Sexual Health Diseases: ज्यादा सेक्स की इच्छा बीमारी कब बनती है और मस्तिष्क में क्या होता ह

Sexual Health Diseases: ‘Nymphomaniac’ शब्द का क्या मतलब है और आधुनिक चिकित्सा इसे क्यों पुराना मानती है?

Yogesh Mishra
Published on: 26 Sept 2026 5:05 PM IST
Sexual Health Diseases Nymphomania Kya Hai Explained on HIndi
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Sexual Health Diseases Nymphomania Kya Hai Explained on HIndi

Sexual Health Diseases: किसी महिला की बहुत ज्यादा यौन इच्छा को ‘निम्फोमेनिया’ कह दिया जाता था। लेकिन क्या ज्यादा सेक्स की इच्छा सचमुच कोई मानसिक बीमारी है? आधुनिक विज्ञान इस सवाल को पुराने नजरिए से बिल्कुल अलग तरीके से देखता है। असली सवाल यह नहीं है कि कोई व्यक्ति कितनी बार सेक्स चाहता है, बल्कि यह है कि क्या वह अपने यौन व्यवहार पर नियंत्रण रख पा रहा है और क्या उस व्यवहार से उसकी जिंदगी को नुकसान हो रहा है।

निम्फोमेनियेक (Nymphomaniac) शब्द सुनते ही आमतौर पर ऐसी महिला की तस्वीर सामने आती है जिसकी यौन इच्छा बहुत ज्यादा हो और जो लगातार सेक्स चाहती हो। लेकिन यह शब्द आधुनिक चिकित्सा की भाषा में पुराना और काफी हद तक अनुपयुक्त माना जाता है। ऐतिहासिक रूप से इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से महिलाओं के लिए किया गया और कई बार सामान्य से अधिक यौन इच्छा को भी बीमारी की तरह देखा गया। इस शब्द के पीछे महिला कामुकता को लेकर पुराने सामाजिक और नैतिक नजरिए की भी बड़ी भूमिका रही है।

आज किसी महिला या पुरुष की यौन इच्छा को केवल उसकी मात्रा के आधार पर बीमारी नहीं माना जाता। आधुनिक चिकित्सा में ज्यादा प्रासंगिक अवधारणा Compulsive Sexual Behaviour Disorder (CSBD) यानी बाध्यकारी यौन व्यवहार विकार है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे ICD-11 में आवेग पर नियंत्रण से जुड़ी समस्याओं की श्रेणी में शामिल किया है।

बहुत ज्यादा सेक्स की इच्छा होना अपने आप में बीमारी नहीं है

यह इस पूरे विषय की सबसे जरूरी बात है। हर व्यक्ति की यौन इच्छा एक जैसी नहीं होती। किसी व्यक्ति को रोज सेक्स की इच्छा हो सकती है, किसी को सप्ताह में एक बार और किसी को बहुत कम। कुछ लोगों की कामेच्छा बहुत ज्यादा होती है, जबकि कुछ लोगों में यौन इच्छा बहुत कम होती है। सिर्फ इस अंतर के आधार पर किसी को बीमार नहीं कहा जा सकता।

समस्या तब शुरू होती है जब व्यक्ति अपनी तीव्र यौन इच्छाओं या उनसे जुड़े व्यवहार को नियंत्रित करने में बार-बार असफल होने लगे। वह कम करने या रोकने की कोशिश करे, लेकिन बार-बार उसी व्यवहार में लौट आए। सेक्स, पोर्नोग्राफी, हस्तमैथुन या यौन गतिविधियों की तलाश उसके जीवन का इतना बड़ा हिस्सा बन जाए कि काम, पढ़ाई, रिश्ते, पैसा, स्वास्थ्य या रोजमर्रा की जिम्मेदारियां प्रभावित होने लगें।

