Sex Me Uttejana Ka Karan: सिर्फ छूने से दिमाग में यौन उत्तेजना क्यों होती है? स्पर्श का विज्ञान

Sex Me Uttejana Ka Karan: क्या सिर्फ छूने से यौन उत्तेजना पैदा हो सकती है? जानिए त्वचा, नसों, दिमाग, आकर्षण, यादों, हार्मोन और भावनाओं के बीच का वैज्ञानिक संबंध।

Yogesh Mishra
Published on: 15 Sept 2026 5:49 PM IST
Sex Me Uttejana Ka Karan Sexual Health Problem Explained
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Sex Me Uttejana Ka Karan Sexual Health Problem Explained 

Sex Me Uttejana Ka Karan: किसी अपने का हाथ पकड़ना, गले लगना, गर्दन या पीठ पर हल्का सा स्पर्श, बालों में उंगलियां फिराना, यह सब कभी सिर्फ छूना नहीं रहता, कई बार शरीर में एक अलग तरह की हलचल पैदा कर देता है। लेकिन वही स्पर्श अगर डॉक्टर, मालिश करने वाला या कोई अनजान इंसान करे, तो अनुभव पूरी तरह बदल जाता है। इसकी वजह शरीर में कोई एक खास बटन नहीं है बल्कि त्वचा, नसें, दिमाग, हार्मोन, यादें और रिश्ता, यह सब मिलकर तय करते हैं कि स्पर्श का मतलब क्या निकलेगा। असल में छूना अपने आप में सिर्फ एक हल्का दबाव है, लेकिन दिमाग ही उसे मतलब देता है। वह उसे सुरक्षित या खतरनाक, अपनापन या बेगानापन, सुखद या नापसंद, और कभी कभी यौन की श्रेणी में फिट करता है। सिर्फ छूने से उत्तेजना शुरू हो सकती है, लेकिन हर स्पर्श ऐसा नहीं करता, और एक ही इंसान में भी वही स्पर्श हर बार एक जैसा असर नहीं डालता।

त्वचा सिर्फ एक ढकने वाली परत नहीं है

हम त्वचा को शरीर का बाहरी कवर समझते हैं लेकिन असल में यह एक बहुत बड़ा संवेदी अंग है। इसमें अलग अलग तरह के छोटे सेंसर होते हैं जो दबाव, कंपन, खिंचाव और हल्की छुअन को पहचानते हैं। जैसे ही कोई त्वचा को छूता है, यह जानकारी नसों के जरिए दिमाग तक पहुंचती है। दिमाग का एक हिस्सा यह पहचानता है कि शरीर के किस हिस्से को कैसे छुआ गया, लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। दिमाग के कुछ और हिस्से, जो भावनाओं और अच्छे बुरे अनुभव को समझने का काम करते हैं, यह तय करने में लग जाते हैं कि इस स्पर्श का मतलब क्या है। यही वजह है कि लगभग एक जैसा दबाव दो अलग स्थितियों में बिल्कुल अलग अनुभव बन सकता है। दिमाग सिर्फ यह नहीं देखता कि कहां छुआ गया, वह यह भी सोचता है कि किसने छुआ, क्यों छुआ और इस इंसान के लिए मेरे मन में क्या भाव है।

धीमे और नरम स्पर्श के लिए खास नसें

शरीर में कुछ खास तरह की नसें होती हैं जो सिर्फ धीमे और नरम स्पर्श को पकड़ने के लिए बनी होती हैं, खासकर बालों वाली त्वचा पर। जब कोई हाथ शरीर के तापमान जैसी गर्माहट के साथ बहुत धीरे धीरे फिराया जाता है, तो यही नसें सबसे ज्यादा सक्रिय होती हैं, और यही वह स्पर्श है जो ज्यादातर लोगों को सुकून देने वाला लगता है। यह नसें मां बाप और बच्चे के प्यार भरे स्पर्श, प्रेमियों के गले मिलने और किसी अपने के करीब होने के एहसास से भी जुड़ी होती हैं। इन्हें सिर्फ यौन नसें कहना गलत होगा, क्योंकि यही स्पर्श पूरी तरह अपनापन, सुरक्षा और भरोसे का एहसास भी दे सकता है, बिना किसी यौन भाव के।

