सपोजर से बचना कानों की सेहत के लिए जरूरी है।

Newstrack Network
Published on: 9 Aug 2026 6:14 PM IST (Updated on: 9 Aug 2026 6:15 PM IST)
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KGMU News: कानों पर लगातार चढ़े ईयरफोन, मोबाइल पर घंटों चलती रील्स, वेब सीरीज और तेज आवाज में संगीत—डिजिटल जीवन की ये सामान्य आदतें धीरे-धीरे सुनने की क्षमता पर असर डाल सकती हैं। किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) के फिजियोलॉजी विभाग के एक अध्ययन में यह संकेत मिला है कि लगातार लंबे समय तक मोबाइल ऑडियो, ईयरफोन या हेडफोन का इस्तेमाल करने वाले लोगों में सुनने की क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव देखा जा सकता है। हालांकि वैज्ञानिक दृष्टि से जोखिम केवल इस बात से तय नहीं होता कि हेडफोन एक घंटे लगाया गया या दो घंटे, बल्कि आवाज कितनी तेज थी, कितनी देर तक सुनी गई और यह आदत कितनी नियमित है, इन तीनों का संयुक्त प्रभाव महत्वपूर्ण होता है।

विभाग के 115वें स्थापना दिवस पर प्रस्तुत अध्ययन में 15 से 60 वर्ष आयु वर्ग के 100 से अधिक लोगों को शामिल किए जाने की जानकारी दी गई। विभागाध्यक्ष डॉ. श्रद्धा सिंह ने वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए अध्ययन के निष्कर्षों की जानकारी दी। शोध में लंबे समय तक व्यक्तिगत ऑडियो उपकरणों का इस्तेमाल करने वालों की श्रवण क्षमता की तुलना कम अवधि तक इन उपकरणों का उपयोग करने वालों से की गई।

अध्ययन को प्रकाशन के लिए वैज्ञानिक जर्नल में भेजे जाने की जानकारी भी दी गई है। इसलिए इसके अंतिम निष्कर्षों का पूर्ण वैज्ञानिक मूल्यांकन सहकर्मी समीक्षा और विस्तृत कार्यप्रणाली सामने आने के बाद ही किया जा सकेगा।

कान के भीतर आखिर होता क्या है?

हेडफोन या ईयरफोन से आने वाली तेज ध्वनि सीधे कान की नली से होकर पर्दे तक पहुंचती है। ध्वनि तरंगें कान के पर्दे और मध्य कान की छोटी हड्डियों को कंपन कराती हैं और यह ऊर्जा भीतरी कान के कॉक्लिया तक पहुंचती है।

कॉक्लिया में हजारों अत्यंत सूक्ष्म हेयर सेल्स होती हैं। ये कोशिकाएं ध्वनि के कंपन को विद्युत संकेतों में बदलती हैं, जिन्हें श्रवण तंत्रिका मस्तिष्क तक पहुंचाती है। समस्या तब शुरू होती है जब इन कोशिकाओं पर लगातार अत्यधिक ध्वनि ऊर्जा पड़ती है।

तेज आवाज के लंबे संपर्क से हेयर सेल्स पर यांत्रिक और जैव-रासायनिक तनाव बढ़ता है। कोशिकाओं में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस पैदा हो सकता है, उनकी सूक्ष्म संरचना क्षतिग्रस्त हो सकती है और श्रवण तंत्रिका से उनका संपर्क भी प्रभावित हो सकता है। मनुष्य में ये संवेदनशील हेयर सेल्स एक बार गंभीर रूप से नष्ट हो जाएं तो सामान्यतः दोबारा विकसित नहीं होतीं। यही कारण है कि noise-induced hearing loss कई मामलों में स्थायी हो सकता है।

एक घंटे का नियम पूर्ण वैज्ञानिक सीमा नहीं

KGMU के अध्ययन में एक घंटे से अधिक उपयोग करने वालों में श्रवण क्षमता प्रभावित होने का संकेत महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे यह नहीं समझना चाहिए कि 59 मिनट तक सुनना पूरी तरह सुरक्षित है और 61वें मिनट में नुकसान शुरू हो जाएगा।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार श्रवण सुरक्षा का सिद्धांत “ध्वनि स्तर × समय” पर आधारित है। लगभग 80 डेसिबल की ध्वनि को सप्ताह में करीब 40 घंटे तक सुनना अपेक्षाकृत सुरक्षित माना जाता है, लेकिन आवाज 90 डेसिबल पहुंचते ही सुरक्षित सुनने की अवधि लगभग चार घंटे प्रति सप्ताह रह जाती है। यानी केवल 10 डेसिबल की वृद्धि सुरक्षित एक्सपोजर को बहुत कम कर देती है। (World Health Organization⁠)

