Newstrack Special: ‘हनीमून सिस्टाइटिस’ क्या है? यह कितना आम है और इससे कैसे बचा जा सकता है?

What is Honeymoon Cystitis: हनीमून सिस्टाइटिस क्या है और शादी या सेक्स के बाद पेशाब में जलन व बार-बार पेशाब क्यों आता है? जानिए इसके कारण, लक्षण, इलाज और बचाव के आसान तरीके।

Yogesh Mishra
Published on: 20 Aug 2026 6:10 PM IST
What is Honeymoon Cystitis Explained
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What is Honeymoon Cystitis Explained

What is Honeymoon Cystitis: शादी के कुछ दिन बाद सब कुछ सामान्य चल रहा है, लेकिन अचानक पेशाब करते समय तेज जलन होने लगे। बार-बार पेशाब आए, लेकिन हर बार कुछ बूंदें या बहुत थोड़ी मात्रा में ही पेशाब निकले। पेट के निचले हिस्से में भारीपन या दर्द महसूस हो और लगे कि पेशाब करने के बाद भी मूत्राशय (bladder) पूरी तरह खाली नहीं हुआ। कई महिलाओं को ऐसी परेशानी पहली बार शादी के बाद या नए यौन संबंध की शुरुआत के बाद होती है। इसी वजह से इसे आम बोलचाल में ‘हनीमून सिस्टाइटिस’ कहा जाता है।

क्या है हनीमून सिस्टाइटिस?

दरअसल, ‘हनीमून सिस्टाइटिस’ कोई अलग बीमारी नहीं है। यह आम तौर पर यौन संबंध के बाद होने वाले मूत्राशय संक्रमण (urinary infection), यानी निचले मूत्रमार्ग संक्रमण (lower urinary tract infection) का आम बोलचाल का नाम है। इसका संबंध खास तौर पर उन महिलाओं से जोड़ा गया जिनमें विवाह या नए यौन संबंध की शुरुआत के बाद सेक्स की आवृत्ति अचानक बढ़ी और कुछ दिनों या हफ्तों में बार-बार पेशाब में जलन, बार-बार पेशाब लगना, पेट के निचले हिस्से में भारीपन या दर्द जैसी शिकायतें होने लगीं। इसी ऐतिहासिक संदर्भ से इसे ‘हनीमून सिस्टाइटिस’ कहा जाने लगा। लेकिन यह सिर्फ हनीमून पर नहीं होता। किसी भी उम्र की यौन सक्रिय महिला में संभोग के बाद सिस्टाइटिस हो सकता है। यौन सक्रियता महिलाओं में मूत्र संक्रमण का स्थापित जोखिम-कारक है।

क्या ये यौन संक्रमण है?

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि सिस्टाइटिस सामान्यतः यौन संचारित संक्रमण नहीं है। अधिकांश साधारण सिस्टाइटिस में जिम्मेदार जीवाणु बाहर से आए किसी यौन रोग के जीवाणु नहीं, बल्कि महिला की अपनी आंत में सामान्य रूप से रहने वाले जीवाणु होते हैं, विशेष रूप से Escherichia coli, यानी ई.कोलाई। ये मलद्वार और उसके आसपास मौजूद हो सकते हैं। संभोग के दौरान घर्षण और त्वचा की गतिविधि इन्हें मूत्रमार्ग के मुहाने तक पहुँचा सकती है। वहाँ से वे मूत्रमार्ग के रास्ते ऊपर चढ़कर मूत्राशय में पहुँच जाएँ तो संक्रमण और सूजन पैदा कर सकते हैं। यानी कई बार संक्रमण बाहर से किसी दूसरे व्यक्ति ने दिया ही नहीं होता। शरीर के अपने सामान्य जीवाणु ही गलत जगह पहुंचकर परेशानी पैदा कर देते हैं। इसीलिए हनीमून सिस्टाइटिस को सीधे यौन संक्रमण मान लेना गलत है।

महिलाओं में यह ज्यादा क्यों होता है?

