Pig Heart in Humans: क्या सूअर का दिल इंसान के शरीर में धड़क सकता है? विज्ञान ने कैसे बदली तस्वीर

Pig Heart Transplant in Humans: क्या सूअर का दिल और किडनी इंसान के शरीर में लगाई जा सकती है? जानिए जेनोट्रांसप्लांटेशन क्या है, 271 दिनों तक काम करने वाली किडनी की कहानी, जीन एडिटिंग और इस तकनीक के जोखिम।

Yogesh Mishra
Published on: 28 Oct 2026 6:41 PM IST
Pig Heart Transplant in Humans | Pig Kidney Transplant | Newstrack Hindi News
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Pig Heart Transplant in Humans | Pig Kidney Transplant | Newstrack Hindi News

Pig Heart Transplant in Humans: कल्पना कीजिए कि किसी व्यक्ति की दोनों किडनियाँ खराब हो चुकी हैं। वह वर्षों से डायलिसिस पर है और किसी मानव अंगदाता की प्रतीक्षा कर रहा है। लेकिन उसे किडनी नहीं मिल रही। ऐसे में डॉक्टर एक आनुवंशिक रूप से संशोधित सूअर की किडनी उसके शरीर में लगा देते हैं। वह काम करने लगती है। अब यह केवल विज्ञान-कथा नहीं है। अमेरिका में ऐसे प्रत्यारोपण किए जा चुके हैं। सितंबर 2026 में प्रकाशित एक महत्त्वपूर्ण शोध के अनुसार सूअर की किडनी प्राप्त करने वाले एक मरीज को 271 दिनों तक डायलिसिस की आवश्यकता नहीं पड़ी। बाद में पशु की किडनी ने काम करना बंद किया और उसे निकालना पड़ा। लेकिन मरीज को मानव अंगदाता की किडनी मिल गई। इससे पहले वर्ष 2022 में दुनिया के पहले जीवित मरीज को आनुवंशिक रूप से संशोधित सूअर का हृदय लगाया गया था। वर्ष 2025 और 2026 में सूअर के लिवर के उपयोग में भी अभूतपूर्व प्रगति हुई। अमेरिका ने अब इन प्रयोगों को सीमित व्यक्तिगत मामलों से आगे बढ़ाकर नियमित वैज्ञानिक परीक्षणों की दिशा में ले जाना शुरू कर दिया है। इसके बावजूद किसी पशु का अंग मनुष्य में वर्षों तक सुरक्षित रूप से काम करेगा, इसका प्रमाण अभी उपलब्ध नहीं है। आखिर पशुओं के अंग मनुष्य में कैसे लगाए जाते हैं, सूअर ही इसके लिए सबसे उपयोगी क्यों माना जा रहा है और क्या भविष्य में अंगों की कमी के कारण होने वाली मौतों को रोका जा सकेगा?

पशुओं के अंगों से मनुष्य का जीवन बचाने का विचार कहाँ से आया?

चिकित्सा विज्ञान के इतिहास में अंग प्रत्यारोपण का विचार जितना आकर्षक रहा है, उतना ही कठिन भी। मनुष्य के शरीर में हृदय, किडनी, लिवर और फेफड़े जैसे अंग अत्यंत जटिल जैविक कार्य करते हैं। इनमें से किसी महत्त्वपूर्ण अंग के गंभीर रूप से खराब हो जाने पर शरीर की सामान्य कार्यप्रणाली प्रभावित होने लगती है। आधुनिक चिकित्सा ने कुछ स्थितियों में दवाओं, मशीनों और दूसरी तकनीकों की मदद से जीवन को लंबे समय तक सुरक्षित रखना संभव बनाया है। उदाहरण के लिए किडनी की कार्यक्षमता समाप्त होने पर डायलिसिस से रक्त में जमा कुछ अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकाला जा सकता है। लेकिन डायलिसिस स्वस्थ किडनी के सभी हार्मोन संबंधी और दूसरे कार्यों का पूर्ण विकल्प नहीं है। इसी तरह कृत्रिम हृदय या हृदय की सहायता करने वाले उपकरण कुछ मरीजों का जीवन बचा सकते हैं। लेकिन वे प्रत्येक परिस्थिति में प्राकृतिक हृदय का स्थायी और पूर्ण विकल्प नहीं हैं। इसलिए चिकित्सा विज्ञान लंबे समय से ऐसे उपाय खोज रहा है जिनसे खराब अंग को किसी दूसरे कार्यशील अंग से बदला जा सके।

मानव अंग प्रत्यारोपण ने इस दिशा में असाधारण उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं। आज किडनी, लिवर, हृदय, फेफड़े और कुछ दूसरे अंगों का प्रत्यारोपण स्थापित चिकित्सा पद्धति बन चुका है। लेकिन इसके सामने एक समस्या लगातार बनी हुई है। अंग प्राप्त करने की आवश्यकता रखने वाले मरीजों की संख्या उपलब्ध मानव अंगदाताओं से कहीं अधिक है। जीवित व्यक्ति कुछ विशेष परिस्थितियों में अपनी एक किडनी या लिवर का हिस्सा दान कर सकता है। लेकिन हृदय जैसे अंग के लिए मृत अंगदाता की आवश्यकता होती है। प्रत्येक व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसके अंग प्रत्यारोपण के लिए उपयोगी हों, ऐसा भी नहीं है। अंगदाता की स्वास्थ्य स्थिति, रक्त प्रवाह, संक्रमण, समय और अंग की गुणवत्ता जैसे अनेक प्रश्न होते हैं। परिणामस्वरूप हजारों मरीज ऐसे अंग की प्रतीक्षा करते रहते हैं, जो उन्हें समय पर नहीं मिल पाता। इसी कमी ने वैज्ञानिकों को एक अत्यंत साहसिक विचार की ओर प्रेरित किया। यदि मानव अंगदाता पर्याप्त नहीं हैं, तो क्या किसी दूसरी प्रजाति के अंग मनुष्य के शरीर में काम कर सकते हैं?

इस तकनीक को 'जेनोट्रांसप्लांटेशन' अर्थात अंतर-प्रजातीय प्रत्यारोपण कहा जाता है। इसका अर्थ है किसी एक प्रजाति की जीवित कोशिकाओं, ऊतकों या अंगों को दूसरी प्रजाति के शरीर में प्रत्यारोपित करना। अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन, अर्थात एफडीए, इसकी परिभाषा में पशु-उत्पत्ति वाले जीवित अंगों और ऊतकों के साथ ऐसी कुछ प्रक्रियाएँ भी शामिल करता है जिनमें मानव कोशिकाओं या शरीर के द्रवों का जीवित पशु कोशिकाओं अथवा ऊतकों से शरीर के बाहर संपर्क कराया जाता है। इसका मतलब है कि जेनोट्रांसप्लांटेशन केवल पूरा सूअर का हृदय या किडनी लगाने तक सीमित नहीं है। इसमें पशुओं की कुछ विशेष कोशिकाओं, त्वचा और अन्य जैविक ऊतकों के चिकित्सकीय उपयोग की संभावनाएँ भी शामिल हैं। लेकिन किसी पशु से प्राप्त निर्जीव या विशेष रूप से संसाधित जैविक सामग्री के प्रत्येक उपयोग को जीवित पशु-अंग प्रत्यारोपण के बराबर नहीं समझना चाहिए। यह अंतर आधुनिक प्रत्यारोपण विज्ञान की चर्चा में बहुत महत्त्वपूर्ण है।

पशुओं से मनुष्य का उपचार करने की अवधारणा आधुनिक आनुवंशिकी से भी पुरानी है। चिकित्सा इतिहास में विभिन्न समयों पर पशुओं से प्राप्त रक्त, कोशिकाओं या ऊतकों को मानव उपचार में उपयोग करने के प्रयोग हुए। इनमें अनेक प्रयोग असफल रहे और कुछ ने गंभीर जोखिम पैदा किए। बीसवीं शताब्दी में वैज्ञानिकों ने बंदरों तथा दूसरे प्राइमेट जीवों के अंगों के प्रत्यारोपण के प्रयास भी किए। लेकिन अंगों की अस्वीकृति, संक्रमण, जैविक असंगति और पशु उपयोग से जुड़े नैतिक प्रश्नों ने इन प्रयासों को सीमित रखा। धीरे-धीरे यह स्पष्ट हुआ कि केवल किसी पशु और मनुष्य के शरीर की बाहरी समानता पर्याप्त नहीं है। किसी पशु का अंग मनुष्य में लगाने के लिए उसके रक्त, रक्तवाहिनियों, कोशिकाओं की सतह, हार्मोन संबंधी प्रक्रियाओं और प्रतिरक्षा तंत्र से होने वाली प्रतिक्रिया को समझना आवश्यक है। बाद में आनुवंशिक इंजीनियरिंग की प्रगति ने इस क्षेत्र को बिल्कुल नई दिशा दी।

सूअर ही क्यों चुना गया, बंदर या चिंपैंजी क्यों नहीं?

