TRENDING TAGS :
सुपरबग्स का बढ़ता साम्राज्य: जब एंटीबायोटिक बेअसर होने लगती हैं, क्या फिर लौट आएगा मौत का दौर?
Superbugs-Antibiotic Resistance: सुपरबग्स और एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस क्यों बढ़ रहे हैं? जानिए AMR का खतरा, WHO की चेतावनी, भारत की चुनौती और भविष्य में संक्रमण से बचाव के उपाय।
Superbugs-Antibiotic Resistance
Superbugs-Antibiotic Resistance: एक समय था जब मामूली चोट लगने के बाद घाव में इन्फेक्शन होना भी जानलेवा साबित हो सकता था। निमोनिया, टाइफाइड, प्रसव के बाद होने वाला संक्रमण या सामान्य सर्जरी के बाद बैक्टीरिया का शरीर में फैल जाना लाखों लोगों की मौत का कारण बनता था। 20वीं सदी में एंटीबायोटिक दवाओं की खोज ने इस तस्वीर को पूरी तरह बदल दिया। पेनिसिलिन से शुरू हुई यह वैज्ञानिक क्रांति आधुनिक चिकित्सा की सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिनी जाती है। इसी ने सर्जरी को सुरक्षित बनाया, अंग प्रत्यारोपण को संभव किया, कैंसर के मरीजों की कीमोथेरेपी को सफल बनाया और समय से पहले जन्मे बच्चों की जान बचाने में अहम भूमिका निभाई।
लेकिन अब यही सबसे भरोसेमंद हथियार धीरे-धीरे कमजोर पड़ता दिखाई दे रहा है। दुनिया भर के वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि अनेक बैक्टीरिया ऐसे विकसित हो चुके हैं जिन पर पहले असर करने वाली एंटीबायोटिक दवाएं अब बेअसर हो रही हैं। इन दवा-प्रतिरोधी जीवाणुओं को आम भाषा में 'सुपरबग्स' कहा जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) 21वीं सदी के सबसे बड़े सार्वजनिक स्वास्थ्य संकटों में शामिल है। यदि इसे समय रहते नहीं रोका गया, तो आने वाले वर्षों में सामान्य संक्रमण भी फिर से जानलेवा हो सकते हैं।
क्या होता है एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस?
अक्सर लोग यह समझते हैं कि बार-बार एंटीबायोटिक खाने से इंसान का शरीर दवा का आदी हो जाता है। जबकि वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग है। प्रतिरोध इंसान में नहीं, बल्कि बैक्टीरिया में विकसित होता है। जब किसी संक्रमण के इलाज के लिए एंटीबायोटिक दी जाती है तो अधिकांश संवेदनशील बैक्टीरिया मर जाते हैं। लेकिन लाखों-करोड़ों बैक्टीरिया की आबादी में कुछ ऐसे भी हो सकते हैं जिनमें प्राकृतिक आनुवंशिक बदलाव के कारण दवा से बचने की क्षमता पहले से मौजूद हो। दवा संवेदनशील बैक्टीरिया को खत्म कर देती है, जबकि प्रतिरोधी बैक्टीरिया जीवित बच जाते हैं और तेजी से अपनी संख्या बढ़ाने लगते हैं। धीरे-धीरे वही बैक्टीरिया पूरे संक्रमण पर कब्जा कर लेते हैं। इसे डार्विन के प्राकृतिक चयन का सबसे तेज उदाहरण माना जाता है। चूंकि बैक्टीरिया कुछ मिनटों या घंटों में नई पीढ़ी तैयार कर लेते हैं, इसलिए उनके भीतर होने वाले लाभदायक आनुवंशिक परिवर्तन भी बेहद तेजी से पूरी आबादी में फैल जाते हैं।
बैक्टीरिया एक-दूसरे को भी सिखा देते हैं दवा से बचने का तरीका
सुपरबग्स की सबसे खतरनाक विशेषता केवल उनका प्रतिरोधी होना नहीं है, बल्कि यह है कि वे अपनी यह क्षमता दूसरे बैक्टीरिया तक भी पहुंचा सकते हैं। बैक्टीरिया के भीतर प्लाज्मिड नामक छोटे आनुवंशिक तत्व होते हैं। ये प्लाज्मिड एक बैक्टीरिया से दूसरे बैक्टीरिया में स्थानांतरित हो सकते हैं।
यदि किसी प्लाज्मिड में एंटीबायोटिक प्रतिरोध वाला जीन मौजूद है तो वह दूसरे बैक्टीरिया को भी दवा से बचने का तरीका सिखा सकता है। कई बार यह आदान-प्रदान अलग-अलग प्रजातियों के बैक्टीरिया के बीच भी हो जाता है। यही वजह है कि किसी अस्पताल में विकसित हुआ प्रतिरोध कुछ ही समय में दूसरे अस्पताल, दूसरे शहर या दूसरे देश तक पहुंच सकता है। अंतरराष्ट्रीय यात्रा, खाद्य पदार्थों का व्यापार, पशुपालन, सीवेज और प्रदूषित जल स्रोत इस प्रसार को और तेज कर देते हैं।
बैक्टीरिया आखिर एंटीबायोटिक को मात कैसे देते हैं?
