Steroids Kya Hai: स्टेरॉयड अचानक बंद करना क्यों हो सकता है खतरनाक? समझिए शरीर के हार्मोन का विज्ञान

Steroids Kya Hai: स्टेरॉयड क्या हैं और कब जीवन बचाते हैं? जानिए मेडिकल स्टेरॉयड और जिम वाले स्टेरॉयड में अंतर, इनके दुष्प्रभाव, हार्मोन पर असर और दवा अचानक बंद करने के खतरे।

Yogesh Mishra
Published on: 21 Oct 2026 1:40 PM IST
Steroids Kya Hai Corticosteroids vs Anabolic Steroids| Steroid Withdrawal Risks | Newstrack Hindi
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Steroids Kya Hai Corticosteroids vs Anabolic Steroids| Steroid Withdrawal Risks | Newstrack Hindi

Steroids Kya Hai: किसी को गंभीर एलर्जी हो जाए, अस्थमा का खतरनाक दौरा पड़े या शरीर की रोग-प्रतिरोधक प्रणाली अपने ही अंगों पर हमला करने लगे, तो डॉक्टर अक्सर स्टेरॉयड देते हैं। ये दवाएँ सूजन घटाकर, साँस में राहत देकर और गंभीर बीमारियों को काबू में रखकर जान बचा सकती हैं। फिर भी स्टेरॉयड का नाम सुनते ही लोग डर जाते हैं। कोई कहता है हड्डियाँ कमज़ोर हो जाती हैं, कोई कहता है चेहरा फूल जाता है और वज़न बढ़ता है, और कुछ लोग मांसपेशियाँ बनाने के लिए इन्हें लेकर बाद में गंभीर बीमारियों में फँस जाते हैं। एक ही नाम के पदार्थ इतने अलग असर क्यों दिखाते हैं? क्या डॉक्टर की दी हुई दवा और जिम वाला स्टेरॉयड एक ही चीज़ है? क्या स्टेरॉयड शरीर में पहले से होते हैं? और इन्हें अचानक बंद करना खतरनाक क्यों हो सकता है?

सबसे पहले एक भ्रम दूर करना ज़रूरी है। स्टेरॉयड किसी एक दवा का नाम नहीं, बल्कि मिलती-जुलती रासायनिक बनावट वाले पदार्थों का बड़ा समूह है। इसमें शरीर के अपने हार्मोन भी हैं और लैब में बनी दवाएँ भी। इलाज में सबसे ज़्यादा कॉर्टिकोस्टेरॉयड इस्तेमाल होते हैं, जो सूजन और प्रतिरक्षा प्रणाली को काबू करते हैं। दूसरी तरफ़ एनाबॉलिक-एंड्रोजेनिक स्टेरॉयड टेस्टोस्टेरोन जैसा असर करते हैं। इनके कुछ खास चिकित्सकीय उपयोग हैं, पर मांसपेशियाँ बढ़ाने के लिए इनका बिना डॉक्टरी इस्तेमाल गंभीर खतरे पैदा करता है। बनावट मिलती है, पर दोनों के मकसद, असर और खतरे अलग हैं।

स्टेरॉयड असल में क्या हैं और शरीर इन्हें खुद क्यों बनाता है?

स्टेरॉयड ऐसे कार्बनिक अणु हैं जिनकी बनावट में चार छल्ले आपस में जुड़े होते हैं। शरीर में कई स्टेरॉयड हार्मोन कोलेस्ट्रॉल से बनते हैं। हम कोलेस्ट्रॉल को सिर्फ़ दिल की बीमारी से जोड़कर देखते हैं, पर वह कोशिकाओं की झिल्ली और कई ज़रूरी हार्मोन बनाने में भी काम आता है। अधिवृक्क ग्रंथियाँ (एड्रिनल ग्लैंड्स) कॉर्टिसोल और एल्डोस्टेरोन बनाती हैं। अंडकोष और अंडाशय जैसे अंग टेस्टोस्टेरोन, एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन बनाते हैं। ये सब स्टेरॉयड परिवार के हैं, पर इनके काम अलग-अलग हैं।

