Periods Mood Swings: पीरियड्स से पहले मूड क्यों बदलता है? जानिए हार्मोन और दिमाग के बीच का विज्ञान

Periods Mood Swings: पीरियड्स से पहले चिड़चिड़ापन, उदासी और बेचैनी क्यों बढ़ती है? जानिए हार्मोन, मस्तिष्क, PMS और PMDD का विज्ञान, लक्षणों की पहचान और इलाज के विकल्प।

Yogesh Mishra
Published on: 20 Oct 2026 7:23 PM IST
Periods Mood Swings Women Mental Health | Newstrack Latest Hindi News | Breaking News India
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Periods Mood Swings: कभी अचानक चिड़चिड़ापन, कभी उदासी, कभी बेचैनी, तो कभी बिना वजह रोने का मन। कुछ महिलाओं को पीरियड्स से पहले बहुत थकान और तनाव होता है, किसी का ध्यान नहीं लगता, तो किसी को छोटी-सी आवाज़ या बात भी खलने लगती है। लेकिन बहुत-सी महिलाओं के मूड में पूरे महीने कोई खास फर्क नहीं पड़ता। ऐसा क्यों होता है?

आम धारणा है कि पीरियड्स में हार्मोन "बिगड़" जाते हैं, इसलिए व्यवहार बदल जाता है। सच इससे ज़्यादा उलझा हुआ है। एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन का घटना-बढ़ना शरीर की सामान्य प्रक्रिया है, बीमारी नहीं। ये हार्मोन दिमाग को भी प्रभावित करते हैं, पर हर महिला का दिमाग इन पर एक जैसा असर नहीं दिखाता। ज़्यादातर में असर हल्का होता है, कुछ में साफ़ लक्षण दिखते हैं, और थोड़ी-सी महिलाओं में गंभीर समस्या (पीएमडीडी) हो सकती है।

एक बात और याद रखनी चाहिए कि पीरियड्स के दिनों की हर उदासी या चिड़चिड़ाहट को सिर्फ़ हार्मोन का नतीजा मान लेना गलत है। नींद, दर्द, ज़्यादा ब्लीडिंग, तनाव, घर के हालात, पहले से मौजूद डिप्रेशन या चिंता, ये सब भी बड़ी भूमिका निभाते हैं।

दिमाग और हार्मोन का रिश्ता

दिमाग का एक हिस्सा (हाइपोथैलेमस) पिट्यूटरी ग्रंथि को संकेत भेजता है। वह ग्रंथि अंडाशय को हार्मोन बनाने के लिए कहती है। अंडाशय से बनने वाले एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन गर्भाशय की परत को संभावित गर्भ के लिए तैयार करते हैं। गर्भ न ठहरे तो चक्र के आखिर में ये हार्मोन गिर जाते हैं और परत ब्लीडिंग के रूप में बाहर निकलती है। यही पीरियड्स हैं।

इन हार्मोन के रिसेप्टर (संदेश पकड़ने वाले हिस्से) सिर्फ़ गर्भाशय या अंडाशय में नहीं, दिमाग में भी होते हैं। एस्ट्रोजन सेरोटोनिन और डोपामिन जैसे रसायनों पर असर डालता है, जो मूड, प्रेरणा, खुशी और नींद से जुड़े हैं। प्रोजेस्टेरोन से एलोप्रेग्नेनोलोन नाम का पदार्थ बनता है, जो दिमाग के "शांत करने वाले" तंत्र (जीएबीए) पर काम करता है। इसी वजह से चक्र के हार्मोन बदलाव कुछ महिलाओं की नींद, तनाव सहने की क्षमता और भावनाओं पर असर डाल सकते हैं।

पीरियड्स से पहले चिड़चिड़ापन और उदासी क्यों बढ़ती है?