विज्ञान ने पाया है कि बैक्टीरिया दवा से बचने के लिए कई तरह की रणनीतियां अपनाते हैं। कुछ बैक्टीरिया ऐसे एंजाइम बनाते हैं जो एंटीबायोटिक के अणु को ही तोड़ देते हैं। कुछ अपनी बाहरी झिल्ली में बदलाव कर लेते हैं ताकि दवा उनके भीतर प्रवेश ही न कर सके। कुछ के पास ऐसे विशेष पंप होते हैं जो दवा को कोशिका में पहुंचते ही बाहर निकाल देते हैं। कई बैक्टीरिया उस जैविक लक्ष्य की संरचना बदल देते हैं जिस पर एंटीबायोटिक हमला करती है। परिणाम यह होता है कि दवा शरीर में मौजूद रहने के बावजूद बैक्टीरिया पर असर नहीं कर पाती। सबसे खतरनाक स्थिति तब होती है जब एक ही बैक्टीरिया इन कई रणनीतियों का एक साथ इस्तेमाल करने लगता है। ऐसे बैक्टीरिया को मल्टी-ड्रग रेजिस्टेंट (MDR) कहा जाता है।
बायोफिल्म बनाकर खुद को अभेद्य किला बना लेते हैं सुपरबग्स
कुछ बैक्टीरिया अपने चारों ओर चिपचिपी सुरक्षात्मक परत बना लेते हैं जिसे बायोफिल्म कहा जाता है। यह परत उन्हें एंटीबायोटिक और शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली दोनों से बचाती है। अस्पतालों में कैथेटर, कृत्रिम जोड़, वेंटिलेटर की नलियां, हृदय के कृत्रिम वाल्व और लंबे समय तक बने रहने वाले घाव बायोफिल्म बनने की आदर्श जगह बन जाते हैं। बायोफिल्म के भीतर रहने वाले बैक्टीरिया बहुत धीमी अवस्था में चले जाते हैं। चूंकि अधिकांश एंटीबायोटिक तेजी से बढ़ रहे बैक्टीरिया पर अधिक असर करती हैं, इसलिए ये निष्क्रिय बैक्टीरिया उपचार के बाद भी जीवित रह जाते हैं। यही कारण है कि कई मरीजों में संक्रमण कुछ समय बाद दोबारा लौट आता है।
सुपरबग्स आखिर होते क्या हैं?
'सुपरबग' कोई वैज्ञानिक नाम नहीं है। यह ऐसा लोकप्रिय शब्द है जिसका उपयोग उन बैक्टीरिया के लिए किया जाता है जिन पर एक नहीं बल्कि कई प्रमुख एंटीबायोटिक दवाएं असर करना बंद कर चुकी हों। इनकी सबसे बड़ी ताकत उनका आकार या विषाक्तता नहीं होती, बल्कि यह होती है कि डॉक्टरों के पास इन्हें खत्म करने के लिए बहुत कम दवाएं बचती हैं। जब कोई बैक्टीरिया कई दवा-समूहों के प्रति प्रतिरोधी हो जाता है तो उसे मल्टी-ड्रग रेजिस्टेंट (MDR) कहा जाता है। जब लगभग सभी प्रमुख दवाएं विफल हो जाएं तो उसे एक्सटेंसिवली ड्रग रेजिस्टेंट (XDR) और जब लगभग कोई भी उपलब्ध एंटीबायोटिक काम न करे तो उसे पैन-ड्रग रेजिस्टेंट (PDR) कहा जाता है। यानी सुपरबग्स की असली ताकत उनके आक्रामक होने में नहीं, बल्कि इलाज के विकल्प खत्म हो जाने में है।
किन सुपरबग्स से सबसे ज्यादा डर है?
