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Ghutane Me Dard Ke Karan: महिलाओं के घुटने 40 के बाद जल्दी क्यों खराब होते हैं:
Mahila Ke Ghutane Me Dard Ke Karan: महिलाओं में 40-50 की उम्र के बाद घुटने का दर्द और Osteoarthritis क्यों बढ़ता है?
Mahila Ke Ghutane Me Dard Ke Karan | Women Knee Pain After 40 | Newstrack Hindi News
Mahila Ke Ghutane Me Dard Ke Karan: घुटनों का दर्द अब सिर्फ बुढ़ापे की समस्या नहीं रहा। चालीस-पैंतालीस साल की बहुत-सी महिलाएं सीढ़ियां चढ़ते समय दर्द, बैठकर उठने में दिक्कत, सुबह की अकड़न, चलते समय चरमराहट या घुटने के आसपास सूजन की शिकायत करती हैं। कुछ सालों में यही तकलीफ इतनी बढ़ जाती है कि ज़मीन पर बैठना, भारतीय शैली का शौचालय इस्तेमाल करना, पूजा के लिए पालथी मारना या थोड़ी दूर पैदल चलना भी मुश्किल हो जाता है।
आम बोलचाल में लोग कहते हैं कि घुटने घिस गए, गैप कम हो गया या ग्रीस खत्म हो गई। पर चिकित्सा विज्ञान के हिसाब से यह बात अधूरी है। ज़्यादातर मामलों में असली बीमारी घुटने का ऑस्टियोआर्थराइटिस (osteoarthritis) होती है। यह सिर्फ हड्डियों के बीच की गद्दी (कार्टिलेज, cartilage) घिसने की बीमारी नहीं है। यह पूरे जोड़ में धीरे-धीरे आने वाला बदलाव है, जिसमें कार्टिलेज, उसके नीचे की हड्डी, जोड़ की अंदरूनी झिल्ली, लिगामेंट (ligament), मांसपेशियां और आसपास के ऊतक सब प्रभावित हो सकते हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) के मुताबिक 2019 में दुनिया में करीब 52.8 करोड़ लोग ऑस्टियोआर्थराइटिस से प्रभावित थे, जो 1990 से 113 प्रतिशत ज़्यादा है। इनमें करीब 60 प्रतिशत महिलाएं थीं और लगभग 36.5 करोड़ लोगों में घुटना प्रभावित था। यानी शरीर के सारे जोड़ों में घुटना इस बीमारी का सबसे बड़ा ठिकाना है।
महिलाओं में खतरा ज़्यादा क्यों?
इसका कोई एक जवाब नहीं है। यह कहना भी ठीक नहीं कि हर महिला के घुटने पुरुषों से पहले खराब होते हैं। पर आबादी के स्तर पर देखें तो महिलाओं में, खासकर मध्य आयु और मेनोपॉज (रजोनिवृत्ति) के बाद, यह बीमारी ज़्यादा दिखती है। एक व्यवस्थित समीक्षा में भी महिलाओं में घुटने के ऑस्टियोआर्थराइटिस का कुल खतरा पुरुषों से ज़्यादा मिला। हालांकि अलग-अलग जोखिम कारणों में स्त्री-पुरुष के फर्क पर शोध अभी पूरी तरह पक्का नहीं है। यह सावधानी इसलिए ज़रूरी है कि सोशल मीडिया पर कभी एस्ट्रोजन (estrogen), कभी कैल्शियम और कभी घर के काम को पूरा दोष दे दिया जाता है, जबकि सच्चाई इन सबसे ज़्यादा उलझी हुई है।
दरअसल, महिला और पुरुष के शरीर की बनावट एक जैसी नहीं होती। कूल्हे की हड्डियों (पेल्विस) की बनावट, कूल्हे से घुटने तक पैर का कोण, मांसपेशियों की मात्रा और ताकत, लिगामेंट की खासियतें और चलते-बैठते समय जोड़ पर पड़ने वाला ज़ोर, इन सबमें फर्क हो सकता है। पर सिर्फ इन फर्कों को बीमारी का कारण मान लेना भी ठीक नहीं। घुटना बहुत जटिल जोड़ है जो शरीर का वज़न उठाता है। जांघ की हड्डी (फीमर, femur), पिंडली की हड्डी (टिबिया, tibia) और घुटने की टोपी (पटेला, patella) के सिरों पर चिकना कार्टिलेज होता है। मेनिस्कस (meniscus) झटके और वज़न को बांटने में मदद करता है। लिगामेंट जोड़ को स्थिर रखते हैं। जांघ की मांसपेशियां, खासकर क्वाड्रिसेप्स (quadriceps), घुटने पर आने वाले ज़ोर को संभालती हैं। इनमें से कोई हिस्सा कमज़ोर हुआ तो बाकी पर दबाव बढ़ता है। इसलिए घुटने को सिर्फ हड्डी घिसने के नज़रिए से समझना गलत है।
मेनोपॉज के बाद शिकायतें अचानक क्यों बढ़ती हैं?
