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Weight Loss and Diabetes: डायबिटीज के मरीजों के लिए राहत की खबर, वजन कम करने से शुगर नियंत्रण में मिल सकती है मदद
Weight Loss and Diabetes: टाइप-2 डायबिटीज में 5 से 10 प्रतिशत वजन घटाने से ब्लड शुगर और इंसुलिन संवेदनशीलता में सुधार हो सकता है। जानिए डायबिटीज रेमिशन, मोटापा, फैटी लिवर और वजन प्रबंधन पर विशेषज्ञों की सलाह।
Weight Loss and Diabetes (Image Credit-Social Media)
लखनऊ। मोटापा केवल शरीर का वजन बढ़ने या शारीरिक बनावट में परिवर्तन होने की समस्या नहीं है। शरीर में आवश्यकता से अधिक चर्बी जमा होने से इंसुलिन की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है, रक्त में ग्लूकोज का स्तर बढ़ सकता है और धीरे-धीरे टाइप-2 डायबिटीज, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग तथा फैटी लिवर जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। लेकिन चिकित्सा विज्ञान में उपलब्ध प्रमाण बताते हैं कि समय रहते वजन कम करने से इन जोखिमों को काफी हद तक घटाया जा सकता है। विशेष रूप से टाइप-2 डायबिटीज की शुरुआती अवस्था में वजन घटाने से शरीर की इंसुलिन के प्रति संवेदनशीलता बेहतर हो सकती है। कुछ मरीजों में तो चिकित्सकीय निगरानी में ऐसा स्तर प्राप्त किया जा सकता है, जहाँ मधुमेह की दवाएँ बंद होने के बाद भी रक्त में शुगर निर्धारित सीमा से नीचे बनी रहती है। चिकित्सा विज्ञान में इस स्थिति को डायबिटीज रेमिशन कहा जाता है। हालाँकि, इसे बीमारी का स्थायी इलाज नहीं माना जाता, क्योंकि भविष्य में वजन बढ़ने या अन्य कारणों से शुगर का स्तर दोबारा बढ़ सकता है।
किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू) के मेडिसिन विभाग के डॉ. केके सावलानी के अनुसार, टाइप-2 डायबिटीज की शुरुआती अवस्था में वजन घटाने से बीमारी पर नियंत्रण पाने की संभावना बढ़ सकती है। विशेष रूप से लगभग 15 किलोग्राम वजन कम करने वाले कुछ मरीजों में डायबिटीज रेमिशन की संभावना उल्लेखनीय रूप से बढ़ती है। हालाँकि, इसका लाभ प्रत्येक मरीज में समान नहीं होता। यह इस बात पर निर्भर करता है कि बीमारी कितने समय से है, मरीज का शुरुआती वजन कितना था, अग्न्याशय की इंसुलिन बनाने की क्षमता कितनी सुरक्षित है और वजन घटाने के बाद उसे कितने समय तक नियंत्रित रखा जा सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, मोटापे का उपचार केवल वजन कम करने तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि शरीर की चयापचय प्रणाली, रक्तचाप, रक्त में वसा के स्तर और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं को भी ध्यान में रखना चाहिए।
शरीर में अतिरिक्त चर्बी इंसुलिन का असर कैसे कम करती है?