कॉर्टिसोल तनाव के जवाब, ऊर्जा के इस्तेमाल, ब्लड प्रेशर और प्रतिरक्षा को प्रभावित करता है। एल्डोस्टेरोन शरीर में सोडियम, पोटैशियम और पानी का संतुलन रखता है। टेस्टोस्टेरोन यौन विकास, मांसपेशियों और हड्डियों में भूमिका निभाता है, और एस्ट्रोजन-प्रोजेस्टेरोन प्रजनन व कई दूसरी प्रक्रियाओं से जुड़े हैं। इसलिए यह कहना गलत है कि स्टेरॉयड अपने आप में हानिकारक हैं। इनके बिना शरीर चल ही नहीं सकता। दिक्कत तब होती है जब मात्रा या अवधि ज़रूरत से ज़्यादा हो जाए, या इन्हें गलत मकसद से बिना निगरानी के लिया जाए।

डॉक्टर की दी हुई स्टेरॉयड दवाएँ शरीर में क्या करती हैं?

इलाज में प्रेडनिसोलोन, प्रेडनिसोन, डेक्सामेथासोन, हाइड्रोकॉर्टिसोन, मिथाइलप्रेडनिसोलोन जैसी दवाएँ इस्तेमाल होती हैं। ये शरीर के प्राकृतिक हार्मोन कॉर्टिसोल के असर की नकल करती हैं। दवा कोशिका के अंदर जाकर ग्लूकोकॉर्टिकोइड रिसेप्टर (संदेश पकड़ने वाले हिस्से) से जुड़ती है। फिर यह जोड़ी कोशिका के केंद्र (नाभिक) में जाकर कई जीनों की गतिविधि बदल देती है। नतीजा यह कि सूजन पैदा करने वाले कई रासायनिक संदेश कम बनते हैं और प्रतिरक्षा की कुछ प्रतिक्रियाएँ दब जाती हैं। कुछ असर जीन बदलने से आते हैं, तो कुछ अपेक्षाकृत जल्दी वाली प्रक्रियाओं से।

उदाहरण के लिए, संक्रमण या चोट में प्रतिरक्षा प्रणाली सक्रिय होकर सूजन बनाती है, जो आम तौर पर फ़ायदेमंद है। पर अगर यही प्रतिक्रिया हद से बढ़ जाए या शरीर अपने ही ऊतकों पर हमला करने लगे, तो सूजन नुकसान करती है। स्टेरॉयड ऐसे में सूजन घटाकर अंगों को बचाते हैं। लेकिन यही ताक़त उनका खतरा भी है, क्योंकि प्रतिरक्षा को ज़्यादा दबाने से संक्रमण से लड़ने की क्षमता घट सकती है। यानी स्टेरॉयड का फ़ायदा और नुकसान एक ही प्रक्रिया के दो पहलू हैं।

किन बीमारियों में स्टेरॉयड जीवनरक्षक हो सकते हैं?

अस्थमा में साँस की नलियों की सूजन घटाने के लिए इनहेलर वाले स्टेरॉयड अहम नियंत्रक दवा हैं। कुछ गंभीर दौरों में थोड़े समय के लिए गोली या इंजेक्शन भी दिए जाते हैं। रूमेटॉइड आर्थराइटिस, ल्यूपस और दूसरी ऑटोइम्यून बीमारियों, कुछ गंभीर एलर्जी, आँतों की सूजन वाली बीमारियों, कुछ त्वचा रोगों और अंग प्रत्यारोपण के बाद प्रतिरक्षा को काबू में रखने में भी इनकी भूमिका हो सकती है। पर हर बीमारी में इनकी ज़रूरत या फ़ायदा एक जैसा नहीं होता।

एक अलग स्थिति है एड्रिनल इंसफिशिएंसी, जिसमें शरीर पर्याप्त कॉर्टिसोल बना ही नहीं पाता। ऐसे मरीज़ों को हाइड्रोकॉर्टिसोन जैसी दवा कमी पूरी करने के लिए दी जाती है, सूजन दबाने के लिए नहीं। यह इलाज कई बार लंबे समय या ताउम्र चल सकता है। इसलिए स्टेरॉयड के लंबे इस्तेमाल को हमेशा गलत कहना भी सही नहीं। असली सवाल यह है कि दवा किस बीमारी में, कितनी मात्रा में, किस तरीके से और कितने समय के लिए दी जा रही है।

स्टेरॉयड इतनी जल्दी राहत क्यों देते हैं?

