Superbug Treatment: सुपरबग्स के खिलाफ बड़ी सफलता, पुरानी एंटीबायोटिक दवाओं को मिली नई जिंदगी

Superbug Treatment: अमेरिकी वैज्ञानिकों ने ऐसी नई तकनीक विकसित की है जिससे पुरानी एंटीबायोटिक दवाएं फिर से प्रभावी बन सकती हैं। जानिए Superbugs, Antibiotic Resistance और इस मेडिकल ब्रेकथ्रू की पूरी कहानी।

Yogesh Mishra
Published on: 31 July 2026 6:23 PM IST
Superbugs Antibiotic Resistance Technology
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Superbugs Antibiotic Resistance Technology

Superbug Treatment: एंटीबायोटिक दवाओं ने पिछले सौ वर्षों में करोड़ों लोगों की जान बचाई है, लेकिन अब यही दवाएं दुनिया के सबसे बड़े स्वास्थ्य संकटों में से एक - एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) - के सामने कमजोर पड़ती जा रही हैं। बैक्टीरिया लगातार खुद को बदल रहे हैं और कई दवाओं के प्रति प्रतिरोधी बन चुके हैं। ऐसे बैक्टीरिया को आम भाषा में सुपरबग्स कहा जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन लंबे समय से चेतावनी देता रहा है कि अगर इस समस्या पर समय रहते काबू नहीं पाया गया, तो मामूली इन्फेक्शन भी भविष्य में जानलेवा साबित हो सकते हैं।

इसी बीच अमेरिका के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी खोज की है जिसने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है। इस बार वैज्ञानिकों ने नई एंटीबायोटिक दवा बनाने की बजाय ऐसी तकनीक विकसित की है, जिससे कई पुरानी और लगभग बेअसर हो चुकी एंटीबायोटिक दवाएं फिर से प्रभावी बन सकती हैं। यदि यह तकनीक मानव परीक्षणों में भी सफल रहती है, तो चिकित्सा विज्ञान के लिए यह पिछले कई दशकों की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक मानी जाएगी।

किसने की यह महत्वपूर्ण खोज?

यह शोध अमेरिका के यूनिवर्सिटी ऑफ़ नार्थ कैरोलिना चैपल हिल और पेनसेल्वेनिया स्टेट यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों की जॉइंट टीम ने किया है। शोधकर्ताओं ने लगभग सात से आठ वर्षों तक बैक्टीरिया के प्रतिरोधी तंत्र का गहन अध्ययन किया। उनका उद्देश्य यह समझना था कि आखिर बैक्टीरिया दवाओं को निष्क्रिय कैसे कर देते हैं और क्या उस प्रक्रिया को रोका जा सकता है।

शोध के दौरान वैज्ञानिकों ने बैक्टीरिया की उन जैव रासायनिक प्रक्रियाओं की पहचान की, जिनकी मदद से वे एंटीबायोटिक दवाओं से बच निकलते हैं। इन्हीं प्रक्रियाओं को लक्ष्य बनाकर उन्होंने एक नया रेजिस्टेंस ब्रेकर अणु विकसित किया।

सुपरबग्स कैसे बनते हैं?

जब किसी व्यक्ति को बार-बार या बिना आवश्यकता के एंटीबायोटिक दवाएं दी जाती हैं, या मरीज डॉक्टर द्वारा निर्धारित पूरा कोर्स नहीं करता, तो कुछ बैक्टीरिया जीवित बच जाते हैं। यही बैक्टीरिया समय के साथ अपने जीन में बदलाव करके दवाओं के प्रति प्रतिरोधी बन जाते हैं। धीरे-धीरे यही प्रतिरोधी बैक्टीरिया फैलने लगते हैं और सामान्य एंटीबायोटिक्स उन पर असर करना बंद कर देती हैं। यही स्थिति सुपरबग्स कहलाती है। आज अस्पतालों में निमोनिया, यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन, सेप्सिस, टीबी और कई अन्य गंभीर संक्रमणों के इलाज में यही सबसे बड़ी चुनौती बन चुकी है।

कैसे काम करती है नई तकनीक?

सुपरबग्स सामान्यतः दो प्रमुख तरीकों से एंटीबायोटिक दवाओं से बचते हैं। पहला, वे अपनी कोशिका की बाहरी दीवार को इतना मजबूत बना लेते हैं कि दवा अंदर प्रवेश ही नहीं कर पाती। दूसरा, यदि दवा कोशिका के भीतर पहुंच भी जाए तो बैक्टीरिया ‘एफ्लक्स पंप’ नामक विशेष प्रोटीन की मदद से उसे तुरंत बाहर निकाल देते हैं। अमेरिकी वैज्ञानिकों द्वारा विकसित नया सहायक अणु इसी दूसरे तंत्र को निष्क्रिय करता है। यह अणु बैक्टीरिया के उस जैविक सिग्नलिंग सिस्टम को ब्लॉक कर देता है, जो एफ्लक्स पंप को सक्रिय करता है। जैसे ही यह पंप बंद होता है, पुरानी एंटीबायोटिक दवाएं बैक्टीरिया के भीतर पर्याप्त मात्रा में पहुंच जाती हैं और उन्हें नष्ट कर देती हैं। सरल भाषा में समझें तो वैज्ञानिकों ने दवा को नहीं बदला, बल्कि बैक्टीरिया की सुरक्षा व्यवस्था को निष्क्रिय कर दिया।

