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Vaccine History: वैक्सीन की दुनिया के बड़े नायक मौरिस हिलमैन को क्यों कम लोग जानते हैं?
Vaccine History: मौरिस हिलमैन कौन थे? जानिए 40 से ज्यादा वैक्सीनों के विकास में उनके योगदान, MMR और हेपेटाइटिस B वैक्सीन की कहानी और 1957 की एशियाई फ्लू महामारी में उनकी भूमिका।
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Vaccine History: एक वैज्ञानिक ऐसी वैक्सीन बनाने में योगदान देता है, जो बच्चों को खतरनाक बीमारियों से बचाती हैं। उसकी रिसर्च की बदौलत मम्प्स, खसरा, रूबेला और हेपेटाइटिस जैसी बीमारियों के खिलाफ वैक्सीन विकसित होती हैं। वह पोलियो और कई दूसरी संक्रामक बीमारियों के खिलाफ टीकों के विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उसके काम से दुनिया भर में सार्वजनिक स्वास्थ्य को फायदा पहुंचता है। फिर भी, अगर आप सड़क पर किसी से पूछें कि इन वैक्सीनों के पीछे काम करने वाले वैज्ञानिक का नाम क्या था, तो शायद बहुत कम लोग जवाब दे पाएंगे।
उस वैज्ञानिक का नाम था डॉ. मौरिस राल्फ हिलमैन (Maurice Ralph Hilleman)। हिलमैन ने अपने करियर में 40 से अधिक वैक्सीनों के विकास में योगदान दिया। उन्हें आधुनिक वैक्सीन विज्ञान के सबसे प्रभावशाली वैज्ञानिकों में गिना जाता है। उनके काम ने बच्चों के टीकाकरण और संक्रामक बीमारियों की रोकथाम को गहराई से प्रभावित किया। लेकिन उनकी कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा सिर्फ यह नहीं कि उन्होंने कितनी वैक्सीनों पर काम किया। असली कहानी है उनकी वैज्ञानिक दूरदृष्टि, बीमारी के सामने तेजी से निर्णय लेने की क्षमता और उस प्रयोगशाला की, जहां ऐसे टीके विकसित हुए जिन्होंने दुनिया भर में स्वास्थ्य सुरक्षा को मजबूत किया। और इसी कहानी में आती है साल 1957 की इन्फ्लुएंजा महामारी, जिसने वैज्ञानिकों के सामने एक बेहद मुश्किल चुनौती रख दी थी।
साल 1957: जब एक अखबार की खबर ने वैज्ञानिक को खतरे का अंदाजा दे दिया
अप्रैल 1957 में मौरिस हिलमैन अमेरिका के वाल्टर रीड आर्मी मेडिकल सेंटर में काम कर चुके अनुभवी वायरोलॉजिस्ट थे। उन्हें इन्फ्लुएंजा वायरस पर काम करने का अनुभव था और वे जानते थे कि फ्लू के वायरस में बदलाव किस तरह नई महामारी का कारण बन सकता है। इसी दौरान उनकी नजर हांगकांग में फैल रही एक गंभीर फ्लू की खबर पर पड़ी। खबर में बीमार लोगों की भारी संख्या और अस्पतालों में उमड़ती भीड़ का जिक्र था। हिलमैन ने इस प्रकोप को सिर्फ किसी स्थानीय बीमारी के रूप में नहीं देखा। उन्हें शक हुआ कि यह वायरस जल्द ही दुनिया के दूसरे हिस्सों तक पहुंच सकता है। उनका डर सही साबित हुआ। यह बीमारी 1957 की एशियाई फ्लू महामारी थी, जो इन्फ्लुएंजा A के H2N2 स्ट्रेन के कारण फैली। इन्फ्लुएंजा वायरस लगातार बदलते रहते हैं। कभी-कभी उनमें इतने बड़े बदलाव हो जाते हैं कि लोगों की पहले से मौजूद प्रतिरक्षा नए वायरस को पहचानने में पर्याप्त सक्षम नहीं होती। ऐसी स्थिति में वायरस तेजी से फैल सकता है, क्योंकि बड़ी आबादी उसके प्रति संवेदनशील होती है। हिलमैन ने समझ लिया कि अगर नए वायरस के खिलाफ वैक्सीन बनाने में देर हुई, तो बीमारी अमेरिका में बड़े पैमाने पर फैल सकती है।