स्टेरॉयड सूजन पैदा करने वाले कई रास्तों को एक साथ प्रभावित करते हैं, इसलिए कई सूजन वाली बीमारियों में राहत अपेक्षाकृत जल्दी मिलती है। अस्थमा के गंभीर दौरे में नलियों की सूजन घटने से हालत सुधर सकती है, हालाँकि ये साँस की नली को तुरंत खोलने वाली राहत दवाओं (रिलीवर) की जगह नहीं ले सकते। त्वचा में लालिमा, खुजली और सूजन घट सकती है, और जोड़ों का दर्द व जकड़न कम हो सकती है। पर राहत की रफ़्तार दवा, खुराक और बीमारी पर निर्भर है। हर स्टेरॉयड मिनटों में असर नहीं करता।

यहीं एक चुनौती भी है। स्टेरॉयड से अच्छा लगने का मतलब यह नहीं कि बीमारी की जड़ खत्म हो गई। वे सूजन को दबाते हैं, जबकि मूल बीमारी बनी रह सकती है। जैसे संक्रमण से हुई सूजन में लक्षण दब सकते हैं, पर ज़रूरी एंटीबायोटिक वगैरह न दी जाए तो असली समस्या बढ़ सकती है। इसीलिए सही जाँच के बिना बार-बार स्टेरॉयड लेना खतरनाक है।

स्टेरॉयड नुकसान कब करने लगते हैं?

दुष्प्रभाव दवा के प्रकार, मात्रा, अवधि, शरीर में पहुँचने के रास्ते और व्यक्ति की सेहत पर निर्भर करते हैं। ज़्यादा मात्रा में या लंबे समय तक दिए गए स्टेरॉयड (गोली/इंजेक्शन वाले) ये असर कर सकते हैं:

ब्लड शुगर और ब्लड प्रेशर बढ़ना

वज़न बढ़ना और चर्बी का बँटवारा बदलना; चेहरा गोल और भरा-भरा हो जाना ("मून फ़ेस"), पेट के आसपास चर्बी बढ़ना और हाथ-पैरों की मांसपेशियाँ कमज़ोर होना

त्वचा पतली होना, आसानी से नील पड़ना, घाव देर से भरना

हड्डियाँ कमज़ोर होना (ऑस्टियोपोरोसिस) और फ्रैक्चर का खतरा

नींद न आना, बेचैनी, चिड़चिड़ापन और मूड बदलना; गंभीर मामलों में उन्माद या मनोविकृति

आँखों में मोतियाबिंद या ग्लूकोमा का खतरा (कुछ तरह के लंबे इस्तेमाल में)

संक्रमण का खतरा और उसकी गंभीरता बढ़ना

पर इसका मतलब यह नहीं कि थोड़े समय के लिए डॉक्टर की निगरानी में दवा लेने वाले हर मरीज़ को ये सब होंगे। खतरे का आकलन हर व्यक्ति की हालत देखकर होना चाहिए।

क्या स्टेरॉयड से शरीर अपना कॉर्टिसोल बनाना बंद कर देता है?