यह प्रश्न स्वाभाविक है कि जब मनुष्य का विकासवादी संबंध बंदरों और दूसरे प्राइमेट जीवों से सूअर की तुलना में अधिक निकट है, तो वैज्ञानिक प्रत्यारोपण के लिए सूअर पर इतना ध्यान क्यों दे रहे हैं। इसका उत्तर केवल आनुवंशिक समानता में नहीं, बल्कि अंगों के आकार, शारीरिक कार्यप्रणाली, प्रजनन, उपलब्धता और संक्रमण संबंधी जोखिमों में भी छिपा है। सूअर के हृदय और किडनी का आकार तथा कुछ शारीरिक विशेषताएँ मानव अंगों से इतनी मिलती-जुलती हैं कि उन्हें प्रत्यारोपण अनुसंधान के लिए उपयोगी माना गया है। सूअर अपेक्षाकृत तेजी से विकसित होते हैं और नियंत्रित परिस्थितियों में उनका प्रजनन संभव है। उनके पालन, पोषण और पशु चिकित्सा से जुड़ी व्यवस्थाओं का भी व्यापक अनुभव उपलब्ध है। इसके विपरीत चिंपैंजी जैसे प्राइमेट जीवों के उपयोग से गंभीर पशु कल्याण और संरक्षण संबंधी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। उनके प्रजनन की गति और उपलब्धता भी बड़े पैमाने पर अंग उत्पादन के लिए उपयुक्त नहीं है।

लेकिन सूअर के पक्ष में इन व्यावहारिक कारणों के बावजूद एक बड़ी जैविक बाधा मौजूद है। मनुष्य और सूअर दो अलग स्तनधारी प्रजातियाँ हैं। उनके अंगों के अनेक कार्य समान हो सकते हैं। लेकिन उनकी कोशिकाओं की सतह और प्रतिरक्षा-संबंधी संकेतों में महत्त्वपूर्ण अंतर होता है। इसलिए यदि सामान्य सूअर का अंग सीधे मनुष्य में लगा दिया जाए, तो मानव प्रतिरक्षा प्रणाली उसे विदेशी जैविक पदार्थ के रूप में पहचानकर अत्यंत तीव्र प्रतिक्रिया दे सकती है। इसी समस्या के कारण आधुनिक शोध में सामान्य सूअर के अंग के बजाय विशेष रूप से आनुवंशिक संशोधन किए गए सूअर के अंगों का उपयोग हो रहा है। यह कोई साधारण पशुपालन प्रक्रिया नहीं है। ऐसे जानवरों को विशेष जैविक निगरानी, रोगाणु नियंत्रण और आनुवंशिक परीक्षण वाली व्यवस्थाओं में तैयार किया जाता है।

सूअर को चुनने का एक और महत्त्वपूर्ण कारण यह है कि वैज्ञानिक उसके जीनोम में ऐसे परिवर्तन करने में सफल हुए हैं जिनसे कुछ प्रमुख प्रतिरक्षा बाधाएँ कम की जा सकती हैं। हाल के वर्षों में 'क्रिस्पर' जैसी जीन-संपादन तकनीकों ने अनेक जीनों में अपेक्षाकृत सटीक परिवर्तन करना संभव बनाया है। इसके माध्यम से कुछ सूअर जीनों को निष्क्रिय किया जा सकता है और कुछ मानव जीनों को जोड़ा जा सकता है। उद्देश्य सूअर के पूरे अंग को मानव अंग में बदलना नहीं है। उद्देश्य यह है कि सूअर का अंग मनुष्य के प्रतिरक्षा तंत्र और रक्त परिसंचरण के साथ अधिक अनुकूल ढंग से काम कर सके। यही अंतर आधुनिक जेनोट्रांसप्लांटेशन को बीसवीं शताब्दी के पुराने और अक्सर असफल पशु-अंग प्रत्यारोपण प्रयोगों से अलग करता है।

इंसान का शरीर पशु के अंग को तुरंत नष्ट क्यों कर सकता है?

मानव शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली का मुख्य कार्य बाहरी रोगजनकों और असामान्य जैविक संरचनाओं की पहचान करके उनसे रक्षा करना है। लेकिन प्रत्यारोपण के मामले में यही प्रणाली एक बड़ी चुनौती बन जाती है। यदि किसी दूसरे व्यक्ति की किडनी मानव शरीर में लगाई जाए, तो भी प्राप्तकर्ता का प्रतिरक्षा तंत्र उस अंग को विदेशी मान सकता है। इसलिए मानव अंग प्रत्यारोपण के बाद भी प्रतिरक्षा दबाने वाली दवाओं की आवश्यकता पड़ सकती है। लेकिन पशु से प्राप्त अंग के मामले में समस्या और गंभीर हो सकती है, क्योंकि दोनों प्रजातियों की कोशिकाओं में कई प्रकार के जैविक अंतर मौजूद होते हैं। मानव रक्त में पहले से मौजूद कुछ एंटीबॉडी सूअर की कोशिकाओं की सतह पर विशेष शर्करा-संबंधी अणुओं को पहचान सकती हैं। इसके बाद प्रतिरक्षा प्रणाली की 'कॉम्प्लीमेंट' नामक प्रतिक्रिया सक्रिय हो सकती है और अंग की रक्तवाहिनियों पर हमला शुरू हो सकता है।

इस तरह की अत्यंत तीव्र प्रतिक्रिया को 'हाइपरएक्यूट रिजेक्शन' कहा जाता है। पुराने प्रत्यारोपण प्रयोगों में यह समस्या इतनी गंभीर थी कि पशु का अंग बहुत जल्दी काम करना बंद कर सकता था। मानव रक्त जब सूअर की रक्तवाहिनियों के संपर्क में आता है, तो कोशिकाओं की सतह पर मौजूद कुछ अणु एंटीबॉडी को सक्रिय कर सकते हैं। इसके बाद रक्तवाहिनियों की भीतरी परत में क्षति, सूजन और रक्त के थक्के बनने जैसी प्रक्रियाएँ शुरू हो सकती हैं। यदि यह प्रतिक्रिया तीव्र हो, तो प्रत्यारोपित अंग में रक्त का प्रवाह प्रभावित हो जाता है और वह अपने आवश्यक कार्य नहीं कर पाता। यही कारण है कि केवल हृदय को जोड़ देना या किडनी की रक्तवाहिनियों को सिल देना सफल प्रत्यारोपण के लिए पर्याप्त नहीं है। प्रत्यारोपण के बाद शरीर को उस अंग के साथ जैविक रूप से काम करना भी स्वीकार करना पड़ता है।

इस समस्या में 'अल्फा-गैल' नामक एक विशेष शर्करा संरचना का ऐतिहासिक महत्त्व रहा है। सामान्य सूअर की कोशिकाओं की सतह पर यह संरचना पाई जाती है, जबकि मानव शरीर में उससे संबंधित स्वाभाविक एंटीबॉडी मौजूद हो सकती हैं। वैज्ञानिकों ने पाया कि सूअर के 'जीजीटीए1' नामक जीन को निष्क्रिय करके इस प्रमुख प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को कम किया जा सकता है। लेकिन केवल एक जीन हटाने से पूरी समस्या समाप्त नहीं होती। अन्य शर्करा संरचनाएँ, रक्त के थक्के बनने के तंत्र, कॉम्प्लीमेंट प्रणाली और प्रतिरक्षा कोशिकाओं की प्रतिक्रियाएँ भी महत्त्वपूर्ण हैं। इसलिए आधुनिक आनुवंशिक संशोधन में कभी अनेक सूअर जीन निष्क्रिय किए जाते हैं और कुछ मानव जीन जोड़े जाते हैं। इसका लक्ष्य अंग को मानव प्रतिरक्षा प्रणाली के लिए अधिक स्वीकार्य बनाना तथा रक्त के सामान्य प्रवाह में मदद करना है।

वर्ष 2026 में चल रहे कुछ प्रमुख प्रत्यारोपण कार्यक्रम ऐसे सूअरों का उपयोग कर रहे हैं जिनमें दस आनुवंशिक परिवर्तन किए गए हैं। अमेरिकी कंपनी यूनाइटेड थेराप्यूटिक्स के अनुसार उसके एक प्लेटफॉर्म में छह मानव जीन जोड़े गए हैं और चार सूअर जीन निष्क्रिय किए गए हैं। इन परिवर्तनों का उद्देश्य प्रतिरक्षा-संबंधी अनुकूलता बढ़ाना, अंग के अस्वीकार होने का जोखिम कम करना और उसकी वृद्धि संबंधी कुछ विशेषताओं को नियंत्रित करना है। लेकिन दस जीन परिवर्तित कर देना सफलता की कोई निश्चित गारंटी नहीं है। अलग शोध समूहों ने एक जीन परिवर्तन से लेकर बहुत अधिक आनुवंशिक बदलावों वाली प्रणालियों पर काम किया है। वास्तविक प्रश्न यह है कि किन परिवर्तनों के संयोजन से अंग लंबे समय तक सुरक्षित और प्रभावी ढंग से काम कर सकता है।

