Blood Pressure: किसने तय किया कि 120/80 सामान्य है? कौन तय करता है मेडिकल पैरामीटर, जानिए पूरा सच

Blood Pressure Explained: डॉक्टर कहते हैं ब्लड प्रेशर 120/80 के आसपास होना चाहिए, खाली पेट शुगर 100 से कम होनी चाहिए, और हार्ट रेट 60 से 100 के बीच सामान्य है।

Yogesh Mishra
Published on: 4 Aug 2026 7:52 PM IST
Blood Pressure Explained
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Blood Pressure Explained: डॉक्टर कहते हैं ब्लड प्रेशर 120/80 के आसपास होना चाहिए, खाली पेट शुगर 100 से कम होनी चाहिए, और हार्ट रेट 60 से 100 के बीच सामान्य है। सुनकर लगता है जैसे शरीर में ये संख्याएँ पहले से लिखी हों और डॉक्टरों ने बस उन्हें खोज लिया हो। असल में ऐसा नहीं है। ये नंबर किसी एक व्यक्ति ने एक दिन बैठकर तय नहीं किए। ये दशकों तक लाखों लोगों का स्वास्थ्य रिकॉर्ड देखकर, फिर सालों बाद यह जाँचकर बने कि किन लेवल पर हार्ट अटैक, स्ट्रोक या किडनी की बीमारी ज़्यादा हुई। फिर यह भी देखा गया कि दवा से इन नंबरों को कम करने पर सच में बीमारी घटती है या नहीं। इसलिए ये नंबर प्रकृति के सख्त नियम नहीं, बल्कि जोखिम समझने के लिए बनाए गए उपयोगी पैमाने हैं।

यही वजह है कि 'नॉर्मल', 'बॉर्डर लाइन', और 'इलाज का लक्ष्य' ये तीनों अलग चीज़ें हैं। किसी का ब्लड प्रेशर 130/82 हो सकता है, जो 120/80 से ज़्यादा है, पर इसका मतलब हर बार यह नहीं कि उसे तुरंत दवा चाहिए। डॉक्टर उसकी उम्र, डायबिटीज़, किडनी की हालत और पहले हार्ट अटैक हुआ है या नहीं, यह सब देखकर फैसला करता है।

शरीर मशीन नहीं, हर पल बदलता है

ब्लड प्रेशर, शुगर और हार्ट रेट स्थिर संख्याएँ नहीं हैं। सीढ़ियाँ चढ़ने पर दिल तेज़ धड़कता है, तनाव में प्रेशर बढ़ सकता है, खाने के बाद शुगर ऊपर जाती है। चाय-कॉफी, नींद, दर्द, बुखार - सब असर डालते हैं। इसीलिए डॉक्टर एक बार की रीडिंग से बीमारी घोषित नहीं करता; वह दोहराव, औसत और लक्षण देखता है।


यूरोपियन सोसाइटी ऑफ कार्डियोलॉजी की 2024 की गाइडलाइन साफ कहती है कि ब्लड प्रेशर का जोखिम धीरे-धीरे बढ़ता है। कोई ऐसा दरवाज़ा नहीं कि 139 तक बिल्कुल सुरक्षित हो और 140 होते ही अचानक खतरा शुरू हो जाए फिर भी इलाज के लिए कोई सीमा तो बनानी पड़ती है।

ब्लड प्रेशर का नंबर आया कहाँ से

पहले डॉक्टर सिर्फ नाड़ी छूकर अंदाज़ा लगाते थे। 19वीं सदी में ऐसे उपकरण बने जो धमनी का दबाव माप सकें, और उसी दौर से दबाव को mmHg में नापने की परंपरा शुरू हुई। ऊपर वाला नंबर (सिस्टोलिक) उस समय का दबाव है जब दिल सिकुड़कर खून बाहर भेजता है, नीचे वाला (डायस्टोलिक) धड़कनों के बीच का दबाव है।

