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Cancer Medicine Price: ₹2,700 की कैंसर दवा पर ₹27,000 MRP, सुप्रीम कोर्ट ने कहा- यह दिनदहाड़े डकैती जैसी स्थिति
Cancer Medicine Price: ₹2,700 की कैंसर दवा पर ₹27,000 MRP के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दवा कीमतों और मार्जिन पर गंभीर सवाल उठाए। कोर्ट 29 सितंबर को मामले की अगली सुनवाई करेगा।
Cancer Medicine Price (Image Credit-Social Media)
नई दिल्ली। कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीज की मजबूरी का बाजार कितना बड़ा फायदा उठा सकता है, इसका एक उदाहरण मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट के सामने आया तो पीठ ने बेहद कड़े शब्दों में नाराजगी जताई। अदालत को बताया गया कि कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली एक जरूरी दवा का खुदरा विक्रेता मूल्य करीब ₹2,700 था, जबकि उसी दवा पर अधिकतम खुदरा मूल्य ₹27,000 छपा था। यानी दोनों कीमतों में करीब दस गुना अंतर। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने इसे मरीजों के साथ ‘दिनदहाड़े डकैती’ जैसी स्थिति बताते हुए सवाल किया कि जब निर्माता दवा को खुदरा विक्रेता तक ₹2,700 में पहुंचा रहा है तो मरीज के लिए ₹27,000 का एमआरपी क्यों रखा गया है। अदालत ने यह भी कहा कि गंभीर बीमारियों के इलाज और दवाओं के लिए लोग अपने घर और गहने तक बेचने को मजबूर होते हैं, ऐसे में दवाओं की कीमत में इतनी बड़ी असमानता को सामान्य व्यापारिक लाभ मानकर नहीं छोड़ा जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी केवल किसी एक कैंसर दवा की कीमत को लेकर नहीं है। अदालत के सामने दो याचिकाओं के माध्यम से देश की पूरी दवा मूल्य निर्धारण व्यवस्था, मूल्य नियंत्रण से बाहर की दवाओं की शुरुआती कीमत तय करने की प्रणाली, अस्पतालों और खुदरा विक्रेताओं के मार्जिन, जेनेरिक दवाओं के पर्चे और चिकित्सा उपकरणों की कीमतों जैसे व्यापक मुद्दे उठाए गए हैं। पीठ ने सुनवाई के दौरान यहां तक संकेत दिया कि यदि दवाओं को प्रभावी मूल्य नियंत्रण व्यवस्था के भीतर लाया जाए तो मरीज के सामने ब्रांडेड और जेनेरिक दवा के बीच भारी मूल्य अंतर की समस्या काफी हद तक कम की जा सकती है। मामले की अगली सुनवाई 29 सितंबर 2026 को होगी।
आखिर ₹2,700 की दवा ₹27,000 की कैसे?
इस पूरे विवाद को समझने के लिए PTR यानी ‘प्राइस टू रिटेलर’ और MRP यानी अधिकतम खुदरा मूल्य का अंतर समझना जरूरी है। PTR वह कीमत है जिस पर दवा खुदरा विक्रेता तक पहुंचती है, जबकि MRP वह अधिकतम राशि है जो पैकेट पर उपभोक्ता के लिए छापी जाती है। अदालत के सामने रखे गए उदाहरण में किसी जरूरी कैंसर दवा का PTR करीब ₹2,700 और MRP ₹27,000 बताया गया। इसका अर्थ यह नहीं है कि हर मरीज से हमेशा पूरे ₹27,000 ही लिए गए या पूरे ₹24,300 का अंतर अकेले खुदरा दुकानदार की जेब में गया। निर्माता, वितरक, स्टॉकिस्ट, अस्पताल और खुदरा विक्रेता की मूल्य शृंखला अलग-अलग हो सकती है। लेकिन अदालत की मूल चिंता यह थी कि जब दवा खुदरा स्तर तक MRP के लगभग दसवें हिस्से में पहुंच रही है तो निर्माता द्वारा निर्धारित अधिकतम मूल्य इतना ऊंचा रखने का औचित्य क्या है।