मान लीजिए किसी व्यक्ति को सेक्स की इच्छा बहुत ज्यादा है, लेकिन वह अपनी इच्छा को अपनी परिस्थिति के हिसाब से नियंत्रित कर सकता है और उसके कारण उसके रिश्ते या काम प्रभावित नहीं हो रहे। इसे अपने आप में बीमारी नहीं कहा जाएगा। दूसरी तरफ कोई व्यक्ति अपेक्षाकृत कम यौन गतिविधि करता हो, लेकिन उसे रोकने में लगातार असफल रहता हो, उसके कारण गंभीर समस्याएं पैदा हो रही हों और फिर भी वह व्यवहार जारी रखता हो, तो मामला चिकित्सकीय ध्यान देने लायक हो सकता है। यानी यहां गिनती से ज्यादा नियंत्रण और परिणाम मायने रखते हैं।

ऐसी कोई संख्या नहीं है जिसके बाद सेक्स ‘बहुत ज्यादा’ कहलाए

यह एक आम भ्रम है कि सप्ताह में इतनी बार सेक्स सामान्य है और उससे ज्यादा होने पर बीमारी शुरू हो जाती है। विज्ञान में ऐसी कोई तय संख्या नहीं है। किसी दंपति के लिए सप्ताह में कई बार सेक्स बिल्कुल सामान्य हो सकता है, जबकि दूसरे व्यक्ति के लिए महीने में एक बार भी पर्याप्त हो सकता है। दोनों स्थितियां सामान्य हो सकती हैं। इसलिए डॉक्टर यह देखकर फैसला नहीं करते कि व्यक्ति ने महीने में कितनी बार सेक्स किया। वे यह देखते हैं कि उसकी इच्छा और व्यवहार पर उसका कितना नियंत्रण है, उससे परेशानी हो रही है या नहीं और उसकी जिंदगी के दूसरे हिस्से कितने प्रभावित हो रहे हैं। यही वजह है कि ‘nymphomania’ जैसे पुराने शब्दों से आधुनिक चिकित्सा दूर हुई है। उनमें अक्सर यह धारणा छिपी रहती थी कि सामान्य से अधिक यौन इच्छा अपने आप में बीमारी है।

सेक्स की इच्छा पैदा करने वाला मस्तिष्क में कोई एक हिस्सा नहीं है

यौन इच्छा का कोई एक ऐसा ‘सेक्स सेंटर’ नहीं है जिसे चालू करने पर व्यक्ति में कामेच्छा पैदा हो जाए। इसके पीछे मस्तिष्क के कई हिस्से और कई तरह के रासायनिक संदेश मिलकर काम करते हैं। हाइपोथैलेमस, अमिगडाला, इंसुला, प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स और स्ट्रायटम जैसे मस्तिष्क के हिस्से यौन इच्छा, भावनाओं, प्रेरणा, पुरस्कार और व्यवहार पर नियंत्रण से अलग-अलग तरीके से जुड़े हैं। इनके साथ हार्मोन, यादें, स्पर्श, कल्पना, दृश्य संकेत और किसी व्यक्ति के पिछले अनुभव भी काम करते हैं।

इसमें डोपामिन महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, लेकिन इसे सिर्फ ‘खुशी का रसायन’ कहना सही नहीं होगा। डोपामिन किसी चीज को पाने की चाह, प्रेरणा, उम्मीद और उससे जुड़ी सीख में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यौन संकेत मिलने पर मस्तिष्क की पुरस्कार और प्रेरणा से जुड़ी व्यवस्था सक्रिय हो सकती है। व्यक्ति का ध्यान उस संकेत की तरफ खिंचने लगता है और उसके अनुसार व्यवहार करने की इच्छा पैदा हो सकती है। लेकिन इसके साथ मस्तिष्क की दूसरी व्यवस्था भी काम करती है, जो परिस्थिति को समझती है, संभावित परिणामों का अंदाजा लगाती है और जरूरत पड़ने पर व्यक्ति को रुकने में मदद करती है। सरल भाषा में कहें तो एक तरफ मस्तिष्क कहता है, ‘यह चीज मुझे चाहिए।’ दूसरी तरफ नियंत्रण करने वाली व्यवस्था कहती है, ‘रुको, परिस्थिति और परिणाम भी देखो।’ स्वस्थ व्यवहार में दोनों के बीच संतुलन बना रहता है।

बाध्यकारी यौन व्यवहार में क्या बदल सकता है?

