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Newstrack Special: रात में अचानक नींद खुलने पर दिमाग में क्या होता है? Sleep Inertia का सच
Deep Sleep Awakening Explained: रात में अचानक नींद खुलने पर कुछ सेकंड तक भ्रम और भारीपन क्यों महसूस होता है? जानिए Sleep Inertia, REM और Deep Sleep के दौरान दिमाग में होने वाली पूरी प्रक्रिया।
Deep Sleep Awakening Explained in Hindi
Deep Sleep Awakening Explained in Hindi: रात के बीचोंबीच अचानक कोई तेज़ आवाज़ सुनकर, फोन की घंटी बजने पर, या किसी अजीब सपने के चलते नींद टूट जाती है। कुछ पल के लिए समझ ही नहीं आता कि हम कहां हैं, क्या समय हो रहा है, या अभी हुआ क्या। कभी-कभी यह भ्रम कुछ सेकंड में साफ हो जाता है तो कभी कई मिनटों तक दिमाग धुंधलाया हुआ महसूस होता है। आखिर अचानक जागने पर हमारे दिमाग के भीतर होता क्या है, और यह कितनी जल्दी अपनी सामान्य 'सेटिंग' वापस पा लेता है? आइए इस दिलचस्प विषय को विस्तार से समझते हैं।
नींद कोई एक जैसी स्थिति नहीं है?
सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि नींद कोई स्थिर, एक जैसी अवस्था नहीं है बल्कि यह कई अलग-अलग चरणों से होकर गुजरती है, जो पूरी रात बार-बार चक्र की तरह दोहराए जाते हैं। इन चरणों को मोटे तौर पर दो बड़े हिस्सों में बांटा जाता है - एक है नॉन-आरईएम (rapid eye movement) नींद, जिसमें हल्की नींद से लेकर गहरी नींद तक कई लेवल आते हैं, और दूसरा है आरईएम नींद, जिसमें हम सबसे ज्यादा जीवंत (lucid) सपने देखते हैं।
रात के शुरुआती हिस्से में हमारा शरीर गहरी नॉन-आरईएम नींद में ज्यादा समय बिताता है, जिसे 'स्लो वेव स्लीप' यानी धीमी तरंगों वाली नींद भी कहा जाता है। जैसे-जैसे रात आगे बढ़ती है, आरईएम नींद के हिस्से लंबे होते जाते हैं, खासकर सुबह के करीब। यही वजह है कि रात के अलग-अलग समय पर जागने का अनुभव बिल्कुल अलग महसूस हो सकता है, क्योंकि हर बार दिमाग किसी अलग नींद के चरण से बाहर निकल रहा होता है।
गहरी नींद से जागना सबसे मुश्किल क्यों है
अगर किसी को रात के शुरुआती घंटों में, यानी गहरी नॉन-आरईएम नींद के दौरान अचानक जगाया जाए, तो उसे सबसे ज्यादा भ्रम और भारीपन महसूस होता है। इस अवस्था में दिमाग की विद्युत तरंगें बेहद धीमी और बड़ी होती हैं, जो शरीर और दिमाग के गहरे आराम की स्थिति को दिखाती हैं। जब अचानक कोई तेज़ आवाज़ या हलचल इस गहरी अवस्था को तोड़ती है, तो दिमाग को इन धीमी तरंगों से एकदम तेज़, जाग्रत अवस्था वाली तरंगों में बदलने के लिए एक अचानक और भारी छलांग लगानी पड़ती है।
यही अचानक बदलाव उस जाने-पहचाने भारीपन, भ्रम और असमंजस का कारण बनता है, जिसे वैज्ञानिक भाषा में 'स्लीप इनर्शिया' यानी नींद की जड़ता कहा जाता है। इस दौरान व्यक्ति को समय, जगह और यहां तक कि सामान्य सोचने-समझने की क्षमता में भी अस्थायी रूप से गड़बड़ी महसूस हो सकती है। भले ही उसकी आंखें खुली हों और वह जाग चुका हो।
आरईएम नींद से जागना अलग क्यों महसूस होता है?