इसी बिंदु पर भारतीय फार्मास्युटिकल एलायंस की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने अदालत के सामने कहा कि दवा कंपनियां स्वयं पूरा विशाल अंतर लाभ के रूप में नहीं रख रही हैं और वास्तविक प्रश्न यह भी है कि दवा स्टॉकिस्ट तथा खुदरा विक्रेता तक किस कीमत में पहुंचती है और बाद में किस स्तर पर कितना मार्जिन जुड़ता है। पीठ ने इस पर ध्यान दिलाया कि MRP आखिरकार निर्माता ही निर्धारित करता है। यानी अदालत अब केवल दुकानदार के मार्जिन को नहीं बल्कि निर्माता से मरीज तक पूरी मूल्य शृंखला को देख रही है।
सभी दवाओं की कीमत सरकार तय नहीं करती
भारत में यह आम धारणा है कि सरकार हर दवा की अधिकतम कीमत नियंत्रित करती है, लेकिन वास्तविक व्यवस्था इससे अलग है। Drugs (Prices Control) Order, 2013 यानी DPCO के तहत राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) अनुसूची में शामिल दवाओं के लिए अधिकतम मूल्य निर्धारित करता है। मूल्य नियंत्रण का मूल उद्देश्य आवश्यक दवाओं की उपलब्धता उचित कीमत पर सुनिश्चित करना है। लेकिन बाजार में उपलब्ध प्रत्येक दवा का शुरुआती मूल्य इसी तरह सरकार तय नहीं करती।
याचिकाकर्ता किशन चंद जैन ने अदालत में कहा कि लगभग 82 प्रतिशत दवाएं गैर-अनुसूचित श्रेणी में आती हैं और उनके शुरुआती मूल्य निर्धारण पर वैसा नियंत्रण नहीं है जैसा अनुसूचित दवाओं पर है। गैर-अनुसूचित दवा के मामले में निर्माता द्वारा तय प्रारंभिक कीमत बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है। याचिकाकर्ता की दलील है कि यदि शुरुआत में ही MRP बहुत ऊंची रख दी गई तो बाद में मूल्य वृद्धि की सीमा होना मरीज को उस मूल ऊंची कीमत से राहत नहीं देता। यही वह नियामकीय खाली जगह है जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर सवाल उठाए हैं।
एक दिलचस्प उदाहरण—एक दवा ₹214, उसी में एस्पिरिन जुड़ी तो ₹70
सुनवाई के दौरान अदालत ने मूल्य नियंत्रण की मौजूदा संरचना में दिखाई देने वाली एक दिलचस्प विसंगति की ओर भी ध्यान दिलाया। जस्टिस संदीप मेहता ने ‘Rosuvas’ का उदाहरण देते हुए कहा कि इसकी एक स्ट्रिप की कीमत करीब ₹214 बताई गई क्योंकि वह संबंधित रूप में मूल्य नियंत्रण वाली अनुसूची से बाहर है, जबकि एस्पिरिन के साथ उसका संयोजन अनुसूचित श्रेणी में आने पर करीब ₹70 में उपलब्ध है। सामान्य समझ के अनुसार दो सक्रिय दवाओं वाला संयोजन अधिक महंगा हो सकता है, लेकिन यहां उलटी स्थिति दिखाई दे रही थी। अदालत ने इसी उदाहरण से पूछा कि मूल्य नियंत्रण के भीतर और बाहर की दवाओं के बीच ऐसी असमानता क्यों बनी हुई है।
यहां यह ध्यान रखना जरूरी है कि अलग-अलग ब्रांड, शक्ति, खुराक और पैक आकार के आधार पर किसी दवा की कीमत अलग हो सकती है। इसलिए ₹214 और ₹70 को हर रोसुवास्टेटिन उत्पाद पर लागू सामान्य बाजार कीमत नहीं माना जाना चाहिए। अदालत ने इसे मौजूदा मूल्य निर्धारण ढांचे से उत्पन्न विसंगति समझाने वाले उदाहरण के रूप में इस्तेमाल किया।
‘लोग घर और गहने बेचते हैं, यह जबरन वसूली नहीं तो क्या है?’