वर्ष 2022 : जब पहली बार जीवित मनुष्य के शरीर में सूअर का हृदय लगाया गया

आधुनिक जेनोट्रांसप्लांटेशन के इतिहास में 7 जनवरी, 2022 एक निर्णायक तारीख है। अमेरिका के मैरीलैंड विश्वविद्यालय से जुड़े चिकित्सकों ने 57 वर्षीय डेविड बेनेट के शरीर में आनुवंशिक रूप से संशोधित सूअर का हृदय प्रत्यारोपित किया। बेनेट गंभीर हृदय रोग से पीड़ित थे और उन्हें पारंपरिक मानव हृदय प्रत्यारोपण के लिए उपयुक्त नहीं माना गया था। ऐसी स्थिति में अमेरिकी नियामक प्राधिकरण ने विशेष परिस्थितियों के अंतर्गत प्रयोगात्मक उपचार की अनुमति दी। डॉक्टरों ने उनका असफल हो रहा हृदय निकालकर सूअर का हृदय लगाया। सबसे आश्चर्यजनक बात यह थी कि प्रत्यारोपित हृदय ने तुरंत अस्वीकार होने के बजाय उनके शरीर में काम करना शुरू कर दिया। यह वैज्ञानिक इतिहास की बड़ी उपलब्धि थी, क्योंकि इससे पहले इस प्रकार के प्रत्यारोपण को लेकर लंबे समय तक सैद्धांतिक और प्रयोगात्मक चर्चा होती रही थी, लेकिन जीवित मनुष्य में ऐसी प्रक्रिया की कार्यक्षमता का प्रमाण सीमित था।

डेविड बेनेट लगभग दो महीने तक जीवित रहे। अंततः 8 मार्च, 2022 को उनकी मृत्यु हो गई। प्रारंभिक अवधि में सूअर का हृदय काम कर रहा था। लेकिन बाद में उनकी हालत बिगड़ गई। प्रत्यारोपित अंग के अध्ययन में सूअर से जुड़े एक वायरस की उपस्थिति सहित अनेक जटिलताएँ सामने आईं। वैज्ञानिकों ने इस मामले से यह समझने का प्रयास किया कि प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया, अंग की कार्यक्षमता, रोगाणुओं की उपस्थिति और मरीज की पहले से गंभीर स्वास्थ्य स्थिति किस प्रकार परिणाम को प्रभावित कर सकती है। यह कहना गलत होगा कि उनकी मृत्यु केवल इसलिए हुई क्योंकि सूअर का अंग मानव शरीर में लगाया गया था। इसी तरह यह कहना भी उचित नहीं होगा कि प्रत्यारोपण पूरी तरह सफल हो गया था। सही निष्कर्ष यह है कि इस प्रयोग ने पहली बार जीवित मरीज में आनुवंशिक रूप से संशोधित सूअर के हृदय की कार्यक्षमता को कुछ समय तक प्रदर्शित किया। लेकिन उसके दीर्घकालिक सुरक्षित उपयोग की समस्या का समाधान नहीं हुआ।

इसके बाद 20 सितंबर, 2023 को मैरीलैंड के चिकित्सकों ने दूसरा प्रयोगात्मक सूअर-हृदय प्रत्यारोपण किया। इस बार मरीज 58 वर्षीय लॉरेंस फॉसेट थे, जो गंभीर हृदय रोग से पीड़ित थे और पारंपरिक हृदय प्रत्यारोपण के लिए उपयुक्त नहीं माने गए थे। आरंभ में उन्होंने कुछ सकारात्मक सुधार दिखाए। वे परिवार के साथ बातचीत करने और कुछ सामान्य गतिविधियों में भाग लेने में सक्षम हुए। लेकिन बाद में प्रत्यारोपित हृदय में अस्वीकृति के संकेत दिखाई दिए और 30 अक्टूबर, 2023 को उनकी मृत्यु हो गई। वे लगभग छह सप्ताह तक जीवित रहे। इन दोनों मामलों ने चिकित्सा विज्ञान के सामने एक महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष रखा। आनुवंशिक रूप से संशोधित सूअर का हृदय मनुष्य के शरीर में तुरंत असफल हुए बिना काम कर सकता है। लेकिन उसे महीनों और वर्षों तक सुरक्षित रखने के लिए प्रतिरक्षा विज्ञान तथा दूसरे जैविक प्रश्नों का अधिक गहरा समाधान आवश्यक है।

वर्ष 2026 तक सूअर के हृदय का प्रत्यारोपण कहाँ पहुँचा?

हृदय से संबंधित सबसे महत्त्वपूर्ण हालिया प्रगति 15 मई, 2026 को सामने आई, जब अमेरिकी जैव प्रौद्योगिकी कंपनी यूनाइटेड थेराप्यूटिक्स ने घोषणा की कि अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन ने आनुवंशिक रूप से संशोधित सूअर के हृदय का व्यवस्थित मानव चिकित्सकीय परीक्षण शुरू करने की अनुमति दे दी है। इस अध्ययन का नाम 'एक्सप्रेस' है और प्रयोगात्मक हृदय को 'यूहार्ट' कहा गया है। प्रारंभिक योजना में अधिकतम दो मरीजों को शामिल करने की व्यवस्था है। पहले मरीज के सुरक्षा और प्रभाव संबंधी परिणामों की समीक्षा के बाद दूसरे मरीज का प्रत्यारोपण किया जाना है। इसके बाद नियामक समीक्षा के आधार पर अध्ययन को आगे बढ़ाने की संभावना रखी गई है। यह बदलाव महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि 2022 और 2023 के प्रयोग विशेष परिस्थितियों में व्यक्तिगत मरीजों को दिए गए असाधारण उपचार थे, जबकि 2026 की अनुमति एक नियोजित चिकित्सकीय परीक्षण से संबंधित है।

लेकिन इस उपलब्धि का अर्थ यह नहीं कि अमेरिका ने सूअर के हृदय को सामान्य अस्पतालों में लगाने की स्वीकृति दे दी है। किसी प्रयोगात्मक उपचार के लिए क्लिनिकल ट्रायल की अनुमति और उस उपचार को व्यापक चिकित्सकीय उपयोग के लिए मंजूरी मिलना दो बिल्कुल अलग चरण हैं। क्लिनिकल ट्रायल में निर्धारित पात्रता वाले मरीजों पर सुरक्षा, प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया, अंग की कार्यक्षमता और संभावित दुष्प्रभावों का सावधानीपूर्वक अध्ययन किया जाता है। अक्टूबर 2026 तक उपलब्ध आधिकारिक जानकारी में यूहार्ट कार्यक्रम के लिए परीक्षण की अनुमति और उसकी प्रारंभिक योजना की पुष्टि होती है। लेकिन इससे लंबे समय तक सफल मानव हृदय प्रत्यारोपण सिद्ध नहीं होता। इसलिए सूअर के हृदय से संबंधित अनुसंधान को आशाजनक लेकिन अभी शुरुआती चिकित्सकीय परीक्षण की अवस्था में समझना चाहिए। इसका सबसे बड़ा वैज्ञानिक प्रश्न आज भी यही है कि प्रत्यारोपित हृदय कितने लंबे समय तक बिना गंभीर प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया और दूसरी जटिलताओं के काम कर सकता है।

सूअर की किडनी ने चिकित्सा विज्ञान को सबसे अधिक उम्मीद क्यों दी है?

हृदय की तुलना में किडनी पर चल रहे जेनोट्रांसप्लांटेशन अनुसंधान को कुछ व्यावहारिक लाभ प्राप्त हैं। किडनी खराब होने वाले कई मरीजों को डायलिसिस के माध्यम से जीवित रखा जा सकता है। यदि किसी प्रयोगात्मक किडनी प्रत्यारोपण में अंग काम करना बंद कर दे, तो कुछ परिस्थितियों में उसे निकालकर मरीज को दोबारा डायलिसिस पर लौटाया जा सकता है। यह विकल्प हर मरीज में समान रूप से सुरक्षित या उपलब्ध नहीं होगा, लेकिन वैज्ञानिक अनुसंधान की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। इसके विपरीत हृदय का काम बंद हो जाने पर तुरंत जीवनरक्षक सहायता की आवश्यकता होती है। इसी कारण किडनी को पशु-अंग प्रत्यारोपण के अपेक्षाकृत शुरुआती व्यापक मानव परीक्षणों के लिए अधिक व्यावहारिक उम्मीदवार माना गया है। लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि प्रयोगात्मक किडनी प्रत्यारोपण भी अत्यंत गंभीर शल्य और प्रतिरक्षा-संबंधी जोखिमों से जुड़ा है।