इंसुलिन अग्न्याशय से निकलने वाला एक महत्वपूर्ण हार्मोन है, जो रक्त में मौजूद ग्लूकोज को शरीर की कोशिकाओं तक पहुँचाने और उसका उपयोग करने में सहायता करता है। भोजन करने के बाद जब रक्त में ग्लूकोज बढ़ता है, तो सामान्यतः अग्न्याशय इंसुलिन छोड़ता है। इसकी सहायता से मांसपेशियाँ और अन्य ऊतक ग्लूकोज का उपयोग करते हैं तथा लिवर आवश्यकता के अनुसार ग्लूकोज का उत्पादन और भंडारण नियंत्रित करता है। लेकिन जब शरीर में विशेष रूप से पेट के भीतर और लिवर के आसपास अधिक चर्बी जमा होने लगती है, तो इंसुलिन के प्रति कोशिकाओं की प्रतिक्रिया कमजोर पड़ सकती है। इस स्थिति को इंसुलिन प्रतिरोध कहा जाता है।
केजीएमयू के गैस्ट्रो मेडिसिन विभागाध्यक्ष डॉ. सुमित रूंगटा के अनुसार, शरीर में आवश्यकता से अधिक चर्बी जमा होने पर इंसुलिन की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है। इससे रक्त में शुगर का स्तर बढ़ने लगता है। पेट के आसपास जमा चर्बी इस जोखिम को और बढ़ा सकती है। वजन कम होने पर शरीर की इंसुलिन के प्रति संवेदनशीलता में सुधार हो सकता है, जिससे रक्त में ग्लूकोज नियंत्रित रखने में सहायता मिलती है।
इंसुलिन प्रतिरोध विकसित होने पर अग्न्याशय शुरुआत में अधिक इंसुलिन बनाकर इसकी भरपाई करने का प्रयास करता है। लेकिन कुछ व्यक्तियों में समय के साथ यह क्षमता पर्याप्त नहीं रह जाती और रक्त में ग्लूकोज बढ़ने लगता है। लंबे समय तक ऐसा रहने पर टाइप-2 डायबिटीज विकसित हो सकती है। इस प्रक्रिया में आनुवंशिक प्रवृत्ति, शारीरिक निष्क्रियता, नींद, उम्र और अन्य चयापचय संबंधी कारकों की भी भूमिका होती है। इसलिए हर मोटे व्यक्ति को डायबिटीज होगी, यह आवश्यक नहीं है। इसी तरह सामान्य वजन वाले व्यक्तियों में भी टाइप-2 डायबिटीज हो सकती है।
पेट की चर्बी क्यों मानी जाती है अधिक खतरनाक?
शरीर में चर्बी कहाँ जमा है, इसका स्वास्थ्य पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। त्वचा के नीचे जमा चर्बी और पेट के भीतर आंतरिक अंगों के आसपास जमा चर्बी की चयापचय संबंधी गतिविधियाँ अलग होती हैं। पेट के भीतर जमा चर्बी को विसरल फैट कहा जाता है। इसकी अधिकता इंसुलिन प्रतिरोध, रक्त में वसा के असामान्य स्तर, उच्च रक्तचाप और हृदय संबंधी जोखिमों से जुड़ी पाई गई है।
भारतीय और अन्य दक्षिण एशियाई आबादियों में यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि कुछ व्यक्तियों में अपेक्षाकृत कम बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआई) होने के बावजूद पेट के भीतर चर्बी और चयापचय संबंधी जोखिम अधिक हो सकते हैं। इसलिए केवल वजन या बीएमआई देखकर स्वास्थ्य की पूरी स्थिति का आकलन नहीं किया जा सकता। कमर की माप, रक्तचाप, रक्त में ग्लूकोज, कोलेस्ट्रॉल और अन्य जाँचों को भी महत्व देना चाहिए।
वजन कम करने पर पेट और लिवर में जमा अतिरिक्त चर्बी घट सकती है। इससे इंसुलिन की कार्यक्षमता में सुधार होने की संभावना रहती है। यही कारण है कि मोटापे के उपचार में केवल तराजू पर वजन घटने की संख्या के बजाय चयापचय संबंधी स्वास्थ्य में आए बदलाव को भी देखा जाता है।
क्या 15 किलो वजन घटाने से डायबिटीज खत्म हो सकती है?