अदालत की सबसे कठोर टिप्पणी मरीजों की मजबूरी को लेकर आई। पीठ ने कहा कि जीवनरक्षक दवा खरीदने वाला व्यक्ति सामान्य ग्राहक की तरह मोलभाव करने की स्थिति में नहीं होता। कैंसर या किसी दूसरी गंभीर बीमारी में मरीज के परिजन तत्काल दवा चाहते हैं और उनके पास अलग-अलग दुकानों पर जाकर कीमतों की तुलना करने का समय या विकल्प नहीं हो सकता। अदालत ने इसी संदर्भ में कहा कि लोग इलाज के लिए घर और आभूषण तक बेच देते हैं और यदि ऐसी परिस्थिति में अत्यधिक कीमत ली जाती है तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि यह ‘जबरन वसूली’ नहीं तो क्या है।
यह स्वास्थ्य बाजार और सामान्य उपभोक्ता बाजार के बीच बुनियादी अंतर भी सामने लाता है। मोबाइल फोन या टेलीविजन महंगा लगे तो उपभोक्ता उसकी खरीद टाल सकता है, लेकिन कैंसर की दवा के मामले में मरीज के पास ऐसा विकल्प नहीं होता। चिकित्सक द्वारा तत्काल दवा की जरूरत बताए जाने के बाद मूल्य तुलना की उसकी क्षमता सीमित हो जाती है। अस्पताल में भर्ती मरीज के लिए यह समस्या और गंभीर हो सकती है यदि उसे अस्पताल की अपनी फार्मेसी से ही दवा खरीदनी पड़े।
निजी अस्पतालों की फार्मेसी भी अदालत की नजर में
याचिकाओं में आरोप लगाया गया है कि कुछ निजी अस्पताल मरीजों को बाहर से सस्ती दवा खरीदने का विकल्प नहीं देते और अपनी फार्मेसी से ही दवा लेने के लिए बाध्य करते हैं। ऐसी स्थिति में यदि अस्पताल को दवा भारी छूट पर मिलती है और मरीज से पूरा MRP लिया जाता है तो अंतर बहुत बड़ा हो सकता है। ये आरोप अभी न्यायिक परीक्षण के अधीन हैं और इन्हें पूरे निजी अस्पताल क्षेत्र पर लागू तथ्य नहीं माना जा सकता, लेकिन अदालत ने इस व्यापारिक मॉडल से उत्पन्न संभावित समस्या को गंभीरता से लिया है।
याचिकाकर्ताओं ने अदालत के सामने एक और उदाहरण दिया जिसमें ₹4,196 MRP वाली दवा करीब ₹980 में उपलब्ध होने की बात कही गई। एक एंटीबायोटिक के मामले में MRP और वास्तविक बिक्री मूल्य के बीच अत्यधिक अंतर का भी दावा किया गया। इन उदाहरणों के जरिए याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि बहुत ऊंची MRP रखने से अस्पताल और खुदरा विक्रेता को असाधारण मार्जिन की गुंजाइश मिलती है। इन विशिष्ट उदाहरणों और प्रतिशतों को अदालत का अंतिम तथ्यात्मक निष्कर्ष नहीं बल्कि याचिकाकर्ताओं द्वारा प्रस्तुत सामग्री के रूप में देखना चाहिए।
आयुष्मान में महंगी दवा तो नुकसान केवल मरीज का नहीं, करदाता का भी
सुप्रीम कोर्ट ने दवाओं की ऊंची कीमत का एक ऐसा पहलू भी उठाया जो सीधे सरकारी खजाने से जुड़ता है। अदालत ने कहा कि जब मरीज का इलाज आयुष्मान भारत जैसी सरकारी योजना के अंतर्गत होता है और अस्पताल ऊंची कीमत पर दवा दिखाकर उसकी प्रतिपूर्ति लेता है तो पैसा अंततः करदाताओं का जाता है। यानी मूल्य निर्धारण में असामान्य अंतर केवल व्यक्तिगत मरीज की आर्थिक समस्या नहीं रह जाता, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य योजनाओं के खर्च को भी प्रभावित कर सकता है। अदालत ने ऐसे संभावित दुरुपयोग को गंभीर बताते हुए कहा कि सरकार द्वारा भुगतान किया जाने वाला पैसा आखिर जनता का पैसा है।
हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि आयुष्मान भारत के तहत होने वाली प्रत्येक दवा खरीद में ऐसा हो रहा है। अदालत ने उस जोखिम और संभावित व्यवस्था की ओर संकेत किया है जिसमें खरीद कीमत और प्रतिपूर्ति में बड़ा अंतर सार्वजनिक धन पर बोझ डाल सकता है। किसी विशिष्ट अस्पताल या दवा के मामले में वास्तविक अनुचित प्रतिपूर्ति साबित करने के लिए खरीद बिल, पैकेज दर और दावा रिकॉर्ड की जांच जरूरी होगी।
सरकार से कोर्ट का सवाल—जिम्मेदार अधिकारी चुप क्यों?