किडनी के अनुसंधान में एक महत्त्वपूर्ण चरण उन व्यक्तियों पर किए गए अध्ययन थे जिन्हें चिकित्सकीय रूप से ब्रेन-डेड घोषित किया जा चुका था और जिनके परिवारों की अनुमति से शरीर की जैविक प्रक्रियाओं को अनुसंधान के लिए सीमित अवधि तक बनाए रखा गया। ऐसे अध्ययन वैज्ञानिकों को प्रत्यारोपित अंग में रक्त प्रवाह, मूत्र निर्माण और प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को वास्तविक मानव शरीर की परिस्थितियों में देखने का अवसर देते हैं। लेकिन ऐसे व्यक्ति जीवित उपचार प्राप्तकर्ता के समान नहीं होते। इसलिए ब्रेन-डेड व्यक्ति में सूअर की किडनी का कुछ समय तक काम करना इस बात का निर्णायक प्रमाण नहीं है कि वही अंग जीवित मरीज में वर्षों तक सफल रहेगा। फिर भी प्रारंभिक प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया, रक्त परिसंचरण और अंग की कार्यक्षमता समझने के लिए यह अनुसंधान महत्त्वपूर्ण रहा है।

नवंबर 2025 में प्रकाशित और वर्ष 2026 के 'नेचर' संस्करण में शामिल एक अध्ययन इस दिशा में विशेष उल्लेखनीय है। इसमें एक आनुवंशिक रूप से संशोधित सूअर की किडनी और थाइमस ऊतक से संबंधित प्रत्यारोपण व्यवस्था का अध्ययन ब्रेन-डेड मानव शरीर में 61 दिनों तक किया गया। वैज्ञानिकों ने अंग की कार्यक्षमता और प्रतिरक्षा प्रणाली की प्रतिक्रिया का विस्तार से विश्लेषण किया। इस प्रयोग की महत्त्वपूर्ण विशेषता यह थी कि उसमें सूअर के एक प्रमुख जीन को निष्क्रिय करने और थाइमस संबंधी तकनीक का उपयोग किया गया। इससे शोधकर्ताओं को यह समझने में सहायता मिली कि प्रत्यारोपित अंग के जीवित रहने के लिए केवल अनेक जीनों को बदलना ही एकमात्र संभावित रास्ता नहीं है। प्रतिरक्षा प्रणाली को अंग के प्रति अधिक सहिष्णु बनाने की दूसरी रणनीतियाँ भी उपयोगी हो सकती हैं।

टिम एंड्रयूज का मामला : सूअर की किडनी ने 271 दिनों तक कैसे काम किया?

सितंबर 2026 तक सूअर की किडनी के प्रत्यारोपण से जुड़ी सबसे महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों में अमेरिकी मरीज टिम एंड्रयूज का मामला सामने आया। वे 66 वर्षीय मरीज थे और टाइप-2 मधुमेह से जुड़ी गंभीर किडनी बीमारी के कारण डायलिसिस पर निर्भर थे। उन्हें मानव किडनी मिलने की संभावना सीमित थी। 25 जनवरी 2025 को मैसाचुसेट्स जनरल हॉस्पिटल में डॉक्टरों ने उनके शरीर में आनुवंशिक रूप से संशोधित सूअर की किडनी प्रत्यारोपित की। यह प्रक्रिया अमेरिकी एफडीए की विशेष अनुमति से संचालित एक सीमित मानव अध्ययन का हिस्सा थी। प्रत्यारोपण के बाद सूअर की किडनी ने तत्काल कार्य करना शुरू किया और मरीज को डायलिसिस की आवश्यकता नहीं रही। इसके बाद चिकित्सकों ने प्रतिरक्षा-संबंधी प्रतिक्रियाओं, किडनी के कार्य और संभावित संक्रमणों की लगातार निगरानी की।

इस प्रयोग की असाधारण उपलब्धि यह थी कि प्रत्यारोपित सूअर की किडनी 271 दिनों तक काम करती रही। यह अवधि लगभग नौ महीने के बराबर है। लेकिन इस पूरे समय सब कुछ बिना जटिलता के नहीं चला। प्रत्यारोपण के चौदहवें दिन की बायोप्सी में टी-कोशिकाओं से संबंधित अस्वीकृति के संकेत मिले, जिन्हें उपचार से नियंत्रित किया गया। लगभग छह महीने तक किडनी की कार्यक्षमता स्थिर रही। बाद में एक बैक्टीरियल संक्रमण की स्थिति में प्रतिरक्षा दबाने वाली दवाओं की मात्रा कम करनी पड़ी। इसके बाद रक्तवाहिनियों की सूक्ष्म संरचनाओं में सूजन, एंडोथीलियल क्षति और सूक्ष्म रक्त-थक्कों से संबंधित समस्याएँ विकसित हुईं। अंततः प्रत्यारोपित किडनी ने काम करना बंद कर दिया और उसे निकालना पड़ा। लेकिन मरीज को बाद में मानव अंगदाता की किडनी प्राप्त हुई। सितंबर 2026 में 'द लैंसेट' में प्रकाशित इस अध्ययन ने पहली बार यह महत्त्वपूर्ण प्रमाण दिया कि सूअर की किडनी कुछ परिस्थितियों में लंबे समय तक अस्थायी सहारे, अर्थात 'ब्रिज टू एलोट्रांसप्लांटेशन', का काम कर सकती है।

इस घटना को समझने के लिए 'ब्रिज' की अवधारणा विशेष महत्त्वपूर्ण है। सामान्यतः किसी मरीज को किडनी की आवश्यकता हो और मानव अंग उपलब्ध न हो, तो उसे लंबे समय तक डायलिसिस पर रहना पड़ सकता है। यदि भविष्य में सूअर की किडनी कुछ महीनों या वर्षों तक सुरक्षित रूप से काम कर सके, तो वह मरीज को मानव अंग मिलने तक जीवनरक्षक सहायता दे सकती है। लेकिन 271 दिनों की उपलब्धि को स्थायी सफलता घोषित करना गलत होगा, क्योंकि अंततः पशु की किडनी असफल हुई। यह अनुसंधान एक महत्त्वपूर्ण चरण तक पहुँचा है, अंतिम मंजिल तक नहीं। फिर भी इसका वैज्ञानिक महत्त्व बहुत बड़ा है। पहली बार चिकित्सकों को जीवित मरीज में महीनों तक काम करने वाले पशु-अंग की कार्यप्रणाली, प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया और असफलता के कारणों का विस्तृत अध्ययन करने का अवसर मिला।

किडनी के नियमित मानव परीक्षण कब शुरू हुए?

फरवरी 2025 में अमेरिकी एफडीए ने यूनाइटेड थेराप्यूटिक्स की प्रयोगात्मक सूअर-किडनी 'यूकेडनी' के क्लिनिकल ट्रायल को अनुमति दी। प्रारंभिक योजना में छह मरीजों को शामिल करने और सुरक्षा तथा प्रभाव के प्रमाण मिलने पर अध्ययन का विस्तार अधिकतम पचास मरीजों तक करने की संभावना रखी गई थी। नवंबर 2025 में कंपनी ने अपने 'एक्सपैंड' परीक्षण में पहले प्रत्यारोपण की घोषणा की। यह प्रक्रिया न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी लैंगोन हेल्थ में की गई थी। परीक्षण में ऐसी आनुवंशिक रूप से संशोधित सूअर की किडनी उपयोग की गई जिसमें दस जीन संबंधी परिवर्तन किए गए थे। इसका लक्ष्य यह समझना है कि गंभीर किडनी विफलता वाले मरीजों में पशु की किडनी कितनी प्रभावी और सुरक्षित साबित हो सकती है।

अक्टूबर 2026 में कंपनी ने अपने विशेष रोगाणु-मुक्त सूअर अंग उत्पादन केंद्रों के विस्तार की घोषणा भी की। 20 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित आधिकारिक जानकारी में यूकेडनी के साथ 'यूथाइमोकिडनी' तथा प्रयोगात्मक हृदय कार्यक्रम 'यूहार्ट' के विकास का उल्लेख किया गया। यह परिवर्तन बताता है कि अनुसंधान केवल किसी एक अस्पताल के ऑपरेशन थिएटर तक सीमित नहीं रह गया है। वैज्ञानिकों को अब यह भी सुनिश्चित करना है कि भविष्य में प्रयोगात्मक उपयोग के लिए अंग लगातार समान जैविक गुणवत्ता के साथ उपलब्ध हो सकें। एक सफल प्रत्यारोपण और हजारों मरीजों के लिए सुरक्षित अंग उत्पादन की व्यवस्था बनाना दो अलग चुनौतियाँ हैं। इसके लिए विशेष पशुपालन केंद्र, रोगाणु नियंत्रण, जीन-संपादन की गुणवत्ता, अंगों की जाँच, परिवहन और लंबी अवधि की निगरानी आवश्यक होगी।

क्या सूअर का लिवर भी मनुष्य के शरीर में काम कर सकता है?

