Thai Mangur Fish: 360 क्विंटल मछली जब्त, 8 फीट गड्ढे में क्यों दफनाई?

Thai Mangur Fish पर भारत में प्रतिबंध क्यों है? नागपुर में 360 क्विंटल मछली जब्त कर नष्ट की गई। जानें थाई मांगुर के खतरे, नियम और देशी मांगुर से अंतर।

Jyotsana Singh
Published on: 22 Aug 2026 3:11 PM IST
Thai Mangur Fish: Why Was 36 Tonnes of This Banned Fish Buried?
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Thai Mangur Fish: Why Was 36 Tonnes of This Banned Fish Buried?

Thai Mangur Fish: भारत में मत्स्य पालन लाखों परिवारों के लिए रोजगार और आजीविका का बड़ा जरिया है। गांवों से लेकर शहरों तक बड़ी संख्या में लोग मछली पालन, बिक्री और इससे जुड़े कारोबार के जरिए अपना घर चलाते हैं। लेकिन मछली पालन के इस कारोबार के बीच कुछ ऐसी विदेशी प्रजातियां भी हैं, जिनका पालन और कारोबार भारत में पूरी तरह प्रतिबंधित है। इन्हीं में से एक है थाई मांगुर, जिसे पर्यावरण और देशी जलीय पारिस्थितिकी तंत्र के लिए खतरा माना जाता है।नागपुर में प्रतिबंधित थाई मांगुर के खिलाफ प्रशासन ने बड़ी कार्रवाई की है। पारशिवनी तहसील के चिंचोली (महादुला) इलाके में संयुक्त टीम ने करीब 36 टन यानी 360 क्विंटल थाई मांगुर जब्त की। इसकी अनुमानित कीमत 32.40 लाख रुपये बताई गई है। कार्रवाई के दौरान जब्त मछलियों को 8 फीट गहरे गड्ढे में नष्ट किया गया। वहीं थाई मांगुर के अलावा बिगहेड कार्प जैसी कुछ विदेशी मछली प्रजातियों के पालन पर भी भारत में प्रतिबंध लगाया गया है। वहीं नाइल तिलापिया, कॉमन कार्प और सकरमाउथ आर्मर्ड कैटफिश जैसी कई विदेशी प्रजातियों को ICAR ने भारत के मीठे पानी के पारिस्थितिकी तंत्र के लिए आक्रामक प्रजातियों के तौर पर चिन्हित किया है। सवाल यह है कि आखिर थाई मांगुर को भारत में इतना बड़ा पर्यावरणीय खतरा क्यों माना जाता है कि इसके पालन, प्रजनन और कारोबार पर रोक लगा दी गई है?

नागपुर के चिंचोली इलाके में हुई इस कार्रवाई में मत्स्य व्यवसाय विभाग, पारशिवनी पुलिस, महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (MPCB), महावितरण (MSEDCL) और स्थानीय निकाय से जुड़े अधिकारियों ने संयुक्त रूप से हिस्सा लिया। अधिकारियों के मुताबिक, तालाब से बरामद की गई मछली प्रतिबंधित विदेशी प्रजाति Clarias gariepinus यानी एक्सोटिक/थाई मांगुर थी। जब्त स्टॉक को मौके पर ही नष्ट करने की कार्रवाई की गई।

थाई मांगुर क्या है और इसका इस्तेमाल किस लिए होता है?

थाई मांगुर को आम तौर पर अफ्रीकन कैट फिश (African catfish) भी कहा जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम क्लेरियस गैरीपिनस (Clarias gariepinus) है। यह मूल रूप से अफ्रीकी क्षेत्र की मछली है और भारत की देशी प्रजाति नहीं है। इसे कई जगहों पर ‘थाई मांगुर’ नाम से जाना जाता है, वहीं इसके नाम को लेकर भ्रम की स्थिति भी रहती है। असल में भारत की देशी इंडियन मांगुर को प्रतिबंधित थाई मांगुर से अलग माना जाता है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने भी अपने आदेशों में Clarias batrachus को भारतीय कैटफिश और Clarias gariepinus को प्रतिबंधित विदेशी कैटफिश के तौर पर अलग-अलग माना है।

थाई मांगुर को मछली पालन में इसलिए आकर्षक माना गया क्योंकि यह तेजी से बढ़ती है, कठिन परिस्थितियों में भी जीवित रह सकती है और कम गुणवत्ता वाले पानी में भी लंबे समय तक टिकने की क्षमता रखती है। यही गुण अवैध मछली पालन करने वालों के लिए इसे फायदे का सौदा बनाते हैं। इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से मछली पालन और खाद्य मछली के रूप में बिक्री के लिए किया जाता रहा है।

क्यों खतरनाक है थाई मांगुर?