अंडा निकलने के बाद के हिस्से में प्रोजेस्टेरोन बढ़ता है, और गर्भ न ठहरे तो आखिरी दिनों में एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन दोनों गिरने लगते हैं। इसी समय कुछ महिलाओं को चिड़चिड़ापन, उदासी, बेचैनी, स्तनों में दर्द, पेट फूलना, सिरदर्द, नींद में बदलाव और थकान होती है। इन्हें मिलाकर पीएमएस (प्रीमेंस्ट्रुअल सिंड्रोम) कहते हैं। अमेरिका के महिला स्वास्थ्य कार्यालय के अनुसार पीरियड्स से पहले कोई न कोई लक्षण होना बहुत आम है, पर हर लक्षण पीएमएस की बीमारी नहीं होता। यह देखना ज़रूरी है कि लक्षण कितने तेज़ हैं, क्या हर बार एक तय समय पर आते हैं और क्या रोज़ की ज़िंदगी में दिक्कत करते हैं।

पहले माना जाता था कि जिन्हें बहुत परेशानी होती है, उनके हार्मोन ज़्यादा या कम बनते होंगे। लेकिन कई अध्ययनों में गंभीर लक्षण वाली महिलाओं में भी हार्मोन का स्तर सामान्य निकला। फ़र्क इसमें हो सकता है कि उनका दिमाग इन सामान्य उतार-चढ़ावों पर कैसी प्रतिक्रिया देता है। अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ के शोधकर्ताओं ने पीएमडीडी वाली महिलाओं में हार्मोन के संकेतों पर कोशिकाओं की प्रतिक्रिया से जुड़े जीन समूह में अंतर पाया था। इससे यह साबित हुआ कि गंभीर लक्षण इच्छाशक्ति की कमी या कमज़ोर स्वभाव की वजह से नहीं होते। हालांकि अभी ऐसा कोई जेनेटिक टेस्ट नहीं है जो पीएमडीडी पक्का बता सके।

एलोप्रेग्नेनोलोन क्या करता है?

यह पदार्थ आमतौर पर दिमाग पर शांत करने वाला असर डालता है। लेकिन पीएमडीडी वाली कुछ महिलाओं में इसके सामान्य बदलावों पर दिमाग का रिसेप्टर अलग तरह से प्रतिक्रिया देता है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यही असामान्य संवेदनशीलता तनाव, बेचैनी और चिड़चिड़ाहट बढ़ाती है। 2020 में Neurobiology of Stress में छपी एक समीक्षा ने भी यही निष्कर्ष निकाला कि पीएमडीडी को सिर्फ़ हार्मोन की कमी-ज़्यादती से नहीं समझा जा सकता। यह मज़बूत परिकल्पना है, पर अंतिम और पक्का जवाब अभी नहीं मिला है।

क्या पीरियड्स में दिमाग की बनावट बदलती है?

कुछ छोटे अध्ययनों में, जिनमें एक ही महिला का चक्र के अलग-अलग समय पर एमआरआई किया गया, दिमाग के कुछ हिस्सों (याददाश्त से जुड़ा हिप्पोकैम्पस, भावनाओं और खतरे को पहचानने वाला एमिग्डाला, और फ़ैसले व भावनाओं पर काबू रखने वाला प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स) में बदलाव दिखे हैं।

पर इसका मतलब यह नहीं कि दिमाग को नुकसान हो रहा है, न्यूरॉन मर रहे हैं या बुद्धि घट रही है। ऐसे बदलाव टिश्यू में पानी की मात्रा, खून के बहाव और हार्मोन की स्थिति से भी हो सकते हैं। कई अध्ययनों में प्रतिभागी बहुत कम थे, इसलिए नतीजे सब पर एक जैसे लागू नहीं होते। यह कहना कि हर महीने पीरियड्स दिमाग को नया आकार दे देते हैं या सोचने की क्षमता कमज़ोर करते हैं, मौजूदा सबूतों से आगे की बात है।

क्या पीरियड्स में याददाश्त और फ़ैसले लेने की क्षमता कमज़ोर हो जाती है?