करीब 50 की उम्र के बाद महिलाओं में ऑस्टियोआर्थराइटिस ज़्यादा दिखता है, और इसी समय मेनोपॉज की वजह से एस्ट्रोजन में बड़ी गिरावट आती है। जोड़ के कार्टिलेज समेत कई टिश्यू में एस्ट्रोजन से जुड़ी बायोलॉजिकल प्रतिक्रियाओं के सबूत मिले हैं। मध्य आयु की महिलाओं पर उपलब्ध शोध बताते हैं कि इस दौर में सिर्फ हार्मोन नहीं बदलते, हड्डियों का घनत्व, मांसपेशियों की मात्रा और ताकत, टेंडन और दर्द महसूस करने की प्रक्रिया भी बदल सकती है। ये सब मिलकर घुटने की समस्या पर असर डाल सकते हैं।
लेकिन यह कहना कि ‘एस्ट्रोजन कम हुआ, इसलिए घुटना खराब हो गया’, अभी साबित हो चुकी बात नहीं है। दशकों से एस्ट्रोजन और ऑस्टियोआर्थराइटिस के रिश्ते पर अध्ययन हो रहे हैं, पर नतीजे मिले-जुले हैं। कुछ अध्ययनों में हार्मोन थेरेपी का संभावित फायदा दिखा, कुछ में नहीं। इसलिए सिर्फ घुटने बचाने के लिए खुद से हार्मोन लेना वैज्ञानिक रूप से सही सलाह नहीं है। 2023 की एक समीक्षा ने भी यही निष्कर्ष निकाला कि एस्ट्रोजन को स्त्री-पुरुष फर्क का अकेला कारण बताने के लिए अभी पक्के सबूत नहीं हैं।
सबसे बड़ा दुश्मन: बढ़ता वज़न
घुटनों की बीमारी के बढ़ने में मोटापा शायद सबसे अहम, और बदला जा सकने वाला, कारण है। घुटना वज़न उठाने वाला जोड़ है, इसलिए शरीर का अतिरिक्त वज़न उसके लिए सिर्फ तराजू पर बढ़े कुछ किलो नहीं होता। चलने, सीढ़ियां चढ़ने और उठने-बैठने में घुटने पर शरीर के वज़न से कई गुना तक ज़ोर पड़ सकता है। लंबे समय तक वज़न ज़्यादा रहे तो जोड़ को करोड़ों कदमों में यह अतिरिक्त बोझ सहना पड़ता है। पर बात सिर्फ इतनी नहीं कि भारी शरीर घुटने को दबाता है। चर्बी का ऊतक जैविक रूप से सक्रिय होता है। उससे निकलने वाले कई रसायन शरीर में हल्की सूजन और चयापचय (metabolism) के बदलावों से जुड़े हैं। इसलिए आज का चिकित्सा विज्ञान मोटापे और ऑस्टियोआर्थराइटिस के रिश्ते को दोनों तरह से देखता है: यांत्रिक बोझ भी और जैविक असर भी। डब्लूएचओ भी ज़्यादा वज़न को कूल्हे और घुटने के ऑस्टियोआर्थराइटिस का प्रमुख जोखिम कारण मानता है। स्त्री-पुरुष जोखिम कारणों की समीक्षा में ऊंचा बीएमआई (BMI) महिलाओं में खास तौर पर अहम संकेत के रूप में सामने आया, हालांकि शोधकर्ता मानते हैं कि इस क्षेत्र में और अच्छे अध्ययन चाहिए। भारतीय महिलाओं के संदर्भ में यह और अहम हो सकता है। मध्य आयु में शारीरिक गतिविधि घटती है, ऊर्जा का खर्च कम होता है, शरीर की बनावट बदलती है और वज़न बढ़ सकता है। अगर उसी समय मांसपेशियों की ताकत भी घट रही हो, तो घुटने पर दोहरी मार पड़ती है: ऊपर से बोझ बढ़ रहा है और उसे संभालने वाली मांसपेशियां कमज़ोर हो रही हैं।
कमज़ोर मांसपेशियां: जिस कारण पर सबसे कम ध्यान जाता है