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 2024 में एंटीबायोटिक-प्रतिरोधी बैक्टीरिया की नई बैक्टीरियल प्रायोरिटी पैथोजेन्स लिस्ट जारी की। इसका उद्देश्य दुनिया भर की सरकारों और दवा कंपनियों को यह बताना है कि किन बैक्टीरिया के खिलाफ नई दवाएं, टीके और जांच तकनीक विकसित करना सबसे जरूरी है। इस सूची में बैक्टीरिया को तीन श्रेणियों - क्रिटिकल, हाई और मीडियम प्रायोरिटी में रखा गया है।
सबसे गंभीर श्रेणी में कार्बापेनेम-प्रतिरोधी Acinetobacter baumannii, कार्बापेनेम-प्रतिरोधी Enterobacterales, तीसरी पीढ़ी की सेफालोस्पोरिन के प्रति प्रतिरोधी Enterobacterales तथा रिफैम्पिसिन-प्रतिरोधी Mycobacterium tuberculosis शामिल हैं। इनमें सबसे ज्यादा चिंता कार्बापेनेम-प्रतिरोधी बैक्टीरिया को लेकर है, क्योंकि कार्बापेनेम ऐसी शक्तिशाली एंटीबायोटिक मानी जाती हैं जिन्हें तब इस्तेमाल किया जाता है जब लगभग सभी सामान्य दवाएं विफल हो चुकी हों।
अस्पतालों का सबसे खतरनाक दुश्मन
Acinetobacter baumannii ऐसा बैक्टीरिया है जो विशेष रूप से अस्पतालों के आईसीयू में गंभीर मरीजों को संक्रमित करता है। वेंटिलेटर पर मौजूद मरीज, गंभीर रूप से झुलसे लोग, खुले घाव वाले रोगी और कमजोर प्रतिरक्षा वाले मरीज इसके सबसे आसान शिकार होते हैं। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह अस्पताल की सूखी सतहों पर भी लंबे समय तक जीवित रह सकता है। यदि यह कार्बापेनेम एंटीबायोटिक के प्रति भी प्रतिरोधी हो जाए तो इसे CRAB (Carbapenem-resistant Acinetobacter baumannii) कहा जाता है। अमेरिकी रोग नियंत्रण एवं रोकथाम केंद्र इसे अस्पतालों में होने वाले सबसे खतरनाक संक्रमणों में गिनता है, क्योंकि कई मामलों में इस पर लगभग कोई भी उपलब्ध एंटीबायोटिक असर नहीं करती।
जब अंतिम हथियार भी बेकार हो जाए
दुनिया भर में डॉक्टरों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन चुके बैक्टीरिया में Carbapenem-resistant Enterobacterales (CRE) शामिल हैं। इस समूह में E. coli और Klebsiella pneumoniae जैसे बैक्टीरिया आते हैं, जो मूत्र संक्रमण, निमोनिया, पेट के संक्रमण और सेप्सिस का कारण बनते हैं। ये बैक्टीरिया ऐसे एंजाइम बनाते हैं जो कार्बापेनेम जैसी अंतिम विकल्प वाली एंटीबायोटिक को भी तोड़ देते हैं। इनमें NDM (New Delhi Metallo-beta-lactamase), KPC और OXA-48 जैसे प्रतिरोधी जीन सबसे अधिक चिंता का विषय हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन की प्राथमिकता सूची यह स्पष्ट करती है कि सुपरबग्स केवल आईसीयू या बड़े अस्पतालों की समस्या नहीं हैं। दवा-प्रतिरोध अब उन बीमारियों तक पहुंच चुका है जो हर साल करोड़ों लोगों को प्रभावित करती हैं। इसी कारण रिफैम्पिसिन-प्रतिरोधी क्षय रोग (टीबी) को भी सबसे गंभीर श्रेणी में रखा गया है। टीबी का इलाज कई महीनों तक चलने वाली दवाओं के संयोजन से किया जाता है। यदि मरीज बीच में दवा छोड़ दे, दवा की गुणवत्ता खराब हो या सही समय पर इलाज न मिले तो जीवाणु धीरे-धीरे दवाओं के खिलाफ प्रतिरोध विकसित कर लेते हैं। ऐसी स्थिति में मल्टी-ड्रग रेजिस्टेंट टीबी (MDR-TB) विकसित होती है, जिसका इलाज लंबा, महंगा और अधिक दुष्प्रभाव वाला होता है।
दुनिया का सबसे चर्चित सुपरबग