इसका मुख्य कारण शरीर की बनावट है। महिलाओं का मूत्रमार्ग (Urethra) पुरुषों की तुलना में बहुत छोटा होता है और उसका बाहरी मुहाना योनि तथा गुदा के अपेक्षाकृत करीब होता है। इसलिए जीवाणुओं को मूत्राशय तक पहुँचने के लिए कम दूरी तय करनी पड़ती है। CDC इसी छोटी मूत्रनली (Ureter) को महिलाओं में यूटीआई का प्रमुख शारीरिक जोखिम-कारक मानता है।

संभोग के दौरान मूत्रमार्ग के आसपास यांत्रिक घर्षण भी होता है। इससे जीवाणुओं का स्थानांतरण आसान हो सकता है और कभी-कभी मूत्रमार्ग के आसपास हल्की जलन भी हो सकती है। इसलिए किसी महिला को पहली बार अधिक बार सेक्स होने के बाद अचानक सिस्टाइटिस हो जाए तो इसका अर्थ यह नहीं कि साथी ने कोई संक्रमण “दे दिया”। कई बार सिर्फ गतिविधि और शारीरिक परिस्थितियों में बदलाव ही पर्याप्त होते हैं।

हालाँकि यदि स्राव, जननांग घाव, दुर्गंध, संभोग में दर्द या किसी नए साथी के बाद संक्रमण का संदेह हो तो क्लैमाइडिया, गोनोरिया जैसे यौन संक्रमणों को अलग से जाँचना पड़ सकता है, क्योंकि उनकी शिकायतें कभी-कभी यूटीआई जैसी लग सकती हैं।

इसके लक्षण क्या होते हैं?

हनीमून सिस्टाइटिस के लक्षण आम तौर पर पहचानना मुश्किल नहीं होते। सबसे आम लक्षण है पेशाब करते समय जलन या दर्द। इसके साथ बहुत जल्दी-जल्दी पेशाब लग सकता है, लेकिन हर बार थोड़ी मात्रा में पेशाब आता है। कुछ महिलाओं को ऐसा लगता है कि अभी-अभी पेशाब किया है, फिर भी दोबारा पेशाब आ रहा है। पेट के निचले हिस्से में दबाव, भारीपन या हल्का दर्द भी हो सकता है। पेशाब धुंधला या तेज गंध वाला हो सकता है और कभी उसमें थोड़ा खून भी दिखाई दे सकता है।

लेकिन एक बात बहुत ध्यान से समझनी चाहिए। हर पेशाब में जलन यूटीआई नहीं होती। योनि संक्रमण, यौन संक्रमण या दूसरी समस्याएं भी पेशाब करते समय जलन पैदा कर सकती हैं। इसलिए अगर लक्षण बार-बार हों या सामान्य इलाज से ठीक न हों तो सही जांच जरूरी है। अगर इसके साथ तेज बुखार, ठंड लगना, कमर या पीठ के एक तरफ तेज दर्द, उल्टी या बहुत कमजोरी होने लगे तो केवल साधारण सिस्टाइटिस मानकर नहीं बैठना चाहिए। संक्रमण गुर्दे तक पहुँच सकता है। ऐसी स्थिति में डाक्टरी सहायता जल्दी लेनी चाहिए।

‘हनीमून’ शब्द क्यों जुड़ा?

यह नाम चिकित्सा की पुरानी बोलचाल से आया। देखा गया कि कुछ युवा महिलाओं को विवाह के तुरंत बाद या यौन गतिविधि (sexual activity) की शुरुआत के बाद बार-बार सिस्टाइटिस होने लगा। पहले विवाह ही अक्सर नियमित यौन जीवन की शुरुआत का समय होता था, इसलिए चिकित्सकों ने इसे लोकप्रिय रूप से ‘honeymoon cystitis’ कहना शुरू कर दिया।

आज सामाजिक परिस्थितियाँ बदल चुकी हैं, इसलिए यह नाम सिर्फ बोलचाल वाला ही है। डाक्टरी रूप से बेहतर शब्द हैं - post-coital cystitis या sex-associated UTI, यानी संभोग के बाद होने वाला मूत्र संक्रमण।

यह कितना आम है?

महिलाओं में यूटीआई बहुत आम है। जीवनकाल में बड़ी संख्या में महिलाओं को कम-से-कम एक बार इसका अनुभव होता है। यौन सक्रियता, विशेष रूप से युवा महिलाओं में, प्रमुख जोखिम-कारकों में से है। पुराने महामारी-विज्ञान अध्ययनों और बाद की समीक्षाओं ने यह दिखाया है कि युवा यौन सक्रिय महिलाओं में संभोग की आवृत्ति बढ़ने के साथ यूटीआई का जोखिम भी बढ़ता है। लेकिन ‘हनीमून सिस्टाइटिस हर तीसरी नई दुल्हन को होता है’ जैसी कोई विश्वसनीय सार्वभौमिक संख्या नहीं है। इसकी दर जनसंख्या, उम्र, यौन व्यवहार, गर्भनिरोधक विधि और पहले से यूटीआई की प्रवृत्ति के अनुसार बदलती है। इसलिए इसे आम समस्या कहना उचित है, लेकिन किसी एक प्रतिशत को पूरी दुनिया पर लागू करना उचित नहीं। यदि किसी महिला को छह महीने में दो या एक वर्ष में तीन या अधिक यूटीआई हों तो इसे सामान्यतः recurrent UTI यानी बार-बार होने वाला मूत्र संक्रमण माना जाता है, और फिर रोकथाम की विशेष रणनीति पर विचार किया जा सकता है।