यह स्टेरॉयड के सबसे अहम और कम समझे जाने वाले खतरों में से है। शरीर में कॉर्टिसोल एक नियंत्रण व्यवस्था से बनता है, जिसे एचपीए एक्सिस कहते हैं। दिमाग का हाइपोथैलेमस पिट्यूटरी ग्रंथि को संकेत देता है, पिट्यूटरी ACTH नाम का हार्मोन भेजती है, और ACTH अधिवृक्क ग्रंथियों से कॉर्टिसोल बनवाता है। जब शरीर में पर्याप्त कॉर्टिसोल हो, तो फ़ीडबैक के ज़रिए यह व्यवस्था खुद धीमी हो जाती है।

अगर बाहर से स्टेरॉयड लंबे समय तक दिया जाए, तो शरीर उसे अपना ही कॉर्टिसोल समझ लेता है। तब ACTH कम निकलता है और अधिवृक्क ग्रंथियों की अपना कॉर्टिसोल बनाने की क्षमता दब सकती है। ऐसे में दवा अचानक बंद कर दी जाए तो शरीर तुरंत पर्याप्त कॉर्टिसोल नहीं बना पाता। इससे बहुत कमज़ोरी, चक्कर, ब्लड प्रेशर गिरना, उल्टी और गंभीर मामलों में एड्रिनल क्राइसिस जैसी जानलेवा हालत हो सकती है।

2024 में यूरोपियन सोसायटी ऑफ एंडोक्रिनोलॉजी और एंडोक्राइन सोसायटी ने इस पर संयुक्त दिशानिर्देश जारी किए। इनके मुताबिक तीन-चार हफ़्ते से कम के इलाज में आम तौर पर खुराक धीरे-धीरे घटाने की ज़रूरत नहीं होती, पर लंबे इलाज में खतरे का आकलन ज़रूरी है। असली फ़ैसला खुराक, दवा की ताक़त, अवधि और मरीज़ की हालत पर निर्भर है। इसलिए लंबे समय से स्टेरॉयड ले रहे व्यक्ति को डॉक्टर की सलाह के बिना दवा अचानक बंद नहीं करनी चाहिए।

क्या जिम वाले स्टेरॉयड और डॉक्टर की दवाएँ एक ही हैं?

मांसपेशियाँ और ताक़त बढ़ाने के लिए जिनका दुरुपयोग होता है, वे आम तौर पर एनाबॉलिक-एंड्रोजेनिक स्टेरॉयड हैं, यानी टेस्टोस्टेरोन से जुड़े कृत्रिम या बदले हुए पदार्थ। इनका असर ग्लूकोकॉर्टिकोइड से अलग होता है। ये एंड्रोजन रिसेप्टर के ज़रिए काम करते हैं और मांसपेशियों में प्रोटीन बनने व ऊतक बढ़ने के संकेत तेज़ कर सकते हैं। इसीलिए कुछ लोग मसल बनाने या खेल में प्रदर्शन सुधारने के लिए इन्हें लेते हैं। पर इसका मतलब यह नहीं कि इनका बिना डॉक्टरी इस्तेमाल सुरक्षित है।

इनके दुरुपयोग से शरीर की प्राकृतिक हार्मोन व्यवस्था दब सकती है:

पुरुषों में: टेस्टोस्टेरोन का अपना निर्माण घटना, अंडकोष सिकुड़ना, शुक्राणु कम होना, प्रजनन क्षमता पर असर, कुछ में स्तनों का बढ़ना।

महिलाओं में: आवाज़ भारी होना, चेहरे व शरीर पर बाल बढ़ना, पीरियड्स में गड़बड़ी।

किशोरों में: हड्डियों की बढ़त और सामान्य विकास पर असर।

दिल और रक्तवाहिकाओं पर: ब्लड प्रेशर और खून में चर्बी का स्तर बिगड़ना, हृदय की मांसपेशी का असामान्य रूप से बढ़ना, दिल की बीमारी व गंभीर रक्तवाहिका संबंधी घटनाओं का खतरा।

लिवर पर: कुछ गोली वाले एनाबॉलिक स्टेरॉयड लिवर को नुकसान पहुँचा सकते हैं।

मन पर: मूड में उतार-चढ़ाव, आक्रामकता, निर्भरता और छोड़ने पर डिप्रेशन जैसे लक्षण।

इनमें से कुछ बदलाव दवा छोड़ने के बाद भी पूरी तरह वापस नहीं आते। अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑन ड्रग एब्यूज़ ने इनके शारीरिक और मानसिक असर का विस्तृत ब्योरा प्रकाशित किया है।

क्या स्टेरॉयड से पुरुष नपुंसक और महिलाएँ बाँझ हो सकती हैं?