घुटने की रक्षा सिर्फ कार्टिलेज नहीं करता। मज़बूत जांघ की मांसपेशियां उसका सक्रिय सुरक्षा कवच हैं। खासकर क्वाड्रिसेप्स कमज़ोर हों, तो बैठकर उठने, सीढ़ी चढ़ने-उतरने और चलने में घुटने को संभालना मुश्किल हो जाता है। दिक्कत यह है कि दर्द शुरू होते ही इंसान चलना कम कर देता है। चलना कम हुआ तो मांसपेशियां और कमज़ोर हुईं। मांसपेशियां कमज़ोर हुईं तो हलचल और कठिन हुई। वज़न बढ़ा और घुटने पर दबाव और बढ़ा। इस तरह एक दुष्चक्र बन जाता है: दर्द → कम हलचल → कमज़ोर मांसपेशियां → वज़न और कामकाज की दिक्कत → और ज़्यादा दर्द।
इसीलिए घुटने में दर्द है तो बिल्कुल मत चलिए, जैसी आम सलाह कई मामलों में उलटी पड़ सकती है। डब्लूएचओ भी ऑस्टियोआर्थराइटिस के इलाज में सही व्यायाम, स्वस्थ वज़न और मज़बूत मांसपेशियों को अहम मानता है। हां, कौन-सा व्यायाम और कितना करना है, यह उम्र, दर्द, सूजन, जोड़ की हालत और दूसरी बीमारियों को देखकर तय होना चाहिए।
घर का काम और बार-बार बैठना भी असर डालते हैं
भारतीय जीवनशैली का एक और पहलू है। सालों तक ज़मीन पर बैठकर काम करना, बार-बार उकड़ू बैठना, घुटनों को बहुत मोड़कर उठना-बैठना, भारी सामान उठाना और लगातार सीढ़ियां चढ़ना घुटने पर ज़्यादा बोझ डाल सकता है, खासकर तब जब पहले से मोटापा, कमज़ोर मांसपेशियां, पुरानी चोट या जोड़ की बनावट की कोई दिक्कत हो। मेनोपॉज से जुड़े भारतीय क्लिनिकल दिशानिर्देशों में भी उम्र, वज़न, महिला होना, क्वाड्रिसेप्स की कमज़ोरी और सीढ़ियां चढ़ने या बार-बार स्क्वाट (squat) जैसी मुद्रा को अहम कारणों में गिना गया है।
इसका मतलब यह नहीं कि ज़मीन पर बैठना अपने आप में बीमारी है या हर महिला को पालथी मारना बंद कर देना चाहिए। हमारे जोड़ चलने-फिरने के लिए बने हैं और सही हलचल उनके लिए ज़रूरी है। दिक्कत तब होती है जब बहुत ज़्यादा दोहराव वाला बोझ, कमज़ोर मांसपेशियां, अतिरिक्त वज़न, पुरानी चोट और बढ़ती उम्र एक साथ जुट जाएं। असली बात शरीर की क्षमता और उस पर डाले गए बोझ के बीच का संतुलन है।
क्या कैल्शियम और विटामिन-डी की कमी से घुटना खराब हो जाता है?
यह सबसे आम भ्रमों में से एक है। कैल्शियम और विटामिन-डी हड्डियों और मांसपेशियों की सेहत के लिए ज़रूरी हैं, और उनकी कमी से अलग दिक्कतें हो सकती हैं। पर घुटने का ऑस्टियोआर्थराइटिस सिर्फ कैल्शियम की कमी की बीमारी नहीं है। ऑस्टियोपोरोसिस (osteoporosis) और ऑस्टियोआर्थराइटिस एक ही बीमारी नहीं हैं। ऑस्टियोपोरोसिस में मुख्य दिक्कत हड्डी का कमज़ोर और कम घना होना है, जबकि ऑस्टियोआर्थराइटिस पूरे जोड़ में होने वाली बनावट और जैविक गड़बड़ी है। किसी महिला को दोनों एक साथ भी हो सकती हैं, पर एक को दूसरे का पर्याय नहीं समझना चाहिए। इसी तरह घुटने की ग्रीस खत्म हो गई जैसी बात भी सटीक बात नहीं है। जोड़ के अंदर चिकना द्रव (सिनोवियल फ्लूइड, synovial fluid) ज़रूर होता है, पर ऑस्टियोआर्थराइटिस किसी मशीन के बेयरिंग में तेल कम होने जैसी समस्या नहीं है। कार्टिलेज की बनावट बदलती है, हड्डी प्रतिक्रिया करती है, कभी हड्डी के किनारों पर नुकीले उभार (ऑस्टियोफाइट, osteophytes) बन जाते हैं, जोड़ की झिल्ली में सूजन आ सकती है, और आसपास की मांसपेशियां व दूसरे ऊतक भी प्रभावित होते हैं।
बीमारी इतनी तेज़ी से बढ़ती क्यों दिख रही है?