यदि किसी सुपरबग का नाम आम लोगों ने सबसे अधिक सुना है तो वह MRSA है। सामान्य परिस्थितियों में Staphylococcus aureus नामक बैक्टीरिया हमारी त्वचा और नाक में बिना कोई बीमारी पैदा किए रह सकता है। लेकिन जब यह शरीर के भीतर प्रवेश कर जाता है तो फोड़े, त्वचा संक्रमण, निमोनिया, हड्डियों का संक्रमण, हृदय के वाल्व का संक्रमण और रक्त में गंभीर संक्रमण पैदा कर सकता है।
MRSA में ऐसा आनुवंशिक परिवर्तन हो चुका है जिससे मेथिसिलिन और उससे संबंधित अनेक बीटा-लैक्टम एंटीबायोटिक बेअसर हो जाती हैं। पहले इसे अस्पतालों तक सीमित माना जाता था, लेकिन अब समुदाय में फैलने वाले MRSA के मामले भी सामने आ रहे हैं। इसका मतलब है कि स्वस्थ व्यक्ति भी बिना अस्पताल गए इस संक्रमण की चपेट में आ सकता है।
जब सामान्य संक्रमण भी जानलेवा बन सकता है
सुपरबग्स का सबसे बड़ा खतरा यह नहीं कि वे नई बीमारी पैदा करते हैं, बल्कि यह है कि वे सामान्य संक्रमण को भी खतरनाक बना देते हैं। एक साधारण मूत्र संक्रमण, जिसे पहले तीन से पांच दिन की दवा से ठीक किया जा सकता था, अब कई मामलों में अस्पताल में भर्ती होने की नौबत ला सकता है। सामान्य ऑपरेशन के बाद होने वाला संक्रमण महीनों तक ठीक नहीं होता। नवजात शिशुओं, बुजुर्गों, कैंसर मरीजों और प्रतिरक्षा कमजोर लोगों में यह खतरा कई गुना बढ़ जाता है। यदि प्रभावी एंटीबायोटिक खत्म हो गईं तो भविष्य में दांत निकालना, सीजेरियन डिलीवरी, घुटने का प्रत्यारोपण, किडनी ट्रांसप्लांट और यहां तक कि छोटी सर्जरी भी जोखिम भरी हो सकती है।
गलती पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था की भी है
एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस की चर्चा अक्सर इस बात पर खत्म हो जाती है कि लोग डॉक्टर की सलाह के बिना दवा लेते हैं या बीच में इलाज छोड़ देते हैं। यह कारण जरूर है, लेकिन पूरी तस्वीर नहीं। वास्तविक समस्या कहीं अधिक जटिल है। कई देशों में बिना जांच के एंटीबायोटिक लिख दी जाती हैं क्योंकि यह पता लगाने की सुविधा ही नहीं होती कि संक्रमण बैक्टीरिया का है या वायरस का। कई जगह मरीज आर्थिक कारणों से पूरा इलाज नहीं करा पाते। नकली या घटिया गुणवत्ता वाली दवाएं भी प्रतिरोध बढ़ाने में भूमिका निभाती हैं।
दूसरी ओर वायरल सर्दी-जुकाम या फ्लू जैसी बीमारियों में भी एंटीबायोटिक दी जाती है, जबकि वायरस पर इनका कोई प्रभाव नहीं होता। इससे बैक्टीरिया पर अनावश्यक दबाव पड़ता है और वे तेजी से प्रतिरोध विकसित करते हैं।
पशुपालन और पर्यावरण भी बना रहे हैं सुपरबग्स
एंटीबायोटिक का उपयोग केवल इंसानों के इलाज तक सीमित नहीं है। दुनिया भर में पशुपालन, पोल्ट्री, डेयरी और मत्स्य पालन में भी इनका व्यापक इस्तेमाल होता है। यदि पशुओं को लंबे समय तक नियमित रूप से एंटीबायोटिक दी जाए तो उनके शरीर में भी प्रतिरोधी बैक्टीरिया विकसित हो सकते हैं। ये बैक्टीरिया मांस, दूध, मल, मिट्टी और जल स्रोतों के माध्यम से मनुष्यों तक पहुंच सकते हैं। इसके अलावा अस्पतालों और दवा निर्माण इकाइयों से निकलने वाला अपशिष्ट यदि बिना उपचार के नदियों या भूजल में पहुंचता है तो वह प्रतिरोधी जीनों के प्रसार का माध्यम बन सकता है।
इसीलिए वैज्ञानिक अब वन हेल्थ दृष्टिकोण पर जोर दे रहे हैं। इसका मतलब है कि मनुष्य, पशु और पर्यावरण का स्वास्थ्य एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है। यदि किसी एक क्षेत्र में एंटीबायोटिक का दुरुपयोग होगा तो उसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा।
भारत के लिए चुनौती और भी बड़ी क्यों है?
