Sexual Health: यौन कमजोरी के नाम पर लाखों का कारोबार? जानिए भ्रामक विज्ञापनों को पहचानने का तरीका

Sexual Health: यौन स्वास्थ्य के नाम पर भ्रामक विज्ञापनों, चमत्कारी इलाज के दावों, ऑनलाइन ऐप्स और कैप्सूल के बाजार की पड़ताल। जानिए जोखिम और सही चिकित्सकीय सलाह का महत्व।

Neel Mani Lal
Published on: 13 Oct 2026 5:48 PM IST
Sexual Health|Male Sexual Health|Sexual Weakness Myths|Latest Hindi News|Samachar Hindi Newstrack
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Sexual Health: कभी विज्ञापन कहता है कि शादीशुदा जिंदगी में कमजोरी है, कभी दावा किया जाता है कि शरीर की ताकत खत्म हो रही है। कहीं सात दिन में असर का वादा है, तो कहीं उम्र भर की समस्या का पक्का इलाज। ऐसे संदेशों के बीच एक बड़ा बाजार खड़ा है, जहां इंसान की सेहत से ज्यादा उसके डर, शर्म और जल्दी ठीक होने की उम्मीद को निशाना बनाया जाता है। फोन पर आने वाले विज्ञापन, इंटरनेट पर बैठे कथित विशेषज्ञ, गुप्त रोग के नाम पर इलाज करने वाले केंद्र और ताकत बढ़ाने के दावे वाले कैप्सूल इसी बाजार के अलग-अलग चेहरे हो सकते हैं।

हर हकीम, हर आयुर्वेदिक उत्पाद या हर ऑनलाइन सलाह धोखा नहीं है। असली समस्या उन लोगों और कंपनियों से है, जो बिना भरोसेमंद प्रमाण के बड़े-बड़े दावे करते हैं, बीमारी का डर बढ़ाते हैं और इसी डर को कमाई का जरिया बनाते हैं।

कमजोरी का डर इतना असरदार क्यों है?

इंसान अपनी सेहत को लेकर स्वाभाविक रूप से चिंतित रहता है। लेकिन यौन स्वास्थ्य से जुड़ी परेशानी में यह चिंता कई गुना बढ़ सकती है, क्योंकि इसमें शरीर के साथ आत्मसम्मान, रिश्ते और समाज में बनी मर्दानगी की धारणा भी जुड़ी होती है। बहुत से पुरुष अपनी समस्या के बारे में खुलकर बात करने में झिझकते हैं। उन्हें डर होता है कि डॉक्टर को बताया तो शर्मिंदगी होगी, साथी को पता चला तो रिश्ते पर असर पड़ेगा या दोस्त मजाक उड़ाएंगे। इसी चुप्पी का फायदा गलत दावे करने वाले लोग उठा सकते हैं।

मान लीजिए, किसी व्यक्ति को काम के तनाव, कम नींद या चिंता के कारण कभी-कभी यौन संबंध बनाते समय परेशानी होती है। यह जरूरी नहीं कि उसे कोई स्थायी बीमारी हो। लेकिन अगर वह इंटरनेट पर ऐसा विज्ञापन देखता है जिसमें कहा गया हो कि यह शरीर की अंदरूनी कमजोरी का संकेत है और इलाज नहीं कराया तो वैवाहिक जीवन बर्बाद हो सकता है, तो वह घबरा सकता है। विज्ञापन उसे समस्या समझने का मौका देने के बजाय सीधे उत्पाद खरीदने की तरफ धकेलता है।

डर बेचने का यह तरीका सिर्फ यौन स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है। बाल झड़ने, मोटापा, बांझपन, त्वचा, जोड़ों के दर्द और उम्र बढ़ने से जुड़ी चिंताओं में भी इसका इस्तेमाल हो सकता है। पहले किसी सामान्य परेशानी को बड़ी समस्या के रूप में दिखाया जाता है, फिर उसके लिए एक खास समाधान पेश किया जाता है। ग्राहक जितना चिंतित होगा, उसके बिना जांच-पड़ताल पैसे खर्च करने की आशंका उतनी बढ़ सकती है।

कमजोरी आखिर होती क्या है?