क्या पहली बार सेक्स से ही यह ज्यादा होता है?

पहली बार सेक्स स्वयं कोई खास जीवाणु पैदा नहीं करता। लेकिन यदि पहले यौन गतिविधि कम थी और अचानक संभोग की आवृत्ति काफी बढ़ गई तो मूत्रमार्ग के आसपास जीवाणुओं के स्थानांतरण के अवसर भी बढ़ जाते हैं। इसी वजह से नया संबंध या ‘हनीमून’ इसका प्रतीक बन गया। यह भी देखा गया है कि कुछ महिलाओं को लगभग हर बार सेक्स करने के बाद यूटीआई हो जाता है, जबकि दूसरों को कभी नहीं। इसके पीछे व्यक्तिगत शारीरिक संरचना, योनि के सूक्ष्मजीव, आनुवंशिक प्रवृत्ति, पहले के यूटीआई और गर्भनिरोधक विधि जैसे कई कारण हो सकते हैं।

गर्भनिरोधक से भी जोखिम बदल सकता है?

विशेष रूप से स्पर्मिसाइड, यानी शुक्राणुनाशक पदार्थ, बार-बार होने वाले यूटीआई के जोखिम से जुड़े हैं। डायफ्राम के साथ स्पर्मिसाइड का उपयोग भी जोखिम बढ़ा सकता है। बार-बार संभोग के बाद सिस्टाइटिस वाली महिलाओं में डॉक्टर अक्सर गर्भनिरोधक विधि के बारे में पूछते हैं। AUA की recurrent UTI guideline में भी यौन संबंध और स्पर्मिसाइड उपयोग को महत्वपूर्ण इतिहास का हिस्सा माना गया है। इसलिए यदि समस्या बार-बार हो रही हो और स्पर्मिसाइड इस्तेमाल हो रहा हो तो डॉक्टर से किसी वैकल्पिक गर्भनिरोधक पर चर्चा करना उपयोगी हो सकता है।

सेक्स के बाद पेशाब करने की सलाह क्यों दी जाती है?

विचार यह है कि यदि संभोग के दौरान कुछ जीवाणु मूत्रमार्ग में पहुँच गए हों तो पेशाब की धारा उन्हें बाहर निकालने में मदद कर सकती है। CDC और NHS दोनों सेक्स के बाद पेशाब करने को रोकथाम के व्यावहारिक उपायों में शामिल करते हैं। लेकिन यह कोई शत-प्रतिशत सुरक्षा नहीं है। पेशाब करने से जोखिम कम हो सकता है, लेकिन जीवाणु हमेशा पूरी तरह बाहर नहीं निकलते।अच्छी आदत यह है कि संभोग के बाद बहुत देर तक पेशाब न रोकें। यदि पेशाब नहीं लग रहा तो जबरन अत्यधिक पानी पीकर तुरंत मूत्र त्याग करना भी जरूरी नहीं। सामान्य हाइड्रेशन पर्याप्त है।

पानी पीने से क्या फर्क पड़ता है?

पर्याप्त पानी पीने से व्यक्ति नियमित रूप से पेशाब करता है। इससे मूत्रमार्ग और मूत्राशय में जीवाणुओं को लंबे समय तक टिकने का अवसर कम हो सकता कुछ महिलाओं में कम पानी पीना और लंबे समय तक पेशाब रोकना यूटीआई की प्रवृत्ति को बढ़ा सकता है।लेकिन ‘दिन में पाँच लीटर पानी पीजिए और यूटीआई कभी नहीं होगा’ भी गलत है। अत्यधिक पानी भी नुकसानदेह हो सकता है। सामान्य लक्ष्य है कि इतना पानी कि प्यास न लगे और नियमित पेशाब आता रहे, जब तक किसी हृदय या गुर्दे की बीमारी के कारण डॉक्टर ने तरल सीमित न किया हो।

साफ-सफाई कितनी जरूरी है?

