Migraine Kya Hota Hai: क्या बार-बार माइग्रेन से दिमाग को स्थायी नुकसान होता है? शोध क्या बताते हैं?

Migraine Kya Hota Hai: माइग्रेन में तेज सिरदर्द, उल्टी, रोशनी से परेशानी और ऑरा क्यों होता है? जानिए दिमाग, CGRP, हार्मोन, माइग्रेन के लक्षण, गंभीर संकेत और आधुनिक इलाज का विज्ञान।

Yogesh Mishra
Published on: 21 Oct 2026 1:06 PM IST
What Happens in the Brain During Migraine | Health Newstrack | Latest Hindi News | Breaking News
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What Happens in the Brain During Migraine | Health Newstrack | Latest Hindi News | Breaking News

Migraine Kya Hota Hai: सिर में तेज़ दर्द होना आम बात है, पर माइग्रेन को सिर्फ़ सिरदर्द समझना बड़ी भूल है। माइग्रेन में दिमाग में ऐसी कई प्रक्रियाएँ चलती हैं जो दर्द के साथ-साथ देखने, सुनने, सूँघने, सोचने और पाचन पर भी असर डालती हैं। किसी को सिरदर्द से पहले अजीब गंध आती है, किसी को आँखों के सामने चमकती रोशनी या टेढ़ी-मेढ़ी लकीरें दिखती हैं, किसी को मामूली आवाज़ भी असहनीय लगती है, और किसी को उल्टी, चक्कर या बहुत थकान होती है। दौरा खत्म होने के बाद भी कई घंटे तक दिमाग सामान्य महसूस नहीं करता। ऐसा क्यों होता है? क्या माइग्रेन में नसें फूल जाती हैं? क्या दिमाग में कोई बिजली-सी दौड़ती है? और क्या बार-बार माइग्रेन से दिमाग को हमेशा के लिए नुकसान होता है?

विश्व स्वास्थ्य संगठन और सिरदर्द विशेषज्ञों के अनुसार माइग्रेन एक "प्राथमिक सिरदर्द रोग" है, यानी सिरदर्द खुद ही बीमारी है, किसी ट्यूमर या इन्फ़ेक्शन का लक्षण नहीं। आज के न्यूरोसाइंस में इसे ऐसी स्थिति माना जाता है जिसमें दिमाग के संवेदना वाले हिस्से, दर्द के संदेश भेजने वाला तंत्र और कुछ रासायनिक संदेशवाहक बदले ढंग से काम करते हैं। इसका असर इतना गंभीर हो सकता है कि इंसान काम, पढ़ाई या सफ़र तक नहीं कर पाता। दुनिया में बीमारी के कारण बर्बाद होने वाले सालों के बड़े कारणों में माइग्रेन शामिल है, खासकर युवाओं और अधेड़ उम्र के लोगों में।

माइग्रेन और आम सिरदर्द में असली फ़र्क

तनाव वाले आम सिरदर्द में अक्सर सिर के दोनों तरफ़ दबाव या कसाव जैसा दर्द होता है। माइग्रेन में दर्द अक्सर धड़कता हुआ महसूस होता है, मध्यम से तेज़ होता है और चलने-फिरने से बढ़ जाता है। यह सिर के एक तरफ़ हो सकता है, पर हमेशा एक तरफ़ ही हो, ज़रूरी नहीं। साथ में मतली, उल्टी, रोशनी से परेशानी और आवाज़ से बेचैनी आम हैं। बिना इलाज के माइग्रेन का दौरा आमतौर पर 4 से 72 घंटे चलता है (बच्चों में अवधि अलग हो सकती है)।

यह भी ज़रूरी नहीं कि हर दौरे में सिरदर्द हो। कुछ लोगों को 'ऑरा' के लक्षण होते हैं, पर दर्द नहीं होता। इसलिए माइग्रेन की पहचान सिर्फ़ दर्द की तेज़ी से नहीं, बल्कि लक्षणों के पूरे पैटर्न, उनके बार-बार आने और डॉक्टर की जाँच से होती है।

दर्द शुरू होने से पहले क्या होता है?

