Sabse Jyada Cancer Wala Desh: किन देशों में कैंसर ज्यादा पाया जाता है और किनमें कम?

Sabse Jyada Cancer Wala Desh: दुनिया में किन देशों में कैंसर की दर सबसे ज्यादा और सबसे कम है? जानिए ऑस्ट्रेलिया में कैंसर दर इतनी ऊंची क्यों है, भारत की दर कम क्यों दिखती है और उम्र, लाइफस्टाइल, जीन, संक्रमण, जांच व इलाज का कितना असर पड़ता है।

Neel Mani Lal
Published on: 20 Aug 2026 7:01 PM IST
Sabse Jyada Cancer Wala Desh
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Sabse Jyada Cancer Wala Desh

Sabse Jyada Cancer Wala Desh: दुनिया में कैंसर कहीं ज्यादा दिखाई देता है और कहीं कम। कुछ देशों में हर एक लाख लोगों पर कैंसर के नए मामले बहुत ज्यादा दर्ज होते हैं, जबकि कुछ देशों में यह संख्या काफी कम दिखती है। पहली नजर में लगता है कि शायद उन देशों के लोग ज्यादा बीमार हैं या वहां की जीवनशैली ज्यादा खराब है। लेकिन कैंसर की दुनिया इतनी सीधी नहीं है।

मिसाल के तौर पर 2022 के वैश्विक आंकड़ों में ऑस्ट्रेलिया में सभी तरह के कैंसर की उम्र-मानकीकृत दर करीब 462.5 मामले प्रति एक लाख थी, जबकि भारत में यह करीब 98.5 थी। अमेरिका में यह दर 367, न्यूजीलैंड में 427.3 और डेनमार्क में 374.7 थी। दूसरी तरफ कई गरीब देशों में दर्ज दर इससे बहुत कम है। तो क्या इसका मतलब यह है कि भारत में लोग ऑस्ट्रेलिया के लोगों से चार-पांच गुना ज्यादा स्वस्थ हैं? जवाब है - बिल्कुल नहीं।

कैंसर के आंकड़ों को समझने के लिए सिर्फ यह देखना काफी नहीं है कि कितने मरीज मिले। यह भी देखना पड़ता है कि देश की आबादी कितनी बूढ़ी है, लोग क्या खाते-पीते हैं, धूम्रपान और शराब का चलन कितना है, किस तरह के संक्रमण आम हैं, कैंसर की जांच कितनी होती है और स्वास्थ्य व्यवस्था कितने मामलों को पकड़ पाती है। यानी किसी देश में कैंसर की दर सिर्फ बीमारी की कहानी नहीं बताती। वह उस देश की उम्र, जीवनशैली, पर्यावरण, जीन, जांच व्यवस्था और स्वास्थ्य व्यवस्था की भी कहानी बताती है।

कैंसर की दर और मरीजों की संख्या एक चीज नहीं हैं?

यह अंतर बहुत महत्वपूर्ण है। भारत में 2022 में करीब 14.13 लाख नए कैंसर मामले दर्ज किए गए, जबकि अमेरिका में करीब 23.8 लाख और चीन में करीब 48.25 लाख। अगर केवल कुल मरीजों की संख्या देखें तो चीन, अमेरिका और भारत दुनिया के सबसे बड़े कैंसर बोझ वाले देशों में दिखाई देते हैं। लेकिन चीन की आबादी भारत से बहुत बड़ी है और अमेरिका की आबादी भारत से काफी कम है। इसलिए सिर्फ कुल मरीजों की संख्या से यह तय नहीं किया जा सकता कि वहां कैंसर का जोखिम कितना ज्यादा है। इसके लिए वैज्ञानिक अक्सर उम्र-मानकीकृत दर, यानी Age-Standardised Rate (ASR) का इस्तेमाल करते हैं। यह एक तरह से अलग-अलग देशों को एक ही उम्र वाली काल्पनिक आबादी के आधार पर तुलना करने का तरीका है। क्योंकि कैंसर का खतरा उम्र के साथ बहुत बढ़ता है। इसीलिए जब भारत और ऑस्ट्रेलिया की तुलना करनी हो तो केवल यह कहना कि ऑस्ट्रेलिया में इतने लाख मरीज हैं और भारत में इतने लाख, पर्याप्त नहीं है।

किन देशों में कैंसर की दर सबसे ज्यादा है?