पहले माना जाता था कि उम्र के साथ प्रेशर बढ़ना स्वाभाविक है। बाद के बड़े अध्ययनों ने दिखाया कि ऊँचा प्रेशर स्ट्रोक और हार्ट अटैक से जुड़ा है, और दवा से इसे घटाने पर फायदा होता है। इसीलिए 120/80 को "आदर्श" कहा जाने लगा। इस स्तर पर हृदय रोग का खतरा अपेक्षाकृत कम दिखता है। पर सभी देश एक जैसी सीमा नहीं मानते। अमेरिका की 2025 गाइडलाइन 130/80 से ऊपर को हाइपरटेंशन मानती है, जबकि यूरोप अब भी क्लिनिक में 140/90 को औपचारिक सीमा मानता है, हालाँकि 120-139 को 'एलिवेटेड' नई श्रेणी में रखता है। डब्लूएचओ वैश्विक स्तर पर 140/90 को मुख्य सीमा मानता है, पर हृदय रोग या डायबिटीज़ वालों के लिए ज़्यादा सख्त लक्ष्य सुझाता है। इसका मतलब यह नहीं कि कोई गलत है। बल्कि सब एक जैसे प्रमाण देख रहे हैं, बस लाभ, खर्च और आबादी के हिसाब से थोड़ा अलग निर्णय ले रहे हैं।

भारत में यह मानक किसने तय किया

भारत में आईसीएमआर, स्वास्थ्य मंत्रालय और विशेषज्ञ समितियाँ मिलकर मानक बनाती हैं। भारत में लंबे समय से क्लिनिक में 140/90 को मुख्य सीमा माना जाता रहा है, जबकि डायबिटीज़ या किडनी की बीमारी वालों के लिए लक्ष्य ज़्यादा सख्त हो सकता है। अमेरिकी 130/80 की सीमा सीधे भारत पर लागू करने का सवाल सिर्फ विज्ञान का नहीं क्योंकि अगर सीमा घटाई जाए तो करोड़ों और लोग बीमार घोषित हो जाएँगे, जिससे स्वास्थ्य व्यवस्था पर भार बढ़ेगा।

ब्लड प्रेशर एक बार मापकर तय क्यों नहीं होता

ब्लड प्रेशर शायद सबसे ज़्यादा गलत तरीके से मापा जाने वाला पैमाना है। मापने से पहले तेज़ चलना, चाय-कॉफी, सिगरेट, बात करना, या गलत साइज़ का कफ, सब नंबर बदल सकते हैं। डॉक्टर को देखकर घबराहट से बढ़ा प्रेशर 'व्हाइट कोट हाइपरटेंशन' कहलाता है, और इसका उल्टा 'मास्क्ड हाइपरटेंशन' भी होता है। इसीलिए आजकल एक रीडिंग की जगह दोहराए गए मापन, घर पर औसत या 24 घंटे की मॉनिटरिंग की सलाह दी जाती है। घर पर शांत माहौल में प्रेशर आमतौर पर क्लिनिक से थोड़ा कम आता है, इसलिए घर के लिए सीमा भी थोड़ी कम रखी जाती है।

शुगर के मानक कैसे बने

शुगर की सीमाएँ भी दशकों की रिसर्च से बनीं। वैज्ञानिकों ने देखा कि किस शुगर स्तर के बाद आँख की बारीक नसों को नुकसान (डायबिटिक रेटिनोपैथी) तेज़ी से बढ़ने लगता है। आज मान्य मानकों के अनुसार आठ घंटे भूखे रहने के बाद खाली पेट शुगर 100 से कम सामान्य, 100-125 प्रीडायबिटीज़ और 126 या ज़्यादा डायबिटीज़ की सीमा है। HbA1c में 5.7% से कम सामान्य, 5.7-6.4% प्रीडायबिटीज़ और 6.5% या ज़्यादा डायबिटीज़ माना जाता है। यहाँ भी 126 कोई जादुई नंबर नहीं है। 124 वाला अचानक सुरक्षित और 126 वाला अचानक बीमार नहीं हो जाता। इसीलिए बीमारी से पहले चेतावनी देने के लिए 'प्रीडायबिटीज़' श्रेणी बनाई गई।

अलग-अलग संस्थाएँ प्रीडायबिटीज़ की निचली सीमा अलग बताती हैं, कोई 100 से शुरू करता है, कोई 110 से। सवाल यह है कि ज़्यादा लोगों को जल्दी पहचानना ज़्यादा ज़रूरी है, या ऐसी बड़ी सूची बनाने से बचना जिसमें बहुत से लोग शामिल हों जिन्हें कभी डायबिटीज़ नहीं होगी।