कमजोरी कोई एक बीमारी नहीं है। थकान महसूस होना, यौन इच्छा कम होना, इरेक्शन यानी लिंग में पर्याप्त कड़ापन न आना, जल्दी स्खलन होना और संतान पैदा करने में परेशानी होना अलग-अलग स्थितियां हैं। इनके कारण भी अलग हो सकते हैं। लेकिन भ्रामक विज्ञापन इन सबको अक्सर एक ही नाम दे देते हैं: गुप्त कमजोरी।

थकान की वजह नींद की कमी, तनाव, खून की कमी, थायरॉइड की समस्या या दूसरी बीमारियां हो सकती हैं। यौन इच्छा में कमी मानसिक तनाव, रिश्ते की परेशानी, कुछ दवाओं या हार्मोन से जुड़े बदलावों के कारण हो सकती है। इरेक्शन की परेशानी कभी-कभी चिंता के कारण होती है, जबकि लगातार बनी रहने वाली समस्या मधुमेह, रक्त वाहिकाओं की बीमारी, नसों की समस्या या कुछ दवाओं से भी जुड़ी हो सकती है।

यौन प्रदर्शन की एक-दो घटनाओं से किसी व्यक्ति की पूरी सेहत या उसकी मर्दानगी का फैसला नहीं किया जा सकता। इसी तरह जल्दी स्खलन होने, यौन इच्छा कम होने या संतान पैदा करने में परेशानी को एक ही दवा से ठीक करने का दावा भी सावधानी से परखना चाहिए। सही इलाज के लिए पहले यह समझना जरूरी है कि परेशानी है क्या और उसके पीछे कारण कौन-सा है।

विज्ञापन का खेल: पहले डर, फिर इलाज का वादा

इस बाजार में विज्ञापन अक्सर एक खास ढर्रे पर चलते हैं। पहले ऐसी भाषा इस्तेमाल की जाती है जिससे व्यक्ति को लगे कि वह अकेला नहीं, बल्कि किसी छिपी हुई समस्या का शिकार है। फिर उसके मन में यह डर बैठाया जाता है कि समस्या आगे चलकर और गंभीर हो सकती है। आखिर में एक कैप्सूल, तेल, चूर्ण, जांच या इलाज को समाधान के रूप में पेश कर दिया जाता है।

कई विज्ञापनों में शादीशुदा जिंदगी खराब होने, साथी के दूर जाने या आत्मविश्वास खत्म होने जैसी बातों को उभारा जाता है। कुछ में कथित मरीजों के अनुभव दिखाए जाते हैं, जबकि कुछ विज्ञापन किसी डॉक्टर जैसी पोशाक पहने व्यक्ति या सफेद कोट वाले चेहरे का इस्तेमाल करते हैं। देखने वाले को लग सकता है कि दावा वैज्ञानिक रूप से साबित है, जबकि असल सवाल यह होना चाहिए कि क्या उसके समर्थन में भरोसेमंद शोध और सही चिकित्सकीय प्रमाण मौजूद हैं।

एक और आम तरीका है बहुत कम समय में पक्का नतीजा देने का वादा। सात दिन में ताकत लौटाने, कुछ हफ्तों में हर समस्या खत्म करने या बिना किसी जांच के स्थायी इलाज का दावा सुनने में आकर्षक लगता है। लेकिन शरीर की अलग-अलग समस्याओं के कारण अलग होते हैं। इसलिए बिना समस्या समझे सबके लिए एक ही इलाज का पक्का वादा अपने आप में संदेह पैदा करना चाहिए।

आयुर्वेदिक लिखा है, तो क्या उत्पाद सुरक्षित और असरदार है?

आयुर्वेद भारत की पारंपरिक चिकित्सा पद्धति है और उसके भीतर औषधियों, आहार और जीवनशैली से जुड़ी लंबी परंपरा है। लेकिन किसी उत्पाद पर आयुर्वेदिक, प्राकृतिक या हर्बल लिखा होने से यह अपने आप साबित नहीं होता कि वह हर व्यक्ति के लिए सुरक्षित है या उसके बताए गए सभी फायदे प्रमाणित हैं।

किसी औषधि की सुरक्षा और असर का आकलन उसके वास्तविक घटकों, मात्रा, निर्माण की गुणवत्ता, इस्तेमाल के तरीके और उपलब्ध शोध के आधार पर होना चाहिए। प्राकृतिक स्रोत से आया पदार्थ भी शरीर पर असर डाल सकता है, दूसरी दवाओं के साथ प्रतिक्रिया कर सकता है या कुछ लोगों के लिए नुकसानदेह हो सकता है। इसलिए सिर्फ पैकेट पर लिखे नाम या विज्ञापन में बताए गए अनुभव से फैसला नहीं करना चाहिए।