माइग्रेन का दौरा सिरदर्द शुरू होने से कई घंटे, कभी-कभी एक-दो दिन पहले ही बनना शुरू हो जाता है। इस शुरुआती दौर को प्रोड्रोम कहते हैं। इसमें बार-बार जम्हाई आना, बहुत नींद या थकान, गर्दन में अकड़न, मूड बदलना और किसी खास चीज़ खाने की तेज़ इच्छा हो सकती है। कई लोग इन्हीं संकेतों को दौरे की वजह समझ लेते हैं। जैसे चॉकलेट खाने की इच्छा हो और फिर सिरदर्द हो जाए, तो लोग चॉकलेट को दोष देते हैं, जबकि हो सकता है वह इच्छा खुद शुरू हो चुके माइग्रेन का हिस्सा हो।

इस दौर में दिमाग का हाइपोथैलेमस खास दिलचस्पी का विषय है। यह हिस्सा नींद-जागने के चक्र, भूख, प्यास और शरीर के तापमान जैसी चीज़ों को संभालता है। ब्रेन इमेजिंग से संकेत मिले हैं कि माइग्रेन के अलग-अलग चरणों में हाइपोथैलेमस और ब्रेनस्टेम (दिमाग के निचले तने जैसे हिस्से) की गतिविधि बदलती है। पर इसका मतलब यह नहीं कि हर दौरा वहीं से शुरू होता है। अलग-अलग मरीज़ों में सबसे पहले क्या सक्रिय होता है, यह वैज्ञानिक अभी समझ रहे हैं।

दिमाग खुद दर्द नहीं महसूस करता, तो दर्द कहाँ से आता है?

दिमाग का असली टिश्यू त्वचा की तरह दर्द महसूस नहीं करता। इसीलिए कुछ खास हालात में दिमाग की सर्जरी के दौरान उसे छूने पर वैसा दर्द नहीं होता जैसा त्वचा कटने पर होता है। पर सिर के भीतर दर्द महसूस करने वाली चीज़ें मौजूद हैं: दिमाग को ढकने वाली झिल्लियाँ (खासकर ड्यूरा मेटर) और उनसे जुड़ी रक्तवाहिकाएँ दर्द पहचानने वाली नसों से जुड़ी होती हैं।

माइग्रेन के दर्द में ट्राइजेमिनल नर्व (चेहरे और सिर की संवेदनाएँ दिमाग तक पहुँचाने वाली नस) की बड़ी भूमिका है। इसकी कुछ शाखाएँ इन्हीं झिल्लियों और वाहिकाओं से जुड़ी हैं। जब यह तंत्र ज़रूरत से ज़्यादा सक्रिय हो जाता है, तो दर्द के संकेत ब्रेनस्टेम से होते हुए थैलेमस (संवेदनाओं को छाँटने वाला केंद्र) और दिमाग के दूसरे हिस्सों तक पहुँचते हैं। फिर कई नेटवर्क मिलकर दर्द की तेज़ी, जगह और बेचैनी का अनुभव बनाते हैं।

क्या माइग्रेन नसों के फूलने की बीमारी है?

लंबे समय तक माना जाता था कि रक्तवाहिकाओं के सिकुड़ने और फैलने से पहले नज़र के लक्षण और फिर सिरदर्द होता है। नए शोध ने इस पुरानी सोच को बहुत सीमित बताया है। अब माइग्रेन को न्यूरोवैस्कुलर बीमारी माना जाता है, यानी इसमें नसों की गतिविधि, रासायनिक संदेशवाहक, दर्द महसूस करने वाली संरचनाएँ और रक्तवाहिकाएँ सब आपस में जुड़े हैं। दौरे में कुछ वाहिकाओं में बदलाव हो सकते हैं, पर वे सब लक्षणों और सब मरीज़ों की पूरी वजह नहीं बताते।

इसी समझ के चलते आज के इलाज सिर्फ़ रक्तवाहिकाओं पर नहीं टिके हैं। कुछ नई दवाएँ उन रासायनिक संकेतों को निशाना बनाती हैं जो दर्द के संदेश फैलाते हैं। यह चिकित्सा विज्ञान की बड़ी तरक्की है, क्योंकि अब बीमारी को उसकी असली जड़ से समझकर इलाज किया जा सकता है।

सीजीआरपी क्या है और इतना ज़रूरी क्यों?