घर की मशीन और लैब का नंबर अलग क्यों आता है


घर का ग्लूकोमीटर उँगली से खून की एक बूँद जाँचता है, जबकि असली निदान लैब के प्लाज़्मा टेस्ट या HbA1c से होता है। हाथ पर मिठाई का अवशेष, ठंड, या खराब स्ट्रिप भी नतीजा बदल सकते हैं। इसलिए घर की रीडिंग निगरानी के लिए बढ़िया है, पर सिर्फ उसी से पहली बार डायबिटीज़ घोषित करना ठीक नहीं। सीमा के आसपास टेस्ट दोहराना ज़रूरी होता है।

हार्ट रेट का 60 - 100 वाला मानक

आराम की हालत में ज़्यादातर स्वस्थ लोगों को देखकर 60 से 100 धड़कन प्रति मिनट को सामान्य माना गया। पर यह बीमारी की सीमा नहीं, एक व्यापक शारीरिक संदर्भ है। खिलाड़ियों की आराम की नाड़ी 40-60 भी हो सकती है क्योंकि उनका दिल ज़्यादा असरदार तरीके से खून पंप करता है। बुखार, दर्द, थायरॉयड, कैफीन, गर्भावस्था, सब हार्ट रेट बदल सकते हैं। 100 से ऊपर टैकीकार्डिया और 60 से नीचे ब्रैडीकार्डिया कहलाता है, पर ये सिर्फ वर्णन हैं, बीमारी का पक्का सबूत नहीं। स्वस्थ धावक की 48 नाड़ी और बेहोशी वाले व्यक्ति की 48 नाड़ी का मतलब बिल्कुल अलग है, साथ में चक्कर, सीने का दर्द या साँस फूलना है या नहीं, यह नंबर से ज़्यादा मायने रखता है।

कुछ शोध कहते हैं कि 60-100 की सीमा बहुत चौड़ी है और ज़्यादा आराम की नाड़ी भविष्य के जोखिम से जुड़ी हो सकती है, पर इसका मतलब यह नहीं कि 85-90 वाले हर व्यक्ति को दवा चाहिए। व्यायाम के लिए '220 माइनस उम्र' वाला सूत्र भी सिर्फ औसत अनुमान है, हर व्यक्ति पर बिल्कुल सटीक नहीं बैठता।

ये मानक बनते कैसे हैं

पहले लाखों लोगों का डेटा सालों तक इकट्ठा किया जाता है और देखा जाता है कि किस स्तर पर बीमारी ज़्यादा हुई। फिर क्लिनिकल ट्रायल में देखा जाता है कि दवा या इलाज से लक्ष्य घटाने पर सच में फायदा होता है या नहीं।जैसे प्रेशर कम करने से स्ट्रोक घटा, पर चक्कर और किडनी की समस्या बढ़ी तो दोनों का संतुलन देखा जाता है। फिर डॉक्टरों, वैज्ञानिकों और मरीज़ प्रतिनिधियों की समिति मिलकर गाइडलाइन बनाती है, जिसे समय-समय पर नए प्रमाण के आधार पर बदला जाता है। यूरोपीय गाइडलाइन खुद मानती है कि कोई भी सीमा पूरी तरह त्रुटिरहित नहीं हो सकती, इसमें कुछ मानवीय निर्णय भी शामिल रहता है।

क्या दवा कंपनियाँ ये नंबर तय करती हैं

यह शक अक्सर उठता है कि सीमा कम करके दवा कंपनियाँ ज़्यादा लोगों को मरीज़ बनवा देती हैं, और इतिहास में ऐसी आलोचना हुई भी है। इसीलिए आजकल गाइडलाइन बनाने वाली समितियों में वित्तीय संबंध बताना और स्वतंत्र समीक्षा ज़रूरी मानी जाती है। पर यह कहना कि सारी सीमाएँ सिर्फ दवा बेचने के लिए बनी हैं, ग़लत है क्योंकि ऊँचे प्रेशर और शुगर का स्ट्रोक-हार्ट अटैक से संबंध कई देशों के अलग-अलग अध्ययनों में मिला है, और नमक कम करना या व्यायाम जैसी सलाहों से किसी दवा कंपनी को सीधा फायदा नहीं होता।

अलग-अलग देशों में मानक अलग क्यों हैं

शरीर देश बदलने से नहीं बदलता, पर आबादी का औसत जोखिम, खान-पान और स्वास्थ्य संसाधन अलग होते हैं। दक्षिण एशियाई लोगों में कम वज़न पर भी डायबिटीज़ और हार्ट डिजीज़ का खतरा ज़्यादा हो सकता है। WHO को ऐसी गाइडलाइन बनानी होती है जो कम संसाधन वाले देशों में भी काम करे, जबकि अमेरिका ज़्यादा सख्त लक्ष्य रख सकता है। भारत को अपनी विशाल आबादी और सीमित स्वास्थ्य संसाधन देखने पड़ते हैं।