भारत दुनिया में एंटीबायोटिक का सबसे बड़ा उपभोक्ता देशों में शामिल है। यहां बड़ी आबादी, संक्रामक रोगों का अधिक बोझ, तेजी से बढ़ता शहरीकरण, भीड़भाड़ वाले अस्पताल और कई क्षेत्रों में बिना पर्चे दवा उपलब्ध होना इस समस्या को और जटिल बना देता है। भारत ने पिछले कुछ वर्षों में नेशनल एक्शन प्लान ऑन एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस, अस्पतालों में एंटीबायोटिक स्टीवर्डशिप कार्यक्रम, निगरानी नेटवर्क और दवाओं के जिम्मेदार उपयोग जैसे कदम उठाए हैं। फिर भी विशेषज्ञ मानते हैं कि प्रयोगशालाओं की क्षमता बढ़ाने, संक्रमण नियंत्रण को मजबूत करने और जनजागरूकता फैलाने की अभी भी बड़ी जरूरत है।
नई एंटीबायोटिक बनाना आसान नहीं
पहली नजर में समाधान सरल लगता है, पुरानी दवाएं काम नहीं कर रहीं तो नई दवाएं बना ली जाएं। लेकिन वास्तविकता इससे कहीं कठिन है। नई एंटीबायोटिक विकसित करने में 10 से 15 वर्ष तक लग सकते हैं और अरबों डॉलर का निवेश करना पड़ता है। इसके बाद भी अधिकांश संभावित दवाएं क्लिनिकल परीक्षणों में विफल हो जाती हैं। जो दवा सफल होती है, उसका उपयोग भी सीमित रखना पड़ता है ताकि बैक्टीरिया जल्दी उसके खिलाफ प्रतिरोध विकसित न कर लें। इससे दवा कंपनियों को अपेक्षित आर्थिक लाभ नहीं मिलता और नई एंटीबायोटिक पर निवेश कम होता जा रहा है।
नई उम्मीदें
वैज्ञानिक अब केवल नई एंटीबायोटिक पर निर्भर नहीं हैं। बैक्टीरियोफेज थेरेपी ऐसी तकनीक है जिसमें ऐसे वायरस का उपयोग किया जाता है जो केवल बैक्टीरिया को संक्रमित करते हैं। ये वायरस बैक्टीरिया के भीतर प्रवेश करके उसे नष्ट कर देते हैं, जबकि शरीर की बाकी कोशिकाओं को नुकसान नहीं पहुंचाते। इसी तरह जीन-संपादन तकनीक के जरिए वैज्ञानिक उन जीनों को निशाना बनाने की कोशिश कर रहे हैं जो बैक्टीरिया को दवा-प्रतिरोधी बनाते हैं। एआई भी इस लड़ाई में नई भूमिका निभा रही है। एआई मरीज के लक्षण, स्थानीय प्रतिरोध पैटर्न और जीनोमिक जानकारी का विश्लेषण करके डॉक्टरों को यह सुझाव दे सकती है कि कौन-सी एंटीबायोटिक सबसे प्रभावी होगी। हालांकि इसके लिए मजबूत डेटा और आधुनिक प्रयोगशालाओं की आवश्यकता होगी।
टीके भी हैं सुपरबग्स के खिलाफ मजबूत हथियार
सुपरबग्स से लड़ाई केवल दवा की नहीं है। टीकाकरण भी इसमें बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जब संक्रमण ही नहीं होगा तो एंटीबायोटिक की जरूरत भी कम पड़ेगी। न्यूमोकोकल और कुछ टीकों ने कई देशों में गंभीर संक्रमण और एंटीबायोटिक के उपयोग को कम किया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सुपरबग्स के खिलाफ लड़ाई किसी एक नई दवा से नहीं जीती जा सकती। इसके लिए कई मोर्चों पर एक साथ काम करना होगा।
सही मरीज को सही एंटीबायोटिक सही मात्रा और सही अवधि तक देना होगा। अस्पतालों में संक्रमण नियंत्रण मजबूत करना होगा। स्वच्छ पानी, बेहतर सीवेज व्यवस्था, हाथों की सफाई, टीकाकरण और आधुनिक जांच सुविधाओं का विस्तार करना होगा। पशुपालन और कृषि में एंटीबायोटिक के अनियंत्रित उपयोग पर भी प्रभावी नियंत्रण जरूरी होगा।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि एंटीबायोटिक को एक असीमित संसाधन नहीं, बल्कि मानवता की साझा विरासत समझना होगा। हर अनावश्यक खुराक भविष्य के किसी मरीज के इलाज का विकल्प कम कर सकती है।