फर्क कहां बनता है

अगर वही नसें दोनों तरह के स्पर्श में काम करती हैं, तो प्यार भरे स्पर्श और यौन स्पर्श में फर्क कहां से आता है। यह फर्क असल में दिमाग की सोच से बनता है। सोचिए डॉक्टर जांच के दौरान आपकी पीठ छूता है। दिमाग को पता है कि यह इलाज का हिस्सा है, माहौल अस्पताल का है, इसलिए वह इसे अलग तरह से समझता है। वही जगह अगर किसी ऐसे इंसान से छू जाए जिसके लिए आपके मन में आकर्षण है, तो दिमाग उसी संकेत को बिल्कुल अलग मतलब दे देता है। इसमें उस इंसान की पहचान, पुराना अनुभव, रिश्ता, चाहत और उस पल का माहौल, यह सब भूमिका निभाते हैं। इसलिए यह समझना गलत होगा कि त्वचा से दिमाग तक सीधी एक तार जाती है, असल में यह नीचे से आने वाला शारीरिक संकेत और ऊपर से आने वाली दिमागी सोच, दोनों का मेल है।

बिना छुए भी उत्तेजना क्यों हो सकती है

यही वजह है कि उत्तेजना बिना किसी असली स्पर्श के भी पैदा हो सकती है। कोई पुरानी याद, कल्पना, आवाज, कोई दृश्य, कोई खुशबू या सिर्फ किसी अपने की नजदीकी भी शरीर में वैसी ही हलचल शुरू कर सकती है। इसका मतलब है कि त्वचा का संकेत होना जरूरी नहीं, दिमाग खुद ही यह पूरा तंत्र चालू कर सकता है। उल्टा भी सच है, शरीर को छुआ जा रहा हो लेकिन अगर दिमाग उस पल को यौन नहीं मान रहा, तो उतनी उत्तेजना नहीं होगी। इसलिए स्पर्श एक ताकतवर रास्ता जरूर है, लेकिन आखिरी फैसला हमेशा दिमाग का होता है।

हर किसी के लिए संवेदनशील जगहें अलग होती हैं

होंठ, उंगलियां और शरीर के गुप्त अंग सबसे ज्यादा संवेदनशील माने जाते हैं, क्योंकि वहां नसों का जाल घना होता है, लेकिन यौन सुख सिर्फ इन्हीं जगहों तक सीमित नहीं। गर्दन, कान, पीठ, पेट या शरीर का कोई और हिस्सा भी किसी इंसान के लिए बहुत खास हो सकता है। सच यह है कि इसकी कोई एक तय लिस्ट नहीं है जो सबके लिए एक जैसी काम करे। जो स्पर्श किसी को बहुत अच्छा लगता है, वही किसी और के लिए बिल्कुल साधारण या नापसंद हो सकता है।

शरीर के अंदर क्या क्या बदलता है

जब उत्तेजना शुरू होती है, तो दिमाग सिर्फ अनुभव नहीं बनाता, वह शरीर को भी संकेत भेजता है। दिल की धड़कन बदल सकती है, सांस तेज हो सकती है, त्वचा में खून का बहाव बदल सकता है और गुप्त अंगों में भी खून का बहाव बढ़ सकता है। यह सारी प्रक्रिया दिमाग, रीढ़ की हड्डी, आसपास की नसों और खून की नलियों के आपसी तालमेल से होती है। इसलिए यह कहना कि उत्तेजना सिर्फ मन में चलती है या सिर्फ शरीर की बात है, दोनों अधूरे हैं। असल में दिमाग और शरीर लगातार एक दूसरे को संकेत भेजते रहते हैं।