इसी तरह अमेरिका का NIOSH कार्यस्थल पर 85 dBA के लिए आठ घंटे की अनुशंसित सीमा मानता है और हर अतिरिक्त 3 dB वृद्धि पर सुरक्षित अवधि लगभग आधी मानी जाती है। (CDC⁠)

इसका अर्थ सरल है—आवाज जितनी तेज, कान उतनी कम देर तक उसे सुरक्षित रूप से सह सकता है।

100 डेसिबल पर कुछ मिनट भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं

डेसिबल का पैमाना सीधा गणितीय पैमाना नहीं बल्कि लॉगरिदमिक होता है। इसलिए 90 dB और 100 dB का अंतर सुनने में केवल “थोड़ा अधिक” लग सकता है, लेकिन ध्वनि ऊर्जा में अंतर बहुत बड़ा होता है।

कई स्मार्टफोन और हेडफोन अधिकतम वॉल्यूम पर 100 dB या उससे ऊपर के स्तर तक पहुंच सकते हैं। ऐसे स्तर पर लंबे समय तक सुनना सुरक्षित नहीं माना जाता। इसलिए केवल फोन की स्क्रीन पर दिखने वाला “50%” या “70%” वॉल्यूम हमेशा वास्तविक डेसिबल का सही संकेत नहीं देता; अलग-अलग हेडफोन की आउटपुट क्षमता अलग होती है।

शुरुआती नुकसान कई बार सुनाई नहीं देता

Noise-induced hearing loss की एक बड़ी समस्या यह है कि शुरुआती चरण में व्यक्ति को अक्सर लगता है कि उसकी सुनने की क्षमता सामान्य है। सबसे पहले उच्च आवृत्ति वाली ध्वनियां प्रभावित हो सकती हैं।

शुरुआती संकेतों में शामिल हो सकते हैं—

कानों में घंटी, सीटी या भनभनाहट महसूस होना,

भीड़ या शोर में बातचीत समझने में कठिनाई,

टीवी या मोबाइल का वॉल्यूम पहले से ज्यादा रखने की जरूरत,

संगीत सुनने के बाद कुछ समय तक आवाज मद्धम लगना,

कानों में भारीपन या “ब्लॉक” जैसा महसूस होना।

यदि तेज आवाज के बाद कुछ घंटों तक सुनाई कम देना और फिर सामान्य हो जाना शुरू हो, तो इसे भी सुरक्षित मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। इसे temporary threshold shift कहा जाता है और बार-बार ऐसा होना स्थायी नुकसान की दिशा में संकेत हो सकता है।

रील्स और शॉर्ट वीडियो क्यों बढ़ा सकते हैं खतरा?

रील्स, शॉर्ट वीडियो और लगातार बदलता कंटेंट उपयोगकर्ता को समय का अहसास कम होने देता है। व्यक्ति सोचता है कि वह “बस कुछ मिनट” मोबाइल चला रहा है, लेकिन सुनने का सत्र एक घंटे या उससे अधिक खिंच सकता है।

दूसरी समस्या यह है कि बस, मेट्रो, सड़क या जिम जैसे शोर वाले माहौल में लोग बाहरी आवाज दबाने के लिए हेडफोन का वॉल्यूम बढ़ा देते हैं। इससे कान को बाहरी शोर और हेडफोन की तेज ध्वनि—दोनों का भार झेलना पड़ सकता है।

ऐसी परिस्थितियों में noise-cancelling headphones उपयोगी हो सकते हैं, क्योंकि बाहरी शोर कम होने पर व्यक्ति को वॉल्यूम बहुत ज्यादा बढ़ाने की जरूरत नहीं पड़ती।

ईयरफोन और हेडफोन में कौन ज्यादा सुरक्षित?

वैज्ञानिक दृष्टि से मुख्य खतरा उपकरण के नाम से नहीं, बल्कि कान तक पहुंचने वाली ध्वनि ऊर्जा से निर्धारित होता है। फिर भी कान के भीतर लगाए जाने वाले ईयरबड्स ध्वनि स्रोत को कान के पर्दे के अधिक नजदीक ले आते हैं और शोर वाले वातावरण में लोग उनका वॉल्यूम अधिक बढ़ा सकते हैं।

ओवर-द-ईयर हेडफोन, खासकर अच्छी नॉइज-कैंसिलिंग क्षमता वाले, कई परिस्थितियों में कम वॉल्यूम पर भी स्पष्ट आवाज सुनने में मदद करते हैं। लेकिन यदि उन्हीं को बहुत तेज आवाज पर इस्तेमाल किया जाए तो वे भी सुरक्षित नहीं हैं।

‘60/60 नियम’ उपयोगी है, लेकिन वैज्ञानिक कानून नहीं

विशेषज्ञ अक्सर 60/60 नियम अपनाने की सलाह देते हैं—अधिकतम वॉल्यूम के लगभग 60 प्रतिशत तक सुनें और लगभग 60 मिनट बाद कानों को विराम दें। Mayo Clinic सहित कई चिकित्सा स्रोत इसे व्यावहारिक सुरक्षित-सुनने की आदत के रूप में सुझाते हैं। (Mayo Clinic News Network⁠)

लेकिन यह किसी सार्वभौमिक जैविक सीमा का नाम नहीं है। वास्तविक जोखिम डेसिबल स्तर और कुल एक्सपोजर पर निर्भर करेगा। इसलिए जहां संभव हो, फोन के हेडफोन सेफ्टी या डेसिबल मॉनिटरिंग फीचर का इस्तेमाल अधिक उपयोगी है।

कितने डेसिबल तक रखें आवाज?