माइग्रेन शोध की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है सीजीआरपी (कैल्सीटोनिन जीन-रिलेटेड पेप्टाइड) की भूमिका समझना। यह एक रासायनिक संदेशवाहक है जो नसों की कोशिकाओं के बीच संदेश पहुँचाता है और कुछ हद तक रक्तवाहिकाओं पर भी असर डालता है। माइग्रेन में ट्राइजेमिनल तंत्र के सक्रिय होने पर सीजीआरपी वाले संकेत बढ़ सकते हैं, जिससे दर्द का तंत्र चालू रहता है। पर सीजीआरपी अकेला हर माइग्रेन की वजह नहीं है, और सब मरीज़ों में बीमारी की प्रक्रिया पूरी तरह एक-सी नहीं होती।

इसी समझ से ऐसी दवाएँ बनीं जो सीजीआरपी या उसके रिसेप्टर (संदेश पकड़ने वाले हिस्से) को निशाना बनाती हैं। इनमें कुछ मोनोक्लोनल एंटीबॉडी दवाएँ माइग्रेन की रोकथाम के लिए दी जाती हैं, और "जिपैंट्स" नाम की छोटे अणुओं वाली दवाएँ दौरे के इलाज या रोकथाम में दी जा सकती हैं। पर हर मरीज़ को इनसे बराबर फ़ायदा नहीं होता। डॉक्टर दूसरी बीमारियों, उपलब्धता, खर्च और सुरक्षा देखकर इनका चुनाव करते हैं।

आँखों के सामने चमकती रोशनी और टेढ़ी लकीरें क्यों दिखती हैं?

कुछ मरीज़ों को सिरदर्द से पहले या उसके साथ कुछ समय के लिए दिमाग से जुड़े लक्षण होते हैं, जिन्हें ऑरा कहते हैं। सबसे आम है नज़र वाला 'ऑरा': चमकती रोशनी, टेढ़ी-मेढ़ी लकीरें, झिलमिलाते पैटर्न या नज़र के किसी हिस्से का कुछ देर के लिए गायब हो जाना। कुछ को हाथ या चेहरे में झुनझुनी होती है, और कुछ को बोलने या शब्द ढूँढने में दिक्कत होती है। ऑरा आमतौर पर धीरे-धीरे बनता है और ज़्यादातर लक्षण 5 से 60 मिनट में खत्म हो जाते हैं। हर मरीज़ को ऑरा नहीं होता, और जिन्हें होता है उन्हें भी हर दौरे में हो, ज़रूरी नहीं।

ऑरा की एक प्रमुख वैज्ञानिक व्याख्या कॉर्टिकल स्प्रेडिंग डिपोलराइज़ेशन है। इसमें दिमाग की ऊपरी परत (कॉर्टेक्स) में कोशिकाओं की बिजली और आयनों वाली गतिविधि में गड़बड़ी की एक लहर धीरे-धीरे फैलती है, और उसके बाद उस हिस्से की सामान्य गतिविधि कुछ देर के लिए दब जाती है। जब यह लहर दिमाग के देखने वाले हिस्से से गुज़रती है, तो चमकती लकीरें दिखती हैं। यह बिजली के झटके जैसी चीज़ नहीं है, और इसे मिर्गी का दौरा भी नहीं समझना चाहिए। इंसानों और प्रयोगों में इसके सबूत मिले हैं, पर हर ऑरा की पूरी व्याख्या अभी शोध का विषय है।

रोशनी और आवाज़ क्यों असहनीय हो जाती है?

माइग्रेन की एक खास पहचान है कि जो रोशनी, आवाज़ या गंध आम दिनों में चल जाती है, वह भी बहुत परेशान करने लगती है। इसे सिर्फ़ दर्द की चिड़चिड़ाहट समझना गलत है। दिमाग में संवेदना के संकेतों को प्रोसेस करने का तरीका बदल जाता है, इसलिए उनका असर बढ़ जाता है। कुछ शोधों से संकेत मिला है कि रोशनी वाले नसों के रास्तों और दर्द के तंत्र के बीच ऐसे जुड़ाव हैं जो माइग्रेन में रोशनी की परेशानी बढ़ा सकते हैं। सुनने और सूँघने के संकेतों के साथ भी ऐसा हो सकता है।

इसका मतलब यह नहीं कि मरीज़ की आँखें या कान ज़्यादा तेज़ हो जाते हैं। गड़बड़ी संकेत पकड़ने वाले अंगों में नहीं, बल्कि दिमाग के उन्हें समझने के तरीके में होती है। इसीलिए अँधेरे, शांत कमरे में कई लोगों को राहत मिलती है। हर किसी में यह एक जैसा नहीं होता: किसी को गंध ज़्यादा सताती है, किसी को रोशनी, किसी को आवाज़।

उल्टी और पेट की परेशानी क्यों?