इस प्रश्न का उत्तर समझने के लिए डायबिटीज रेमिशन की अवधारणा जानना आवश्यक है। रेमिशन का अर्थ है कि किसी व्यक्ति में पहले से मौजूद टाइप-2 डायबिटीज के बावजूद रक्त में ग्लूकोज का स्तर कुछ समय तक मधुमेह की निर्धारित सीमा से नीचे बना रहे और इस अवधि में ग्लूकोज कम करने वाली दवाओं की आवश्यकता न पड़े। अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों की सहमति के अनुसार, सामान्यतः दवा बंद होने के कम से कम तीन महीने बाद एचबीए1सी का स्तर 6.5 प्रतिशत से कम रहने को रेमिशन की प्रमुख कसौटी माना जाता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि भविष्य में मधुमेह दोबारा नहीं होगा।
इस संबंध में ब्रिटेन में किया गया डायबिटीज रेमिशन क्लिनिकल ट्रायल, जिसे डायरेक्ट अध्ययन कहा जाता है, महत्वपूर्ण है। इसमें प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं के माध्यम से संरचित वजन प्रबंधन कार्यक्रम का अध्ययन किया गया। अध्ययन के एक वर्ष के परिणामों में हस्तक्षेप समूह के लगभग 46 प्रतिशत प्रतिभागियों में डायबिटीज रेमिशन प्राप्त हुआ, जबकि सामान्य देखभाल वाले समूह में यह अनुपात लगभग चार प्रतिशत था। जिन प्रतिभागियों ने कम से कम 15 किलोग्राम वजन घटाया, उनमें रेमिशन की दर लगभग 86 प्रतिशत पाई गई। लेकिन यह परिणाम अध्ययन में शामिल विशेष प्रकार के मरीजों और निर्धारित कार्यक्रम के संदर्भ में था, सभी मधुमेह रोगियों के लिए समान परिणाम की गारंटी नहीं है।
इस अध्ययन का एक और महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह था कि वजन कम करने के बाद उसे बनाए रखना आवश्यक है। बाद के वर्षों में कुछ प्रतिभागियों का वजन दोबारा बढ़ा और रेमिशन की स्थिति समाप्त हो गई। इसलिए डायबिटीज रेमिशन को एक ऐसी उपलब्धि समझना चाहिए जिसके बाद भी नियमित निगरानी और स्वस्थ जीवनशैली आवश्यक रहती है।
पाँच से दस प्रतिशत वजन घटने पर भी मिल सकते हैं लाभ
स्वास्थ्य सुधार के लिए प्रत्येक व्यक्ति को 15 किलोग्राम वजन कम करने की आवश्यकता नहीं होती। यदि किसी व्यक्ति का वजन 90 किलोग्राम है, तो पाँच प्रतिशत वजन घटाने का अर्थ लगभग साढ़े चार किलोग्राम और दस प्रतिशत वजन घटाने का अर्थ नौ किलोग्राम है। कई अध्ययनों में पाया गया है कि शरीर के शुरुआती वजन में लगभग पाँच से दस प्रतिशत की कमी से रक्त में ग्लूकोज, रक्तचाप और कुछ अन्य चयापचय संबंधी संकेतकों में सुधार हो सकता है।
इसका अर्थ यह नहीं है कि पाँच प्रतिशत वजन घटते ही सभी बीमारियाँ समाप्त हो जाएँगी। लाभ की मात्रा व्यक्ति की उम्र, शुरुआती स्वास्थ्य स्थिति, वजन घटाने के तरीके और उसे बनाए रखने की अवधि पर निर्भर करती है। कुछ लोगों में अधिक वजन घटाने से अतिरिक्त लाभ मिल सकते हैं, जबकि अन्य व्यक्तियों के लिए धीरे-धीरे और सुरक्षित तरीके से वजन कम करना अधिक उपयुक्त हो सकता है।
विशेषज्ञ इस बात पर जोर देते हैं कि बहुत तेजी से वजन घटाने के बजाय ऐसा तरीका अपनाया जाए जिसे लंबे समय तक बनाए रखा जा सके। अत्यधिक कम कैलोरी वाला भोजन, बिना चिकित्सकीय निगरानी लंबे उपवास और अप्रमाणित वजन घटाने वाली दवाओं का इस्तेमाल स्वास्थ्य के लिए जोखिमपूर्ण हो सकता है।
मोटापे का संबंध केवल डायबिटीज से नहीं, हृदय रोगों से भी
लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान के कार्डियोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. भुवन चन्द्र तिवारी के अनुसार, मोटापा कम करने के लिए भोजन में कैलोरी की मात्रा नियंत्रित करना, मीठे पेय पदार्थों और तले हुए खाद्य पदार्थों का सेवन सीमित करना तथा नियमित शारीरिक गतिविधि अपनाना महत्वपूर्ण है। तेज चाल से नियमित पैदल चलना भी वजन प्रबंधन और हृदय स्वास्थ्य में सहायता कर सकता है।
अतिरिक्त वजन के साथ उच्च रक्तचाप, असामान्य कोलेस्ट्रॉल, इंसुलिन प्रतिरोध और शरीर में दीर्घकालीन सूजन जैसी स्थितियाँ विकसित हो सकती हैं। ये सभी कारक हृदय और रक्तवाहिनियों के स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं। मोटापे के साथ कुछ व्यक्तियों में कोरोनरी धमनी रोग, हार्ट फेल्योर और स्ट्रोक का जोखिम बढ़ सकता है। हालाँकि, किसी व्यक्ति में इन बीमारियों का वास्तविक जोखिम उसकी उम्र, धूम्रपान, पारिवारिक इतिहास, रक्तचाप, डायबिटीज और अन्य कारकों पर भी निर्भर करता है।
वजन कम करने से रक्तचाप और चयापचय संबंधी स्वास्थ्य में सुधार संभव है। लेकिन यदि किसी व्यक्ति को पहले से हृदय रोग है, तो उसे केवल वजन कम करने के उद्देश्य से अचानक अत्यधिक व्यायाम शुरू नहीं करना चाहिए। शारीरिक गतिविधि की मात्रा और तीव्रता चिकित्सकीय सलाह के अनुसार तय करना अधिक सुरक्षित है।
फैटी लिवर में भी वजन घटाने से हो सकता है सुधार
मोटापे का एक महत्वपूर्ण प्रभाव लिवर पर पड़ता है। जब लिवर में सामान्य से अधिक चर्बी जमा होने लगती है, तो उसे सामान्य भाषा में फैटी लिवर कहा जाता है। वर्तमान चिकित्सा शब्दावली में चयापचय संबंधी कारणों से होने वाली इस बीमारी को मेटाबॉलिक डिसफंक्शन एसोसिएटेड स्टीएटोटिक लिवर डिजीज (एमएएसएलडी) कहा जाता है। कुछ मरीजों में केवल चर्बी जमा होती है, जबकि अन्य में सूजन और लिवर की कोशिकाओं को क्षति भी हो सकती है।
समय के साथ गंभीर बीमारी वाले कुछ मरीजों में लिवर में फाइब्रोसिस और सिरोसिस जैसी स्थितियाँ विकसित हो सकती हैं। लेकिन प्रत्येक फैटी लिवर मरीज में ऐसा होगा, यह आवश्यक नहीं है। वजन घटाना इस बीमारी के प्रबंधन का एक महत्वपूर्ण उपाय माना जाता है। शरीर के शुरुआती वजन में लगभग पाँच प्रतिशत की कमी से लिवर की चर्बी में सुधार हो सकता है, जबकि अधिक वजन घटने पर कुछ मरीजों में सूजन और फाइब्रोसिस से संबंधित लाभ भी मिल सकते हैं।
डॉ. सुमित रूंगटा की ओर से अतिरिक्त चर्बी और इंसुलिन प्रतिरोध के बीच बताए गए संबंध को फैटी लिवर के संदर्भ में भी समझा जा सकता है। लिवर में जमा चर्बी और इंसुलिन प्रतिरोध एक-दूसरे को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए मोटापा, टाइप-2 डायबिटीज और फैटी लिवर अक्सर एक साथ पाए जाते हैं।
मोटापे से नींद में साँस रुकने की समस्या भी हो सकती है
मोटापे से जुड़ी एक अन्य समस्या ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया है। इसमें सोते समय ऊपरी श्वसन मार्ग बार-बार संकरा या बंद हो सकता है, जिससे कुछ क्षणों के लिए साँस रुकती या कम हो जाती है। तेज खर्राटे, नींद में घुटन महसूस होना, सुबह सिरदर्द और दिन में अत्यधिक नींद आना इसके संभावित लक्षण हैं।
गर्दन और ऊपरी शरीर के आसपास अतिरिक्त चर्बी जमा होने से कुछ लोगों में यह जोखिम बढ़ सकता है। वजन घटाने से लक्षणों में सुधार संभव है, लेकिन गंभीर स्लीप एपनिया वाले मरीजों को विशेष उपचार की भी आवश्यकता हो सकती है। इसलिए केवल वजन घटने की प्रतीक्षा करना उचित नहीं है। जिन लोगों को सोते समय बार-बार साँस रुकने की शिकायत होती है, उन्हें चिकित्सकीय जाँच करानी चाहिए।
रोज कितना पैदल चलना चाहिए?