इस सवाल के साथ समाज में पुरानी धारणाएँ जुड़ी हैं कि पीरियड्स में महिलाएँ समझदारी से फ़ैसले नहीं ले सकतीं। वैज्ञानिक सबूत इस दावे का समर्थन नहीं करते। शोधों के नतीजे मिले-जुले हैं: कुछ में किसी खास काम पर छोटा फ़र्क मिला, जबकि कई में कोई साफ़ या बार-बार दोहराया जा सकने वाला असर नहीं दिखा।

हाँ, अगर किसी को तेज़ पेटदर्द, माइग्रेन, बहुत ज़्यादा ब्लीडिंग, नींद न आना या पीएमडीडी के गंभीर लक्षण हों, तो उसका ध्यान और काम करने की क्षमता कुछ समय के लिए ज़रूर प्रभावित हो सकती है। पर यह उस तकलीफ़ का असर है, महिलाओं की सामान्य मानसिक क्षमता की सीमा नहीं। नींद की कमी, दर्द या तनाव में पुरुषों का प्रदर्शन भी गिर सकता है।

दर्द का असर मूड पर

मूड बिगड़ने की एक बड़ी वजह दर्द भी हो सकता है। पीरियड्स में गर्भाशय की परत से प्रोस्टाग्लैंडिन नाम के रसायन निकलते हैं, जो गर्भाशय की मांसपेशियों को सिकोड़ते हैं। कुछ महिलाओं में ये ज़्यादा सक्रिय होते हैं, जिससे तेज़ ऐंठन और दर्द होता है (इसे प्राथमिक डिसमेनोरिया कहते हैं)। लगातार दर्द से नींद बिगड़ती है, थकान बढ़ती है और सहनशक्ति घट जाती है। इसलिए पीरियड्स में चिड़चिड़ापन हमेशा हार्मोन की वजह से नहीं होता; दर्द और उससे पैदा हुआ तनाव भी बड़ा कारण हो सकता है।

कुछ महिलाओं में पीरियड्स के आसपास माइग्रेन भी बढ़ जाता है, क्योंकि एस्ट्रोजन गिरने का संबंध मासिक धर्म से जुड़े माइग्रेन से है। साथ ही, बहुत ज़्यादा ब्लीडिंग से आयरन की कमी और एनीमिया हो सकता है, जिससे थकान, चक्कर, कमज़ोरी और ध्यान लगाने में दिक्कत होती है। इसलिए अगर पीरियड्स के दौरान लगातार थकान या दिमाग में धुंध-सी रहे, तो उसे सिर्फ़ मूड स्विंग कहकर टालना ठीक नहीं। ज़रूरत हो तो ब्लीडिंग, हीमोग्लोबिन और आयरन की जाँच करानी चाहिए।

पीएमएस और पीएमडीडी में फ़र्क

पीएमएस: पीरियड्स शुरू होने से पहले शारीरिक और भावनात्मक लक्षण दिखते हैं (पेट फूलना, स्तनों में दर्द, सिरदर्द, चिड़चिड़ापन, थकान, मूड में बदलाव) और ब्लीडिंग शुरू होने के बाद कम होने लगते हैं। ज़्यादातर महिलाओं में ये हल्के होते हैं।

पीएमडीडी: यह कहीं ज़्यादा गंभीर स्थिति है। इसमें तेज़ उदासी, चिंता, निराशा, गुस्सा, भावनात्मक उथल-पुथल या किसी चीज़ में रुचि न रहना जैसे लक्षण इतने बढ़ सकते हैं कि काम, पढ़ाई, परिवार और रिश्ते प्रभावित होने लगें।

अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ के अनुसार प्रजनन उम्र की लगभग 2 से 5 प्रतिशत महिलाएँ पीएमडीडी से प्रभावित हो सकती हैं (अलग अध्ययनों में यह आँकड़ा बदल सकता है)। अमेरिकी महिला स्वास्थ्य कार्यालय भी इसे करीब 5 प्रतिशत तक बताता है। यानी हल्की परेशानी और पीएमडीडी को एक ही श्रेणी में नहीं रखना चाहिए।

