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Pregnancy Diet: गर्भावस्था में ‘दो लोगों का खाना’ जरूरी नहीं, ICMR-NIN की गाइडलाइन में क्या है सही डाइट?
Pregnancy Diet: क्वीन मेरी की OPD में 50-60% गर्भवतियों की डाइट असंतुलित मिली। जानें गर्भावस्था में 350 अतिरिक्त कैलोरी, प्रोटीन, फाइबर और संतुलित आहार को लेकर ICMR-NIN की गाइडलाइन क्या कहती है।
Pregnancy Diet (Image Credit-Social Media)
लखनऊ। गर्भवती महिला को ‘अब दो लोगों के लिए खाना है’ कहकर सामान्य से लगभग दोगुना भोजन देने की पारिवारिक धारणा जितनी पुरानी है, उतनी ही भ्रामक भी हो सकती है। KGMU के महिला अस्पताल क्वीन मेरी की ओपीडी में आने वाली गर्भवतियों की भोजन आदतों के आकलन में करीब 50 से 60 प्रतिशत महिलाओं की खुराक असंतुलित पाई जा रही है। अस्पताल की डायटीशियन शालिनी श्रीवास्तव के अनुसार कई महिलाओं की थाली में जरूरत से अधिक वसा पहुंच रही है, जबकि पर्याप्त प्रोटीन और फाइबर नहीं मिल रहा। कुछ महिलाओं में प्रतिदिन लगभग 40 ग्राम फाइबर की जरूरत के मुकाबले सेवन केवल 10-15 ग्राम तक पाया जा रहा है। हालांकि इन आंकड़ों को किसी प्रकाशित जनसंख्या अध्ययन के बजाय क्वीन मेरी ओपीडी में आने वाली महिलाओं के चिकित्सकीय अनुभव और आहार मूल्यांकन के रूप में समझना चाहिए। इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि लखनऊ की 60 प्रतिशत या देश की 60 प्रतिशत गर्भवतियों की खुराक इसी तरह असंतुलित है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि गर्भावस्था में भोजन की आवश्यकता वास्तव में बढ़ती है, लेकिन ‘दो व्यक्तियों जितना खाना’ वैज्ञानिक सलाह नहीं है। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के राष्ट्रीय पोषण संस्थान यानी ICMR-NIN की 2024 की Dietary Guidelines for Indians के अनुसार सामान्य वजन वाली गर्भवती महिला को दूसरी और तीसरी तिमाही में सामान्य जरूरत के अतिरिक्त करीब 350 किलो कैलोरी प्रतिदिन की आवश्यकता होती है। प्रोटीन की अतिरिक्त जरूरत दूसरी तिमाही में लगभग 8 ग्राम प्रतिदिन और तीसरी तिमाही में करीब 18 ग्राम प्रतिदिन बताई गई है। पहली तिमाही में अतिरिक्त ऊर्जा की आवश्यकता इसी स्तर की नहीं होती। इसलिए ‘पूरी गर्भावस्था में सामान्य भोजन से ठीक 25 प्रतिशत ज्यादा खाना’ भी हर महिला पर लागू होने वाला वैज्ञानिक सूत्र नहीं है। जरूरत गर्भावस्था की तिमाही, गर्भधारण से पहले के वजन, शारीरिक गतिविधि और पोषण स्थिति के अनुसार बदलती है।
‘दो लोगों का खाना’ नहीं, एक महिला के शरीर में दो जीवन की पोषण जरूरत
गर्भावस्था में भोजन बढ़ाने का उद्देश्य पेट भरना नहीं बल्कि भ्रूण के विकास, प्लेसेंटा, मातृ रक्त की बढ़ती मात्रा और शरीर में होने वाले बदलावों के लिए पर्याप्त ऊर्जा, प्रोटीन, आयरन, फोलेट, कैल्शियम, आयोडीन और दूसरे सूक्ष्म पोषक तत्व उपलब्ध कराना है। इसीलिए अतिरिक्त कैलोरी बिस्कुट, नमकीन, मिठाई, तले भोजन या अत्यधिक घी-तेल से पूरी कर लेने का अर्थ पोषण आवश्यकता पूरी करना नहीं है।
