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नवजात के लिए अमृत है 'कोलोस्ट्रम', फिर भी UP में 65% बच्चे स्तनपान से वंचित
UP Breastfeeding Crisis: यूपी में संस्थागत प्रसव बढ़ने के बावजूद शुरुआती छह महीने तक केवल मां का दूध पाने वाले बच्चों की संख्या घटी है। विशेषज्ञों ने कोलोस्ट्रम और स्तनपान के महत्व को लेकर जागरूकता बढ़ाने पर जोर दिया।
Breastfeeding
UP Breastfeeding Crisis: नवजात शिशु के जन्म के तुरंत बाद मां के शरीर से निकलने वाला गाढ़ा पीला दूध (कोलोस्ट्रम) किसी कुदरती वरदान और पहली प्राकृतिक 'वैक्सीन' से कम नहीं होता। हालांकि, जागरूकता की भारी कमी, डिब्बाबंद (फॉर्म्युला) दूध के बढ़ते चलन और "पर्याप्त दूध न बनने" के मिथक के चलते उत्तर प्रदेश में बड़ी संख्या में नवजात इस अनमोल पोषण से वंचित रह जाते हैं। अस्पतालों में संस्थागत प्रसव (Institutional Deliveries) का ग्राफ तो बढ़ा है, लेकिन दुखद रूप से शुरुआती छह महीनों तक केवल मां का दूध पाने वाले बच्चों का आंकड़ा बेहद चिंताजनक स्तर तक नीचे गिर गया है।
अस्पतालों में डिलीवरी बढ़ी, लेकिन गिरा स्तनपान का ग्राफ: NFHS की रिपोर्ट
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) के आंकड़े उत्तर प्रदेश में शिशु स्वास्थ्य और पोषण को लेकर एक विरोधाभासी और गंभीर तस्वीर पेश करते हैं:
अस्पतालों में बढ़े प्रसव: प्रदेश में संस्थागत प्रसव की दर 83.40% से बढ़कर 88.2% पहुँच गई है।
स्तनपान में आई भारी गिरावट: इसके बावजूद जन्म के बाद शुरुआती छह महीनों तक 'केवल मां का दूध' (Exclusive Breastfeeding) पाने वाले बच्चों का आंकड़ा 59.70% से घटकर महज 34.60% रह गया है।
65% नवजात वंचित: इसका सीधा मतलब यह है कि राज्य के 65 प्रतिशत से अधिक नवजात जीवन के सबसे महत्वपूर्ण शुरुआती 6 महीनों में मां के दूध से मिलने वाले प्राकृतिक पोषण से पूरी तरह वंचित हैं।
'गोल्डन आवर' में भारी चूक: जन्म के तुरंत बाद का पहला घंटा यानी 'गोल्डन आवर' (Golden Hour) सबसे अहम माना जाता है, लेकिन इस दौरान मां का पहला पीला दूध (कोलोस्ट्रम) पाने वाले नवजातों की दर प्रदेश में केवल 25.10% ही है।
90% महिलाओं को केवल भ्रम: चेरी जितना छोटा होता है नवजात का पेट
केजीएमयू (KGMU), लखनऊ के बाल रोग विभाग की प्रोफेसर डॉ. शालिनी त्रिपाठी के अनुसार, बाल रोग ओपीडी में आने वाली करीब 90 फीसदी माताओं को केवल यह गलतफहमी या भ्रम होता है कि उनके शरीर में बच्चे के लिए पर्याप्त दूध नहीं बन रहा है।
शुरुआती जरूरत बेहद कम: जन्म के शुरुआती दो दिनों में नवजात शिशु के पेट का आकार मात्र एक 'चेरी' (Cherry) जितना छोटा होता है। उसके लिए मां के दूध की कुछ बूंदें ही पूरी तरह पर्याप्त होती हैं।
जितना स्तनपान, उतना प्रोलैक्टिन: वैज्ञानिक सच यह है कि शिशु जितनी बार स्तनपान करता है, मां के शरीर में 'प्रोलैक्टिन' (Prolactin) हार्मोन उतना ही अधिक सक्रिय होता है और दूध बनने की प्राकृतिक प्रक्रिया बढ़ती है।
फॉर्म्युला मिल्क का नुकसान: इसके विपरीत, जब परिजन 'दूध कम बनने' के भ्रम में बच्चे को बार-बार डिब्बे या बोतल का कृत्रिम दूध देना शुरू कर देते हैं, तो मां के शरीर में दूध बनने की प्राकृतिक शारीरिक प्रक्रिया बाधित होने लगती है।
शिशु और मां दोनों के लिए संजीवनी है स्तनपान
चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, शिशु को जन्म से 6 महीने तक केवल और केवल मां का दूध (पानी भी नहीं) और उसके बाद पौष्टिक ऊपरी आहार के साथ कम से कम दो साल तक स्तनपान जारी रखना चाहिए। इसके अनेक चमत्कारी फायदे हैं:
बीमारियों और शिशु मृत्यु दर से बचाव: केवल स्तनपान कराने से नवजात में डायरिया (दस्त) और निमोनिया जैसी जानलेवा बीमारियों से होने वाली मौत का खतरा कई गुना कम हो जाता है।
मानसिक व शारीरिक विकास: इससे बच्चे का बौद्धिक और मानसिक विकास (Brain Development) बेहतर होता है। भविष्य में उसमें मोटापा, मधुमेह (Diabetes), उच्च रक्तचाप (BP) और अस्थमा जैसी गंभीर बीमारियों की आशंका न के बराबर रहती है।
मां को कैंसर से सुरक्षा: नियमित स्तनपान कराने वाली माताओं में ब्रेस्ट कैंसर (स्तन कैंसर) और ओवरी (अंडाशय) कैंसर का जोखिम बहुत घट जाता है। साथ ही प्रसव के बाद होने वाले अत्यधिक रक्तस्राव (Postpartum Hemorrhage) का खतरा भी काफी कम रहता है।
मां का दूध बच्चे का पहला अधिकार और उसकी जीवनभर की सेहत की नींव है। "दूध न बनने" की भ्रांति को दूर करने के लिए अस्पतालों, आशा कार्यकर्ताओं और डॉक्टरों को प्रसव के तुरंत बाद माताओं की सही काउंसलिंग करनी होगी। डिब्बाबंद दूध के झांसे से बाहर निकलकर 'गोल्डन आवर' में स्तनपान को बढ़ावा देकर ही प्रदेश के नवजातों को एक स्वस्थ और सुरक्षित भविष्य दिया जा सकता है।