दिमाग के ब्रेनस्टेम के कुछ हिस्से मतली, उल्टी और शरीर की अपने-आप चलने वाली क्रियाओं को संभालते हैं। माइग्रेन में ये हिस्से प्रभावित हो सकते हैं। कुछ मरीज़ों में पेट के खाली होने की रफ़्तार भी धीमी हो जाती है, जिससे मतली बढ़ती है और मुँह से ली गई दवा देर से असर करती है। इसीलिए दौरे में खाना अच्छा नहीं लगता और गोली समय पर काम नहीं करती। ज़्यादा उल्टी हो तो डॉक्टर ऐसा इलाज चुन सकते हैं जो इस दिक्कत का भी ध्यान रखे।

माइग्रेन को सिर्फ़ पेट की खराबी से होने वाली बीमारी कहना गलत है। कुछ लोगों में खाना छोड़ना या देर तक भूखे रहना दौरा ला सकता है, जबकि कई बार किसी चीज़ को खाने की इच्छा खुद दौरे की शुरुआत का लक्षण होती है। इसलिए किसी एक खाने की चीज़ को सब मरीज़ों के लिए दोषी ठहराना सही नहीं।

दौरे के बाद भी दिमाग थका क्यों लगता है?

दर्द कम होने के बाद भी कई लोग पूरी तरह सामान्य महसूस नहीं करते। दिमाग में धुंध-सी, ध्यान लगाने में दिक्कत, थकान, चक्कर, मूड में बदलाव या शरीर में कमज़ोरी रह सकती है। इस दौर को पोस्टड्रोम कहते हैं और यह कुछ घंटों से लगभग दो दिन तक चल सकता है। इसका मतलब यह नहीं कि दिमाग को हमेशा के लिए नुकसान हो गया। यह संकेत है कि दौरे में प्रभावित नेटवर्कों को वापस संतुलन में आने में वक़्त लगता है। इस दौर के सारे कारण अभी साफ़ नहीं हैं।

इसलिए अगर कोई सिरदर्द खत्म होने के बाद भी काम पर ध्यान नहीं लगा पा रहा, तो उसे कमज़ोरी या बहाना न समझें। बीमारी का असर दर्द की अवधि से ज़्यादा देर तक रह सकता है।

महिलाओं में माइग्रेन ज़्यादा क्यों?

बच्चे पैदा करने की उम्र में महिलाओं को माइग्रेन ज़्यादा होता है। इसके पीछे जीन, हार्मोन और दूसरे जैविक कारणों की मिली-जुली भूमिका मानी जाती है। एस्ट्रोजन में उतार-चढ़ाव कुछ महिलाओं में माइग्रेन को प्रभावित करता है। जैसे पीरियड्स के आसपास एस्ट्रोजन गिरने पर कुछ को दौरे पड़ते हैं। गर्भावस्था और मेनोपॉज़ में भी माइग्रेन का रूप बदल सकता है, पर सबमें एक जैसा नहीं।

इसका मतलब यह नहीं कि माइग्रेन सिर्फ़ हार्मोन की बीमारी है। यह पुरुषों, बच्चों और मेनोपॉज़ के बाद की महिलाओं को भी होता है। हार्मोन कई कारणों में से एक हैं। जिन महिलाओं को ऑरा वाला माइग्रेन है, उनके लिए एस्ट्रोजन वाली गर्भनिरोधक गोलियाँ लेना डॉक्टर की खास जाँच का विषय है, क्योंकि कुछ हालात में इनसे स्ट्रोक का खतरा बढ़ सकता है।

क्या माइग्रेन खानदानी बीमारी है?

माइग्रेन में जीन की भूमिका अहम है, और कई मरीज़ों के परिवार में दूसरों को भी माइग्रेन होता है। पर आम माइग्रेन किसी एक जीन से तय होने वाली सीधी बीमारी नहीं है। कई जीनों के छोटे-छोटे असर मिलकर दिमाग की संवेदनशीलता और माइग्रेन का खतरा तय करते हैं। इसके ऊपर नींद, तनाव, हार्मोन और माहौल जैसी चीज़ें दौरे की संभावना बदलती हैं। कुछ दुर्लभ किस्में, जैसे फ़ैमिलियल हेमिप्लेजिक माइग्रेन, खास जीन बदलावों से जुड़ी हैं, पर इन्हें सब मरीज़ों का नमूना नहीं मानना चाहिए। परिवार में किसी को माइग्रेन न हो, तब भी आपको हो सकता है। और माँ-बाप को होने का मतलब यह नहीं कि बच्चे को ज़रूर होगा। झुकाव होना और बीमारी होना अलग बातें हैं।

क्या बार-बार माइग्रेन से दिमाग को हमेशा का नुकसान होता है?