उस समय आधुनिक जीनोमिक सीक्वेंसिंग और आज जैसी तेज वैज्ञानिक तकनीकें उपलब्ध नहीं थीं। वायरस की पहचान करना, उसके खिलाफ वैक्सीन तैयार करना और फिर बड़े पैमाने पर उत्पादन करना बेहद कठिन काम था। लेकिन महामारी के सामने सबसे बड़ा सवाल यही था: क्या वैक्सीन तब तक तैयार हो सकती है, जब तक वायरस लाखों लोगों तक पहुंचता? इस सवाल का जवाब देने के लिए हिलमैन ने तेजी से काम शुरू किया।
वैक्सीन बनाने की दौड़ भी शुरू कराई
हिलमैन ने नए वायरस के बारे में जानकारी जुटाई और यह पता लगाने की कोशिश की कि लोगों में उसके खिलाफ पहले से कितनी प्रतिरक्षा मौजूद है। उन्हें पता चला कि यह नया वायरस उस समय प्रचलित फ्लू वायरस से अलग था और बड़ी आबादी के पास इसके खिलाफ पर्याप्त एंटीबॉडी नहीं थीं। इसका मतलब था कि संक्रमण फैलने पर बहुत से लोग बीमार पड़ सकते थे। उन्होंने वैक्सीन बनाने वाली कंपनियों को वायरस के नमूने उपलब्ध कराने और जल्द से जल्द वैक्सीन तैयार करने की दिशा में काम करने के लिए प्रेरित किया। यह सिर्फ एक वैज्ञानिक की प्रयोगशाला में किया गया काम नहीं था। वैक्सीन तैयार करने के लिए वैज्ञानिकों, निर्माताओं और सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थानों के बीच तालमेल जरूरी था। वैक्सीन बनाना एक बात है, लेकिन करोड़ों लोगों तक पहुंचाने लायक मात्रा में उसका उत्पादन करना बिल्कुल अलग चुनौती है। हिलमैन ने इस प्रक्रिया को गति देने में अहम भूमिका निभाई। अमेरिकी वैक्सीन निर्माताओं ने तेजी से काम किया और कुछ ही महीनों में लाखों खुराकें तैयार की गईं। इस प्रयास के तहत अमेरिका में लगभग 4 करोड़ वैक्सीन खुराकें तैयार हुईं। इससे महामारी के असर को कम करने में मदद मिली।
यह कहना कि हिलमैन ने अकेले महामारी को पूरी तरह रोक दिया, सही नहीं होगा। 1957 की एशियाई फ्लू महामारी दुनिया भर में फैली और अनुमान है कि इसने वैश्विक स्तर पर लगभग 10 लाख से 20 लाख लोगों की जान ली। अमेरिका में भी इसके कारण हजारों लोगों की मृत्यु हुई। हिलमैन की उपलब्धि यह थी कि उन्होंने खतरे को जल्दी पहचाना, वैक्सीन बनाने के प्रयासों को तेज करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और अमेरिका में वैक्सीन उपलब्ध कराने की प्रक्रिया को गति दी। इसने महामारी के खिलाफ सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रतिक्रिया को मजबूत किया। यानी उन्होंने उस समय उपलब्ध विज्ञान का इस्तेमाल करके दुनिया को उससे लड़ने का एक महत्वपूर्ण हथियार दिया।
मौरिस हिलमैन का सफर: एक छोटे से फार्म से दुनिया की सबसे बड़ी प्रयोगशालाओं तक
मौरिस हिलमैन का जन्म 30 अगस्त 1919 को अमेरिका के मोंटाना राज्य में हुआ था। उनका बचपन किसी बड़े शहर या संपन्न वैज्ञानिक परिवार में नहीं, बल्कि एक ग्रामीण इलाके में बीता। उनकी शुरुआती जिंदगी आसान नहीं थी। परिवार की आर्थिक परिस्थितियां सीमित थीं और कम उम्र में ही उन्हें जीवन की कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। लेकिन पढ़ाई के प्रति उनकी रुचि ने आगे बढ़ने का रास्ता बनाया। उन्होंने मोंटाना स्टेट यूनिवर्सिटी में पढ़ाई की और बाद में शिकागो विश्वविद्यालय से माइक्रोबायोलॉजी में डॉक्टरेट हासिल की। इसके बाद वे ऐसे वैज्ञानिक करियर की ओर बढ़े, जिसमें वायरस और संक्रामक बीमारियों को समझना उनका मुख्य काम बन गया। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान और उसके बाद संक्रामक बीमारियां सेना और आम जनता, दोनों के लिए बड़ी चुनौती थीं। हिलमैन ने श्वसन संबंधी बीमारियों और इन्फ्लुएंजा पर काम किया। इस दौरान उन्होंने यह समझने में महत्वपूर्ण योगदान दिया कि फ्लू वायरस समय के साथ कैसे बदलते हैं और उन बदलावों का वैक्सीन बनाने पर क्या असर पड़ता है। 1957 में वे दवा कंपनी मर्क (Merck) से जुड़े। वहां उन्होंने दशकों तक वैक्सीन रिसर्च का नेतृत्व किया और अपनी टीम के साथ कई महत्वपूर्ण टीकों के विकास में योगदान दिया। उनकी कहानी का खास पहलू यह था कि वे सिर्फ प्रयोगशाला में किसी वायरस को समझकर संतुष्ट नहीं होते थे। वे उस वैज्ञानिक जानकारी को ऐसी वैक्सीन में बदलना चाहते थे, जो वास्तव में लोगों को बीमारी से बचा सके।
40 से ज्यादा वैक्सीन: आखिर उन्होंने कौन-कौन से टीके बनाने में योगदान दिया?
हिलमैन के योगदान का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उनके करियर में विकसित की गई वैक्सीनों में कई ऐसी हैं, जो आधुनिक टीकाकरण कार्यक्रमों के इतिहास में बेहद महत्वपूर्ण साबित हुईं। उन्होंने खसरा (Measles) की वैक्सीन को बेहतर बनाने में योगदान दिया। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, 1968 में हिलमैन ने खसरे के वायरस को चिकन एम्ब्रियो कोशिकाओं में बार-बार विकसित करके कमजोर किया। इससे वैक्सीन का एक बेहतर संस्करण तैयार करने में मदद मिली। इस स्ट्रेन से विकसित वैक्सीन के कुछ रूप आज भी खसरे के टीकों के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। लेकिन उनका योगदान खसरे तक सीमित नहीं था। उन्होंने मम्प्स यानी गलसुआ, रूबेला, हेपेटाइटिस A और हेपेटाइटिस B जैसी बीमारियों के खिलाफ वैक्सीनों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी टीम ने चिकनपॉक्स, न्यूमोकोकल संक्रमण और अन्य गंभीर संक्रामक बीमारियों के खिलाफ टीके विकसित करने में भी योगदान दिया। उनके काम का असर बच्चों के टीकाकरण से लेकर वयस्कों में संक्रमण की रोकथाम तक फैला हुआ था। हिलमैन की असाधारण उपलब्धि यह थी कि उन्होंने अपने लंबे करियर में बार-बार ऐसे शोध का नेतृत्व किया, जिससे नए टीके विकसित हुए या मौजूदा टीकों को बेहतर बनाया जा सका। और उनकी सबसे दिलचस्प कहानियों में से एक उनके अपने घर से जुड़ी है।
पिता ने बीमारी के नमूने में वैज्ञानिक संभावना देखी
साल 1963 में हिलमैन की छोटी बेटी जेरिल लिन (Jeryl Lynn) को मम्प्स यानी गलसुआ हो गया। मम्प्स एक संक्रामक वायरल बीमारी है, जो अक्सर बच्चों में देखने को मिलती है। इससे गालों और जबड़े के आसपास मौजूद लार ग्रंथियों में सूजन आ सकती है। कुछ मामलों में यह गंभीर जटिलताएं भी पैदा कर सकती है। हिलमैन उस समय वैक्सीन रिसर्च में काम कर रहे थे। उन्होंने अपनी बेटी के गले से वायरस का नमूना लिया और प्रयोगशाला में उसका अध्ययन शुरू किया। यह एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक अवसर था। अगर वायरस के उपयुक्त स्ट्रेन को कमजोर किया जा सके और उससे सुरक्षित प्रतिरक्षा विकसित की जा सके, तो मम्प्स के खिलाफ वैक्सीन बनाई जा सकती थी। आगे चलकर इसी नमूने से प्राप्त वायरस स्ट्रेन का इस्तेमाल मम्प्स वैक्सीन विकसित करने में हुआ। इस स्ट्रेन को उनकी बेटी के नाम पर Jeryl Lynn strain कहा गया। इस पर आधारित वैक्सीन को 1967 में अमेरिका में लाइसेंस मिला। इस कहानी में एक भावनात्मक पहलू