नियमित शारीरिक गतिविधि वजन प्रबंधन के साथ इंसुलिन संवेदनशीलता और हृदय स्वास्थ्य के लिए उपयोगी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन वयस्कों को सामान्यतः सप्ताह में कम से कम 150 से 300 मिनट मध्यम तीव्रता वाली एरोबिक गतिविधि करने की सलाह देता है। तेज चाल से चलना ऐसी गतिविधियों में शामिल हो सकता है। इसके अतिरिक्त सप्ताह में कम से कम दो दिन मांसपेशियों को मजबूत बनाने वाले व्यायाम भी उपयोगी माने जाते हैं।
जो लोग लंबे समय से शारीरिक रूप से निष्क्रिय हैं, वे अपनी क्षमता के अनुसार कम समय से शुरुआत करके धीरे-धीरे गतिविधि बढ़ा सकते हैं। हर व्यक्ति के लिए एक ही संख्या में कदम चलना अनिवार्य नहीं है। विशेष रूप से बुजुर्गों, जोड़ों की बीमारी वाले व्यक्तियों और गंभीर हृदय रोगियों के लिए गतिविधि का प्रकार अलग हो सकता है।
व्यायाम का लाभ केवल उससे खर्च होने वाली कैलोरी तक सीमित नहीं है। नियमित शारीरिक गतिविधि मांसपेशियों द्वारा ग्लूकोज के उपयोग को बेहतर बनाने और इंसुलिन प्रतिरोध कम करने में सहायता कर सकती है। इसलिए वजन में बहुत अधिक बदलाव न होने पर भी शारीरिक सक्रियता से स्वास्थ्य लाभ मिल सकते हैं।
भोजन में क्या बदलाव करने चाहिए?
वजन प्रबंधन के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भोजन से मिलने वाली ऊर्जा और शरीर द्वारा खर्च की जाने वाली ऊर्जा के बीच लंबे समय तक उपयुक्त संतुलन बनाया जाए। लेकिन इसका अर्थ भूखा रहना या किसी एक खाद्य पदार्थ को पूरी तरह बंद कर देना नहीं है। भोजन में पर्याप्त प्रोटीन, सब्जियाँ, फल, दालें, साबुत अनाज और अन्य आवश्यक पोषक तत्व शामिल होने चाहिए।
मीठे पेय पदार्थ, अधिक चीनी वाले पैकेटबंद जूस, बार-बार तली हुई चीजें और अत्यधिक कैलोरी वाले प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ कुल ऊर्जा सेवन बढ़ा सकते हैं। चाय या कॉफी स्वयं मोटापे का अनिवार्य कारण नहीं हैं, लेकिन उनमें बार-बार अधिक चीनी, क्रीम या अन्य कैलोरीयुक्त सामग्री मिलाने से ऊर्जा सेवन बढ़ सकता है।
भारतीय भोजन में दाल, सब्जी, रोटी, चावल, दही और अन्य पारंपरिक खाद्य पदार्थों के माध्यम से भी संतुलित आहार तैयार किया जा सकता है। वजन घटाने के लिए महँगे विशेष खाद्य पदार्थ खरीदना आवश्यक नहीं है। भोजन की मात्रा, पकाने का तरीका, नियमितता और व्यक्ति की पोषण संबंधी जरूरतें अधिक महत्वपूर्ण हैं।
अत्यधिक मोटापे में बेरियाट्रिक सर्जरी भी विकल्प
लोहिया संस्थान के गैस्ट्रो सर्जरी विभागाध्यक्ष डॉ. अंशुमान पांडेय के अनुसार, अत्यधिक मोटापे वाले कुछ मरीजों में बेरियाट्रिक सर्जरी एक उपचार विकल्प हो सकती है। इस प्रकार की सर्जरी में पाचन तंत्र की संरचना में परिवर्तन करके भोजन की मात्रा, भूख और चयापचय संबंधी प्रक्रियाओं को प्रभावित किया जाता है। इससे वजन घटाने के साथ टाइप-2 डायबिटीज और मोटापे से संबंधित कुछ अन्य बीमारियों में सुधार हो सकता है।