किडनी और हृदय के बाद वैज्ञानिकों की सबसे अधिक रुचि लिवर में भी है, लेकिन यह अंग प्रत्यारोपण की दृष्टि से विशेष रूप से जटिल है। मानव लिवर केवल रक्त से हानिकारक पदार्थ निकालने का काम नहीं करता। वह प्रोटीन बनाता है, पित्त उत्पन्न करता है, रक्त के थक्के बनने में सहायता करने वाले अनेक कारकों का निर्माण करता है, पोषक पदार्थों के चयापचय में भूमिका निभाता है और शरीर की अनेक आवश्यक जैविक प्रक्रियाओं को नियंत्रित करता है। इसलिए किसी पशु का लिवर मनुष्य में लगाने के लिए केवल यह पर्याप्त नहीं कि वह रक्त प्राप्त करके जीवित बना रहे। उसे मानव शरीर की चयापचय और रक्त संबंधी आवश्यकताओं के अनुरूप काम भी करना होगा। यही कारण है कि सूअर के लिवर से संबंधित शोध अपेक्षाकृत अधिक कठिन रहा है।

इस क्षेत्र में चीन के वैज्ञानिकों ने महत्त्वपूर्ण प्रगति दिखाई है। 26 मार्च 2025 को 'नेचर' में प्रकाशित अध्ययन में आनुवंशिक रूप से संशोधित सूअर का लिवर ब्रेन-डेड मानव शरीर में लगाया गया था। यह एक सहायक प्रत्यारोपण था, जिसका अर्थ है कि सूअर के लिवर को मानव शरीर में अतिरिक्त अंग के रूप में जोड़ा गया, न कि सामान्यतः कार्यरत समूचे मानव लिवर की जगह पूरी तरह प्रतिस्थापित किया गया। वैज्ञानिकों ने दस दिनों तक अंग की गतिविधियों का अध्ययन किया। सूअर के लिवर में पित्त निर्माण के संकेत मिले और उससे संबंधित एल्ब्यूमिन जैसे प्रोटीन की उपस्थिति भी दर्ज की गई। इस अवधि में तत्काल गंभीर अस्वीकृति के बिना कुछ आवश्यक कार्य जारी रहना एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि थी। लेकिन चूँकि प्रयोग ब्रेन-डेड व्यक्ति में किया गया था और उसकी अवधि सीमित थी, इसलिए इसे जीवित मरीज में दीर्घकालिक सफल लिवर प्रत्यारोपण का प्रमाण नहीं माना जा सकता।

इसके बाद चीन से जीवित व्यक्ति में सूअर के लिवर के उपयोग की जानकारी सामने आई। मार्च 2026 में 'जर्नल ऑफ हेपेटोलॉजी' में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार एक ऐसे मरीज में दस आनुवंशिक परिवर्तन वाले सूअर के लिवर को सहायक अंग के रूप में प्रत्यारोपित किया गया था, जिसे लिवर कैंसर की गंभीर समस्या थी। प्रत्यारोपण के बाद सूअर के लिवर ने कुछ चयापचय संबंधी कार्य किए और आवश्यक प्रोटीनों के निर्माण के संकेत मिले। शुरुआती दौर में तत्काल या तीव्र अस्वीकृति की समस्या नहीं दिखी, लेकिन आगे चलकर रक्तवाहिनियों और सूक्ष्म थक्कों से संबंधित गंभीर जटिलताएँ विकसित हुईं। अंततः सूअर का अंग निकालना पड़ा। अध्ययन में मरीज के 171 दिनों तक जीवित रहने का विवरण दिया गया। यह संख्या प्रत्यारोपित सूअर के लिवर के 171 दिनों तक बिना समस्या कार्य करते रहने के बराबर नहीं है। इस अंतर को समझना अत्यंत आवश्यक है। अध्ययन ने संभावित उपचार की दिशा दिखाई, लेकिन सुरक्षित और स्थायी लिवर प्रत्यारोपण की समस्या अभी हल नहीं हुई।

मार्च 2026 में एक और असाधारण प्रयोग की जानकारी प्रकाशित हुई जिसमें गंभीर लिवर विफलता वाले 56 वर्षीय मरीज के रक्त को शरीर के बाहर रखे आनुवंशिक रूप से संशोधित सूअर के लिवर से जोड़ा गया। इस व्यवस्था में सूअर के लिवर को मरीज के शरीर में स्थायी रूप से प्रत्यारोपित नहीं किया गया था। उसका उपयोग रक्त को कुछ समय तक संसाधित करने और मरीज को मानव लिवर उपलब्ध होने तक सहारा देने के उद्देश्य से किया गया। इस तकनीक को 'एक्स्ट्राकॉर्पोरियल लिवर सपोर्ट' की श्रेणी में समझा जा सकता है। इससे एक अत्यंत रोचक भविष्य की संभावना सामने आती है। हो सकता है कि कुछ परिस्थितियों में पूरा पशु-अंग मनुष्य के शरीर में स्थायी रूप से लगाना आवश्यक न हो। किसी अंग का उपयोग शरीर के बाहर जीवनरक्षक जैविक सहायता प्रदान करने के लिए भी किया जा सकता है। लेकिन इसके लिए रक्त संबंधी अनुकूलता, संक्रमण नियंत्रण और अंग की कार्यक्षमता जैसी समस्याओं का समाधान आवश्यक रहेगा।

जुलाई 2026 में 'नेचर मेडिसिन' में प्रकाशित अनुसंधान ने सूअर के लिवर और मानव रक्त के बीच होने वाली जैविक प्रतिक्रियाओं को समझने में नई जानकारी दी। ब्रेन-डेड व्यक्तियों से जुड़े प्रयोगों में वैज्ञानिकों ने रक्त और प्रत्यारोपित ऊतकों का प्रोटीन, वसा तथा चयापचय संबंधी स्तर पर अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि सूअर का लिवर कुछ आवश्यक कार्य करते हुए भी मानव रक्त की प्लेटलेट्स और प्रतिरक्षा प्रणाली के साथ जटिल प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न कर सकता है। विशेष रूप से प्लेटलेट्स में गंभीर कमी एक महत्त्वपूर्ण समस्या बनी रही। यह इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि किसी मरीज का लिवर यदि रक्त का सामान्य संतुलन बनाए रखने के बजाय गंभीर रक्तस्राव या थक्कों का जोखिम बढ़ा दे, तो केवल पित्त बनाना अथवा कुछ प्रोटीन उत्पन्न करना पर्याप्त सफलता नहीं कहलाएगा।

क्या भविष्य में फेफड़े, अग्न्याशय और दूसरी कोशिकाएँ भी पशुओं से मिल सकती हैं?

जेनोट्रांसप्लांटेशन का विकास केवल हृदय, किडनी और लिवर तक सीमित नहीं है। वैज्ञानिक अग्न्याशय की इंसुलिन बनाने वाली कोशिकाओं, विशेष ऊतकों और दूसरे अंगों से संबंधित संभावनाओं का भी अध्ययन कर रहे हैं। उदाहरण के लिए मधुमेह के कुछ प्रकारों में शरीर की इंसुलिन बनाने वाली बीटा कोशिकाएँ नष्ट हो जाती हैं या पर्याप्त कार्य नहीं कर पातीं। यदि पशुओं से प्राप्त विशेष कोशिकाएँ मानव शरीर में सुरक्षित रूप से इंसुलिन बना सकें, तो भविष्य में कुछ मरीजों के लिए उपचार का एक नया विकल्प विकसित हो सकता है। लेकिन ऐसी कोशिकाओं को जीवित रखने, प्रतिरक्षा प्रणाली से बचाने और उनके कार्य को नियंत्रित करने की चुनौतियाँ बनी हुई हैं। फेफड़ों के प्रत्यारोपण में भी रक्तवाहिनियों, प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया और गैसों के आदान-प्रदान की जटिलताएँ महत्त्वपूर्ण हैं। इसलिए किसी एक अंग में सफलता मिल जाने से दूसरे अंग का प्रत्यारोपण अपने आप आसान नहीं हो जाएगा।

इस विषय में त्वचा और हृदय के वाल्व जैसे ऊतकों का अंतर भी समझना चाहिए। चिकित्सा में पशु-उत्पत्ति वाले विशेष रूप से संसाधित हृदय वाल्वों का उपयोग पहले से होता रहा है। इन्हें अक्सर 'बायोप्रोस्थेटिक वाल्व' कहा जाता है। इनमें सूअर के वाल्व या गोवंशीय ऊतकों से प्राप्त सामग्री का उपयोग किया जा सकता है। लेकिन इन उत्पादों के निर्माण में ऊतकों का विशेष उपचार किया जाता है, जिससे वे जीवित पशु-अंग प्रत्यारोपण से जैविक रूप से अलग होते हैं। ऐसे वाल्व का उपयोग यह प्रमाण नहीं है कि पूरा सूअर का हृदय बिना प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया के मानव शरीर में लगाया जा सकता है। इसी तरह पशु-उत्पत्ति वाले कुछ संसाधित त्वचा संबंधी उत्पादों और जीवित पशु कोशिकाओं के प्रत्यारोपण के बीच भी महत्त्वपूर्ण अंतर है। आधुनिक जेनोट्रांसप्लांटेशन का सबसे चुनौतीपूर्ण क्षेत्र ऐसे जीवित अंगों का उपयोग है जिन्हें मानव रक्त परिसंचरण तथा प्रतिरक्षा प्रणाली के साथ लंबे समय तक कार्य करना होता है।

सबसे बड़ी चुनौती : अंग का अस्वीकार होना या संक्रमण का फैलना?