उचित स्वच्छता महत्वपूर्ण है, लेकिन अत्यधिक सफाई उल्टा नुकसान भी कर सकती है। शौच के बाद आगे से पीछे की ओर साफ करना उपयोगी है, ताकि गुदा क्षेत्र के जीवाणु मूत्रमार्ग की ओर न आएँ। लेकिन योनि के भीतर साबुन, सुगंधित स्प्रे या डूशिंग की आवश्यकता नहीं। ऐसी चीजें सामान्य योनि जीवाणु-संतुलन को बिगाड़ सकती हैं और जलन पैदा कर सकती हैं। जरूरत से ज्यादा सफाई समस्या को कम करने के बजाय जलन बढ़ा सकती है। CDC जननांग क्षेत्र में डूशिंग, स्प्रे और पाउडर कम करने की सलाह देता है। सादा पानी अक्सर बाहरी सफाई के लिए पर्याप्त है। शौच के बाद आगे से पीछे की ओर सफाई करना उपयोगी है। इससे गुदा क्षेत्र के जीवाणुओं के मूत्रमार्ग की तरफ पहुंचने की संभावना कम करने में मदद मिल सकती है।

क्या ज्यादा सेक्स करने से खतरा बढ़ता है?

हाँ। लंबे या बार-बार संभोग में यदि पर्याप्त प्राकृतिक चिकनाई न हो तो मूत्रमार्ग और आसपास के ऊतक (tissue) में अधिक घर्षण (friction) हो सकता है। इससे स्थानीय जलन बढ़ सकती है और संभवतः जीवाणुओं के प्रवेश में मदद मिल सकती है। अगर सूखापन समस्या हो तो उपयुक्त चिकनाई का इस्तेमाल मददगार हो सकता है। विशेष रूप से रजोनिवृत्ति (menopause) के बाद एस्ट्रोजन कम होने से योनि और मूत्रमार्ग के ऊतक पतले तथा अधिक संवेदनशील हो सकते हैं; इसी वजह से इस उम्र में यूटीआई के जोखिम का तंत्र थोड़ा अलग भी हो सकता है। रजोनिवृत्ति के हार्मोनल बदलाव को यूटीआई जोखिम का कारक माना जाता है। बार-बार यूटीआई वाली रजोनिवृत्त महिलाओं में स्थानीय योनि एस्ट्रोजन कई दिशानिर्देशों में प्रभावी रोकथाम विकल्प है, यदि चिकित्सकीय रूप से उपयुक्त हो।

कंडोम से बचाव होता है या बढ़ता है?

कंडोम का मुख्य काम यूटीआई रोकना नहीं है। यह यौन संक्रमणों और अनचाहे गर्भ से बचाव का बेहद महत्वपूर्ण तरीका है, लेकिन सामान्य यूटीआई अक्सर व्यक्ति के अपने शरीर में मौजूद जीवाणुओं के कारण होता है। इसलिए कंडोम पहनने से सामान्य यूटीआई का खतरा पूरी तरह खत्म नहीं होता। लेकिन अगर किसी कंडोम या दूसरे गर्भनिरोधक उत्पाद में स्पर्मिसाइड मौजूद है और महिला को बार-बार यूटीआई होता है तो डॉक्टर से दूसरे विकल्प पर बात की जा सकती है। सम्जहने वाली बात है कि यूटीआई सामान्यतः यौन संचारित बीमारी नहीं है। वह साथी से आने वाले किसी खास यौन रोगजनक के बजाय आसपास के जीवाणुओं के मूत्रमार्ग में जाने से होता है।

क्या सेक्स रोक देना इलाज है?

तीव्र सिस्टाइटिस में यदि सेक्स दर्द या जलन बढ़ाता है तो लक्षण ठीक होने तक कुछ समय बचना आरामदायक हो सकता है। लेकिन जीवनभर सेक्स से बचना समाधान नहीं। यदि संक्रमण बार-बार संभोग से जुड़ा हो तो उसके लिए विशिष्ट रोकथाम उपलब्ध है।

अगर हर बार सेक्स के बाद यूटीआई हो तो?