पुरानी दवाओं को मिलेगी नई जिंदगी


इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि डॉक्टरों को पूरी तरह नई एंटीबायोटिक विकसित करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। ऐसी दवाएं जो वर्षों से प्रतिरोध के कारण कम प्रभावी हो गई थीं, वे दोबारा उपयोग में लाई जा सकेंगी। इससे पेनिसिलिन, टेट्रासाइक्लिन और अन्य कई पारंपरिक एंटीबायोटिक्स की उपयोगिता बढ़ सकती है। इससे स्वास्थ्य सेवाओं की लागत भी कम होगी क्योंकि नई दवा विकसित करने की तुलना में पुरानी दवाओं को पुनः प्रभावी बनाना कहीं अधिक सस्ता और तेज़ होगा।

नई एंटीबायोटिक बनाना कठिन

एक बिल्कुल नई एंटीबायोटिक विकसित करने में सामान्यतः 10 से 15 वर्ष का समय लगता है। इस प्रक्रिया में अरबों डॉलर खर्च होते हैं और हजारों संभावित रासायनिक यौगिकों का परीक्षण किया जाता है। इनमें से अधिकांश क्लिनिकल ट्रायल के दौरान असफल हो जाते हैं। दूसरी ओर, यदि पहले से स्वीकृत दवाओं के साथ सहायक अणु जोड़कर उन्हें दोबारा प्रभावी बनाया जा सके, तो नई दवा विकसित करने की तुलना में समय, धन और संसाधनों, तीनों की बड़ी बचत होगी।

पूरी दुनिया के लिए खतरा


विश्व स्वास्थ्य संगठन एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस को वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य के सबसे गंभीर संकटों में शामिल करता है। वैज्ञानिक अनुमानों के अनुसार यदि यह समस्या इसी गति से बढ़ती रही, तो आने वाले वर्षों में कैंसर, हृदय शल्य चिकित्सा, अंग प्रत्यारोपण और सामान्य ऑपरेशन तक जोखिम भरे हो जाएंगे क्योंकि संक्रमणों के इलाज के लिए प्रभावी एंटीबायोटिक्स उपलब्ध नहीं होंगी। सुपरबग्स के कारण अस्पतालों में भर्ती मरीजों की मृत्यु दर बढ़ सकती है और स्वास्थ्य प्रणालियों पर आर्थिक बोझ भी कई गुना बढ़ जाएगा।

भारत के लिए महत्वपूर्ण है यह खोज

भारत दुनिया में एंटीबायोटिक दवाओं के सबसे बड़े उपभोक्ताओं और उत्पादकों में शामिल है। देश में बिना डाक्टरी सलाह के एंटीबायोटिक लेने, अधूरा उपचार करने और पशुपालन में एंटीबायोटिक के अत्यधिक उपयोग जैसी समस्याएं सुपरबग्स की स्थिति को बढ़ावा देती हैं। भारत सरकार ने राष्ट्रीय एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस कार्ययोजना लागू की है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि नई वैज्ञानिक तकनीकों के साथ-साथ एंटीबायोटिक के विवेकपूर्ण उपयोग पर भी बराबर ध्यान देना आवश्यक है। अगर अमेरिकी तकनीक सफल रहती है, तो भारत जैसे देशों में इसका लाभ विशेष रूप से अधिक हो सकता है क्योंकि यहां पुरानी एंटीबायोटिक दवाओं का व्यापक उपयोग पहले से होता रहा है।

क्लिनिकल ट्रायल में क्या परिणाम मिले?

शोधकर्ताओं ने अभी तक इस तकनीक का परीक्षण प्रयोगशाला और पशु मॉडल पर किया है। इन शुरुआती अध्ययनों में पाया गया कि सहायक अणु के साथ उपयोग की गई पुरानी एंटीबायोटिक दवाएं कई प्रतिरोधी बैक्टीरिया के खिलाफ पहले की तुलना में लगभग 100 गुना अधिक प्रभावी साबित हुईं। हालांकि वैज्ञानिकों का कहना है कि यह अभी प्रारंभिक चरण है और वास्तविक प्रभाव का आकलन मानव परीक्षणों के बाद ही किया जा सकेगा।

अगला चरण मानवों पर क्लिनिकल ट्रायल का है। इस दौरान वैज्ञानिक यह जांचेंगे कि यह तकनीक पूरी तरह सुरक्षित है या नहीं, इसके दुष्प्रभाव कितने हैं और विभिन्न प्रकार के संक्रमणों में इसकी प्रभावशीलता कितनी रहती है। यदि मानव परीक्षण सफल रहते हैं और नियामक संस्थाओं से मंजूरी मिल जाती है, तो अगले कुछ वर्षों में अस्पतालों में पुरानी एंटीबायोटिक दवाओं के साथ इस "रेजिस्टेंस ब्रेकर" तकनीक का इस्तेमाल शुरू हो सकता है।

चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में केवल नई दवाएं बनाना ही समाधान नहीं होगा, बल्कि उपलब्ध दवाओं को अधिक प्रभावी बनाना भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा। अमेरिकी वैज्ञानिकों की यह खोज इसी दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है। यदि यह तकनीक व्यापक स्तर पर सफल साबित होती है, तो यह न केवल सुपरबग्स के बढ़ते खतरे को कम करने में मदद करेगी, बल्कि दुनिया भर के स्वास्थ्य तंत्र पर बढ़ते आर्थिक बोझ को भी घटा सकती है।

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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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