बेरियाट्रिक सर्जरी केवल पेट छोटा करने की एक ही प्रक्रिया का नाम नहीं है। इसमें स्लीव गैस्ट्रेक्टॉमी और गैस्ट्रिक बाइपास जैसी अलग-अलग शल्य चिकित्सा पद्धतियाँ शामिल हैं। कौन-सी प्रक्रिया उपयुक्त होगी, यह मरीज की स्वास्थ्य स्थिति, बीएमआई, डायबिटीज, पोषण संबंधी आवश्यकताओं और अन्य बीमारियों के आधार पर तय किया जाता है।
भारत में दक्षिण एशियाई आबादी के लिए उपयुक्त बीएमआई सीमाओं और चयापचय संबंधी जोखिमों को ध्यान में रखते हुए सर्जरी की पात्रता का आकलन किया जा सकता है। लेकिन केवल वजन अधिक होने से हर व्यक्ति को ऑपरेशन की आवश्यकता नहीं होती। इसके लिए विशेषज्ञ चिकित्सकों, पोषण विशेषज्ञों और अन्य संबंधित विभागों द्वारा विस्तृत मूल्यांकन आवश्यक है।
सर्जरी के बाद भी मरीज को जीवनभर भोजन संबंधी अनुशासन, आवश्यक विटामिन और खनिजों की निगरानी तथा नियमित चिकित्सकीय परामर्श की आवश्यकता हो सकती है। कुछ प्रक्रियाओं में पोषक तत्वों की कमी, रक्तस्राव, संक्रमण और अन्य जटिलताओं का जोखिम भी रहता है। इसलिए सर्जरी के संभावित लाभ और जोखिम दोनों को समझना आवश्यक है।
वजन घटाने की दवाएँ भी उपलब्ध, लेकिन स्वयं इस्तेमाल करना खतरनाक
मोटापे के उपचार में अब कुछ ऐसी दवाएँ भी उपलब्ध हैं जो भूख, तृप्ति और भोजन सेवन को प्रभावित करती हैं। इनमें जीएलपी-1 रिसेप्टर एगोनिस्ट और अन्य संबंधित औषधियाँ शामिल हैं। कुछ मरीजों में ये दवाएँ चिकित्सकीय निगरानी के अंतर्गत वजन घटाने और रक्त में ग्लूकोज नियंत्रित करने में उपयोगी हो सकती हैं।
लेकिन ऐसी दवाएँ हर व्यक्ति के लिए उपयुक्त नहीं होतीं। इनके दुष्प्रभाव, उपयोग की शर्तें, अन्य बीमारियों से संबंधित सावधानियाँ और उपचार बंद करने के बाद वजन दोबारा बढ़ने की संभावना को ध्यान में रखना पड़ता है। इंटरनेट या सोशल मीडिया पर प्रचार देखकर वजन घटाने की दवा लेना उचित नहीं है। उपचार का निर्णय योग्य चिकित्सक के साथ किया जाना चाहिए।
डायबिटीज की दवाएँ अपने आप बंद न करें
वजन कम होने के बाद कुछ मरीजों में रक्त में शुगर का स्तर बेहतर हो जाता है। इससे दवाओं की मात्रा में परिवर्तन की आवश्यकता पड़ सकती है। लेकिन यह निर्णय केवल चिकित्सक को करना चाहिए। विशेष रूप से इंसुलिन या कुछ ऐसी दवाएँ लेने वाले मरीजों में, जिनसे रक्त में शुगर अत्यधिक कम हो सकती है, भोजन और शारीरिक गतिविधि में बड़े बदलाव के साथ दवा का समायोजन आवश्यक हो सकता है।
डायबिटीज रेमिशन प्राप्त होने के बाद भी नियमित एचबीए1सी जाँच, आँखों, किडनी, पैरों और हृदय संबंधी जोखिमों की निगरानी आवश्यक रहती है। रेमिशन का अर्थ यह नहीं है कि मधुमेह से पहले हुए सभी नुकसान स्वतः समाप्त हो गए हैं। इसलिए दवाएँ बंद हो जाने को इलाज की समाप्ति समझना सही नहीं होगा।
मोटापे का उपचार केवल इच्छाशक्ति का प्रश्न नहीं
