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Thalassemia: बच्चों को कैसे जकड़ लेती है यह जेनेटिक बीमारी? जानें लक्षण, खतरे और बचाव के तरीके
Thalassemia: स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर जांच और सही जानकारी के जरिए इस बीमारी को काफी हद तक रोका जा सकता है।
Thalassemia
Thalassemia: थैलेसीमिया एक गंभीर आनुवंशिक (जेनेटिक) रक्त विकार है, जो माता-पिता से बच्चों में जीन के माध्यम से पहुंचता है। भारत में हर साल हजारों बच्चे इस बीमारी के साथ जन्म लेते हैं, लेकिन जागरूकता की कमी के कारण कई परिवार समय रहते इसकी पहचान नहीं कर पाते। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर जांच और सही जानकारी के जरिए इस बीमारी को काफी हद तक रोका जा सकता है।
क्या है Thalassemia ?
थैलेसीमिया एक ऐसी बीमारी है जिसमें शरीर पर्याप्त मात्रा में स्वस्थ हीमोग्लोबिन नहीं बना पाता। हीमोग्लोबिन लाल रक्त कोशिकाओं का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है, जो पूरे शरीर में ऑक्सीजन पहुंचाने का काम करता है। जब इसकी कमी होती है तो शरीर में खून की कमी (एनीमिया) होने लगती है और मरीज को कई स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, दुनिया भर में बड़ी संख्या में लोग थैलेसीमिया जीन के कैरियर हैं। कई मामलों में कैरियर व्यक्ति पूरी तरह स्वस्थ दिखाई देता है, लेकिन वह यह जीन अपनी आने वाली पीढ़ियों को दे सकता है।
बच्चों में कैसे होती है यह बीमारी?
थैलेसीमिया जन्म से पहले ही तय हो जाता है क्योंकि यह माता-पिता से मिलने वाले जीन पर निर्भर करता है। यदि माता और पिता दोनों थैलेसीमिया के कैरियर हैं, तो हर गर्भावस्था में बच्चे के थैलेसीमिया मेजर से प्रभावित होने की संभावना लगभग 25 प्रतिशत तक हो सकती है।
यही वजह है कि विशेषज्ञ विवाह से पहले और परिवार शुरू करने की योजना बनाने वाले दंपतियों को थैलेसीमिया स्क्रीनिंग कराने की सलाह देते हैं।
शुरुआती लक्षणों को न करें नजरअंदाज
थैलेसीमिया के शुरुआती लक्षण अक्सर सामान्य कमजोरी या एनीमिया जैसे दिखाई देते हैं, जिससे कई बार बीमारी की पहचान देर से होती है। प्रभावित बच्चों में लगातार थकान, त्वचा का पीला पड़ना, कमजोरी, वजन और लंबाई का सही तरीके से विकास न होना जैसे संकेत दिखाई दे सकते हैं।
कुछ मामलों में बच्चों को बार-बार बीमार पड़ने की समस्या भी हो सकती है। यदि इन लक्षणों को समय रहते गंभीरता से नहीं लिया जाए, तो बीमारी जटिल रूप ले सकती है।
समय पर इलाज न मिलने पर बढ़ सकता है खतरा
डॉक्टरों के मुताबिक, थैलेसीमिया मेजर के मरीजों को जीवनभर गंभीर स्वास्थ्य चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। बीमारी बढ़ने पर हृदय, लिवर और अन्य महत्वपूर्ण अंग प्रभावित हो सकते हैं। इसके अलावा हड्डियों के आकार में बदलाव और शारीरिक विकास में रुकावट जैसी समस्याएं भी सामने आ सकती हैं।
कई मरीजों को नियमित रूप से ब्लड ट्रांसफ्यूजन की जरूरत पड़ती है, जिससे उनके जीवन की गुणवत्ता और सामान्य दिनचर्या प्रभावित हो सकती है।
स्क्रीनिंग और जेनेटिक काउंसलिंग क्यों जरूरी?
विशेषज्ञों का कहना है कि थैलेसीमिया से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका जागरूकता और समय पर जांच है। एक साधारण ब्लड टेस्ट से यह पता लगाया जा सकता है कि कोई व्यक्ति थैलेसीमिया जीन का कैरियर है या नहीं।
यदि दोनों संभावित माता-पिता कैरियर हों, तो जेनेटिक काउंसलिंग के माध्यम से उन्हें बीमारी के जोखिम और उपलब्ध विकल्पों के बारे में जानकारी दी जा सकती है। कई देशों में नियमित स्क्रीनिंग कार्यक्रमों के कारण थैलेसीमिया से प्रभावित बच्चों के जन्म में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है।
इलाज और भविष्य की उम्मीदें
वर्तमान में थैलेसीमिया मेजर के मरीजों को नियमित ब्लड ट्रांसफ्यूजन और शरीर में बढ़ने वाले अतिरिक्त आयरन को नियंत्रित करने वाली दवाओं की आवश्यकता होती है। कुछ मामलों में बोन मैरो ट्रांसप्लांट लंबे समय तक राहत देने या बीमारी को ठीक करने का प्रभावी विकल्प साबित हो सकता है।
इसके अलावा जीन थेरेपी पर चल रहा शोध भी भविष्य के लिए नई उम्मीदें जगा रहा है। हालांकि, इन आधुनिक उपचारों की लागत और उपलब्धता अभी भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
रोकथाम ही सबसे बड़ा उपाय
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि थैलेसीमिया काफी हद तक रोकी जा सकने वाली बीमारी है। नियमित स्क्रीनिंग, समय पर जांच, सही परामर्श और जागरूकता के जरिए इसके प्रभाव को कम किया जा सकता है। आज जरूरत केवल इलाज पर ध्यान देने की नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित रखने के लिए रोकथाम को प्राथमिकता देने की है।