शरीर की प्रतिक्रिया का मतलब सहमति नहीं होता

यह बात समझना बेहद जरूरी है, शरीर की यौन प्रतिक्रिया और इंसान की मर्जी दोनों अलग अलग चीजें हैं। शरीर कभी किसी स्पर्श पर अपने आप प्रतिक्रिया दे सकता है, जबकि इंसान मन से उस स्पर्श को बिल्कुल नहीं चाहता। शरीर में हुई कोई भी अनैच्छिक प्रतिक्रिया यह साबित नहीं करती कि व्यक्ति उस चीज के लिए तैयार है। शरीर के कुछ रिफ्लेक्स खुद ब खुद होते हैं, उन्हें इच्छा या मर्जी का सबूत मानना एक गंभीर गलती है। सहमति का फैसला हमेशा इंसान की साफ और खुली मर्जी से होता है, शरीर के किसी अनजाने संकेत से नहीं।

इसी तरह उल्टा भी हो सकता है, इंसान मन से बहुत आकर्षित हो लेकिन शरीर वैसी प्रतिक्रिया न दे। तनाव, थकान, डर, चिंता, रिश्ते की उलझन, कुछ दवाइयां, शराब या सेहत से जुड़ी परेशानियां शरीर की प्रतिक्रिया को कम कर सकती हैं। इसलिए यह मान लेना कि शरीर ने प्रतिक्रिया दी तो मन भी वैसा ही चाहता था, यह सोच वैज्ञानिक रूप से गलत है।

भरोसा और सुरक्षा की भावना क्यों जरूरी है?

स्पर्श अच्छा लगेगा या नहीं, इसमें सुरक्षा का एहसास सबसे बड़ी भूमिका निभाता है। जिस इंसान पर भरोसा है, उसका स्पर्श मन को शांत कर देता है, जबकि अनचाहा या डर पैदा करने वाला स्पर्श शरीर को सतर्क कर देता है। दिमाग का वह हिस्सा जो खतरे को पहचानता है, यह तुरंत भांप लेता है कि सामने वाला भरोसेमंद है या नहीं। इसलिए कोई स्पर्श तकनीकी रूप से कितना भी नरम क्यों न हो, अगर व्यक्ति उसे अनचाहा समझे तो वह बुरा ही लगेगा। वहीं भरोसेमंद रिश्ते में सिर्फ हाथ पकड़ना भी गहरा असर छोड़ सकता है।

लव हार्मोन वाली बात कितनी सच है

अक्सर सुना जाता है कि गले मिलने से एक खास हार्मोन निकलता है जिसे प्यार का हार्मोन कहा जाता है। यह हार्मोन सच में मौजूद है और रिश्तों, अपनेपन और मां बच्चे के बंधन से जुड़ा है, लेकिन इंटरनेट पर इसे हर आलिंगन का सीधा कारण बताना जरूरत से ज्यादा आसान बना दिया गया है, क्योंकि असल में इसका असर इंसान और परिस्थिति के हिसाब से काफी जटिल होता है। इसी तरह दिमाग में मौजूद एक और रसायन खुशी और इनाम के एहसास से जुड़ा है, जो सुखद अनुभवों में भूमिका निभा सकता है, लेकिन उत्तेजना सिर्फ किसी एक हार्मोन का नतीजा नहीं, इसमें कई रसायन और दिमाग के कई हिस्से मिलकर काम करते हैं।

दिमाग पहले से अंदाजा लगा लेता है

अगर इंसान को पता हो कि कोई अपना जल्द ही उसका हाथ पकड़ने वाला है, तो स्पर्श होने से पहले ही दिमाग उसकी तैयारी शुरू कर देता है। दिमाग सिर्फ बाहर से आई जानकारी नहीं पकड़ता, वह लगातार अंदाजा लगाता रहता है कि आगे क्या होने वाला है। यही वजह है कि जिस स्पर्श का इंतजार था वह अचानक हुए किसी अनजान स्पर्श से बिल्कुल अलग महसूस होता है, भले ही त्वचा पर दबाव एक जैसा हो। पुराना अनुभव भी इस अंदाजे को बदल देता है, इसलिए किसी अच्छी पुरानी याद से जुड़ा स्पर्श खास तौर पर सुखद लग सकता है, जबकि किसी बुरे अनुभव से जुड़ा स्पर्श तनाव पैदा कर सकता है।