यहीं से आधुनिक मस्तिष्क विज्ञान इस समस्या को समझने की कोशिश करता है। कुछ शोधों में पाया गया है कि CSBD वाले कुछ लोगों में यौन संकेतों के प्रति पुरस्कार और प्रेरणा से जुड़े मस्तिष्क क्षेत्रों की प्रतिक्रिया अलग हो सकती है। साथ ही व्यवहार को रोकने, ध्यान नियंत्रित करने और लंबे समय के परिणामों को ध्यान में रखने वाली मस्तिष्क प्रणालियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण दिखाई देती है। हाल के न्यूरोइमेजिंग अध्ययनों में स्ट्रायटम और उससे जुड़े पुरस्कार तंत्र तथा मस्तिष्क के उन नेटवर्क में अंतर देखे गए हैं जो नियंत्रण और निर्णय लेने से जुड़े हैं। इसे बहुत सरल भाषा में ऐसे समझ सकते हैं कि कुछ लोगों में यौन संकेतों की ‘खींच’ ज्यादा मजबूत हो सकती है, जबकि उस खिंचाव को रोकने वाली व्यवस्था उतनी प्रभावी ढंग से काम नहीं कर रही हो। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वैज्ञानिकों ने CSBD वाले हर व्यक्ति के मस्तिष्क में एक खास तरह का बदलाव खोज लिया है। अभी शोध जारी है और मस्तिष्क का स्कैन देखकर किसी व्यक्ति को CSBD का मरीज घोषित नहीं किया जा सकता। यानी मस्तिष्क में दिखाई देने वाला कोई एक पैटर्न इस विकार का प्रमाण नहीं है।

‘पसंद’ और ‘चाहत’ हमेशा एक जैसी नहीं होती

मस्तिष्क विज्ञान में एक दिलचस्प अंतर है, जिसे अंग्रेजी में चाहत और पसंद कहा जाता है। आसान भाषा में इसे ‘किसी चीज को बहुत चाहना’ और ‘उससे वास्तव में बहुत आनंद मिलना’ के अंतर के रूप में समझ सकते हैं। मान लीजिए कोई व्यक्ति पहली बार किसी यौन गतिविधि से बहुत आनंद महसूस करता है। उसके बाद बार-बार वही अनुभव मिलने पर मस्तिष्क उस गतिविधि से जुड़े संकेतों को महत्वपूर्ण मानना सीख सकता है। समय के साथ ऐसा भी हो सकता है कि उस गतिविधि से मिलने वाला आनंद पहले जितना खास न रहे, लेकिन उससे जुड़ी इच्छा या खिंचाव बार-बार पैदा होता रहे। यही वजह है कि केवल यह पूछना कि ‘उसे इसमें कितना आनंद मिलता है?’ हमेशा पर्याप्त नहीं होता। यह भी देखना पड़ता है कि क्या व्यक्ति को बार-बार उस व्यवहार की तीव्र इच्छा खींच रही है और क्या वह उसे रोक पा रहा है। यह कुछ हद तक उस आदत जैसा है जिसमें व्यक्ति बिना किसी खास जरूरत के बार-बार फोन उठाकर सोशल मीडिया खोलता है। हर बार उसे बहुत आनंद नहीं मिलता, लेकिन नोटिफिकेशन, आदत या किसी संकेत के कारण हाथ अपने आप फोन की तरफ चला जाता है।