पहला कारण है आबादी का बूढ़ा होना। लोग पहले से ज़्यादा साल जी रहे हैं, और इस बीमारी का खतरा उम्र के साथ बढ़ता है। दूसरा बड़ा कारण मोटापा है। तीसरा चोट और लंबे समय तक जोड़ पर पड़ने वाला असामान्य बोझ। चौथा कारण यह है कि आज बीमारी की पहचान और इलाज तक पहुंच बेहतर है। जो लोग पहले इसे उम्र का दर्द मानकर घर बैठ जाते थे, वे अब जांच और इलाज तक पहुंच रहे हैं। बूढ़ी होती आबादी, बढ़ते मोटापे और चोटों की वजह से आने वाले सालों में इसका बोझ और बढ़ने की आशंका है। 1990 से 2019 के बीच प्रभावित लोगों की कुल संख्या में 113 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज हुई। इसका मतलब यह नहीं कि इंसानी घुटना अचानक कमज़ोर हो गया है। इसका बड़ा हिस्सा आबादी बढ़ने, लोगों के लंबा जीने और मोटापे जैसे खतरों के फैलने से जुड़ा है।
घुटना कब इशारा देने लगता है?
ऑस्टियोआर्थराइटिस आम तौर पर धीरे-धीरे बढ़ता है। शुरू में ज़्यादा देर चलने, सीढ़ियां चढ़ने-उतरने या कुर्सी से उठने पर दर्द हो सकता है। कुछ लोगों को आराम के बाद उठते समय जकड़न लगती है, जो चलने पर कम हो जाती है। घुटना मोड़ने पर आवाज़ आ सकती है। बीमारी बढ़ने पर सूजन, हिलने-डुलने में कमी और पैर की आकृति में बदलाव तक हो सकता है। गंभीर हालत में आराम करते समय भी दर्द रह सकता है। दर्द, सूजन, जकड़न और जोड़ चलाने में कठिनाई को मुख्य लक्षण माना जाता है।
लेकिन घुटने की हर आवाज़ बीमारी नहीं होती। बिना दर्द के कभी-कभार चरमराहट या क्लिक की आवाज़ का मतलब यह नहीं कि कार्टिलेज खत्म हो रहा है। इसी तरह एक्स-रे के बदलाव और मरीज़ का दर्द हमेशा बराबर अनुपात में नहीं चलते। किसी के एक्स-रे में काफी बदलाव हों पर दर्द कम हो, तो किसी और को कम बदलाव के बावजूद ज़्यादा तकलीफ हो सकती है। इसलिए डॉक्टर सिर्फ एक्स-रे नहीं, दर्द, रोज़मर्रा की गतिविधि, जांच और मरीज़ की पूरी हालत देखते हैं।
क्या घुटना बचाया नहीं जा सकता?
यह दूसरा बड़ा भ्रम है। ऑस्टियोआर्थराइटिस में जो कार्टिलेज पहले ही नष्ट हो चुका है, उसे किसी साधारण गोली या तेल से पूरी तरह नया बना देना आज की चिकित्सा में संभव नहीं है। पर इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं कि कुछ किया ही नहीं जा सकता। लक्षणों, कामकाज की क्षमता और आगे के अनावश्यक बोझ पर काफी असर डाला जा सकता है।
इलाज की बुनियाद ये हैं:
- सही वज़न
- नियमित और सही किस्म का व्यायाम
- जांघ और कूल्हे की मांसपेशियों को मज़बूत करना
- ज़रूरत के हिसाब से फिज़ियोथेरेपी (physiotherapy)
- रोज़मर्रा की गतिविधियों में समझदारी भरे बदलाव
- डॉक्टर की देखरेख में दर्द पर काबू
गंभीर हालत में, जब घुटना रोज़ का काम बहुत सीमित कर दे, तब घुटना प्रत्यारोपण (knee replacement) जैसी सर्जरी काम आ सकती है। पर हर घुटने के दर्द का रास्ता ऑपरेशन तक नहीं जाता। WHO भी व्यायाम, स्वस्थ आहार, वज़न प्रबंधन और पुनर्वास को इलाज की केंद्रीय रणनीति मानता है। तेल-मालिश, तरह-तरह के सप्लीमेंट, कार्टिलेज दोबारा बनाने वाले चमत्कारी उत्पाद और बिना डॉक्टरी जांच के लगातार दर्द की गोलियां लेना इस समस्या का वैज्ञानिक हल नहीं है। खासकर लंबे समय तक खुद से दर्दनिवारक दवाएं लेना उन लोगों के लिए जोखिम भरा हो सकता है जिन्हें पेट, गुर्दे या ब्लड प्रेशर की दिक्कत है। इलाज हर व्यक्ति की हालत के हिसाब से होना चाहिए।
चालीस के बाद महिलाओं को क्या करना चाहिए?