यह सवाल मुख्य रूप से एनाबॉलिक स्टेरॉयड के दुरुपयोग से जुड़ा है। बाहर से लिया गया टेस्टोस्टेरोन शरीर की प्रजनन हार्मोन व्यवस्था को दबा सकता है। पुरुषों में LH और FH जैसे हार्मोन कम हो सकते हैं, जो शुक्राणु बनने के लिए ज़रूरी हैं। नतीजतन शुक्राणु बहुत कम हो सकते हैं या कुछ समय के लिए लगभग बनना बंद हो सकते हैं। कई लोगों में दवा छोड़ने के बाद हार्मोन और प्रजनन क्षमता धीरे-धीरे लौट आती है, पर इसमें महीनों या उससे ज़्यादा लग सकते हैं और पूरी वापसी की गारंटी नहीं है।

महिलाओं में ये स्टेरॉयड अंडा बनने और पीरियड्स की प्रक्रिया बिगाड़ सकते हैं। पर यह कहना भी गलत होगा कि इन्हें लेने वाला हर व्यक्ति हमेशा के लिए बाँझ हो जाएगा। खतरा पदार्थ, मात्रा, अवधि और व्यक्ति की जैविक स्थिति पर निर्भर करता है। और आम कॉर्टिकोस्टेरॉयड इलाज के प्रजनन संबंधी खतरों को एनाबॉलिक स्टेरॉयड के दुरुपयोग जैसा नहीं समझना चाहिए।

स्टेरॉयड वाली क्रीम और इनहेलर कितने सुरक्षित हैं?

त्वचा पर लगने वाली क्रीम और साँस से ली जाने वाली इनहेलर दवाएँ भी इसी परिवार की हैं, पर इनका असर शरीर के खास हिस्से पर सूजन घटाने के लिए होता है। सही दवा, सही मात्रा और तय अवधि में इनसे बड़ा फ़ायदा मिलता है। जैसे एक्ज़िमा की सूजन और खुजली में स्टेरॉयड क्रीम काम आती है, और अस्थमा में इनहेलर गंभीर दौरों का खतरा घटाता है।

पर स्थानीय इस्तेमाल का मतलब पूरी तरह बेखतर होना नहीं है। बहुत तेज़ क्रीम को लंबे समय तक, खासकर चेहरे, त्वचा की सिलवटों या बड़े हिस्से पर बिना निगरानी के लगाने से त्वचा पतली हो सकती है, नसें उभरकर दिखने लग सकती हैं और दूसरे स्थानीय दुष्प्रभाव हो सकते हैं। फंगल संक्रमण में बिना जाँच स्टेरॉयड मिली क्रीम लगाने से संक्रमण का रूप बदल सकता है और उसे पहचानना व ठीक करना मुश्किल हो जाता है। इनहेलर से कुछ लोगों के मुँह में फंगल संक्रमण या आवाज़ बैठने की दिक्कत हो सकती है। सही तकनीक से इस्तेमाल और जहाँ बताया गया हो वहाँ इस्तेमाल के बाद कुल्ला करने से यह खतरा घटाया जा सकता है। इन दुष्प्रभावों के डर से अस्थमा की ज़रूरी नियंत्रक दवा खुद से बंद नहीं करनी चाहिए।

क्या स्टेरॉयड से डायबिटीज़ और मोटापा हो सकता है?

ग्लूकोकॉर्टिकोइड शरीर में ऊर्जा के इस्तेमाल को प्रभावित करते हैं। ये लिवर में ग्लूकोज़ बनना बढ़ा सकते हैं और कुछ ऊतकों में इंसुलिन का असर घटा सकते हैं। इसलिए इलाज के दौरान ब्लड शुगर बढ़ सकता है। जिन्हें पहले से डायबिटीज़ है, उनमें शुगर काबू करना मुश्किल हो सकता है, और कुछ लोगों में स्टेरॉयड के दौरान पहली बार डायबिटीज़ पकड़ में भी आ सकती है। खतरा दवा की मात्रा, अवधि और व्यक्ति की पहले की संवेदनशीलता पर निर्भर करता है।