मोटापा एक जटिल, दीर्घकालीन स्वास्थ्य स्थिति है। इसमें आनुवंशिक प्रवृत्ति, हार्मोन, भूख और तृप्ति को नियंत्रित करने वाली प्रणालियाँ, नींद, मानसिक तनाव, दवाएँ, शारीरिक गतिविधि, भोजन की उपलब्धता और सामाजिक परिस्थितियाँ भूमिका निभाती हैं। इसलिए हर व्यक्ति के वजन बढ़ने का कारण केवल अधिक खाना या व्यायाम न करना नहीं होता।
कुछ व्यक्तियों में थायरॉयड संबंधी बीमारी, हार्मोन संबंधी अन्य समस्याएँ या विशेष दवाओं के कारण वजन बढ़ सकता है। हालाँकि, हर मोटे व्यक्ति में ऐसी बीमारी मौजूद नहीं होती। उचित चिकित्सकीय मूल्यांकन से यह समझने में सहायता मिल सकती है कि वजन बढ़ने में कौन-से कारक महत्वपूर्ण हैं और किस प्रकार का उपचार उपयुक्त होगा।
वजन घटाने के बाद शरीर में भूख बढ़ाने और ऊर्जा खर्च कम करने से संबंधित जैविक परिवर्तन भी हो सकते हैं। यही कारण है कि कुछ लोगों को वजन घटाने के बाद उसे बनाए रखने में कठिनाई होती है। लंबे समय तक स्वास्थ्य लाभ बनाए रखने के लिए निरंतर सहायता, व्यावहारिक भोजन योजना और नियमित शारीरिक गतिविधि आवश्यक हो सकती है।
समय रहते वजन नियंत्रित करना क्यों जरूरी है?
केजीएमयू और लोहिया संस्थान के विशेषज्ञों की सलाह का केंद्रीय संदेश यह है कि मोटापे को केवल बाहरी शारीरिक परिवर्तन समझकर अनदेखा नहीं करना चाहिए। अतिरिक्त चर्बी शरीर की चयापचय प्रणाली को प्रभावित कर सकती है और अनेक गंभीर बीमारियों के जोखिम से जुड़ी होती है। लेकिन वजन घटाने से इंसुलिन संवेदनशीलता, रक्त में ग्लूकोज, रक्तचाप और लिवर के स्वास्थ्य में सुधार की संभावना रहती है।
टाइप-2 डायबिटीज की शुरुआती अवस्था में यह लाभ विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो सकता है। कुछ मरीजों में पर्याप्त और टिकाऊ वजन घटने पर डायबिटीज रेमिशन प्राप्त हो सकता है। फिर भी इसका अर्थ स्थायी रूप से बीमारी समाप्त हो जाना नहीं है। मरीज को नियमित निगरानी और स्वस्थ जीवनशैली बनाए रखने की आवश्यकता रहती है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि स्वास्थ्य लाभ प्राप्त करने के लिए हर व्यक्ति को बहुत अधिक वजन घटाने की आवश्यकता नहीं होती। शुरुआती वजन में पाँच से दस प्रतिशत की कमी भी कई लोगों के लिए उपयोगी हो सकती है। संतुलित भोजन, नियमित पैदल चलना, पर्याप्त नींद और आवश्यकतानुसार चिकित्सकीय उपचार मिलकर मोटापे से जुड़ी बीमारियों के जोखिम को कम करने में सहायता कर सकते हैं। गंभीर मोटापे में दवाओं या सर्जरी जैसे उपचार विकल्पों पर भी विशेषज्ञों की सलाह से विचार किया जा सकता है।
इस प्रकार वजन घटाने का उद्देश्य केवल शरीर को पतला बनाना नहीं, बल्कि उसके भीतर चल रही चयापचय प्रक्रियाओं को बेहतर बनाना है। सही समय पर शुरू किया गया वजन प्रबंधन भविष्य में डायबिटीज, हृदय रोग और फैटी लिवर जैसी समस्याओं को रोकने या नियंत्रित करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।