केमिस्ट्री का असली विज्ञान

किसी को छूते ही केमिस्ट्री महसूस होना कोई मापने वाली चीज नहीं है, लेकिन इसके पीछे असली मनोवैज्ञानिक और शारीरिक प्रक्रिया जरूर होती है। चेहरा, आवाज, खुशबू, व्यक्तित्व और पहले से मौजूद पसंद, यह सब मिलकर आकर्षण बनाते हैं। अगर पहले से आकर्षण मौजूद है, तो एक हल्का सा स्पर्श उसे और बढ़ा सकता है। इसका मतलब यह नहीं कि छूते ही कोई जादुई ऊर्जा दोनों के बीच बहने लगी, बल्कि यह अनुभव दिमाग के इनाम, ध्यान और उम्मीद वाले तंत्र से समझा जा सकता है। दूसरी तरफ पहली बार छूने पर कुछ खास महसूस न होना भी यह नहीं दिखाता कि आकर्षण नहीं है, क्योंकि हर इंसान में यह भावना अलग रफ्तार से बनती है।

पुराने रिश्ते में वही स्पर्श अलग क्यों लगता है

लंबे रिश्ते में वही स्पर्श जो शुरुआत में बहुत रोमांचक लगता था, समय के साथ जाना पहचाना और शांत महसूस हो सकता है। इसका मतलब यह नहीं कि प्यार कम हो गया, बल्कि दिमाग बार बार मिलने वाले संकेतों का आदी हो जाता है। ऐसे में स्पर्श की भूमिका उत्तेजना से ज्यादा सुरक्षा और आराम की तरफ बदल जाती है। अगर रिश्ते में नयापन, ध्यान या भावनात्मक नजदीकी फिर से बढ़े, तो वही पुराना स्पर्श दोबारा नया एहसास दे सकता है। यहां मन की भूमिका बहुत बड़ी है, क्योंकि अगर रिश्ते में तनाव, नाराजगी या दूरी हो तो सही तरीके से किया गया स्पर्श भी बेअसर रह सकता है, जबकि नजदीकी बढ़ने पर एक साधारण सा स्पर्श भी गहरा असर छोड़ सकता है।

स्पर्श की कमी का असर

इंसान एक सामाजिक प्राणी है, और अपनेपन भरा स्पर्श रिश्तों का एक अहम हिस्सा है। लंबे समय तक शारीरिक नजदीकी न मिलने से कुछ लोगों में अकेलापन और तनाव बढ़ सकता है, हालांकि इसे किसी एक बीमारी या हार्मोन से जोड़ना ठीक नहीं। यह भी समझना जरूरी है कि हर इंसान की स्पर्श की जरूरत एक जैसी नहीं होती, कोई बार बार गले मिलना पसंद करता है तो कोई कम शारीरिक नजदीकी में सहज रहता है, और इनमें से किसी एक को सही या गलत कहना उचित नहीं।

उम्र, सेहत और दवाइयों का असर

उम्र के साथ त्वचा की संवेदनशीलता, हार्मोन और नसों के काम करने के तरीके में बदलाव आता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उम्र बढ़ने के साथ स्पर्श का मतलब खत्म हो जाता है। शरीर की प्रतिक्रिया धीमी हो सकती है और ज्यादा समय या सीधे स्पर्श की जरूरत पड़ सकती है, लेकिन अनुभव और रिश्ते की गहराई स्पर्श को और भी खास बना सकती है। इसके अलावा कुछ बीमारियां, नसों से जुड़ी परेशानियां, अवसाद और कई दवाइयां भी स्पर्श की संवेदना और शरीर की प्रतिक्रिया को बदल सकती हैं। इसलिए अगर अचानक और लगातार इसमें बड़ा बदलाव दिखे, तो इसे सिर्फ मानसिक मानने के बजाय डॉक्टर से जांच कराना बेहतर है।