ICMR-NIN का कहना है कि गर्भावस्था में अतिरिक्त कैलोरी और प्रोटीन ऐसे खाद्य पदार्थों से मिलना चाहिए जिनमें सूक्ष्म पोषक तत्व भी पर्याप्त हों। WHO भी गर्भावस्था में विविध भोजन की सलाह देता है जिसमें हरी और नारंगी सब्जियां, फल, दालें-बीन्स, मेवे, साबुत अनाज, दूध-दही तथा भोजन पद्धति के अनुसार अंडा, मांस या मछली जैसे स्रोत शामिल हो सकते हैं। यानी गर्भवती महिला की थाली को केवल ‘कितना खाया’ से नहीं बल्कि ‘क्या खाया’ से देखना अधिक महत्वपूर्ण है।
40 ग्राम फाइबर की बात में जरूरी है थोड़ा सुधार
क्वीन मेरी के आहार आकलन में कई महिलाओं को केवल 10-15 ग्राम फाइबर मिलने और जरूरत करीब 40 ग्राम बताए जाने की बात सामने आई है। यहां भी इसे हर गर्भवती महिला के लिए एक निश्चित सार्वभौमिक संख्या मानना ठीक नहीं होगा। ICMR-NIN के 2024 दिशा-निर्देश फाइबर से भरपूर साबुत अनाज, दालों और सब्जियों पर जोर देते हैं और लगभग 25 ग्राम फाइबर प्रति 1,000 किलो कैलोरी भोजन का संदर्भ देते हैं। गर्भावस्था में ऊर्जा सेवन के आधार पर वास्तविक मात्रा अलग हो सकती है।
फाइबर की कमी गर्भावस्था में इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि कब्ज सामान्य समस्या है। साबुत अनाज, मोटे अनाज, दाल, चना, राजमा, फल, हरी सब्जियां और पर्याप्त पानी इसमें मदद कर सकते हैं। लेकिन बहुत कम फाइबर वाले भोजन से अचानक अत्यधिक फाइबर पर चले जाना भी कुछ लोगों में पेट फूलना या असुविधा पैदा कर सकता है, इसलिए आहार में बदलाव धीरे-धीरे और पर्याप्त पानी के साथ बेहतर रहता है।
‘50% कार्बोहाइड्रेट, 20% प्रोटीन, 20% फाइबर और 10% फैट’ को वैज्ञानिक प्रतिशत न समझें
मूल सलाह में आदर्श थाली को 50 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट, 20 प्रतिशत प्रोटीन, 20 प्रतिशत फाइबर और 10 प्रतिशत वसा के रूप में बताया गया है। इसे भोजन की थाली समझाने वाला सरल व्यावहारिक मॉडल माना जा सकता है, लेकिन पोषण विज्ञान में ऊर्जा देने वाले पोषक तत्वों का मानक प्रतिशत इस तरह नहीं जोड़ा जाता, क्योंकि फाइबर को प्रोटीन, वसा और कार्बोहाइड्रेट के समान 20 प्रतिशत ऊर्जा हिस्से के रूप में गिनना उचित नहीं है।
WHO सामान्य स्वस्थ आहार में कुल वसा को कुल ऊर्जा के 30 प्रतिशत से कम रखने और कार्बोहाइड्रेट मुख्यतः साबुत अनाज, दालों और दूसरे कम परिष्कृत स्रोतों से लेने की सलाह देता है। गर्भावस्था में वास्तविक अनुपात व्यक्तिगत ऊर्जा जरूरत और स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार तय हो सकता है।
इसलिए गर्भवती महिलाओं के लिए ज्यादा उपयोगी तरीका ‘प्रतिशत गणित’ के बजाय थाली में विविधता देखना है—अनाज के साथ पर्याप्त दाल या दूसरा प्रोटीन स्रोत, खूब सब्जियां, हरी पत्तेदार सब्जियां, फल, दूध-दही, मेवे और सीमित मात्रा में तेल।
प्रोटीन आधा मिल रहा तो केवल पाउडर इसका समाधान नहीं
क्वीन मेरी की ओपीडी में देखी गई बड़ी समस्या प्रोटीन की कमी है। गर्भावस्था में भ्रूण के ऊतक, प्लेसेंटा और मातृ शरीर में होने वाले बदलावों के लिए प्रोटीन महत्वपूर्ण है। लेकिन इसका अर्थ महंगे प्रोटीन पाउडर या अत्यधिक उच्च-प्रोटीन भोजन लेना नहीं है।