सबसे काम की सोच यह है कि घुटने को दर्द शुरू होने के बाद नहीं, उससे पहले बचाया जाए।
- वज़न स्वस्थ सीमा में रखें।
- लंबे समय तक निष्क्रिय न रहें।
- नियमित चलें और अपनी क्षमता के हिसाब से ताकत बढ़ाने वाले व्यायाम करें।
- जांघ और कूल्हे की मांसपेशियों को मज़बूत रखें।
- पुरानी घुटने की चोट को नज़रअंदाज़ न करें।
- लंबे समय तक घुटने को बहुत मोड़कर किए जाने वाले काम को शरीर की क्षमता के हिसाब से संभालें।
अगर वज़न पहले से ज़्यादा है, तो उसे घटाना सिर्फ डायबिटीज़ या दिल की बीमारी के लिए नहीं, घुटने के लिए भी एक अहम निवेश है। डब्लूएचओ भी स्वस्थ वज़न, नियमित शारीरिक गतिविधि और जोड़ के ज़रूरत से ज़्यादा इस्तेमाल से बचने को रोकथाम और नियंत्रण का अहम हिस्सा मानता है। एक बात खास तौर पर याद रखें: दर्द होते ही हलचल पूरी तरह बंद कर देना हल नहीं है। सही व्यायाम इलाज का हिस्सा है। किसी के लिए पैदल चलना ठीक रहेगा, किसी के लिए साइकिल चलाना या पानी में व्यायाम, और किसी को नियंत्रित ताकत वाले अभ्यास की ज़रूरत होगी। पर ये हालात सामान्य घिसाव मानकर नहीं छोड़ने चाहिए, क्योंकि इनके पीछे चोट, संक्रमण, गाउट (gout) या कोई और बीमारी भी हो सकती है। तेज़ दर्द, अचानक बहुत ज़्यादा सूजन, घुटना लाल और गर्म होना, बुखार के साथ दर्द, चोट के बाद पैर पर वज़न न डाल पाना या घुटने का अटक जाना (लॉक होना) किसी अन्य बीमारी का संकेत हो सकता है।
सिर्फ उम्र की वजह से नहीं हारता महिलाओं का घुटना
महिलाओं के घुटनों की समस्या को उम्र हो गई, कैल्शियम कम है या मेनोपॉज हो गया कहकर निपटा देना इस बीमारी को बहुत छोटा करके देखना है। असल में उम्र, महिला शरीर की जैविक खासियतें, मेनोपॉज के आसपास हार्मोन और शरीर की बनावट के बदलाव, बढ़ता वज़न, कमज़ोर मांसपेशियां, पुरानी चोटें, बार-बार पड़ने वाला बोझ, आनुवंशिक झुकाव और जीवनशैली, ये सब मिलकर खतरा बनाते हैं। एस्ट्रोजन इस कहानी का हिस्सा हो सकता है, पर उसे पूरी कहानी मानने के सबूत अभी नहीं हैं। शायद बढ़ने से रोका नहीं जा सकता, पर वज़न, मांसपेशियों की ताकत, शारीरिक सक्रियता, चोट से बचाव और समय पर इलाज जैसी कई चीज़ें हमारे हाथ में हैं। इसलिए महिलाओं के घुटनों की बढ़ती समस्या को सिर्फ इलाज का मामला समझना अधूरा नज़रिया है। इसे चालीस-पचास के बाद शुरू होने वाली बीमारी मानने के बजाय, तीस और चालीस की उम्र से ही घुटनों की सेहत बचाने की जन-स्वास्थ्य चुनौती के रूप में देखना ज़्यादा काम का होगा। यही फर्क आने वाले दशकों में लाखों महिलाओं को दर्द, चलने-फिरने की मजबूरी और आखिर में बड़े ऑपरेशन तक पहुंचने से बचा सकता है।