यहां एक जरूरी फर्क समझना भी जरूरी है। आयुर्वेदिक औषधि, स्वास्थ्य पूरक और सामान्य खाद्य उत्पाद एक ही श्रेणी नहीं हैं। भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) के नियमों में स्वास्थ्य पूरकों और पोषण संबंधी उत्पादों के लिए अलग व्यवस्था है। ऐसे उत्पादों को आम तौर पर किसी बीमारी का इलाज करने या उसे ठीक करने का दावा करने की खुली छूट नहीं है। दूसरी ओर, किसी औषधि की वैधता और उसके दावों की जांच अलग नियमों के तहत हो सकती है। इसलिए किसी उत्पाद पर लाइसेंस या पंजीकरण का उल्लेख देखकर यह मान लेना सही नहीं होगा कि विज्ञापन में किया गया हर दावा भी प्रमाणित है।

कैप्सूल में क्या है, यह जानना इतना जरूरी क्यों है?

किसी कैप्सूल के पैकेट पर जड़ी-बूटियों के नाम लिखे हो सकते हैं, लेकिन उपभोक्ता के लिए असली सवाल यह है कि उसमें वास्तव में क्या है, कितनी मात्रा में है और उसकी गुणवत्ता की जांच कैसे हुई है। अगर उत्पाद की सामग्री स्पष्ट नहीं है या निर्माता के बारे में भरोसेमंद जानकारी नहीं मिलती, तो जोखिम बढ़ जाता है।

दूसरे देशों में यौन क्षमता बढ़ाने के नाम पर बिकने वाले कुछ पूरकों में ऐसी दवाओं के घटक पाए गए हैं, जिनका उल्लेख लेबल पर नहीं था। अमेरिका के राष्ट्रीय पूरक एवं समेकित स्वास्थ्य केंद्र (NCCIH) ने चेतावनी दी है कि यौन क्षमता बढ़ाने के नाम पर बिकने वाले कई पूरकों में छिपे हुए औषधीय घटक पाए गए हैं। ऐसे घटक कुछ दवाओं के साथ खतरनाक प्रतिक्रिया कर सकते हैं, खासकर उन दवाओं के साथ जो हृदय रोग में इस्तेमाल होती हैं और रक्तचाप को प्रभावित करती हैं। यह प्रमाण भारत में बिकने वाले हर उत्पाद के बारे में निष्कर्ष नहीं है, लेकिन यह जरूर बताता है कि बिना जांच के किसी पूरक को सुरक्षित मानना ठीक नहीं है।

सबसे बड़ी चिंता तब होती है, जब कोई व्यक्ति बिना डॉक्टर की सलाह के ऐसा उत्पाद लेने लगता है और उसे पता ही नहीं होता कि उसमें क्या मौजूद है। अगर वह पहले से मधुमेह, उच्च रक्तचाप या दिल की बीमारी की दवा ले रहा है, तो जोखिम और बढ़ सकता है। किसी उत्पाद के सेवन के बाद सीने में दर्द, तेज चक्कर, सांस लेने में परेशानी या दूसरी गंभीर प्रतिक्रिया हो, तो तुरंत चिकित्सकीय मदद लेनी चाहिए।

फोन पर चलने वाले ऐप और इंटरनेट का नया बाजार

पहले ऐसे विज्ञापन अखबारों, दीवारों, पर्चों या देर रात के टेलीविजन कार्यक्रमों में ज्यादा दिखाई देते थे। अब मोबाइल फोन ने इस कारोबार को नया रास्ता दिया है। खोजने वाले व्यक्ति को वेबसाइट, वीडियो, सोशल मीडिया पन्ने, संदेश और ऐप के जरिए अलग-अलग तरह की सलाह और उत्पाद मिल सकते हैं। कुछ सेवाएं सवाल पूछने या परामर्श देने का दावा करती हैं, जबकि कुछ सीधे कैप्सूल या तेल बेचती हैं।

ऑनलाइन माध्यम की एक खास बात यह है कि कोई व्यक्ति अपनी परेशानी चुपचाप खोज सकता है। उसे दुकान पर जाकर सवाल पूछने या किसी परिचित के सामने अपनी समस्या बताने की जरूरत नहीं पड़ती। यह सुविधा सही स्वास्थ्य जानकारी पाने में मदद कर सकती है। लेकिन इसी गोपनीयता का फायदा वे लोग भी उठा सकते हैं जो डर पैदा करने वाले संदेशों से ग्राहक को अपनी तरफ खींचते हैं।