WHO के अनुसार कुपोषित गर्भवती महिलाओं में संतुलित ऊर्जा और प्रोटीन पूरक लाभकारी हो सकता है, लेकिन ऐसा अत्यधिक प्रोटीन पूरक जिसमें ऊर्जा का बहुत बड़ा हिस्सा प्रोटीन से आए, लाभकारी सिद्ध नहीं हुआ और कुछ अध्ययनों में छोटे आकार के शिशु के जोखिम से जुड़ा पाया गया।
भारतीय भोजन में दाल, चना, राजमा, लोबिया, सोयाबीन, दूध, दही, पनीर, मेवे और बीज अच्छे स्रोत हो सकते हैं। जो महिलाएं अंडा, मछली या मांस खाती हैं उनके लिए ये भी प्रोटीन स्रोत हैं। दाल और अनाज को साथ खाने से प्रोटीन की गुणवत्ता भी बेहतर हो सकती है।
‘वन पॉट मील’ व्यस्त गर्भवतियों के लिए आसान रास्ता
हर पोषक तत्व के लिए अलग पकवान बनाना जरूरी नहीं है। दाल, सब्जी और अनाज वाली खिचड़ी, सब्जियों और दाल वाला दलिया या तहरी, साथ में दही अथवा पनीर जैसे विकल्प एक ही भोजन में कई पोषक तत्व दे सकते हैं। ICMR-NIN भी अनाज के साथ पर्याप्त दाल या बीन्स लेने पर जोर देता है और 2024 के दिशानिर्देश में अनाज-दाल का अनुपात मोटे तौर पर 2:1 से 3:1 रखने की बात कही गई है।
इसका एक फायदा यह भी है कि भोजन घर का और ताजा रहता है। WHO ने अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों के बढ़ते इस्तेमाल को अधिक ऊर्जा, नमक, चीनी और अस्वास्थ्यकर वसा वाले भोजन की बढ़ती समस्या से जोड़ा है।
पैकेज्ड और रेडी-टू-ईट भोजन से सावधानी, लेकिन हर पैकेट खराब नहीं
ऑनलाइन मिलने वाले तैयार भोजन को गर्भावस्था की समस्या का एकमात्र कारण मानना भी उचित नहीं होगा। सभी पैकेज्ड खाद्य पदार्थ समान नहीं होते। समस्या उन अत्यधिक प्रसंस्कृत उत्पादों से अधिक है जिनमें कैलोरी, नमक, संतृप्त वसा या मुक्त शर्करा बहुत अधिक हो और पोषक घनत्व कम हो। इसलिए पैकेट देखकर ही ‘हानिकारक’ कहने के बजाय पोषण लेबल, सामग्री और मात्रा देखना अधिक उपयोगी है।
घर का ताजा भोजन सामान्यतः मात्रा, तेल, नमक और सामग्री पर बेहतर नियंत्रण देता है। लेकिन सुरक्षित ढंग से पैक किया गया कम नमक और संतुलित भोजन भी परिस्थितियों के अनुसार उपयोग किया जा सकता है।
गर्भावस्था में वजन बढ़ना जरूरी भी है, ज्यादा बढ़ना समस्या भी
गर्भावस्था में वजन बढ़ना सामान्य और आवश्यक है। इसलिए वजन बढ़ने को अपने आप अस्वस्थता नहीं माना जाना चाहिए। महत्वपूर्ण बात यह है कि वृद्धि महिला के गर्भधारण से पहले के वजन के अनुरूप हो। ICMR-NIN के अनुसार भारतीय संदर्भ में गर्भधारण के समय सामान्य BMI वाली महिला को गर्भावस्था के दौरान कम से कम करीब 10-12 किलो वजन बढ़ाने का लक्ष्य रखा जा सकता है, जबकि अधिक वजन या मोटापे वाली महिलाओं के लिए वृद्धि कम रखने की सलाह दी जाती है। कम वजन वाली महिलाओं को पर्याप्त भोजन और वजन की निगरानी की जरूरत होती है। इसीलिए एक गर्भवती महिला को ‘कम खाओ’ और दूसरी को ‘ज्यादा खाओ’ दोनों सलाह सही हो सकती हैं—यह उसकी शुरुआती पोषण स्थिति पर निर्भर करेगा।
आयरन-फोलिक एसिड और कैल्शियम को भोजन का विकल्प न समझें
गर्भावस्था में केवल भोजन से हर बढ़ी हुई सूक्ष्म पोषक आवश्यकता पूरी हो जाना हमेशा संभव नहीं होता। ICMR-NIN ने आयरन, फोलिक एसिड, आयोडीन और दूसरे महत्वपूर्ण पोषक तत्वों पर विशेष ध्यान देने को कहा है। फोलिक एसिड गर्भधारण से पहले शुरू करने और गर्भावस्था में जारी रखने की सलाह दी गई है।