इस मछली को लेकर सबसे बड़ी चिंता केवल इंसानी भोजन नहीं, बल्कि इसका जलीय पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रभाव है। थाई मांगुर एक विदेशी और शिकारी प्रवृत्ति वाली प्रजाति है। यदि यह तालाब, नदी या प्राकृतिक जलस्रोत में पहुंच जाए तो छोटी मछलियों और दूसरे जलीय जीवों को अपना भोजन बनाकर पारिस्थितिकी तंत्र पर दबाव बढ़ा सकती है।

भारत सरकार की ओर से गठित राष्ट्रीय समिति ने विदेशी जलीय प्रजातियों के देश में प्रवेश और उनके प्रसार के संभावित पारिस्थितिक और आर्थिक प्रभावों का आकलन करने की व्यवस्था की है। 2026 में NGT के सामने रखे गए सरकारी रिकॉर्ड में भी कहा गया कि Clarias gariepinus की खेती को 1997 में प्रतिबंधित किया गया था और बाद में 2013 तथा 2019 में भी विदेशी मांगुर पर प्रतिबंध की पुष्टि की गई। क्योंकि इन्हें देशी पारिस्थितिकी तंत्र और एक्वाकल्चर के लिए खतरा माना गया।

भारत में कब लगा था प्रतिबंध?

थाई मांगुर यानी क्लेरियस गैरीपिनस की खेती पर रोक कोई नया फैसला नहीं है। NGT में पेश सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, इसकी खेती को 19 दिसंबर 1997 के पत्र के जरिए प्रतिबंधित किया गया था। इसके बाद 10 जनवरी 2013 और 20 फरवरी 2019 के आदेशों के जरिए विदेशी मांगुर/कैटफिश पर प्रतिबंध को फिर स्पष्ट किया गया। बाद में इस मामले में NGT ने भी सख्त रुख अपनाया। अप्रैल 2024 के एक आदेश में अधिकरण ने साफ कहा कि Clarias gariepinus और इसके हाइब्रिड का प्रजनन और पालन सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में प्रतिबंधित है। मौजूदा स्टॉक की पहचान कर उसे नष्ट करने के लिए जिला प्रशासन को कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया। दिसंबर 2024 में NGT ने इस मामले से जुड़े एक अन्य आदेश में भी स्पष्ट किया कि प्रतिबंधित एक्सोटिक मांगुर की पहचान के बाद उसे नष्ट किया जाना है और कैटफिश पालकों को मछली के बीज केवल राज्य मत्स्य विभाग या अधिकृत एजेंसियों से लेने चाहिए।

क्या थाई मांगुर खाने से कैंसर होता है?

थाई मांगुर को लेकर सोशल मीडिया और कई रिपोर्टों में इसे सीधे कैंसर से जोड़ने वाले दावे किए जाते हैं। हर थाई मांगुर खाने से कैंसर होता है। ऐसी सीधी वजह-नतीजे वाली बात के लिए ठोस वैज्ञानिक प्रमाण अभी तक सामने नहीं आए हैं।

असल में चिंता यह है कि यह मछली अक्सर ऐसे अवैध या अस्वच्छ तालाबों में पाली जाती है जहां पानी की गुणवत्ता और फीड पर पर्याप्त निगरानी नहीं होती। ऐसे वातावरण में पाली गई मछलियों में प्रदूषक या भारी धातुओं का जोखिम स्वास्थ्य के लिए हानिकारक साबित हो सकता है। थाई मांगुर पर प्रतिबंध का सबसे मजबूत आधिकारिक आधार विदेशी प्रजाति होने के कारण जैव-विविधता और देशी जलीय पारिस्थितिकी तंत्र को संभावित नुकसान है।

देशी मांगुर और थाई मांगुर में अंतर

इस मामले में सबसे ज्यादा भ्रम ‘मांगुर’ नाम को लेकर होता है। NGT ने अपने आदेशों में स्पष्ट किया है कि भारत की Indian catfish यानी Clarias batrachus और प्रतिबंधित Exotic catfish यानी Clarias gariepinus एक ही चीज नहीं हैं। भारतीय मांगुर की वैधता और विदेशी थाई मांगुर के प्रतिबंध को आपस में मिलाना गलत होगा।

यही वजह है कि अधिकारियों को कार्रवाई के दौरान मछली की सही पहचान पर जोर देना होता है। NGT ने भी प्रतिबंधित प्रजाति की पहचान के लिए मत्स्य विभाग की निरीक्षण टीमों के गठन का निर्देश दिया है।

36 टन मछली को दफनाने की कार्रवाई क्यों?

इस तरह की कार्रवाई का मकसद सिर्फ अवैध कारोबार रोकना नहीं है। यदि प्रतिबंधित विदेशी मछली को जीवित छोड़ दिया जाए और वह किसी प्राकृतिक जलस्रोत में पहुंच जाए, तो उसके फैलने और स्थानीय प्रजातियों को प्रभावित करने का खतरा पैदा हो सकता है। इसलिए जब्त स्टॉक का सुरक्षित निपटान कार्रवाई का अहम हिस्सा बन जाता है। नागपुर की यह कार्रवाई इसी बड़े पर्यावरणीय खतरे से सुरक्षा का एक पहलू है।

360 क्विंटल मछली की जब्ती से यह भी साफ है कि प्रतिबंध के बावजूद विदेशी मांगुर का अवैध पालन पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। ऐसे में प्रशासन के सामने चुनौती सिर्फ तालाबों पर छापा मारने की नहीं, बल्कि प्रतिबंधित प्रजाति की पहचान, अवैध बीज की आपूर्ति और उसके बाजार तक पहुंचने की पूरी श्रृंखला पर निगरानी रखने की भी है।

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Jyotsana Singh is an Tech/Auto and Tourism Desk Content Writer at Newstrack.com.

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