इसके उलट अगर किसी को आरईएम नींद के दौरान जगाया जाए यानी उस अवस्था में जब हम सपने देख रहे होते हैं तो अनुभव अक्सर अलग होता है। आरईएम नींद के दौरान दिमाग की विद्युत गतिविधि जागने की अवस्था से काफी मिलती-जुलती होती है। यानी दिमाग पहले से ही अपेक्षाकृत सक्रिय अवस्था में होता है, भले ही शरीर की मांसपेशियां उस वक्त लगभग पूरी तरह निष्क्रिय रहती हैं।
यही वजह है कि आरईएम नींद से जागने पर व्यक्ति को अक्सर तुलनात्मक रूप से ज्यादा स्पष्टता महसूस होती है। साथ ही उसे अपने सपने भी ज्यादा साफ याद रह जाते हैं, क्योंकि दिमाग पहले से ही एक सक्रिय अवस्था में मौजूद था। कई लोग यह भी बताते हैं कि आरईएम नींद के दौरान जागने पर वे तुरंत उठकर कोई काम कर सकते हैं। जबकि गहरी नींद से जागने के बाद कुछ मिनट पूरी तरह असमंजस में गुजर जाते हैं।
दिमाग के भीतर असल में क्या बदलता है
जागने की इस पूरी प्रक्रिया को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि दिमाग का कौन-सा हिस्सा सबसे पहले सक्रिय होता है, और कौन-सा हिस्सा पीछे रह जाता है। दिमाग का वह हिस्सा जो बुनियादी होश और सतर्कता को नियंत्रित करता है, वह आमतौर पर बेहद तेज़ी से सक्रिय हो जाता है। यानी कुछ ही सेकंड में व्यक्ति को यह एहसास हो जाता है कि वह जाग चुका है। पर दिमाग का वह हिस्सा, जिसे प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स कहा जाता है जो तार्किक सोच, फैसला लेने और गहरी समझ के लिए जिम्मेदार है, वह इतनी तेज़ी से सक्रिय नहीं होता।
यही असंतुलन इस पूरे भ्रम की जड़ है। शरीर और बुनियादी होश तो जाग चुके होते हैं, पर दिमाग का सबसे समझदार हिस्सा अभी भी धीमी गति से जागने की प्रक्रिया में होता है। यही वजह है कि नींद टूटने के तुरंत बाद कई बार व्यक्ति कोई अजीब या गलत फैसला ले बैठता है, जैसे गलत नंबर पर फोन करना या किसी सामान्य चीज़ को न पहचान पाना, क्योंकि उस वक्त दिमाग का तार्किक हिस्सा पूरी तरह सक्रिय नहीं हुआ होता।
एडेनोसीन नाम के रसायन की भूमिका
दिमाग में एक खास रसायन होता है, जिसे एडेनोसीन कहा जाता है। ये जागते रहने के दौरान धीरे-धीरे जमा होता जाता है और नींद की जरूरत का एहसास बढ़ाता है। नींद के दौरान यह रसायन धीरे-धीरे साफ होता है, ताकि सुबह उठने पर व्यक्ति तरोताज़ा महसूस करे। अगर किसी को नींद के बीच में ही, इससे पहले कि यह रसायन पूरी तरह साफ हो चुका हो, अचानक जगा दिया जाए तो दिमाग में अब भी काफी मात्रा में एडेनोसीन मौजूद रहता है। ये उसी भारीपन और नींद जैसी सुस्ती का एहसास बनाए रखता है, भले ही व्यक्ति तकनीकी रूप से जाग चुका हो।
यही कारण है कि अगर किसी को नींद के बीचोंबीच जगाया जाए, तो वह उतना तरोताज़ा महसूस नहीं करता, जितना सुबह प्राकृतिक रूप से नींद पूरी होने पर महसूस करता है, भले ही सोने का कुल समय बराबर ही क्यों न हो।
दिमाग सामान्य सेटिंग कितनी जल्दी वापस पा लेता है
इसका जवाब कई चीज़ों पर निर्भर करता है, जिनमें सबसे अहम है यह कि व्यक्ति नींद के किस चरण से जागा है। अगर जागना आरईएम नींद के दौरान हुआ हो, तो सामान्य सतर्कता कुछ ही मिनटों में, कई बार तो कुछ सेकंड में ही वापस आ सकती है। पर अगर जागना गहरी नॉन-आरईएम नींद के दौरान हुआ हो, तो यह भारीपन पंद्रह मिनट से लेकर पूरे एक घंटे तक भी बना रह सकता है, खासकर अगर व्यक्ति पहले से नींद की कमी से जूझ रहा हो।
वैज्ञानिक शोध में यह देखा गया है कि नींद की जड़ता के दौरान सोचने-समझने की क्षमता, प्रतिक्रिया देने की गति और यहां तक कि याददाश्त भी अस्थायी रूप से प्रभावित हो सकती है, और यह असर पूरी तरह खत्म होने में औसतन तीस मिनट के आसपास का समय लग सकता है, हालांकि यह हर व्यक्ति और हर परिस्थिति में अलग-अलग हो सकता है।
उम्र और नींद की कमी का असर