तनाव और अकेलापन भी इस चक्र को मजबूत कर सकते हैं

बाध्यकारी यौन व्यवहार को समझने का एक रास्ता भावनाओं से भी जुड़ा है। मान लीजिए किसी व्यक्ति को बहुत तनाव है। वह पोर्नोग्राफी, हस्तमैथुन या किसी दूसरी यौन गतिविधि के जरिए थोड़ी देर के लिए तनाव से राहत महसूस करता है। मस्तिष्क इस अनुभव से एक संबंध सीख सकता है: तनाव → यौन व्यवहार → थोड़ी देर की राहत।

अगली बार तनाव आने पर वही रास्ता जल्दी सक्रिय हो सकता है। यदि यह बार-बार होता रहे तो व्यक्ति केवल यौन आनंद के लिए उस व्यवहार की ओर नहीं जा रहा होता, बल्कि तनाव, अकेलेपन, ऊब, चिंता या उदासी से कुछ समय बचने के लिए भी उसका इस्तेमाल कर रहा होता है। यहीं व्यवहार की आदत मजबूत हो सकती है। इसलिए कुछ मामलों में असली सवाल यह नहीं होता कि ‘इस व्यक्ति को सेक्स इतना ज्यादा क्यों चाहिए?’ बल्कि यह भी होता है कि ‘क्या यौन व्यवहार उसके लिए तनाव या दूसरी मुश्किल भावनाओं से निपटने का मुख्य तरीका बन गया है?’

क्या इसका मतलब है कि शरीर में डोपामिन बहुत ज्यादा बन रहा है?

सोशल मीडिया पर अक्सर यह बहुत सरल दावा सुनने को मिलता है कि ‘डोपामिन बढ़ गया, इसलिए सेक्स की लत लग गई।’ वास्तविक विज्ञान इससे कहीं ज्यादा जटिल है। समस्या को केवल डोपामिन की मात्रा से नहीं समझा जा सकता। यह भी मायने रखता है कि मस्तिष्क का कौन सा हिस्सा किस संकेत पर प्रतिक्रिया दे रहा है, व्यक्ति ने उस संकेत के साथ क्या सीखा है और उसके नियंत्रण से जुड़े मस्तिष्क तंत्र उस इच्छा को कितना रोक पा रहे हैं। यौन व्यवहार में डोपामिन के अलावा कई दूसरे रासायनिक संदेशवाहक और हार्मोन भी शामिल होते हैं। इसलिए ऐसा कोई साधारण ‘डोपामिन टेस्ट’ नहीं है जिससे पता लगाया जा सके कि किसी व्यक्ति को CSBD है या नहीं।

क्या यह सिर्फ महिलाओं की समस्या है?

‘Nymphomania’ शब्द ऐतिहासिक रूप से महिलाओं के लिए इस्तेमाल किया जाता था। पुरुषों के अत्यधिक यौन व्यवहार के लिए अलग शब्द भी इस्तेमाल किए गए। लेकिन आधुनिक चिकित्सा इस तरह के लिंग आधारित वर्गीकरण को उपयोगी निदान नहीं मानती। बाध्यकारी यौन व्यवहार महिलाओं और पुरुषों दोनों में हो सकता है। किसी में बार-बार यौन संबंध तलाशने का रूप दिखाई दे सकता है, किसी में पोर्नोग्राफी का अनियंत्रित इस्तेमाल, किसी में बाध्यकारी हस्तमैथुन या लगातार ऑनलाइन यौन गतिविधियों में लगे रहने का रूप। इसलिए किसी महिला को ‘nymphomaniac’ कहना केवल चिकित्सकीय रूप से अस्पष्ट नहीं है, बल्कि पुराने सामाजिक पूर्वाग्रह को भी दोहरा सकता है।

अगर यौन इच्छा अचानक बहुत बढ़ जाए तो?