यह स्थिति सामान्य हनीमून सिस्टाइटिस से आगे बढ़कर बार-बार होने वाला यूटीआई हो सकती है। आम तौर पर छह महीने में दो या एक साल में तीन या उससे ज्यादा यूटीआई होने को बार-बार होने वाला मूत्र संक्रमण माना जाता है। ऐसे मामलों में सिर्फ हर बार नई एंटीबायोटिक लेना सही तरीका नहीं है। डॉक्टर पहले यह देख सकते हैं कि वास्तव में बार-बार जीवाणु संक्रमण हो रहा है या कोई दूसरी समस्या यूटीआई जैसी शिकायत पैदा कर रही है। जरूरत पड़ने पर पेशाब की जांच और कल्चर किया जाता है। इससे पता चल सकता है कि कौन सा जीवाणु मौजूद है और कौन सी दवा उस पर असर करेगी।

अगर यह साफ हो जाए कि संक्रमण बार-बार संभोग के बाद ही होता है तो कुछ महिलाओं में डॉक्टर संभोग के बाद लेने वाली कम खुराक की एंटीबायोटिक रोकथाम (post-coital antibiotic prophylaxis) पर विचार कर सकते हैं। लेकिन इसे खुद से शुरू नहीं करना चाहिए। बार-बार और गलत तरीके से एंटीबायोटिक लेने से जीवाणुओं में दवा के खिलाफ प्रतिरोध बढ़ सकता है और दूसरी परेशानियां भी हो सकती हैं।

क्या क्रैनबेरी वास्तव में मदद करती है?

क्रैनबेरी उत्पादों पर लंबे समय से शोध हुआ है। कुछ अध्ययनों में संकेत मिला है कि क्रैनबेरी के कुछ तत्व ई. कोलाई जैसे जीवाणुओं को मूत्रमार्ग और मूत्राशय की सतह से चिपकने में मुश्किल पैदा कर सकते हैं। इसलिए जिन महिलाओं को बार-बार यूटीआई होता है, उनमें क्रैनबेरी उत्पादों को रोकथाम के एक विकल्प के रूप में देखा जा सकता है। लेकिन यहां भी सावधानी जरूरी है। क्रैनबेरी अपने आप में कोई सक्रिय संक्रमण का इलाज नहीं है। विचार यह है कि क्रैनबेरी के कुछ घटक ई. कोलाई को मूत्रमार्ग की सतह से चिपकने में बाधा डाल सकते हैं। बार बार के यूटीआई वाली कुछ महिलाओं में लाभ के प्रमाण हैं, लेकिन उत्पाद और मात्रा में बहुत अंतर है। तो सिर्फ क्रैनबेरी खाकर इलाज पूरा हो जाएगा, ऐसा मानना गलत है। इसके अलावा अलग-अलग क्रैनबेरी उत्पादों में सक्रिय तत्व की मात्रा अलग हो सकती है। अर्थात क्रैनबेरी कुछ लोगों में रोकथाम का विकल्प हो सकती है, एंटीबायोटिक का विकल्प नहीं जब वास्तविक जीवाणु संक्रमण का उपचार जरूरी हो।

प्रोबायोटिक या दही से बचाव होता है?

योनि के सामान्य जीवाणुओं में लैक्टोबैसिलस (Lactobacillus) जैसे जीवाणु महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए प्रोबायोटिक से यूटीआई रोकने का विचार वैज्ञानिक रूप से आकर्षक है। लेकिन अभी उपलब्ध शोध के आधार पर हर महिला के लिए किसी एक प्रोबायोटिक को पक्का और प्रभावी इलाज मानना सही नहीं होगा। दही खाना स्वस्थ आहार का हिस्सा हो सकता है, लेकिन यह कहना कि रोज दही खाने से हनीमून सिस्टाइटिस नहीं होगा, वैज्ञानिक रूप से सही नहीं है। दही स्वस्थ आहार का हिस्सा हो सकता है, लेकिन वह हनीमून सिस्टाइटिस से निश्चित बचाव नहीं है।

क्या यूटीआई को घर पर केवल पानी पीकर ठीक किया जा सकता है?

हल्के लक्षण कभी-कभी स्वयं बेहतर हो सकते हैं, लेकिन इसे नियम नहीं बनाना चाहिए। खास तौर पर पहली बार लक्षण हों, गर्भावस्था हो, बार-बार संक्रमण हो, पुरुष में यूटीआई हो, रक्त अधिक आए या बुखार/कमर दर्द हो तो चिकित्सकीय मूल्यांकन उचित है।एंटीबायोटिक तभी और उतनी अवधि के लिए लेना चाहिए जितनी चिकित्सकीय आवश्यकता हो। बार-बार बिना जाँच के बची हुई पुरानी एंटीबायोटिक लेना गलत है। यदि recurrent UTI है तो urine culture विशेष महत्व रखता है, ताकि यह पुष्टि हो कि सच में जीवाणु संक्रमण है और कौन-सी दवा उस जीवाणु पर काम करेगी।

सिस्टाइटिस और यौन संक्रमण में भ्रम कैसे हो सकता है?