दोनों गंभीर चुनौतियाँ हैं, लेकिन उनकी प्रकृति अलग है। प्रतिरक्षा अस्वीकृति का संबंध इस बात से है कि मानव शरीर पशु-अंग को विदेशी जैविक संरचना के रूप में पहचानकर उस पर हमला कर सकता है। संक्रमण का प्रश्न इस आशंका से जुड़ा है कि पशु में मौजूद कोई रोगाणु मनुष्य तक पहुँच जाए। जीवित अंग प्रत्यारोपण में पशु की कोशिकाएँ सीधे मानव शरीर के रक्त और प्रतिरक्षा तंत्र के संपर्क में आती हैं। इसलिए साधारण पशु संपर्क की तुलना में कुछ विशिष्ट संक्रमण संबंधी चिंताएँ पैदा हो सकती हैं। सूअरों से संबंधित वायरस, बैक्टीरिया और दूसरे रोगजनकों की निगरानी आवश्यक होती है। एक विशेष चिंता 'पोर्सिन एंडोजेनस रेट्रोवायरस' अर्थात 'पीईआरवी' से जुड़ी है। ऐसे वायरसों से संबंधित आनुवंशिक अनुक्रम सूअर के जीनोम में मौजूद हो सकते हैं। वैज्ञानिकों का उद्देश्य यह समझना है कि क्या वे मानव कोशिकाओं को प्रभावित कर सकते हैं और ऐसे जोखिम को किस प्रकार नियंत्रित किया जाए।

यहाँ एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिक सावधानी आवश्यक है। किसी पशु में वायरस से संबंधित आनुवंशिक सामग्री का मौजूद होना और उससे मानव में वास्तविक बीमारी फैल जाना एक ही बात नहीं है। सभी पहचाने गए वायरस मानव शरीर में संक्रमण पैदा करने में सक्षम हों, ऐसा आवश्यक नहीं है। लेकिन अंग प्रत्यारोपण जैसी प्रक्रिया में सावधानी का स्तर बहुत ऊँचा रखना पड़ता है क्योंकि प्राप्तकर्ता को प्रतिरक्षा प्रणाली दबाने वाली दवाएँ भी दी जा सकती हैं। इन दवाओं के कारण शरीर की कुछ संक्रमणों से रक्षा करने की क्षमता कम हो सकती है। इसीलिए सूअर के अंग तैयार करने वाली कंपनियाँ ऐसे विशेष केंद्र विकसित कर रही हैं जहाँ पशुओं को रोगाणु निगरानी की नियंत्रित व्यवस्था में पाला जाता है। अंग निकालने से पहले विस्तृत परीक्षण किए जाते हैं और प्रत्यारोपण प्राप्तकर्ताओं की लंबे समय तक निगरानी की योजना बनाई जाती है।

संक्रमण संबंधी जोखिम केवल उस मरीज तक सीमित नहीं हो सकता जिसे पशु-अंग लगाया गया है। यदि किसी नई परिस्थिति में पशु-उत्पत्ति वाला रोगाणु मनुष्य में प्रभावी संक्रमण उत्पन्न कर सके, तो सैद्धांतिक रूप से सार्वजनिक स्वास्थ्य से संबंधित प्रश्न भी सामने आ सकते हैं। इसी कारण एफडीए ने जेनोट्रांसप्लांटेशन को केवल सामान्य शल्य चिकित्सा का विषय नहीं माना है। इसमें पशु स्रोत की निगरानी, अंग प्राप्तकर्ता का परीक्षण, जैविक नमूनों का संग्रह और संभावित संक्रमणों की पहचान से जुड़े विशेष सुरक्षा प्रश्न शामिल हैं। लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि पशु-अंग प्रत्यारोपण से किसी नई महामारी का फैलना निश्चित है। अभी मुख्य प्रश्न संभावित जोखिमों की वैज्ञानिक पहचान और उनके प्रभावी नियंत्रण का है। नियामक संस्थाएँ इसी अनिश्चितता के कारण व्यापक उपयोग की अनुमति देने से पहले सीमित और नियंत्रित अध्ययन कर रही हैं।

प्रतिरक्षा दबाने वाली दवाएँ कब तक देनी पड़ेंगी?

मानव से मानव अंग प्रत्यारोपण के बाद भी प्राप्तकर्ता को अक्सर लंबे समय तक प्रतिरक्षा दबाने वाली दवाएँ लेनी पड़ती हैं। पशु से मनुष्य में अंग प्रत्यारोपण के दौरान यह चुनौती और कठिन हो सकती है। वैज्ञानिक ऐसी दवाओं और उपचारों का अध्ययन कर रहे हैं जो प्रतिरक्षा प्रणाली के विशिष्ट रास्तों को प्रभावित करके अंग की अस्वीकृति को नियंत्रित कर सकें। इस क्षेत्र में 'सीडी40' और उससे संबंधित प्रतिरक्षा संकेतों का विशेष महत्त्व रहा है। कुछ प्रयोगात्मक उपचार इन संकेतों को बाधित करने का प्रयास करते हैं, जिससे प्रतिरक्षा कोशिकाओं की सक्रियता कम हो सके। लेकिन समस्या यह है कि प्रतिरक्षा प्रणाली को अत्यधिक दबा देने पर संक्रमण का जोखिम बढ़ सकता है। दूसरी ओर यदि दवा कम कर दी जाए, तो प्रत्यारोपित अंग के विरुद्ध प्रतिक्रिया फिर सक्रिय हो सकती है। इसलिए चिकित्सा विज्ञान को ऐसा संतुलन खोजना है जिसमें पशु-अंग की रक्षा भी हो और मरीज की संक्रमणों से लड़ने की क्षमता पूरी तरह समाप्त भी न हो।

टिम एंड्रयूज के 271 दिनों वाले मामले में यही समस्या विशेष रूप से सामने आई थी। संक्रमण के कारण प्रतिरक्षा दबाने वाली दवाओं में परिवर्तन के बाद अंग में गंभीर रक्तवाहिका संबंधी प्रतिक्रिया विकसित हुई। इससे यह संकेत मिलता है कि प्रत्यारोपण की सफलता केवल अंग के आनुवंशिक संशोधन पर निर्भर नहीं करती। मरीज की मूल बीमारी, संक्रमण, दवाएँ और उपचार के दौरान बदलती शारीरिक स्थिति भी परिणाम को प्रभावित करती हैं। भविष्य में यदि ऐसी तकनीक विकसित हो जाए जो मानव प्रतिरक्षा प्रणाली को पशु के अंग के प्रति अपेक्षाकृत अधिक सहिष्णु बना सके, तो प्रत्यारोपण की सफलता बढ़ सकती है। लेकिन अक्टूबर 2026 तक किसी पशु-अंग के लिए ऐसी स्थायी और व्यापक रूप से प्रमाणित प्रतिरक्षा-सहिष्णुता व्यवस्था उपलब्ध नहीं है जो हर मरीज में लंबी अवधि तक अस्वीकृति रोकने की गारंटी दे सके।

क्या पशुओं को केवल अंग निकालने के लिए पैदा करना नैतिक रूप से उचित है?

जेनोट्रांसप्लांटेशन का विकास वैज्ञानिक उपलब्धि के साथ एक गंभीर नैतिक प्रश्न भी सामने लाता है। यदि भविष्य में किसी अस्पताल को हजारों सूअर की किडनियाँ उपलब्ध कराई जा सकती हैं, तो उसके लिए बड़ी संख्या में विशेष रूप से तैयार किए गए पशुओं का प्रजनन, पालन और अंततः अंग निकालने के लिए उनका उपयोग करना होगा। इससे पशु कल्याण, जैविक प्रयोगों की सीमाएँ और मानव जीवन बचाने के उद्देश्य से दूसरी प्रजातियों का उपयोग करने की नैतिकता पर बहस उत्पन्न होती है। एक दृष्टिकोण यह है कि यदि पशुओं के अंगों से गंभीर बीमारियों से पीड़ित लोगों का जीवन बचाया जा सकता है, तो कठोर नियमन और पशु कल्याण संबंधी व्यवस्थाओं के अंतर्गत ऐसे अनुसंधान को नैतिक आधार मिल सकता है। दूसरी ओर पशु अधिकारों के समर्थक यह प्रश्न उठाते हैं कि क्या किसी संवेदनशील जीव को केवल मनुष्यों के लिए अंग उत्पादन का साधन बना देना उचित है। यह बहस केवल वैज्ञानिक तथ्यों से समाप्त नहीं हो सकती, क्योंकि इसमें जीवन के नैतिक मूल्य और विभिन्न प्रजातियों के प्रति मनुष्य की जिम्मेदारी से जुड़े विचार भी शामिल हैं।