कुछ एमआरआई अध्ययनों में माइग्रेन के मरीज़ों (खासकर कुछ समूहों) में दिमाग के सफ़ेद हिस्से में छोटे-छोटे बदलाव ज़्यादा मिले हैं। पर इनके दिखने का मतलब यह नहीं कि गंभीर और स्थायी नुकसान हो गया या याददाश्त ज़रूर कमज़ोर होगी। इन बदलावों का लंबे समय में क्या मतलब है, इस पर अभी अनिश्चितता है। ज़्यादातर मरीज़ों में बार-बार सिरदर्द का मतलब यह नहीं कि दिमाग की कोशिकाएँ लगातार मर रही हैं।

दूसरी तरफ़, कुछ अध्ययनों में माइग्रेन, खासकर ऑरा वाला, इस्कीमिक स्ट्रोक (दिमाग में खून की रुकावट वाला स्ट्रोक) के थोड़े बढ़े हुए खतरे से जुड़ा मिला है। पर आपका अपना खतरा उम्र, धूम्रपान, ब्लड प्रेशर, गर्भनिरोधक गोलियों और दूसरी सेहत संबंधी बातों पर निर्भर करता है। ज़्यादातर युवा मरीज़ों में स्ट्रोक का असली खतरा कम ही रहता है। इसलिए इस संबंध को न पूरी तरह नकारें, न हर मरीज़ को स्ट्रोक का डर दिखाएँ।

क्या माइग्रेन लगभग रोज़ की बीमारी बन सकता है?

कुछ मरीज़ों में दौरे इतने बढ़ जाते हैं कि महीने के ज़्यादातर दिन सिरदर्द रहता है। सिरदर्द के अंतरराष्ट्रीय वर्गीकरण के अनुसार क्रॉनिक माइग्रेन में तीन महीने से ज़्यादा समय तक हर महीने कम से कम 15 दिन सिरदर्द होता है, जिनमें कम से कम 8 दिन माइग्रेन जैसे लक्षणों वाले होते हैं। इससे काम, नींद, मानसिक सेहत और घर की ज़िंदगी बुरी तरह प्रभावित हो सकती है। पर हर बार-बार होने वाला सिरदर्द क्रॉनिक माइग्रेन नहीं होता। दूसरी बीमारियों, दवाओं के ज़्यादा इस्तेमाल और अन्य सिरदर्द रोगों को भी देखना पड़ता है।

यहाँ एक उलटी समस्या भी है। राहत के लिए बार-बार दर्द की दवा लेने से खुद सिरदर्द बढ़ सकता है। इसे मेडिकेशन-ओवरयूज़ हेडेक कहते हैं। आम दर्दनिवारक दवाएँ महीने में 15 या ज़्यादा दिन, या ट्रिप्टान और मिश्रित दर्दनिवारक दवाएँ 10 या ज़्यादा दिन, कम से कम तीन महीने तक लेना इस समस्या से जुड़ा हो सकता है। इसका मतलब यह नहीं कि सीमा पार करते ही हर किसी को यह हो जाएगा, पर बार-बार दवा की ज़रूरत पड़ना डॉक्टर को दिखाने का साफ़ संकेत है।

माइग्रेन की पहचान के लिए एमआरआई या सीटी स्कैन कितना ज़रूरी?

माइग्रेन की पहचान मुख्य रूप से लक्षणों, सिरदर्द के पैटर्न, मेडिकल इतिहास और नसों की जाँच से होती है। अगर लक्षण आम माइग्रेन जैसे हों और जाँच में चिंता की कोई बात न मिले, तो हर मरीज़ को स्कैन की ज़रूरत नहीं होती। स्कैन माइग्रेन की पुष्टि करने वाला टेस्ट नहीं है। उसका इस्तेमाल तब होता है जब डॉक्टर को किसी और बीमारी का शक हो।

पर कुछ लक्षणों को माइग्रेन कहकर टालना खतरनाक है। इन हालात में तुरंत डॉक्टरी जाँच करवाएँ: सिरदर्द अचानक कुछ ही सेकंड में बहुत तेज़ हो जाए, ज़िंदगी का सबसे अजीब या सबसे तेज़ सिरदर्द लगे, शरीर के एक हिस्से में अचानक कमज़ोरी आए, बोलने में अचानक दिक्कत हो, बेहोशी या दौरा पड़े, बुखार के साथ गर्दन अकड़ जाए या सिरदर्द का पैटर्न साफ़ तौर पर बदल जाए।

पहली बार नज़र या दूसरे नसों से जुड़े लक्षण आएँ, तो भी बिना जाँच उन्हें माइग्रेन ऑरा न मानें, क्योंकि कुछ लक्षण स्ट्रोक या दूसरी गंभीर स्थितियों से मिलते-जुलते हो सकते हैं।

आज का इलाज क्या है? क्या माइग्रेन पूरी तरह ठीक हो सकता है?