पीठ ने मूल्य अंतर से जितनी नाराजगी दिखाई, उतनी ही चिंता नियामक संस्थाओं की भूमिका को लेकर भी जताई। जस्टिस मेहता ने कहा कि हैरानी की बात है कि जिन अधिकारियों को इस विषय पर निर्णय लेना चाहिए वे चुप हैं। केंद्र की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज ने अदालत को बताया कि सरकार इस मामले को विरोधी मुकदमे के रूप में नहीं देख रही और जहां व्यवस्था सुधारने की गुंजाइश होगी वहां सुधार पर विचार किया जाएगा। उन्होंने सरकार की जन औषधि योजना का उल्लेख करते हुए कहा कि उद्देश्य दवा को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना है।
अदालत ने इसके बाद महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया—यदि मरीज को जिस दवा की जरूरत है वह जन औषधि केंद्र पर उपलब्ध ही नहीं है तो वह कहां जाएगा? याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि भारत का कुल दवा बाजार करीब ₹2.5 लाख करोड़ का है, जबकि जन औषधि केंद्रों की बिक्री उसका बहुत छोटा हिस्सा है। ये बाजार आकार संबंधी आंकड़े याचिकाकर्ता द्वारा अदालत के सामने रखे गए हैं, इसलिए इन्हें सरकारी अंतिम आंकड़ा नहीं माना जाना चाहिए। लेकिन अदालत का मूल प्रश्न महत्वपूर्ण है कि सस्ती जेनेरिक दवाओं का विकल्प तभी प्रभावी होगा जब मरीज की आवश्यक दवा वहां उपलब्ध हो।
क्या अब हर दवा मूल्य नियंत्रण में आ जाएगी?
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि देश की सभी दवाओं पर तत्काल सरकारी मूल्य सीमा लागू होने वाली है। अदालत ने अभी कोई ऐसा अंतिम आदेश नहीं दिया है। सुनवाई के दौरान पीठ ने व्यापक मूल्य नियंत्रण की संभावना और आवश्यकता पर विचार रखा है। अगली सुनवाई में केंद्र सरकार, फार्मा उद्योग और याचिकाकर्ताओं की दलीलें आगे सुनी जानी हैं। इसलिए फिलहाल इसे नीतिगत दिशा पर सुप्रीम कोर्ट की गंभीर चिंता और विचार माना जाना चाहिए, अंतिम नई मूल्य व्यवस्था नहीं।
यदि सभी दवाओं की शुरुआती कीमत या व्यापार मार्जिन पर किसी रूप में नियंत्रण लाया जाता है तो उसके व्यापक प्रभाव होंगे। एक तरफ मरीजों को अत्यधिक MRP और असामान्य मार्जिन से राहत मिल सकती है, दूसरी तरफ सरकार को नई दवा के अनुसंधान, उत्पादन लागत, आयातित दवाओं, छोटे बाजार वाली दुर्लभ बीमारियों की दवाओं और दवा उपलब्धता जैसे पहलुओं को भी संतुलित करना होगा। यही कारण है कि मूल्य नियंत्रण केवल अधिकतम कीमत लिख देने का प्रश्न नहीं बल्कि पूरी फार्मास्युटिकल आपूर्ति व्यवस्था से जुड़ा विषय है।