भारत में इस विषय का धार्मिक और सांस्कृतिक पहलू भी महत्त्वपूर्ण है। सूअर का मांस और उससे संबंधित उत्पाद कुछ धार्मिक समुदायों में निषिद्ध या संवेदनशील माने जाते हैं। ऐसी स्थिति में सूअर से प्राप्त अंग का प्रत्यारोपण धार्मिक और व्यक्तिगत निर्णयों से जुड़ सकता है। लेकिन यह मान लेना गलत होगा कि किसी धर्म के सभी अनुयायी जीवनरक्षक चिकित्सा में पशु-उत्पत्ति वाले अंगों के उपयोग पर हमेशा एक ही राय रखते हैं। अनेक धार्मिक परंपराओं में जीवन बचाने की आवश्यकता को विशेष महत्त्व दिया जाता है और विशिष्ट चिकित्सकीय परिस्थितियों पर अलग विचार संभव हैं। इसलिए भारत में इस तकनीक की भविष्य की स्वीकार्यता केवल चिकित्सा विज्ञान की सफलता से निर्धारित नहीं होगी। मरीज की स्वतंत्र सहमति, उसकी धार्मिक मान्यताओं, परिवार की भूमिका और सामाजिक विश्वास का भी महत्त्व होगा। यदि कभी भारत में ऐसे प्रत्यारोपण नियमित चिकित्सकीय परीक्षणों की अवस्था तक पहुँचते हैं, तो चिकित्सकों को इन प्रश्नों के प्रति संवेदनशील रहना होगा।

एक और नैतिक समस्या यह है कि प्रयोगात्मक उपचार के लिए मरीज की सहमति कितनी स्वतंत्र और सूचित होती है। यदि किसी गंभीर रोगी के सामने मानव अंग मिलने की संभावना बहुत कम है, तो वह ऐसी नई तकनीक स्वीकार कर सकता है जिसके दीर्घकालिक जोखिम अभी स्पष्ट नहीं हैं। ऐसी परिस्थितियों में डॉक्टरों और शोधकर्ताओं का दायित्व बढ़ जाता है। मरीज को स्पष्ट बताया जाना चाहिए कि उपचार प्रयोगात्मक है, उसकी सफलता की संभावना अभी निश्चित नहीं है और गंभीर अस्वीकृति, संक्रमण अथवा मृत्यु का जोखिम मौजूद है। इसी तरह यह भी समझाना आवश्यक है कि यदि प्रत्यारोपित अंग असफल हो गया तो क्या संभावित विकल्प होंगे। अनुसंधान की सफलता को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करना या मरीज की निराशा को प्रयोगात्मक उपचार की स्वीकृति प्राप्त करने का साधन बनाना उचित नहीं होगा। गंभीर चिकित्सा अनुसंधान में वैज्ञानिक उपलब्धि के साथ मरीज की गरिमा और निर्णय की स्वतंत्रता की रक्षा करना भी आवश्यक है।

भारत में पशुओं के अंगों के प्रत्यारोपण की स्थिति क्या है?

भारत में इस तकनीक का महत्त्व समझने के लिए पहले मानव अंग प्रत्यारोपण की वास्तविक स्थिति देखनी होगी। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने 10 मार्च 2026 को राज्यसभा में जानकारी दी कि 3 मार्च 2026 तक राष्ट्रीय अंग प्रत्यारोपण रजिस्ट्री में प्रमुख अंगों के लिए 89,839 मरीज प्रतीक्षा सूची में दर्ज थे। उस समय मंत्रालय ने वर्ष 2025 में 20,019 अंग प्रत्यारोपण होने की जानकारी दी थी। बाद में राष्ट्रीय अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण संगठन की अधिक अद्यतन वार्षिक रिपोर्ट में वर्ष 2025 के लिए 20,138 प्रत्यारोपण दर्ज किए गए। अलग समय पर संकलित इन आँकड़ों में छोटा अंतर है, इसलिए किसी एक संख्या को बिना उसकी रिपोर्ट की तारीख बताए अंतिम और अपरिवर्तनीय आँकड़ा नहीं मानना चाहिए। अगस्त 2026 में जारी वार्षिक आँकड़ों के अनुसार वर्ष 2013 के लगभग 4,990 प्रत्यारोपणों से बढ़कर 2025 में संख्या 20 हजार से अधिक हो चुकी थी। इसके बावजूद मानव अंगों की आवश्यकता और उपलब्धता के बीच बहुत बड़ा अंतर बना हुआ है।

भारत की इस परिस्थिति में जेनोट्रांसप्लांटेशन भविष्य की एक महत्त्वपूर्ण संभावना हो सकती है। यदि कभी सूअर की किडनी वर्षों तक सुरक्षित रूप से काम करने लगे, तो उन मरीजों को लाभ मिल सकता है जिन्हें मानव अंगदाता मिलने की संभावना सीमित है। इसी तरह लिवर और हृदय के क्षेत्र में प्रगति गंभीर रोगियों को नए उपचार विकल्प दे सकती है। लेकिन अक्टूबर 2026 तक भारत में आनुवंशिक रूप से संशोधित सूअर के अंगों का नियमित और मान्य चिकित्सकीय प्रत्यारोपण कार्यक्रम स्थापित होने का विश्वसनीय प्रमाण उपलब्ध नहीं है। दिसंबर 2025 में प्रकाशित 'ट्रांसप्लांटेशन रिपोर्ट्स' के एक अध्ययन ने भारत में जेनोट्रांसप्लांटेशन के नैतिक, ऐतिहासिक और नियामकीय प्रश्नों का मूल्यांकन करते हुए उल्लेख किया कि देश में इस तकनीक के लिए विशिष्ट और व्यापक चिकित्सकीय शोध तथा नियामक नीति विकसित किए जाने की आवश्यकता है। इसलिए अमेरिका या चीन की उपलब्धियों को भारत में उपलब्ध स्थापित उपचार के रूप में प्रस्तुत करना गलत होगा।

भारत में पशु-अंग प्रत्यारोपण के इतिहास का एक विवादास्पद प्रसंग वर्ष 1997 से जुड़ा है। उस वर्ष असम में डॉ. धनिराम बरुआ द्वारा एक मरीज में पशु-अंग प्रत्यारोपण का दावा किया गया था, जो बाद में गंभीर विवाद और कानूनी कार्रवाई का विषय बना। इस घटना को आधुनिक आनुवंशिक रूप से संशोधित सूअर-अंग अनुसंधान की प्रमाणित सफलता के समान नहीं माना जा सकता। उस दौर में आज की जीन-संपादन तकनीक, प्रतिरक्षा-संबंधी जाँच और नियंत्रित चिकित्सकीय परीक्षणों की व्यवस्था उपलब्ध नहीं थी। लेकिन यह ऐतिहासिक प्रसंग भारत में इस क्षेत्र के प्रति सार्वजनिक विश्वास और नियमन के महत्त्व को समझाता है। किसी ऐसी चिकित्सा तकनीक में, जहाँ मरीज की जान सीधे दाँव पर लगी हो, केवल साहसिक दावा या असाधारण प्रयोग पर्याप्त नहीं है। वैज्ञानिक प्रमाण, नैतिक स्वीकृति, स्वतंत्र निरीक्षण और नियामकीय अनुमति आवश्यक हैं।

भारत में मानव अंगों और ऊतकों के प्रत्यारोपण के लिए 'ट्रांसप्लांटेशन ऑफ ह्यूमन ऑर्गन्स एंड टिश्यूज एक्ट, 1994' तथा संबंधित नियम महत्त्वपूर्ण कानूनी आधार हैं। लेकिन पशु से मनुष्य में जीवित अंग प्रत्यारोपण के लिए अलग जैविक, संक्रमण संबंधी और नैतिक समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। ऐसे उपचार के विकास में केवल सामान्य मानव अंग प्रत्यारोपण के नियम पर्याप्त होंगे या विशेष नियमन आवश्यक होगा, यह एक महत्त्वपूर्ण नीतिगत प्रश्न है। पशुओं के जीन-संपादन, विशेष पालन केंद्रों, जैविक सुरक्षा, मरीज की दीर्घकालिक निगरानी और अनुसंधान की अनुमति जैसी व्यवस्थाओं का समन्वय आवश्यक होगा। इसलिए भारत में यह तकनीक विकसित करने के लिए केवल कुशल प्रत्यारोपण सर्जन होना पर्याप्त नहीं होगा। आणविक जीवविज्ञान, प्रतिरक्षा विज्ञान, पशु चिकित्सा, संक्रमण नियंत्रण और नियामकीय विशेषज्ञता भी आवश्यक होगी।

क्या भविष्य में हर जरूरतमंद मरीज को पशु का अंग मिल सकेगा?