जरूर है, लेकिन इसकी वैज्ञानिक अहमियत उससे भी बड़ी है। किसी संक्रमित व्यक्ति से वायरस का नमूना लेना, उसे प्रयोगशाला में विकसित करना, उसकी विशेषताओं को समझना और फिर सुरक्षित वैक्सीन तैयार करना लंबी वैज्ञानिक प्रक्रिया है। हिलमैन ने अपनी बेटी की बीमारी को सिर्फ एक पारिवारिक परेशानी के रूप में नहीं देखा। उन्होंने उसमें ऐसी रिसर्च की संभावना पहचानी, जो भविष्य में दूसरे बच्चों को भी उस बीमारी से बचाने में मदद कर सकती थी। यह उस तरह की वैज्ञानिक सोच का उदाहरण है, जिसमें किसी बीमारी के कारण को समझना ही नहीं, बल्कि उससे बचाव का व्यावहारिक तरीका खोजना भी जरूरी होता है।
तीन बीमारियां, एक इंजेक्शन: MMR वैक्सीन की कहानी
हिलमैन की एक और बड़ी उपलब्धि थी तीन अलग-अलग बीमारियों के टीकों को एक संयुक्त वैक्सीन में शामिल करने में उनकी भूमिका। खसरा, मम्प्स और रूबेला। तीनों वायरस से होने वाली बीमारियां हैं, लेकिन इनके प्रभाव अलग-अलग हो सकते हैं। खसरा गंभीर जटिलताएं पैदा कर सकता है, मम्प्स में लार ग्रंथियों में सूजन आ सकती है और रूबेला गर्भावस्था के दौरान संक्रमण होने पर गर्भस्थ शिशु को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है। अलग-अलग बीमारियों के लिए अलग टीके लगाने के बजाय, क्या एक ही वैक्सीन में तीनों के खिलाफ सुरक्षा दी जा सकती है? हिलमैन और उनकी टीम ने इस दिशा में महत्वपूर्ण काम किया। 1971 में उन्होंने खसरा, मम्प्स और रूबेला के टीकों को मिलाकर MMR वैक्सीन तैयार करने में अहम भूमिका निभाई। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी अपने टीकाकरण इतिहास में इस योगदान को दर्ज करता है। इसका फायदा केवल यह नहीं था कि बच्चों को एक ही इंजेक्शन में तीन बीमारियों से सुरक्षा मिल सकती थी। संयुक्त वैक्सीन ने टीकाकरण कार्यक्रमों को व्यवस्थित करने और कई संक्रमणों के खिलाफ प्रतिरक्षा उपलब्ध कराने में भी मदद की। आज MMR वैक्सीन दुनिया के कई देशों के नियमित टीकाकरण कार्यक्रमों का हिस्सा है।
हेपेटाइटिस B की वैक्सीन: एक और बड़ी उपलब्धि
हिलमैन के योगदान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हेपेटाइटिस B के खिलाफ वैक्सीन के विकास से जुड़ा है। हेपेटाइटिस B वायरस लिवर को प्रभावित करता है। कुछ लोगों में संक्रमण लंबे समय तक बना रह सकता है और आगे चलकर लिवर सिरोसिस या लिवर कैंसर जैसी गंभीर समस्याओं का जोखिम बढ़ा सकता है। इस बीमारी के खिलाफ वैक्सीन विकसित करना सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण था। 1970 के दशक में हिलमैन और उनके सहयोगियों ने हेपेटाइटिस B वायरस से जुड़े एक प्रोटीन का इस्तेमाल करके वैक्सीन विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण काम किया। शुरुआती वैक्सीन में संक्रमित लोगों के रक्त से प्राप्त वायरस के सतही एंटीजन को शुद्ध करके इस्तेमाल किया जाता था। इस प्रक्रिया में सुरक्षा और शुद्धता सुनिश्चित करना बेहद महत्वपूर्ण था। बाद में रिकॉम्बिनेंट DNA तकनीक पर आधारित हेपेटाइटिस B वैक्सीन विकसित हुई, जिसमें वायरस के सतही प्रोटीन को बनाने के लिए जेनेटिक इंजीनियरिंग का इस्तेमाल किया गया। हिलमैन के शुरुआती काम ने इस क्षेत्र की प्रगति में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
इतना बड़ा वैज्ञानिक, फिर दुनिया उन्हें कम क्यों जानती है?