पीएमडीडी की पहचान में लक्षणों का समय अहम है। ये आमतौर पर पीरियड्स से एक-दो हफ़्ते पहले शुरू होते हैं, पीरियड्स शुरू होने के कुछ दिनों में साफ़ घट जाते हैं, और चक्र के बाद के हिस्से में लगभग गायब रहते हैं। अगर उदासी, चिंता या चिड़चिड़ापन पूरे महीने एक जैसा बना रहता है, तो सिर्फ़ पीएमडीडी का निदान काफ़ी नहीं; डिप्रेशन, एंग्ज़ाइटी या दूसरी समस्याओं की जाँच ज़रूरी है। कई बार पहले से मौजूद मानसिक समस्या पीरियड्स से पहले और बिगड़ जाती है। इसे प्रीमेंस्ट्रुअल एग्ज़ैसर्बेशन कहते हैं, और यह पीएमडीडी से अलग है।

क्या हर मूड बदलाव को हार्मोन से जोड़ना गलत है?

मासिक चक्र का मूड से जैविक रिश्ता होने का मतलब यह नहीं कि महिलाओं की हर भावना हार्मोन तय करते हैं। अगर किसी को दफ़्तर में नाइंसाफ़ी लगती है, घर में तनाव है या किसी रिश्ते से नाराज़गी है, तो उसकी प्रतिक्रिया को "पीरियड्स का असर" कह देना उसके असली अनुभव को अनदेखा करना है। चक्र कुछ महिलाओं की भावनात्मक संवेदनशीलता बदल सकता है, पर इससे किसी भावना की वजह या उसकी सच्चाई तय नहीं हो जाती।

भावनाएँ नींद, तनाव, पुराने अनुभव, मानसिक सेहत, आसपास के माहौल और शारीरिक दर्द, सबसे प्रभावित होती हैं। हार्मोन इनके साथ मिलकर असर डालते हैं, अकेले व्यवहार को नहीं चलाते। विज्ञान का मकसद महिलाओं के व्यवहार को "हार्मोन का चक्कर" कहकर टालना नहीं, बल्कि यह पहचानना है कि कब असली इलाज की ज़रूरत है।

पीरियड्स से पहले डिप्रेशन और आत्महत्या के विचार

गंभीर पीएमडीडी में कुछ महिलाओं को बहुत ज़्यादा निराशा, खुद को बेकार समझने की भावना और आत्महत्या के विचार भी आ सकते हैं। यह सामान्य चिड़चिड़ाहट या हल्की उदासी से बिल्कुल अलग है। ब्रिटेन की राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा (एनएचएस) भी इसे पीएमडीडी के गंभीर लक्षणों में गिनती है। ऐसे लक्षणों को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए। अगर खुद को नुकसान पहुँचाने का विचार आए, तो तुरंत डॉक्टर या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की मदद लें। तुरंत खतरा हो तो व्यक्ति को अकेला न छोड़ें और आपातकालीन सेवाओं को बुलाएँ। गंभीर पीएमडीडी होना भावनात्मक कमज़ोरी का सबूत नहीं है। शोध बताते हैं कि कुछ महिलाओं के दिमाग और कोशिकाएँ सामान्य हार्मोन बदलावों पर अलग तरह से प्रतिक्रिया देती हैं। इसलिए हल समझदारी से "खुद को काबू में रखो" कहना नहीं, बल्कि ज़रूरत पड़ने पर सही इलाज देना है।

क्या पीएमएस और पीएमडीडी का इलाज है?

हाँ, दोनों का इलाज है। कौन-सा इलाज चुना जाए, यह लक्षणों की गंभीरता, सेहत के इतिहास और हालात पर निर्भर करता है।

हल्के लक्षणों में: नियमित नींद, कसरत, तनाव कम करने के तरीके और दर्द का सही इलाज मदद करते हैं।

गंभीर लक्षणों में: डॉक्टर दवाओं और काउंसलिंग पर विचार कर सकते हैं। एसएसआरआई वर्ग की दवाएँ पीएमडीडी में असरदार पाई गई हैं। कभी ये पूरे महीने दी जाती हैं, कभी सिर्फ़ चक्र के खास हिस्से में। यह फ़ैसला डॉक्टर की जाँच के बाद होता है।

हार्मोनल गर्भनिरोधक गोलियाँ: कुछ चुनी हुई मरीज़ों में लक्षण कम कर सकती हैं, पर हर महिला के लिए सही नहीं होतीं। ऑरा वाला माइग्रेन, खून के थक्के जमने का खतरा या दूसरी स्वास्थ्य समस्याएँ हों तो खास सावधानी चाहिए।

सीबीटी (संज्ञानात्मक व्यवहार चिकित्सा): कुछ मरीज़ों को लक्षणों से निपटने और रोज़मर्रा का काम बेहतर करने में मदद करती है।

क्या हार्मोन की जाँच से पीएमडीडी पता चलता है?