2022 के आंकड़ों में सभी कैंसर को मिलाकर, जिसमें त्वचा का गैर-मेलानोमा कैंसर भी शामिल है, ऑस्ट्रेलिया की उम्र-मानकीकृत दर दुनिया में सबसे ज्यादा थी - करीब 462.5 मामले प्रति एक लाख। उसके बाद न्यूजीलैंड करीब 427.3, डेनमार्क 374.7, अमेरिका 367 और नॉर्वे 357.9 पर थे। अगर गैर-मेलानोमा त्वचा कैंसर को हटा दें तो तस्वीर थोड़ी बदल जाती है। इस स्थिति में डेनमार्क करीब 349.8, नॉर्वे 340.3, ऑस्ट्रेलिया 322.4, हंगरी 321.2 और फ्रांस करीब 316.6 की दर के साथ ऊपर दिखाई देते हैं। यूरोप में भी कैंसर की दर काफी ऊंची है। डेनमार्क, नॉर्वे, आयरलैंड और नीदरलैंड जैसे देशों में दरें ऊंची हैं।

ऑस्ट्रेलिया में इतना कैंसर क्यों?

ऑस्ट्रेलिया का उदाहरण बहुत दिलचस्प है क्योंकि वहां कैंसर का पता लगाने की व्यवस्था भी मजबूत है और कुछ खास कैंसर के जोखिम भी काफी महत्वपूर्ण हैं। सबसे बड़ा कारणों में से एक वहां की आबादी में त्वचा कैंसर का बड़ा बोझ है। ऑस्ट्रेलिया में पराबैंगनी यानी अल्ट्रा वायलेट (UV) रेडिएशन का संपर्क महत्वपूर्ण जोखिम है और त्वचा के कैंसर की दर काफी ज्यादा है। इसके अलावा वहां की आबादी अपेक्षाकृत उम्रदराज है, स्वास्थ्य सेवाएं मजबूत हैं और कैंसर की जांच तथा रजिस्ट्रेशन व्यवस्था भी अच्छी है। यानी वहां ज्यादा कैंसर दर्ज होने का एक अर्थ यह भी हो सकता है कि बीमारी को खोजने और दर्ज करने की क्षमता बेहतर है। यह बात बहुत महत्वपूर्ण है। किसी देश में ज्यादा मामले मिलना हमेशा यह साबित नहीं करता कि वहां बीमारी पैदा होने की दर ही उतनी ज्यादा है। कभी-कभी बेहतर जांच भी ज्यादा मामलों को सामने ले आती है।

फिर गरीब देशों में कैंसर कम क्यों दिखाई देता है?

अगर किसी गरीब देश में कैंसर की जांच बहुत कम होती है, लोग अस्पताल देर से पहुंचते हैं, कैंसर रजिस्ट्रियां कमजोर हैं और कई मरीज बिना सही जांच के ही मर जाते हैं, तो आधिकारिक आंकड़ों में कैंसर के मामले कम दिखाई दे सकते हैं। इसका मतलब यह नहीं कि वहां कैंसर सचमुच बहुत कम है। यही कारण है कि दुनिया के कम विकसित क्षेत्रों में कम दर्ज की गई कैंसर दर को सीधे लोग ज्यादा स्वस्थ हैं के रूप में पढ़ना गलत होगा। विश्व कैंसर आंकड़ों के विश्लेषण में भी यह साफ दिखता है कि अधिक विकसित देशों में कैंसर की उम्र-मानकीकृत घटना दर ज्यादा है, लेकिन कम विकसित देशों में कैंसर से होने वाली मृत्यु का बोझ अपेक्षाकृत ज्यादा हो सकता है। यानी कैंसर ज्यादा होना और कैंसर से ज्यादा मरना एक ही बात नहीं है।

भारत में कैंसर की दर अमेरिका और यूरोप से कम क्यों है?

भारत में 2022 में सभी कैंसरों की उम्र-मानकीकृत दर करीब 98.5 प्रति एक लाख थी, जबकि गैर-मेलानोमा त्वचा कैंसर हटाने पर यह करीब 97.7 थी। यह दर अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और पश्चिमी यूरोप के मुकाबले काफी कम है। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं। भारत की आबादी अपेक्षाकृत युवा है। यहां पश्चिमी यूरोप और जापान जैसे देशों की तुलना में बहुत बड़ी आबादी कम उम्र में है। चूंकि कैंसर उम्र के साथ तेजी से बढ़ता है, इसलिए युवा आबादी वाले देश में कच्ची कैंसर दर कम दिखाई दे सकती है। लेकिन सिर्फ उम्र ही वजह नहीं है। भारत में कैंसर के प्रकारों का पैटर्न भी अलग है। महिलाओं में स्तन और गर्भाशय ग्रीवा का कैंसर महत्वपूर्ण हैं, जबकि पुरुषों में तंबाकू से जुड़े मुंह और फेफड़े के कैंसर का बड़ा महत्व है। इसके साथ ही संक्रमण से जुड़े कैंसर भी भारत जैसे देशों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

उम्र कैंसर की कहानी को कितना बदल देती है?