अभी ऐसा कोई इलाज नहीं है जो हर किसी में माइग्रेन को हमेशा के लिए खत्म कर दे। पर आज के इलाज से कई मरीज़ों में दौरे कम, छोटे और हल्के किए जा सकते हैं। इलाज के दो लक्ष्य होते हैं: दौरा शुरू होने पर उसे रोकना, और जिन्हें दौरे बार-बार पड़ते हैं या बहुत परेशान करते हैं, उनमें आगे के दौरों की संख्या और तीव्रता घटाना।

दौरे के समय: कुछ आम दर्दनिवारक दवाएँ, माइग्रेन की खास दवाएँ (ट्रिप्टान), जिपैंट्स और मतली रोकने वाली दवाएँ।

रोकथाम के लिए: कुछ ब्लड प्रेशर वाली दवाएँ, नसों पर असर करने वाली खास दवाएँ, सीजीआरपी को निशाना बनाने वाले इलाज, और कुछ मरीज़ों में बोटुलिनम टॉक्सिन के इंजेक्शन।

हर दवा हर किसी के लिए ठीक नहीं होती। जैसे दिल और रक्तवाहिका की कुछ बीमारियों में ट्रिप्टान नहीं दी जानी चाहिए। गर्भावस्था, दूसरी दवाओं और अन्य बीमारियों के हिसाब से भी इलाज बदलता है। इसलिए माइग्रेन का इलाज सिर्फ़ कोई दर्द की गोली चुनना नहीं, बल्कि हर मरीज़ के लिए अलग योजना बनाना है।

क्या नींद, योग, ध्यान और खान-पान से माइग्रेन काबू में आता है?

रहन-सहन माइग्रेन संभालने का अहम हिस्सा है, पर यह दवाओं की जगह नहीं ले सकता। नियमित नींद, खाने का तय समय, भरपूर पानी, रोज़ की कसरत और तनाव कम करना कुछ मरीज़ों में दौरे घटा सकते हैं। कुछ लोगों में नींद की कमी, खाना छोड़ना, ज़्यादा शराब या कैफ़ीन में अचानक बदलाव से दौरे बढ़ते हैं। पर सब माइग्रेन मरीज़ों के लिए "ये चीज़ें बिल्कुल न खाएँ" की एक ही सूची वैज्ञानिक रूप से सही नहीं है। बेहतर तरीका है सिरदर्द की डायरी रखना, जिसमें दौरे की तारीख, कितनी देर चला, लक्षण, नींद, पीरियड्स से संबंध और ली गई दवाएँ लिखी जाएँ।

योग, ध्यान, रिलैक्सेशन तकनीक और संज्ञानात्मक व्यवहार चिकित्सा (सीबीटी) कुछ लोगों में तनाव घटाने और बीमारी से निपटने में मदद करते हैं। मैग्नीशियम और राइबोफ्लेविन जैसे सप्लीमेंट पर भी रोकथाम के लिए अध्ययन हुए हैं, पर कितना फ़ायदा होगा और कितनी मात्रा सही है, यह व्यक्ति के हिसाब से अलग हो सकता है। प्राकृतिक का मतलब हमेशा सुरक्षित नहीं होता। गुर्दे की बीमारी, गर्भावस्था या दूसरी दवाओं के साथ कोई भी सप्लीमेंट डॉक्टर की सलाह से ही लें।

माइग्रेन हमें सिखाता है कि दर्द सिर्फ़ शरीर के किसी हिस्से की चोट का नतीजा नहीं होता; दिमाग खुद दर्द के अनुभव और शरीर की प्रतिक्रियाओं को प्रभावित करता है। इसलिए माइग्रेन का सही इलाज सिर्फ़ दर्द दबाना नहीं, बल्कि उस जटिल बीमारी को पहचानना और काबू में रखना है जो दर्द पैदा करती है।

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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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