ऐसे बाजार में हर ऐप या वेबसाइट को धोखाधड़ी कहना सही नहीं होगा। असली सवाल यह है कि सेवा देने वाला कौन है, डॉक्टर की योग्यता क्या है, सलाह किस आधार पर दी जा रही है, उत्पाद बनाने वाली कंपनी कौन है और शिकायत होने पर जिम्मेदारी कौन लेगा। अगर कोई ऐप बिना पर्याप्त जानकारी लिए हर समस्या के लिए एक ही महंगा पैकेज बेच रहा है या बार-बार फोन करके खरीदने का दबाव डालता है, तो सतर्क हो जाना चाहिए।

इंटरनेट पर दिखाई देने वाली रेटिंग और ग्राहक अनुभव भी अंतिम प्रमाण नहीं हैं। कुछ अनुभव असली हो सकते हैं, लेकिन केवल प्रशंसात्मक टिप्पणियों के आधार पर किसी इलाज की प्रभावशीलता तय नहीं की जा सकती। बेहतर है कि चिकित्सकीय सलाह और उत्पाद के बारे में जानकारी स्वतंत्र और भरोसेमंद स्रोतों से भी जांची जाए।

इस कारोबार पर सरकारी संस्थाएं क्या कहती हैं?

भारत में भ्रामक स्वास्थ्य विज्ञापनों पर रोक लगाने के लिए नियम मौजूद हैं। औषधियों और तथाकथित चमत्कारी उपचारों के विज्ञापनों पर ड्रग्स एंड मैजिक रेमेडीज (आपत्तिजनक विज्ञापन) अधिनियम, 1954 समेत संबंधित नियम लागू हो सकते हैं। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम और भ्रामक विज्ञापनों से जुड़ी दिशा-निर्देश व्यवस्था भी ऐसे मामलों में महत्वपूर्ण है। आयुष मंत्रालय की आयुष सुरक्षा व्यवस्था में आपत्तिजनक और भ्रामक विज्ञापनों की निगरानी और संबंधित अधिकारियों तक उनकी जानकारी पहुंचाने की प्रक्रिया शामिल है।

विज्ञापन मानक परिषद की 2023-24 की रिपोर्ट इस समस्या का एक ठोस उदाहरण देती है। रिपोर्ट के अनुसार, 1,249 ऐसे विज्ञापन आयुष मंत्रालय को भेजे गए थे जिनमें दवाओं और चमत्कारी उपचारों से जुड़े कानून के संभावित उल्लंघन की आशंका थी। इनमें 91 प्रतिशत विज्ञापन यौन क्षमता बनाए रखने या बढ़ाने से संबंधित प्रावधानों का उल्लंघन कर रहे थे। रिपोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि ऐसे बहुत से विज्ञापन वेबसाइटों और ऑनलाइन बाजारों पर दिखाई दिए।

यह आंकड़ा किसी पूरे उद्योग को दोषी ठहराने के लिए नहीं है। इसका मतलब यह भी नहीं है कि इन सभी विज्ञापनों में बिकने वाले हर उत्पाद की सामग्री जांचकर उसे नकली पाया गया था। लेकिन इससे यह जरूर पता चलता है कि यौन क्षमता से जुड़े विज्ञापनों में बिना पर्याप्त आधार के दावे एक गंभीर निगरानी का विषय हैं।

अगर सचमुच परेशानी है, तो सही रास्ता क्या है?

सबसे पहले समस्या को सही नाम देना जरूरी है। अगर लगातार थकान है, तो उसके कारणों की जांच की जरूरत हो सकती है। अगर यौन इच्छा कम हो गई है, इरेक्शन में परेशानी रहती है या जल्दी स्खलन होने से चिंता होती है, तो संबंधित चिकित्सक से बात की जा सकती है। समस्या के अनुसार सामान्य चिकित्सक, मूत्र एवं पुरुष प्रजनन स्वास्थ्य विशेषज्ञ या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ मदद कर सकते हैं। जरूरत के अनुसार जांच कराई जा सकती है और फिर उचित इलाज चुना जा सकता है।

डॉक्टर के पास जाने का मतलब यह नहीं कि हर व्यक्ति को लंबी जांच या महंगी दवा की जरूरत होगी। कई बार नींद, तनाव, जीवनशैली, रिश्ते से जुड़ी चिंता या दवा के असर को समझना भी जरूरी होता है। लगातार इरेक्शन की परेशानी कभी-कभी मधुमेह या रक्त वाहिकाओं से जुड़ी बीमारी का शुरुआती संकेत भी हो सकती है। इसलिए इसे केवल मर्दानगी की समस्या समझकर दबाना सही नहीं है।