यह स्थिति थोड़ी अलग है और चिकित्सकीय रूप से महत्वपूर्ण भी। मान लीजिए किसी व्यक्ति की यौन इच्छा पहले सामान्य थी, लेकिन अचानक उसमें बहुत ज्यादा यौन उत्तेजना के साथ बहुत कम नींद, असामान्य रूप से ज्यादा ऊर्जा, बहुत ज्यादा बोलना, तेजी से विचार आना, जरूरत से ज्यादा खर्च करना और जोखिम भरे फैसले लेने जैसे बदलाव भी दिखाई देने लगें। ऐसी स्थिति में डॉक्टर केवल CSBD के बारे में नहीं सोचेंगे। उन्माद या हाइपोमेनिया जैसी अवस्थाएं भी संभावित कारणों में शामिल हो सकती हैं। कुछ दवाएं, मस्तिष्क की चोट और कुछ न्यूरोलॉजिकल स्थितियां भी यौन व्यवहार में बदलाव ला सकती हैं। इसलिए अचानक शुरू हुए अत्यधिक यौन व्यवहार को केवल ‘कामेच्छा बहुत बढ़ गई है’ कहकर छोड़ देना सही नहीं है। उसके पीछे कोई दूसरी चिकित्सकीय या मानसिक स्थिति भी हो सकती है।

पोर्नोग्राफी देखने वाला हर व्यक्ति बाध्यकारी यौन व्यवहार से पीड़ित नहीं है

किसी व्यक्ति का पोर्नोग्राफी देखना अपने आप में CSBD का प्रमाण नहीं है। उसी तरह कितनी बार पोर्न देखा गया, यह संख्या अकेले निदान तय नहीं करती। चिंता तब ज्यादा होती है जब व्यक्ति बार-बार इसे कम करने या बंद करने की कोशिश करे लेकिन सफल न हो, उसका काफी समय इसी में निकलने लगे, काम या रिश्ते प्रभावित हों और नुकसान समझने के बावजूद व्यवहार जारी रहे। यानी यहां भी असली मुद्दा नियंत्रण, नुकसान और जीवन पर प्रभाव है, सिर्फ संख्या नहीं।

किसी व्यक्ति की धार्मिक, पारिवारिक या व्यक्तिगत मान्यताएं किसी यौन व्यवहार को गलत मान सकती हैं। वह उस व्यवहार के बाद अपराधबोध महसूस कर सकता है। लेकिन केवल अपराधबोध होने से यह साबित नहीं होता कि व्यक्ति को CSBD है। अगर किसी व्यक्ति की यौन पसंद या व्यवहार उसकी निजी मान्यताओं से टकराता है, तो वह परेशान हो सकता है, लेकिन चिकित्सकीय निदान के लिए यह देखना जरूरी है कि क्या वास्तव में नियंत्रण की समस्या है और क्या व्यवहार जीवन के दूसरे हिस्सों को नुकसान पहुंचा रहा है। वरना सामान्य यौन व्यवहार या अलग-अलग यौन पसंद को भी गलती से मानसिक बीमारी समझ लिया जा सकता है।

क्या CSBD को ‘सेक्स की लत’ कहना सही है?

आम भाषा में इसे अक्सर ‘सेक्स एडिक्शन’ कहा जाता है, क्योंकि इसमें कुछ बातें नशे जैसी लग सकती हैं। बार-बार इच्छा पैदा होना, खास संकेतों पर तेज प्रतिक्रिया, व्यवहार रोकने में मुश्किल और नुकसान के बावजूद उसे दोहराना, ये सभी बातें कुछ हद तक नशे से मिलती-जुलती हैं।

लेकिन चिकित्सकीय वर्गीकरण में तस्वीर इतनी सीधी नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने CSBD को आवेग नियंत्रण से जुड़े विकारों की श्रेणी में रखा है, न कि पदार्थों की लत वाले विकारों में। शोध में भी अलग-अलग तंत्रों की भूमिका सामने आती है। इसमें आदत, पुरस्कार की उम्मीद, आवेग, आत्मनियंत्रण और भावनाओं को संभालने की कठिनाई एक साथ भूमिका निभा सकती हैं। इसलिए हर मामले को सीधे ‘सेक्स की लत’ कहना वैज्ञानिक स्थिति को जरूरत से ज्यादा सरल कर देता है।

इसका इलाज क्या है?