दिमाग के जागने की रफ्तार सिर्फ नींद के चरण पर ही नहीं, बल्कि उम्र और व्यक्ति की समग्र नींद की गुणवत्ता पर भी निर्भर करती है। बच्चों और युवाओं में आमतौर पर गहरी नींद का अनुपात ज्यादा होता है, इसलिए उन्हें जगाना अक्सर मुश्किल होता है, और जागने के बाद उनका भ्रम भी अपेक्षाकृत ज्यादा और लंबा हो सकता है। वहीं उम्र बढ़ने के साथ गहरी नींद का अनुपात स्वाभाविक रूप से घटता जाता है, इसलिए बुजुर्गों में नींद टूटने पर सामान्य सतर्कता अक्सर अपेक्षाकृत जल्दी वापस आ जाती है, हालांकि उनकी नींद खुद ज्यादा बार टूटने की समस्या से जूझती है।
जो लोग पहले से नींद की भारी कमी से जूझ रहे हों, उनमें नींद की जड़ता का असर कहीं ज्यादा गहरा और लंबा हो सकता है, क्योंकि उनका दिमाग गहरी नींद की भरपाई करने की कोशिश में होता है, और अचानक जागने पर उसे इस अधूरी प्रक्रिया से बाहर निकाला जा रहा होता है। यही वजह है कि नींद की कमी से जूझ रहे लोग अक्सर सुबह उठने के बाद भी लंबे समय तक सुस्त और असमंजस में महसूस करते हैं।
बार-बार नींद टूटने का असर
आज की जिंदगी में बहुत से लोगों की नींद रात में एक से ज्यादा बार टूटती है, चाहे वह छोटे बच्चे की देखभाल करने वाले माता-पिता हों, शिफ्ट में काम करने वाले लोग हों, या ऐसे लोग जिनकी नींद किसी शारीरिक या मानसिक स्थिति की वजह से बाधित रहती हो। बार-बार नींद टूटने से दिमाग को गहरी, निर्बाध नींद के लंबे और स्थिर चक्र पूरे करने का मौका नहीं मिल पाता, जिससे न सिर्फ हर बार जागने पर ज्यादा भारीपन महसूस होता है, बल्कि पूरे दिन की सतर्कता और मूड पर भी असर पड़ सकता है।
यही कारण है कि नींद विशेषज्ञ हमेशा सिर्फ नींद के कुल घंटों को ही नहीं, बल्कि नींद की निरंतरता को भी उतना ही महत्वपूर्ण मानते हैं। बार-बार टूटी हुई आठ घंटे की नींद, बिना किसी रुकावट वाली छह घंटे की नींद से भी कम तरोताज़ा करने वाली महसूस हो सकती है, क्योंकि हर बार जागने के बाद दिमाग को दोबारा गहरी नींद तक पहुंचने में समय लगता है, और यह पूरा चक्र बार-बार टूटता रहता है।
अचानक जागने पर बेहतर महसूस करने के तरीके
चूंकि नींद की जड़ता पूरी तरह टाली नहीं जा सकती, पर इसके असर को कुछ हद तक कम जरूर किया जा सकता है। अगर संभव हो तो जागने के तुरंत बाद तेज़ रोशनी में आना, खासकर प्राकृतिक धूप में, दिमाग को जल्दी सतर्क होने में मदद कर सकता है। क्योंकि रोशनी दिमाग को यह संकेत भेजती है कि अब जागने का वक्त है। इसके अलावा जागने के तुरंत बाद कोई बड़ा या महत्वपूर्ण फैसला लेने से बचना समझदारी है, क्योंकि उस वक्त दिमाग का तार्किक हिस्सा अभी पूरी तरह सक्रिय नहीं हुआ होता, जिससे गलत फैसले की आशंका बढ़ सकती है।
नियमित और पर्याप्त नींद का रूटीन बनाए रखना भी नींद की जड़ता को कम करने में मदद करता है। क्योंकि जब शरीर को पर्याप्त और निरंतर नींद मिलती रहती है, तो अचानक जागने पर भी भ्रम अपेक्षाकृत जल्दी साफ होता है, क्योंकि दिमाग पर पहले से नींद की कमी का बोझ नहीं होता।
रात में अचानक नींद खुलने पर महसूस होने वाला भारीपन और भ्रम कोई असामान्य बात नहीं, बल्कि यह दिमाग के अलग-अलग हिस्सों के अलग-अलग रफ्तार से जागने का स्वाभाविक नतीजा है। बुनियादी होश तो तुरंत लौट आता है, पर तार्किक सोच और गहरी समझ के लिए जिम्मेदार हिस्सा धीरे-धीरे सक्रिय होता है, और यही असंतुलन कुछ मिनटों से लेकर करीब आधे घंटे तक बना रह सकता है, खासकर अगर जागना गहरी नींद के दौरान हुआ हो। यह समझ लेने के बाद अगली बार जब आपकी नींद अचानक टूटे, तो यह जानना आसान हो जाएगा कि वह भ्रम भरा एहसास असल में आपके दिमाग के भीतर चल रही एक बेहद दिलचस्प, पर पूरी तरह स्वाभाविक प्रक्रिया का हिस्सा है, जो कुछ ही देर में अपने आप शांत हो जाएगी।