आमतौर पर नहीं। पीएमडीडी पकड़ने के लिए कोई एक खून की जाँच या हार्मोन का स्तर निर्णायक नहीं है। कई प्रभावित महिलाओं में एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन सामान्य निकलते हैं, इसलिए रिपोर्ट सामान्य आने से पीएमडीडी की संभावना खत्म नहीं हो जाती। पहचान लक्षणों के स्वरूप, समय, तीव्रता और चक्र से उनके रिश्ते से होती है। डॉक्टर अक्सर कम से कम दो चक्रों तक रोज़ लक्षण लिखने की सलाह देते हैं, ताकि साफ़ हो सके कि वे पीरियड्स से पहले बढ़ते और बाद में घटते हैं या पूरे महीने रहते हैं।

थायरॉयड, एनीमिया या दूसरी समस्याओं की जाँच कभी-कभी उपयोगी होती है, पर ये पीएमडीडी की पुष्टि नहीं करतीं। एक बार हार्मोन नापकर किसी के मूड या मानसिक सेहत के बारे में भरोसेमंद निष्कर्ष निकालना भी संभव नहीं है।

उम्र और मेनोपॉज़ के आसपास मूड

उम्र के साथ चक्र बदलता है। किशोरावस्था के शुरुआती सालों में पीरियड्स अनियमित हो सकते हैं। मेनोपॉज़ से पहले की अवस्था (पेरिमेनोपॉज़) में हार्मोन और चक्र में ज़्यादा उतार-चढ़ाव होता है, और कुछ महिलाओं में नींद की दिक्कत, गर्मी के दौरे (हॉट फ्लैश), चिंता या डिप्रेशन के लक्षण बढ़ सकते हैं। पर यह सब महिलाओं में नहीं होता, और इस दौर में भी मूड का बदलना हमेशा सिर्फ़ हार्मोन की वजह से नहीं होता; जीवन के हालात, नींद और पहले से मौजूद मानसिक सेहत भी मायने रखती है।

जिन्हें पहले पीएमएस या पीएमडीडी रहा है, उनमें अलग-अलग हार्मोनल दौर में संवेदनशीलता का रूप बदल सकता है। फिर भी यह मान लेना ठीक नहीं कि उम्र बढ़ने पर हर महिला को गंभीर मानसिक समस्या होगी। कुछ महिलाओं को मेनोपॉज़ के बाद चक्र वाले लक्षणों से राहत भी मिलती है, क्योंकि अंडा बनने का सामान्य चक्र बंद हो जाता है।

सबसे ज़रूरी बात: पीरियड्स का मतलब यह नहीं कि महिलाओं की बुद्धि, समझ या फ़ैसले की क्षमता घट जाती है। सबके मूड में एक जैसा बदलाव नहीं आता, और गंभीर लक्षणों को औरतों का स्वभाव कहकर टालना नहीं चाहिए। अगर हर महीने पीरियड्स से पहले उदासी, चिंता, चिड़चिड़ाहट या मानसिक परेशानी इतनी हो कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी प्रभावित होने लगे, तो डॉक्टर को दिखाना बिल्कुल सही कदम है।

विज्ञान यह नहीं कहता कि पीरियड्स दिमाग को कमज़ोर करते हैं। वह यह बताता है कि दिमाग और प्रजनन हार्मोन लगातार एक-दूसरे से "बात" करते रहते हैं। कुछ महिलाओं में यह सामान्य बातचीत भावनात्मक लक्षणों के रूप में दिखती है, कुछ में नहीं, और इसी फ़र्क को समझना मासिक धर्म और मानसिक सेहत का असली विज्ञान है।

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Yogesh Mishra

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Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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