अगर किसी व्यक्ति को लगता है कि उसका यौन व्यवहार नियंत्रण से बाहर हो रहा है और उससे उसकी जिंदगी प्रभावित हो रही है, तो इसका उपचार संभव है। मनोचिकित्सा में व्यक्ति यह समझने की कोशिश कर सकता है कि उसके व्यवहार को कौन से संकेत या परिस्थितियां शुरू करते हैं। तनाव, अकेलापन, ऊब या दूसरी भावनाओं से निपटने के बेहतर तरीके विकसित किए जा सकते हैं। इच्छा और व्यवहार के बीच थोड़ा अंतर पैदा करना और बार-बार दोहराए जाने वाले व्यवहार को बदलना भी उपचार का हिस्सा हो सकता है। अगर साथ में चिंता, अवसाद, नशे की समस्या, ADHD या कोई दूसरी स्थिति मौजूद हो तो उसका उपचार भी महत्वपूर्ण हो सकता है। कुछ मामलों में डॉक्टर दवाओं पर भी विचार कर सकते हैं, लेकिन CSBD के लिए दवाओं से जुड़े प्रमाण अभी सीमित हैं। इसलिए दवा का फैसला विशेषज्ञ की सलाह से ही किया जाना चाहिए।

‘Nymphomaniac’ शब्द से आगे निकल चुका है आधुनिक विज्ञान

करीब से देखें तो इस पूरे विषय में सबसे बड़ा बदलाव शब्द का नहीं, सोच का है। पुराने समय में सवाल कुछ ऐसा था: ‘इस महिला को सेक्स की इच्छा इतनी ज्यादा क्यों है?’ वहीं, आधुनिक चिकित्सा का सवाल है: ‘क्या यह व्यक्ति अपनी यौन इच्छा और व्यवहार को नियंत्रित कर पा रहा है, या व्यवहार उसके नियंत्रण से बाहर जा रहा है?’ दोनों सवालों में बहुत बड़ा फर्क है। बहुत ज्यादा यौन इच्छा रखने वाली महिला या पुरुष जरूरी नहीं कि बीमार हो। कामेच्छा लोगों में स्वाभाविक रूप से अलग-अलग होती है। बीमारी का सवाल तब उठता है जब व्यक्ति बार-बार नियंत्रण खोता है, व्यवहार उसके जीवन के दूसरे जरूरी हिस्सों पर हावी होने लगता है, उसे रोकने की कोशिशें नाकाम होती हैं और नुकसान के बावजूद वही व्यवहार जारी रहता है। मस्तिष्क विज्ञान भी अब इसे केवल ‘बहुत ज्यादा सेक्स हार्मोन’ या ‘बहुत ज्यादा डोपामिन’ की कहानी नहीं मानता। इसमें मस्तिष्क की पुरस्कार और प्रेरणा व्यवस्था, सीखी हुई आदतें, भावनाओं से निपटने का तरीका और खुद को रोकने वाली प्रणालियां, सभी एक साथ भूमिका निभा सकती हैं।

इसलिए ‘nymphomaniac’ जैसा शब्द किसी व्यक्ति को समझने के बजाय उसके ऊपर एक पुराना लेबल लगा देता है। आधुनिक विज्ञान इससे आगे जाकर यह समझने की कोशिश करता है कि इच्छा कितनी है, उससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि व्यक्ति उस इच्छा के साथ क्या कर पा रहा है।

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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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