पेशाब में जलन केवल यूटीआई से नहीं होती। क्लैमाइडिया, गोनोरिया, ट्राइकोमोनास, जननांग हर्पीस और योनि संक्रमण भी जलन या असुविधा पैदा कर सकते हैं। यदि यूटीआई की दवा बार-बार ली जा रही हो लेकिन कल्चर नकारात्मक आए, या साथ में असामान्य योनि स्राव, घाव, रक्तस्राव या नए यौन साथी का इतिहास हो, तो यौन संक्रमण की जाँच महत्वपूर्ण है।यानी हर ‘हनीमून के बाद जलन’ को हनीमून सिस्टाइटिस मान लेना भी ठीक नहीं।

क्या ये पुरुषों में भी हो सकता है?

संभोग से संबंधित यूटीआई पुरुषों में भी संभव है। लेकिन युवा स्वस्थ पुरुषों में यह महिलाओं की तुलना में बहुत कम सामान्य है। इसका मुख्य कारण पुरुष मूत्रमार्ग का काफी लंबा होना है। किसी पुरुष को बार-बार पेशाब में जलन या स्राव हो तो केवल ‘हनीमून सिस्टाइटिस’ कहकर नहीं छोड़ना चाहिए। यौन संक्रमण, प्रोस्टेट या दूसरे मूत्ररोग कारणों की जाँच जरूरी हो सकती है।

गर्भावस्था में इसे हल्के में क्यों नहीं लेना चाहिए?

गर्भावस्था में यूटीआई को विशेष गंभीरता से लिया जाता है, क्योंकि संक्रमण ऊपर चढ़कर गुर्दे तक पहुँचने और गर्भावस्था संबंधी जटिलताओं का जोखिम बढ़ा सकता है। गर्भवती महिला में यूटीआई के लक्षण हों तो शीघ्र चिकित्सकीय मूल्यांकन कराना उचित है।

बचाव का सबसे व्यावहारिक तरीका क्या है?

अगर इसे कुछ सरल आदतों में समेटें तो पर्याप्त पानी पीना, पेशाब लंबे समय तक न रोकना, संभोग के बाद जल्दी पेशाब करना, शौच के बाद आगे से पीछे साफ करना, जननांग क्षेत्र में कठोर साबुन और सुगंधित डूश से बचना और बार-बार यूटीआई होने पर स्पर्मिसाइड वाले गर्भनिरोधक पर पुनर्विचार करना उपयोगी है।

लेकिन एक जरूरी बात यह भी है कि महिला स्वयं को ‘गंदा’ समझकर जरूरत से ज्यादा धोना शुरू न करे। हनीमून सिस्टाइटिस खराब स्वच्छता या चरित्र की बीमारी नहीं है। यह मुख्यतः महिला मूत्रमार्ग की शारीरिक संरचना और संभोग के दौरान जीवाणुओं के यांत्रिक स्थानांतरण से जुड़ी समस्या है।

इसकी पूरी प्रक्रिया को बहुत सरल रूप में समझें। आंत के सामान्य जीवाणु जननांग और गुदा के आसपास मौजूद हैं। संभोग के दौरान कुछ जीवाणु मूत्रमार्ग के मुहाने तक पहुँचते हैं। महिला की मूत्रनली छोटी है, इसलिए जीवाणु अपेक्षाकृत आसानी से मूत्राशय तक पहुँच सकते हैं। वहाँ वे बढ़ते हैं और मूत्राशय की अंदरूनी परत में सूजन पैदा करते हैं। परिणाम होता है - जलन, बार-बार पेशाब और निचले पेट में असुविधा।

इसीलिए ‘हनीमून सिस्टाइटिस’ का सबसे सही अर्थ है - यौन संबंध से जुड़ा सामान्य मूत्राशय संक्रमण, न कि कोई अलग यौन रोग। यह आम है, अधिकतर आसानी से उपचार योग्य है और जिन महिलाओं में बार-बार होता है उनके लिए प्रभावी रोकथाम के कई विकल्प उपलब्ध हैं। सबसे जरूरी बात है कि बार-बार होने वाले हर प्रकरण को केवल अनुमान से एंटीबायोटिक न दिया जाए; सही निदान किया जाए और फिर उसी के अनुसार रोकथाम की रणनीति चुनी जाए।

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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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