कैंसर को काफी हद तक उम्र से जुड़ी बीमारी भी कहा जा सकता है। इसका मतलब यह नहीं कि युवा लोगों को कैंसर नहीं होता। होता है। लेकिन उम्र बढ़ने के साथ कैंसर का जोखिम तेजी से बढ़ता है। WHO के मुताबिक उम्र बढ़ने के साथ कैंसर की घटना तेजी से बढ़ती है। इसकी एक वजह यह है कि शरीर की कोशिकाएं वर्षों तक अलग-अलग जोखिमों के संपर्क में आती रहती हैं और समय के साथ कोशिकाओं में नुकसान जमा होता जाता है। उम्र बढ़ने पर कोशिकाओं की मरम्मत करने वाली प्रक्रियाएं भी पहले जैसी प्रभावी नहीं रह सकतीं। यही कारण है कि जापान जैसे बुजुर्ग आबादी वाले देश में कैंसर के कुल मामले ज्यादा दिखाई दे सकते हैं। भारत की आबादी बड़ी है, लेकिन अभी भी उसका बड़ा हिस्सा अपेक्षाकृत युवा है। आने वाले दशकों में भारत की आबादी बूढ़ी होगी तो केवल उम्र के कारण ही कैंसर का बोझ बढ़ सकता है।

क्या ज्यादा जीना भी कैंसर का एक कारण है?

यह सुनने में अजीब लग सकता है, लेकिन आधुनिक चिकित्सा ने कई ऐसी बीमारियों से होने वाली मौतें कम कर दी हैं जिनसे लोग पहले कम उम्र में मर जाते थे। लोग अब ज्यादा उम्र तक जीवित रहते हैं। और जितनी लंबी उम्र होगी, उतने ज्यादा वर्षों तक शरीर की कोशिकाएं अलग-अलग जोखिमों के संपर्क में रहेंगी। इसलिए विकसित देशों में कैंसर का ज्यादा दिखाई देना कभी-कभी उनकी स्वास्थ्य व्यवस्था की सफलता का एक अप्रत्यक्ष परिणाम भी हो सकता है। लोग दूसरी बीमारियों से बचकर इतनी उम्र तक पहुंच रहे हैं जहां कैंसर का जोखिम बढ़ जाता है। लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं कि कैंसर को रोकने की कोशिश बेकार है। तंबाकू, शराब, मोटापा, शारीरिक निष्क्रियता, वायु प्रदूषण और कुछ संक्रमण जैसे जोखिमों को कम करके कैंसर का बड़ा हिस्सा रोका जा सकता है।

लाइफस्टाइल का कितना असर है?

कैंसर की कहानी में जीवनशैली का बड़ा रोल है। तंबाकू इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। सिगरेट, बीड़ी और दूसरे तंबाकू उत्पाद कई तरह के कैंसर का जोखिम बढ़ाते हैं। WHO और IARC के 2026 के विश्लेषण के मुताबिक 2022 में दुनिया भर के करीब 37 प्रतिशत नए कैंसर मामलों को 30 ऐसे कारणों से जोड़ा जा सकता था जिन्हें काफी हद तक रोका जा सकता है। इनमें तंबाकू सबसे बड़ा कारण था, जो करीब 15 प्रतिशत नए कैंसर मामलों से जुड़ा था। इसके बाद कैंसर पैदा करने वाले संक्रमण करीब 10 प्रतिशत और शराब करीब 3 प्रतिशत मामलों से जुड़े थे। शराब, ज्यादा वजन, कम शारीरिक गतिविधि, अस्वास्थ्यकर भोजन और वायु प्रदूषण भी कैंसर के जोखिम को बढ़ा सकते हैं। इसका मतलब यह नहीं कि जो व्यक्ति स्वस्थ जीवनशैली अपनाता है उसे कभी कैंसर नहीं होगा। कैंसर कई कारणों से होता है और कुछ जोखिम हमारे नियंत्रण से बाहर होते हैं। लेकिन जोखिम को कम करना संभव है।

जीन का कितना हाथ है?