वज़न बढ़ने के भी कई कारण होते हैं। कुछ स्टेरॉयड भूख बढ़ाते हैं, शरीर में पानी-नमक का संतुलन बदलते हैं और चर्बी का बँटवारा बदल देते हैं। पर हर स्टेरॉयड और हर खुराक से एक जैसा वज़न नहीं बढ़ता। कई बार मूल बीमारी, कम चलना-फिरना और दूसरी दवाएँ भी वज़न बदलती हैं। इसलिए सिर्फ़ वज़न बढ़ता देखकर स्टेरॉयड को दोष देना या डॉक्टर से पूछे बिना दवा बंद करना सही नहीं।

क्या स्टेरॉयड कैंसर करते हैं, या कैंसर के इलाज में भी काम आते हैं?

यह रिश्ता भी जटिल है। कुछ कैंसर के इलाज में कॉर्टिकोस्टेरॉयड अहम हैं। जैसे खून के कुछ कैंसर और लिम्फोमा के इलाज की योजनाओं में ये शामिल हो सकते हैं। कैंसर के मरीज़ों में सूजन, मतली या दूसरे लक्षण काबू करने के लिए भी इनका इस्तेमाल होता है। इसलिए यह कहना गलत है कि स्टेरॉयड हमेशा कैंसर करते हैं।

दूसरी तरफ़, लंबे समय तक प्रतिरक्षा दबाने वाले इलाज में संक्रमण और कुछ अन्य खतरों की जाँच ज़रूरी है। किसी के कैंसर के खतरे पर सिर्फ़ एक दवा नहीं, बल्कि मूल बीमारी, दूसरी दवाएँ, उम्र और संक्रमण जैसे कई कारण असर डालते हैं। एनाबॉलिक स्टेरॉयड के कुछ रूपों के दुरुपयोग को लिवर की गंभीर समस्याओं और कुछ तरह के ट्यूमर से जोड़ा गया है। इसलिए सब स्टेरॉयड को कैंसर के मामले में एक ही श्रेणी में रखना ठीक नहीं।

क्या स्टेरॉयड लेने वाला इन्हें छोड़ सकता है?

यह इस पर निर्भर है कि कौन-सा स्टेरॉयड है, किस मकसद से लिया जा रहा है और कब से। कॉर्टिकोस्टेरॉयड लंबे समय से लेने वाले मरीज़ में दवा बंद करने के लिए खुराक धीरे-धीरे घटानी पड़ती है और कभी-कभी अधिवृक्क ग्रंथियों की कार्यक्षमता भी जाँचनी पड़ती है। पर हर छोटे कोर्स में खुराक घटाना ज़रूरी नहीं होता। और जिन मरीज़ों में कॉर्टिसोल की स्थायी कमी है, उन्हें हार्मोन की पूर्ति जारी रखनी पड़ सकती है।

एनाबॉलिक स्टेरॉयड का दुरुपयोग करने वालों में छोड़ने के बाद थकान, यौन इच्छा में कमी, मूड में बदलाव और हार्मोन की गड़बड़ियाँ आ सकती हैं। कुछ को मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ और हार्मोन विशेषज्ञ (एंडोक्रिनोलॉजिस्ट) की मदद लगती है। इसलिए छोड़ने का फ़ैसला भी डॉक्टरी जाँच के आधार पर होना चाहिए। इंटरनेट से दवाएँ लेकर खुद हार्मोन ठीक करने की कोशिश नया खतरा खड़ा करती है।

स्टेरॉयड अपने आप में न अच्छे हैं, न बुरे; उनका असर इस पर निर्भर है कि कैसे और किस संदर्भ में इस्तेमाल हों।असली फ़र्क इससे पड़ता है कि वह कौन-सा स्टेरॉयड है, किस बीमारी में दिया जा रहा है, कितनी मात्रा में और कितने समय तक। इसलिए स्टेरॉयड से अंधाधुंध डरना और उन्हें बिना डॉक्टर की सलाह के लेना, दोनों गलत हैं।

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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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