जोनास सॉल्क का नाम सुनते ही पोलियो वैक्सीन याद आती है। अलेक्जेंडर फ्लेमिंग का नाम पेनिसिलिन की खोज के साथ जुड़ा है। लेकिन मौरिस हिलमैन का नाम आम लोगों के बीच उतना लोकप्रिय क्यों नहीं हुआ? इसका एक कारण यह है कि वैज्ञानिक खोजें हमेशा किसी एक व्यक्ति की पहचान से नहीं जुड़तीं। खासकर वैक्सीन का विकास एक लंबी प्रक्रिया है, जिसमें बुनियादी शोध, वायरस की पहचान, प्रयोगशाला परीक्षण, क्लिनिकल ट्रायल, उत्पादन और सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रम शामिल होते हैं। किसी वैक्सीन को सफल बनाने के लिए कई लोगों और संस्थानों का योगदान जरूरी होता है। ऐसे में आम जनता अक्सर वैक्सीन का नाम तो जानती है, लेकिन उसके पीछे काम करने वाले वैज्ञानिकों के नाम नहीं जानती। दूसरा कारण हिलमैन का काम करने का तरीका था। वे मुख्य रूप से प्रयोगशाला और रिसर्च के क्षेत्र में सक्रिय रहे। उनकी प्रसिद्धि किसी एक खोज से नहीं, बल्कि कई दशकों में किए गए वैज्ञानिक कामों से बनी। BMJ में प्रकाशित उनके 2005 के मृत्युलेख में उन्हें 20वीं सदी के सबसे प्रभावशाली वैक्सीन वैज्ञानिकों में गिना गया। उसमें यह भी रेखांकित किया गया कि उनके इतने बड़े योगदान के बावजूद आम जनता में उनका नाम लगभग अपरिचित रहा।
मौरिस हिलमैन की कहानी सिर्फ एक प्रतिभाशाली वैज्ञानिक की कहानी नहीं है। यह उस विज्ञान की कहानी है, जो अक्सर पर्दे के पीछे काम करता है। उनका नाम शायद हर घर में नहीं जाना जाता, लेकिन उनके काम का असर उन परिवारों तक पहुंचा है, जिनके बच्चे टीकाकरण के जरिए गंभीर बीमारियों से सुरक्षित हुए। यही विज्ञान की खूबसूरती है। वैज्ञानिक प्रयोगशाला में काम करता है, शोधपत्र प्रकाशित होते हैं और वैक्सीन बनती है। फिर एक दिन वह वैक्सीन किसी बच्चे को बीमारी से बचाती है। उस बच्चे के माता-पिता शायद कभी वैज्ञानिक का नाम न जानें, लेकिन उसके काम का लाभ उनकी जिंदगी का हिस्सा बन जाता है। मौरिस हिलमैन की विरासत किसी एक पुरस्कार या एक खोज में नहीं समाती। उनकी विरासत उन लाखों लोगों की बेहतर स्वास्थ्य-सुरक्षा में है, जिन्हें शायद कभी पता भी नहीं चला कि उनकी सुरक्षा के पीछे किस वैज्ञानिक का कितना बड़ा योगदान था।