कैंसर को केवल खान-पान या जीवनशैली की बीमारी मानना भी गलत है। हमारे शरीर की हर कोशिका के अंदर डीएनए होता है। डीएनए में ऐसे बदलाव हो सकते हैं जो कोशिका के सामान्य नियंत्रण को बिगाड़ दें और कैंसर की शुरुआत में भूमिका निभाएं। कुछ बदलाव उम्र और जीवनभर के दौरान होने वाले नुकसान के कारण आते हैं। कुछ बाहरी कारणों से जुड़े होते हैं और कुछ आनुवंशिक रूप से माता-पिता से मिल सकते हैं। लेकिन यहां भी एक महत्वपूर्ण बात है कि हर कैंसर आनुवंशिक बीमारी नहीं होता और हर कैंसर परिवार से नहीं आता। कुछ लोगों में ऐसी आनुवंशिक प्रवृत्ति होती है जिससे कुछ खास कैंसर का जोखिम बढ़ सकता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि कैंसर निश्चित रूप से होगा। WHO के अनुसार कैंसर सामान्य कोशिकाओं में होने वाले आनुवंशिक बदलावों और बाहरी कारकों के बीच जटिल बातचीत से पैदा होता है।

संक्रमण भी कैंसर पैदा कर सकते हैं

यह बात भारत जैसे देशों के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण है। कुछ संक्रमण लंबे समय में कैंसर का खतरा बढ़ा सकते हैं। उदाहरण के लिए एचपीवी सर्वाइकल कैंसर से जुड़ा है। हेपेटाइटिस बी और सी वायरस लिवर कैंसर का जोखिम बढ़ा सकते हैं। Helicobacter pylori पेट के कैंसर से जुड़ा है। WHO के अनुसार 2022 में दुनिया भर के लगभग 10 प्रतिशत कैंसर मामलों को कैंसर पैदा करने वाले संक्रमणों से जोड़ा गया था। कम और निम्न-मध्यम आय वाले देशों में इन संक्रमणों का महत्व और ज्यादा है। यही वजह है कि कैंसर रोकने में सिर्फ “जंक फूड मत खाओ” कहना पर्याप्त नहीं है। टीकाकरण, संक्रमण की रोकथाम, स्वच्छता और समय पर इलाज भी महत्वपूर्ण हैं।

हेल्थकेयर सिस्टम का कितना असर है?

मान लीजिए दो देशों में बीमारी की वास्तविक दर लगभग समान है। पहले देश में हर व्यक्ति को समय पर डॉक्टर, जांच, स्कैन और बायोप्सी की सुविधा मिल जाती है। दूसरे देश में लोग अस्पताल देर से पहुंचते हैं और जांच की सुविधा सीमित है। पहले देश में कैंसर के ज्यादा मामले रिकॉर्ड होंगे। इसलिए ज्यादा दर्ज कैंसर का मतलब हमेशा ज्यादा वास्तविक कैंसर नहीं होता। लेकिन हेल्थकेयर सिस्टम का दूसरा पहलू और ज्यादा महत्वपूर्ण है - मृत्यु। अगर कैंसर जल्दी पकड़ में आ जाए और सही इलाज मिल जाए तो कई कैंसर में मरीज के बचने की संभावना काफी बढ़ सकती है। WHO भी कहता है कि मजबूत स्वास्थ्य व्यवस्था वाले देशों में शुरुआती पहचान, बेहतर इलाज और आगे की देखभाल के कारण कई कैंसरों में जीवित रहने की दर बेहतर हो रही है। यानी बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था दो विरोधी तस्वीरें एक साथ पैदा कर सकती है - ज्यादा कैंसर सामने आना और कैंसर से कम लोगों का मरना।

अमीर देशों में कैंसर की घटना दर अक्सर ज्यादा है लेकिन कई कैंसरों के मरीजों को बेहतर जांच और इलाज मिल जाता है। गरीब देशों में दर्ज घटना दर कम हो सकती है, लेकिन मरीज देर से अस्पताल पहुंच सकते हैं और इलाज तक पहुंच सीमित हो सकती है। इसलिए सिर्फ किस देश में कैंसर ज्यादा है?पूछना आधा सवाल है। सही सवाल होना चाहिए, किस देश में कैंसर के नए मामले कितने हैं, किस उम्र में हैं, किस तरह का कैंसर है, कितने मामलों की जांच हो रही है और कैंसर से कितनी मौतें हो रही हैं?