WHO के अनुसार व्यक्तिगत ऑडियो उपकरणों के लिए सुरक्षित सुनने का उद्देश्य औसतन 80 dB से नीचे एक्सपोजर रखना है। बच्चों के लिए और भी कम स्तर बेहतर माना जाता है। (World Health Organization⁠)

व्यावहारिक रूप से यदि हेडफोन लगाए व्यक्ति के पास बैठा दूसरा व्यक्ति भी साफ-साफ संगीत सुन पा रहा है, तो वॉल्यूम संभवतः जरूरत से ज्यादा है।

मोबाइल फोन में उपलब्ध “Reduce Loud Sounds”, “Headphone Safety” या समान विकल्प सक्रिय करना भी उपयोगी हो सकता है।

स्क्रीन आंखों को, साउंड कानों को—दोहरा डिजिटल दबाव

लंबे समय तक रील्स या वीडियो देखने की आदत केवल कानों तक सीमित समस्या नहीं है। लंबे स्क्रीन टाइम के साथ आंखों में थकान, गर्दन और कंधों पर दबाव, नींद के समय में कमी और लगातार बैठे रहने जैसी समस्याएं भी जुड़ सकती हैं।

यदि इसी दौरान कान लगातार तेज ऑडियो के संपर्क में रहें, तो स्क्रीन और साउंड दोनों मिलकर डिजिटल स्वास्थ्य पर अतिरिक्त बोझ डालते हैं।

कब कराएं सुनने की जांच?

यदि कानों में बार-बार घंटी बजती हो, एक कान से आवाज कम सुनाई देने लगे, भीड़ में बातचीत समझने में कठिनाई हो या वॉल्यूम लगातार बढ़ाना पड़ रहा हो तो ENT विशेषज्ञ या ऑडियोलॉजिस्ट से जांच करानी चाहिए।

Pure Tone Audiometry श्रवण क्षमता मापने की मानक जांचों में से एक है। इसमें अलग-अलग आवृत्तियों पर व्यक्ति की सुनने की न्यूनतम सीमा का आकलन किया जाता है।

अचानक किसी एक या दोनों कान से सुनाई देना बहुत कम हो जाए तो इसे सामान्य हेडफोन थकान मानकर इंतजार नहीं करना चाहिए; ऐसी स्थिति तत्काल चिकित्सा मूल्यांकन की मांग कर सकती है।

कानों को सुरक्षित रखने के सात सरल तरीके

हेडफोन का वॉल्यूम जितना संभव हो कम रखें।

लगातार लंबे सत्र के बजाय नियमित ब्रेक लें।

शोर वाली जगह पर आवाज बढ़ाने की बजाय नॉइज-कैंसिलिंग का उपयोग करें।

मोबाइल की हेडफोन-सेफ्टी और डेसिबल चेतावनी सक्रिय रखें।

तेज संगीत सुनने के बाद कानों को शांत वातावरण दें।

कानों में घंटी या आवाज मद्धम लगने को चेतावनी मानें।

नियमित रूप से तेज ऑडियो सुनते हैं तो समय-समय पर श्रवण जांच कराएं।

असल संदेश-एक घंटा नहीं, ‘डोज’ महत्वपूर्ण

KGMU का अध्ययन डिजिटल ऑडियो की बढ़ती आदत पर महत्वपूर्ण चेतावनी देता है, लेकिन वैज्ञानिक निष्कर्ष इससे थोड़ा व्यापक है। कान के लिए खतरा केवल हेडफोन पहनने के समय से नहीं, बल्कि ध्वनि की तीव्रता × अवधि × बारंबारता से बनता है।

एक व्यक्ति कम आवाज में दो घंटे सुनकर सुरक्षित रह सकता है, जबकि दूसरा बहुत तेज आवाज में 20-30 मिनट सुनकर भी नुकसान का जोखिम बढ़ा सकता है।

इसलिए हेडफोन को दुश्मन मानने की जरूरत नहीं है। असली समस्या है बहुत तेज, बहुत देर और बार-बार सुनना। आधुनिक डिजिटल जीवन में कानों को बचाने का सबसे सरल विज्ञान यही है—आवाज घटाइए, बीच-बीच में विराम दीजिए और कानों को लगातार ध्वनि से उबरने का समय दीजिए।

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