इसी तरह इंटरनेट पर मिली किसी दवा को खुद से शुरू करना, किसी दूसरे व्यक्ति की दवा लेना या बिना जांच के कई तरह के कैप्सूल एक साथ खाना नुकसानदेह हो सकता है। यदि कोई विक्रेता डॉक्टर से सलाह लेने से मना करता है, बीमारी की जांच को बेकार बताता है या दावा करता है कि उसकी दवा हर तरह की कमजोरी का पक्का इलाज है, तो उसकी बात पर भरोसा करने से पहले रुककर जांच करना जरूरी है।

ऐसे विज्ञापन को पहचानने का आसान तरीका

अगर कोई उत्पाद बहुत कम समय में स्थायी इलाज का वादा करता है, हर उम्र और हर समस्या के लिए एक ही समाधान बताता है या अपनी बात साबित करने के लिए सिर्फ ग्राहक की कहानी दिखाता है, तो उसके दावे को सावधानी से परखें। यह भी देखें कि निर्माता और सामग्री की जानकारी साफ है या नहीं, उत्पाद किस श्रेणी में आता है और उसके दावों के समर्थन में भरोसेमंद प्रमाण मौजूद हैं या नहीं।

किसी व्यक्ति की तस्वीर, वीडियो या कथित डॉक्टर की मौजूदगी अपने आप में वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इसी तरह किसी उत्पाद के लिए पंजीकरण या लाइसेंस होने का मतलब यह नहीं कि उसके विज्ञापन में किए गए हर चिकित्सकीय दावे को मंजूरी मिली हुई है। अगर विज्ञापन किसी बीमारी के इलाज का दावा कर रहा है, तो उस दावे के लिए लागू नियम और उसके समर्थन में उपलब्ध प्रमाण अलग से जांचने चाहिए।

अगर आपको कोई भ्रामक आयुष औषधि विज्ञापन दिखाई देता है, तो आयुष सुरक्षा पोर्टल पर शिकायत की प्रक्रिया देख सकते हैं। उपभोक्ता से जुड़े भ्रामक विज्ञापनों के मामले में उपभोक्ता मामलों के विभाग की व्यवस्था और संबंधित शिकायत मंचों की जानकारी भी उपयोगी हो सकती है। शिकायत करते समय विज्ञापन का स्क्रीनशॉट, वेबसाइट का पता, उत्पाद का नाम और खरीद की रसीद जैसी जानकारी सुरक्षित रखना मददगार हो सकता है।

असली सवाल मर्दानगी का नहीं, सेहत का है

कमजोरी का बाजार इसलिए चलता है क्योंकि वह सिर्फ कोई कैप्सूल नहीं बेचता, बल्कि व्यक्ति को यह विश्वास दिलाता है कि उसके भीतर कुछ खराब हो गया है और उसे ठीक करने का एक खास रास्ता केवल विक्रेता के पास है। वह शर्म को बढ़ाता है, समस्या को छिपाने के लिए प्रेरित करता है और जल्दी नतीजे की उम्मीद दिखाता है। इसी वजह से कई लोग सही सलाह लेने के बजाय बिना जांच के पैसे खर्च कर सकते हैं।

लेकिन यौन स्वास्थ्य में परेशानी होना किसी व्यक्ति की कीमत, चरित्र या मर्दानगी का प्रमाण नहीं है। ऐसी समस्याएं आम हैं और उनके कई कारण हो सकते हैं। सही जानकारी, जरूरत के अनुसार जांच और प्रमाण आधारित इलाज से मदद मिल सकती है। हर आयुर्वेदिक उत्पाद को धोखा कहना गलत होगा, लेकिन हर प्राकृतिक या पारंपरिक नाम वाले उत्पाद को सुरक्षित और असरदार मान लेना भी ठीक नहीं है।

याद रखने वाली बात यह है कि जो व्यक्ति आपकी समस्या समझने से पहले आपको डराता है और फिर अपने उत्पाद को पक्का इलाज बताता है, उसके दावे की जांच जरूर करें। सेहत का फैसला शर्म, डर या विज्ञापन के दबाव में नहीं, सही जानकारी और योग्य चिकित्सकीय सलाह के आधार पर होना चाहिए।

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