भारत के लिए आने वाले सालों में क्या चुनौती है?

भारत के सामने कैंसर की दोहरी चुनौती है। एक तरफ तंबाकू, वायु प्रदूषण, मोटापा, कम शारीरिक गतिविधि और बदलती खान-पान की आदतों से जुड़े जोखिम बढ़ रहे हैं। दूसरी तरफ आबादी धीरे-धीरे बूढ़ी होगी। इसका मतलब है कि आने वाले वर्षों में कैंसर के मामलों की कुल संख्या बढ़ सकती है, भले ही कुछ कैंसरों की उम्र-मानकीकृत दर बहुत ज्यादा न बदले। इसके साथ भारत को कैंसर की शुरुआती पहचान, जांच, इलाज और ग्रामीण तथा छोटे शहरों तक स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाने पर ज्यादा जोर देना होगा।

क्या कैंसर को पूरी तरह रोका जा सकता है?

कैंसर के सभी मामलों को रोकना संभव नहीं है। उम्र, आनुवंशिक बदलाव और कई ऐसे कारण हैं जिन्हें हम पूरी तरह नियंत्रित नहीं कर सकते। लेकिन बड़ी संख्या में मामलों का जोखिम कम किया जा सकता है। WHO और IARC के 2026 के विश्लेषण के अनुसार 2022 के करीब 37 प्रतिशत नए कैंसर मामलों को रोके जा सकने वाले कारणों से जोड़ा गया था। यानी कैंसर के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार सिर्फ महंगा इलाज नहीं बल्कि रोकथाम भी है।

तंबाकू से दूर रहना, शराब सीमित करना, स्वस्थ वजन बनाए रखना, नियमित शारीरिक गतिविधि करना, बेहतर भोजन लेना, एचपीवी और हेपेटाइटिस बी जैसे संक्रमणों से बचाव करना और जरूरत के मुताबिक कैंसर की जांच कराना इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।

किस देश में कैंसर सबसे ज्यादा और सबसे कम है?

अगर केवल 2022 की उम्र-मानकीकृत घटना दर देखें तो ऑस्ट्रेलिया सबसे ऊपर था, उसके बाद न्यूजीलैंड और डेनमार्क जैसे देश थे। अमेरिका भी दुनिया के ऊंची दर वाले देशों में था। दूसरी तरफ कुछ अफ्रीकी और एशियाई देशों में दर्ज दर बहुत कम है। लेकिन यहां सावधानी जरूरी है। कम आंकड़े का मतलब हमेशा कम बीमारी नहीं होता। कमजोर जांच और रजिस्ट्रेशन व्यवस्था के कारण वास्तविक कैंसर बोझ कम दर्ज हो सकता है। GLOBOCAN के वैश्विक विश्लेषण में भी अलग-अलग क्षेत्रों में कैंसर की दरों के अंतर को जोखिमों के साथ-साथ रोकथाम, शुरुआती पहचान और इलाज तक पहुंच से जोड़ा गया है। और यही इस पूरी कहानी का सबसे जरूरी निष्कर्ष है।

किसी देश में कैंसर की ऊंची दर देखकर यह मत मानिए कि वहां के लोग ज्यादा बीमार हैं। और किसी देश में कम दर देखकर यह मत मानिए कि वहां लोग कैंसर से सुरक्षित हैं। कैंसर के आंकड़े असल में चार बड़ी चीजों का मिश्रण हैं - लोग कितने बूढ़े हैं, उनका जीवन कैसा है, उनके जीन और पर्यावरण में क्या जोखिम हैं और स्वास्थ्य व्यवस्था कितनी बीमारी खोज और इलाज कर पाती है। इसलिए ऑस्ट्रेलिया का ऊंचा आंकड़ा सिर्फ वहां की जीवनशैली की कहानी नहीं है और भारत का कम आंकड़ा सिर्फ भारतीयों के स्वस्थ होने की कहानी नहीं है।

कैंसर की असली तस्वीर तब सामने आती है जब हम नए मामलों, उम्र, कैंसर के प्रकार, मृत्यु, जांच और इलाज - इन सभी को एक साथ देखते हैं। यही वजह है कि दुनिया के अलग-अलग देशों में कैंसर की दरों की तुलना करना सिर्फ आंकड़ों की तुलना नहीं, बल्कि समाज और स्वास्थ्य व्यवस्था को समझने का भी एक तरीका है।

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