लेकिन पूरक गोलियां संतुलित भोजन की जगह नहीं लेतीं। इसी तरह अच्छा भोजन होने का अर्थ यह भी नहीं कि चिकित्सक द्वारा लिखी आयरन-फोलिक एसिड या कैल्शियम की गोली छोड़ दी जाए। दोनों की भूमिका अलग है।
पानी 2 से 2.5 लीटर—उपयोगी सामान्य सलाह, लेकिन हर महिला की जरूरत समान नहीं
क्वीन मेरी की डायटीशियन ने दिन में करीब दो से ढाई लीटर पानी थोड़ा-थोड़ा पीने की सलाह दी है। सामान्य गर्भावस्था में पर्याप्त तरल लेना महत्वपूर्ण है, विशेष रूप से गर्म मौसम और कब्ज की स्थिति में। लेकिन तरल की जरूरत मौसम, गतिविधि, भोजन और चिकित्सकीय स्थिति से बदल सकती है। किडनी, हृदय या दूसरी विशेष बीमारी वाली गर्भवती को पानी की मात्रा अपने चिकित्सक की सलाह के अनुसार रखनी चाहिए।
लंबी ओपीडी प्रतीक्षा या यात्रा के दौरान भुना चना, थोड़ी मूंगफली या फल साथ रखना उपयोगी हो सकता है। इससे लंबे अंतराल के बाद बहुत अधिक भोजन करने या आसानी से उपलब्ध अत्यधिक प्रसंस्कृत नाश्ता लेने की संभावना कम हो सकती है।
खाना खाने के बाद हल्की गतिविधि, लेकिन हर गर्भवती के लिए एक जैसी नहीं
भोजन के तुरंत बाद बिस्तर पर चले जाने के बजाय कुछ देर बाद हल्का चलना सामान्य स्वस्थ गर्भावस्था में उपयोगी हो सकता है। WHO स्वस्थ गर्भवती और प्रसवोत्तर महिलाओं के लिए सप्ताह में कम से कम 150 मिनट मध्यम तीव्रता की शारीरिक गतिविधि की सलाह देता है, जिसमें चलना भी शामिल हो सकता है।
लेकिन प्लेसेंटा संबंधी समस्या, रक्तस्राव, समयपूर्व प्रसव का जोखिम या चिकित्सक द्वारा आराम की सलाह जैसी स्थितियों में सामान्य व्यायाम सलाह लागू नहीं की जानी चाहिए। इसलिए गर्भावस्था में ‘हर भोजन के बाद 20 मिनट चलना ही है’ जैसा कठोर नियम उचित नहीं है।
क्वीन मेरी के 50-60 प्रतिशत का आंकड़ा क्या बताता है?
यदि OPD में आने वाली आधे से अधिक महिलाओं में आहार असंतुलन दिखाई दे रहा है तो यह चिकित्सकीय परामर्श में भोजन की विस्तृत चर्चा की जरूरत का संकेत है। लेकिन यह कोई जनसंख्या सर्वे नहीं है। अस्पताल में आने वाली महिलाएं पहले से किसी समस्या, उच्च जोखिम गर्भावस्था या दूसरे चिकित्सकीय कारण के कारण सामान्य आबादी से अलग हो सकती हैं। इसलिए इस आंकड़े को ‘लखनऊ की 60 प्रतिशत गर्भवती कुपोषित’ जैसी सुर्खी में बदलना तथ्यात्मक रूप से गलत होगा।
क्वीन मेरी की OPD से सामने आ रही तस्वीर का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि गर्भावस्था में ‘दो लोगों के लिए दोगुना खाना’ नहीं बल्कि एक महिला के भोजन की गुणवत्ता बढ़ाना जरूरी है। ICMR-NIN के अनुसार दूसरी और तीसरी तिमाही में करीब 350 अतिरिक्त किलो कैलोरी और तिमाही के अनुसार अतिरिक्त प्रोटीन की जरूरत होती है, जबकि साबुत अनाज, दाल, सब्जियां, फल, दूध-दही, मेवे और चिकित्सकीय सलाह के अनुसार आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्व भोजन का आधार होने चाहिए। 40 ग्राम फाइबर, 25 प्रतिशत अतिरिक्त भोजन या 50:20:20:10 जैसे आंकड़ों को हर गर्भवती के लिए कठोर सार्वभौमिक नियम मानने के बजाय उसकी शुरुआती पोषण स्थिति, तिमाही और स्वास्थ्य के अनुसार आहार तय करना अधिक वैज्ञानिक है।