इस प्रश्न का उत्तर फिलहाल अनिश्चित है। वैज्ञानिक अनुसंधान ने यह प्रदर्शित कर दिया है कि आनुवंशिक रूप से संशोधित सूअर के कुछ अंग मानव शरीर में तुरंत असफल हुए बिना काम कर सकते हैं। किडनी के मामले में 271 दिनों तक काम करने का प्रमाण विशेष रूप से आशाजनक है। लेकिन आधुनिक चिकित्सा में किसी उपचार को व्यापक उपयोग के लिए सुरक्षित और प्रभावी मानने से पहले अनेक सवालों का उत्तर चाहिए। क्या पशु-अंग प्राप्त करने वाले मरीज सामान्य मानव अंग प्रत्यारोपण जितने लंबे समय तक जीवित रह सकेंगे? क्या उन्हें संक्रमण का अधिक जोखिम होगा? क्या प्रतिरक्षा दबाने वाली दवाओं की आवश्यकता अधिक होगी? क्या विभिन्न आयु और बीमारियों वाले मरीजों में परिणाम समान होंगे? और सबसे महत्त्वपूर्ण बात, क्या इस तकनीक से वास्तव में मरीजों की जीवन प्रत्याशा तथा जीवन की गुणवत्ता बेहतर होगी?

इसके साथ आर्थिक प्रश्न भी जुड़ा हुआ है। आनुवंशिक रूप से संशोधित सूअर तैयार करना, उन्हें विशेष रोगाणु-मुक्त केंद्रों में पालना, अंगों की विस्तृत जाँच करना और प्राप्तकर्ता की लंबे समय तक निगरानी करना अत्यंत संसाधन-सघन प्रक्रिया हो सकती है। आज इस उपचार का विकास बड़े अनुसंधान संस्थानों और जैव प्रौद्योगिकी कंपनियों द्वारा किया जा रहा है। यदि भविष्य में यह तकनीक सफल होती है, तो बड़े पैमाने पर उत्पादन से कुछ खर्च कम हो सकते हैं, लेकिन अभी यह कहना संभव नहीं कि सूअर की किडनी मानव अंग प्रत्यारोपण से सस्ती होगी। यह भी निर्धारित करना होगा कि उपचार का लाभ किन मरीजों को पहले दिया जाए, उसकी कीमत कौन वहन करे और सीमित संसाधनों वाले देशों में उसकी उपलब्धता कैसे सुनिश्चित हो। यदि नई तकनीक केवल अत्यंत संपन्न व्यक्तियों या कुछ चुनिंदा संस्थानों तक सीमित रह जाए, तो अंगों की वैश्विक कमी की समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं होगी।

कुछ वैज्ञानिकों को आशा है कि पशु-अंग भविष्य में मानव अंगदान पर निर्भरता कम कर सकते हैं। लेकिन अभी इस संभावना को अंतिम निष्कर्ष नहीं मानना चाहिए। मानव अंग प्रत्यारोपण दशकों के अनुभव, व्यापक चिकित्सकीय अध्ययन और विकसित निगरानी व्यवस्था पर आधारित उपचार है। इसके विपरीत जेनोट्रांसप्लांटेशन अभी सीमित संख्या के मानव प्रयोगों की अवस्था में है। इसलिए वर्तमान समय में अंगदान को बढ़ावा देना, मृत अंगदाताओं से अधिक सुरक्षित अंग प्राप्त करना, प्रत्यारोपण सेवाओं का विस्तार और अंग वितरण में पारदर्शिता बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। पशु-अंग प्रत्यारोपण भविष्य में एक अतिरिक्त विकल्प बन सकता है, लेकिन उसकी संभावित सफलता के भरोसे मौजूदा मानव अंगदान व्यवस्था की आवश्यकता समाप्त नहीं होती।

2026 की सबसे बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धि वास्तव में क्या है?

यदि इस क्षेत्र की प्रगति को एक साथ देखा जाए, तो 2022 से 2026 के बीच तीन महत्त्वपूर्ण परिवर्तन दिखाई देते हैं। पहला, जीवित मनुष्य में आनुवंशिक रूप से संशोधित सूअर के हृदय को प्रत्यारोपित करके उसकी कार्यक्षमता को सीमित समय तक प्रदर्शित किया गया। दूसरा, सूअर की किडनी ने जीवित मरीज को 271 दिनों तक डायलिसिस से मुक्त रखने में सहायता की और बाद में मानव किडनी प्रत्यारोपण तक पहुँचने के लिए अस्थायी सहारे का काम किया। तीसरा, सूअर के लिवर पर हुए प्रयोगों ने यह संकेत दिया कि पशु-अंगों का उपयोग केवल स्थायी प्रत्यारोपण के लिए नहीं, बल्कि कुछ परिस्थितियों में शरीर के बाहर अस्थायी जीवनरक्षक सहायता के रूप में भी किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त अमेरिकी नियामक संस्थाओं ने किडनी और हृदय के नियोजित चिकित्सकीय परीक्षणों को अनुमति देकर अनुसंधान को अगले चरण में पहुँचाया है।

लेकिन इन सभी उपलब्धियों के बीच एक सावधानी हमेशा बनी रहनी चाहिए। कुछ दिनों तक किसी अंग का काम करना, कई महीनों तक उसका काम करना और जीवनभर सुरक्षित कार्य करना तीन अलग स्तर हैं। आधुनिक मानव अंग प्रत्यारोपण की सफलता का मूल्यांकन वर्षों की अवधि में किया जाता है। यदि भविष्य में पशु-अंगों का उपयोग व्यापक रूप से करना है, तो वैज्ञानिकों को इसी स्तर की दीर्घकालिक सुरक्षा और कार्यक्षमता की दिशा में आगे बढ़ना होगा। प्रतिरक्षा अस्वीकृति के साथ रक्तवाहिनियों की सूक्ष्म क्षति, संक्रमण, अंग की वृद्धि और मानव शरीर के हार्मोन तथा चयापचय संबंधी वातावरण से अनुकूलता जैसी चुनौतियाँ अभी मौजूद हैं। इसलिए अक्टूबर 2026 तक जेनोट्रांसप्लांटेशन को 'सफल स्थापित उपचार' नहीं, बल्कि 'मानव परीक्षणों तक पहुँची आशाजनक प्रयोगात्मक चिकित्सा तकनीक' कहना अधिक सही होगा।

इस वैज्ञानिक यात्रा का सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू शायद यही है कि उसने एक पुरानी जैविक सीमा को चुनौती दी है। लाखों वर्षों के विकासक्रम ने विभिन्न प्रजातियों के शरीरों को अलग-अलग जैविक पहचान दी। प्रतिरक्षा प्रणाली इसी पहचान के माध्यम से शरीर की रक्षा करती है। मानव शरीर के लिए सूअर का अंग स्वाभाविक रूप से अपना अंग नहीं है। लेकिन आनुवंशिक इंजीनियरिंग ने वैज्ञानिकों को यह क्षमता दी है कि वे पशु की कोशिकाओं की कुछ विशेषताओं को बदलकर इस अंतर को सीमित करने का प्रयास कर सकें। यह जीवविज्ञान की असाधारण उपलब्धि है। फिर भी प्रकृति की इस बाधा को पूरी तरह पार करना अभी शेष है।

अंग प्रत्यारोपण के लिए पशुओं के अंगों का उपयोग अब केवल कल्पना नहीं रहा। सूअर का हृदय मनुष्य में धड़क चुका है, उसकी किडनी नौ महीने तक एक मरीज को डायलिसिस से मुक्त रख चुकी है और उसका लिवर भी मानव शरीर तथा शरीर के बाहर नियंत्रित प्रयोगों में कुछ आवश्यक कार्य कर चुका है। लेकिन कोई भी उपलब्ध परिणाम अभी यह प्रमाणित नहीं करता कि पशु का अंग मनुष्य में वर्षों तक उसी विश्वसनीयता से काम करेगा जिसकी अपेक्षा स्थापित मानव अंग प्रत्यारोपण से की जाती है। इसलिए विज्ञान ने एक असंभव समझे जाने वाले दरवाजे को खोल दिया है, लेकिन उसके दूसरी ओर सुरक्षित और व्यापक उपचार की व्यवस्था विकसित होना बाकी है। यदि आने वाले वर्षों में प्रतिरक्षा अस्वीकृति, संक्रमण और दीर्घकालिक कार्यक्षमता की चुनौतियाँ हल हो जाती हैं, तो संभव है कि अंगदान की प्रतीक्षा में जीवन खोने वाले हजारों मरीजों के लिए उपचार की नई संभावना विकसित हो। आज की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि प्रश्न अब यह नहीं रह गया कि पशु का अंग मनुष्य में कभी काम कर सकता है या नहीं। वैज्ञानिक अब यह खोज रहे हैं कि वह कितने समय तक, कितनी सुरक्षा के साथ और किन मरीजों के लिए काम कर सकेगा।

Yogesh Mishra
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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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