दिमाग स्पर्श को सीख भी सकता है

अगर कोई खास तरह का स्पर्श बार बार किसी अच्छे अनुभव के साथ जुड़ता है, तो वह खुद ही उत्तेजना का संकेत बनने लगता है। यही वजह है कि हर इंसान की पसंद इतनी अलग हो सकती है, क्योंकि जन्मजात संवेदनशीलता के ऊपर जिंदगी के अनुभव और सीख की एक और परत चढ़ जाती है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि हर पसंद के पीछे कोई एक खास पुरानी घटना ही जिम्मेदार होगी, इसमें जीव विज्ञान, अनुभव, रिश्ते और संस्कार, सब कुछ मिल जाता है।

सिर्फ हाथ पकड़ने से भी उत्तेजना संभव है

अगर सामने वाले इंसान और उस पल का दिमाग के लिए रोमांटिक मतलब है, तो सिर्फ हाथ पकड़ना भी उत्तेजना पैदा कर सकता है। हाथ में नसों का घना जाल होता है, और हाथ पकड़ने में सिर्फ त्वचा का स्पर्श नहीं होता, उसमें गर्माहट, उंगलियों की हरकत, नजदीकी, आंखों का मिलना और उस इंसान से जुड़ी यादें भी शामिल हो जाती हैं। किसी पसंदीदा इंसान का हाथ दिमाग के लिए उसी हाथ से बिल्कुल अलग मतलब रखता है जो डॉक्टर जांच के दौरान पकड़ता है। इसलिए उत्तेजना के लिए हमेशा सीधा शारीरिक स्पर्श जरूरी नहीं, गले लगना, चूमना या हाथ पकड़ना भी काफी हो सकता है। लेकिन अगर आकर्षण नहीं है या इंसान वह स्पर्श नहीं चाहता, तो सबसे संवेदनशील जगह छूने पर भी सुख की जगह तनाव या नापसंदगी महसूस हो सकती है। यही साबित करता है कि शरीर पर कोई ऐसा सार्वभौमिक बटन नहीं है जिसे छूते ही हर किसी में एक जैसी प्रतिक्रिया शुरू हो जाए।

कल्पना और उम्मीद का असर

अगर इंसान पहले से किसी रोमांटिक सोच में डूबा हो, तो साधारण सा स्पर्श भी बहुत गहरा असर छोड़ सकता है। इसके उलट तनाव, डर या किसी और काम में गहरा ध्यान उसी स्पर्श का असर कम कर सकता है। दिमाग आने वाले हर संकेत को बस चुपचाप दर्ज नहीं करता, वह अपने उस पल के मूड के हिसाब से उसका मतलब बदल देता है। यही वजह है कि सही माहौल, निजता, सुरक्षा और भावनात्मक नजदीकी वाकई अनुभव को गहरा बना सकते हैं। कई बार तो असली स्पर्श से पहले सिर्फ उसका इंतजार ही दिल की धड़कन और ध्यान को बदलना शुरू कर देता है।

इसी तरह किसी पुरानी सुखद याद को सोचने भर से भी शरीर में वैसा ही एहसास लौट सकता है, क्योंकि याद सिर्फ दिमाग में दर्ज कोई बात नहीं होती, उसमें भावना और एहसास भी जुड़े रहते हैं। इसीलिए बिना किसी असली स्पर्श के भी, सिर्फ याद के जरिए उत्तेजना महसूस होना मुमकिन है।

डर और तनाव इसे रोक भी सकते हैं

अगर दिमाग किसी पल को खतरनाक समझ रहा हो, तो शरीर की प्राथमिकता बदल जाती है और सुकून तथा नजदीकी की भावना पीछे रह जाती है। इसी वजह से मानसिक सुरक्षा और भरोसा सिर्फ भावनात्मक बात नहीं, बल्कि शरीर विज्ञान का हिस्सा है। इसके अलावा लगातार यह सोचते रहना कि मुझे अभी उत्तेजित होना ही चाहिए, खुद ही उस स्वाभाविक अनुभव में रुकावट बन सकता है, क्योंकि ध्यान आनंद से हटकर अपने ही शरीर पर नजर रखने में चला जाता है। इसलिए यह जबरदस्ती या इच्छाशक्ति से आदेश देकर पैदा करने वाली चीज नहीं है।

स्त्री और पुरुष में मूल विज्ञान एक जैसा है

त्वचा के सेंसर, दिमाग की भूमिका और शरीर की प्रतिक्रिया का मूल सिद्धांत दोनों में एक जैसा है, हालांकि अनुभव और शरीर की प्रतिक्रिया में इंसान दर इंसान फर्क हो सकता है। लेकिन यह कहना कि पुरुष सिर्फ शरीर से उत्तेजित होते हैं और महिलाएं सिर्फ भावना से, यह एक गलत और बहुत आसान बना दी गई सोच है। असल में दोनों में शरीर, दिमाग, रिश्ता और माहौल, सब कुछ मिलकर काम करता है, और अक्सर दो इंसानों के बीच का फर्क स्त्री और पुरुष के औसत फर्क से कहीं ज्यादा बड़ा होता है।

संवेदनशीलता हमेशा एक जैसी नहीं रहती

थकान, नींद की कमी, तनाव, हार्मोन में बदलाव, सेहत, उम्र, दवाइयां, शराब और मन की स्थिति, यह सब स्पर्श की संवेदनशीलता को बदल सकते हैं। जो स्पर्श किसी दिन बहुत अच्छा लगा था, वही किसी और दिन साधारण लग सकता है, और इसका यह मतलब जरूरी नहीं कि आकर्षण खत्म हो गया। साथ ही अगर एक जैसा स्पर्श लगातार मिलता रहे, तो दिमाग धीरे धीरे उसका आदी हो जाता है और उसकी तीव्रता कम महसूस होने लगती है। स्पर्श में थोड़ा बदलाव या कुछ समय का ठहराव इस एहसास को फिर से ताजा कर सकता है।

आखिर जवाब क्या है

तो हां, सिर्फ छूने से दिमाग में उत्तेजना पैदा हो सकती है, लेकिन अकेला छूना इसकी वजह नहीं है। त्वचा बस शुरुआती संकेत भेजती है, उसे यौन मतलब देने का काम दिमाग करता है। कौन छू रहा है, कहां छू रहा है, सामने वाला व्यक्ति उस स्पर्श को चाहता है या नहीं, उसके प्रति आकर्षण है या नहीं, उस पल की मानसिक स्थिति कैसी है, पुराना अनुभव कैसा रहा है और माहौल सुरक्षित लग रहा है या नहीं, यह सब मिलकर उसी स्पर्श का मतलब बदल देते हैं। इसीलिए एक ही तरह का हाथ का स्पर्श कभी सिर्फ दोस्ती है, कभी सांत्वना, कभी इलाज, कभी डर और कभी गहरा यौन एहसास। त्वचा ने शायद लगभग एक जैसा दबाव महसूस किया हो, लेकिन दिमाग ने हर बार बिल्कुल अलग अनुभव बना दिया।

इंसान का सबसे बड़ा यौन अंग शरीर का कोई खास हिस्सा नहीं, बल्कि दिमाग है। त्वचा दरवाजा खोल सकती है, नसें संदेश पहुंचा सकती हैं, शरीर प्रतिक्रिया दे सकता है, लेकिन उस स्पर्श को चाहत, अपनापन, खुशी या सिर्फ एक मामूली छुअन में बदलने का आखिरी फैसला हमेशा दिमाग ही करता है। यही वजह है कि एक ही हल्का सा स्पर्श कभी शरीर में गहरी हलचल पैदा कर देता है और कभी बिल्कुल कुछ नहीं। स्पर्श तो बस एक शारीरिक घटना है, असली उत्तेजना उस घटना को दिमाग द्वारा दिया गया भावनात्मक मतलब है।

Yogesh Mishra
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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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