उम्र, गर्भावस्था और बुज़ुर्गों के लिए अलग नियम

बच्चों का प्रेशर और हार्ट रेट उम्र-लंबाई के हिसाब से देखा जाता है, वयस्कों वाला नंबर उन पर लागू नहीं होता। गर्भावस्था में प्रेशर और शुगर की अलग सीमाएँ हैं क्योंकि बच्चे का जोखिम भी जुड़ा है। बुज़ुर्ग और कमज़ोर व्यक्ति में बहुत कम प्रेशर गिरने और चोट का खतरा बढ़ा सकता है, इसलिए 85 साल से ऊपर या बहुत कमज़ोर लोगों के लिए ज़्यादा उदार लक्ष्य रखा जाता है। पर सिर्फ उम्र देखकर ऊँचे प्रेशर को नॉर्मल मान लेना अब सही नहीं माना जाता। बुज़ुर्गों को भी प्रेशर कंट्रोल से फायदा हो सकता है।

क्या 120/80 से कम हमेशा बेहतर है


नहीं। बहुत कम प्रेशर से चक्कर, बेहोशी और गिरने का खतरा बढ़ सकता है। किसी युवा का 105/65 बिल्कुल सामान्य हो सकता है, जबकि दवा ले रहे बुज़ुर्ग का 95/55 चिंता की बात हो सकता है। इसी तरह शुगर बहुत कम होना भी खतरनाक है क्योंकि दिमाग को ग्लूकोज़ चाहिए ही नहीं तो कंपकंपी, भ्रम और बेहोशी हो सकती है। इसलिए लक्ष्य 'जितना कम उतना अच्छा' नहीं, बल्कि 'जितना कम सुरक्षित हो' है।

ये मानक बदलते क्यों रहते हैं

नए और बेहतर प्रमाण आने पर मानक बदलते हैं। पहले सिर्फ डायस्टोलिक नंबर पर ध्यान था, बाद में पता चला कि बुज़ुर्गों में सिस्टोलिक नंबर बढ़ना ज़्यादा खतरनाक है। अमेरिका ने 2017 में सीमा 140/90 से घटाकर 130/80 की, यूरोप ने अपनी सीमा 140/90 रखी पर 2024 में "एलिवेटेड" की नई श्रेणी जोड़ी। मानक बदलना यह नहीं दिखाता कि पुराना विज्ञान गलत था — बेहतर अध्ययन आने पर सुधार होना, यही विज्ञान की ताकत है।

स्मार्टवॉच ने क्या बदला

घर की मशीनों और स्मार्टवॉच ने एक बार के मापन से लगातार निगरानी की तरफ चिकित्सा को बढ़ाया है। पर ज़्यादा डेटा हमेशा बेहतर समझ नहीं देता। कलाई की घड़ी वह पूरी तस्वीर नहीं दे सकती जो अस्पताल की मशीन देती है, और उसके प्रेशर-शुगर के दावों को डॉक्टरी फैसले में इस्तेमाल करने से पहले जाँच ज़रूरी है।

आम आदमी को क्या समझना चाहिए

120/80 के आसपास होना अच्छा माना जा सकता है, पर एक रीडिंग निदान नहीं है। बार-बार 140/90 या घर पर औसत 135/85 से ज़्यादा आए तो डॉक्टर को दिखाएँ। खाली पेट शुगर 100 से कम सामान्य, 100-125 चेतावनी, 126 या ज़्यादा डायबिटीज़ का संकेत है, पर पुष्टि ज़रूरी है। सिर्फ नंबर नहीं, बदलाव की दिशा भी देखें। अगर सालों से 110/70 था और अब लगातार 135/85 आ रहा है, तो यह भी अहम है, भले ही यह बीमारी की सीमा से नीचे हो।

लक्षण नंबर से ज़्यादा ज़रूरी कब हैं

अगर बहुत ऊँचे प्रेशर के साथ सीने में दर्द, साँस की कमी, बोलने में दिक्कत या भ्रम हो, तो यह इमरजेंसी हो सकती है। शुगर बहुत ज़्यादा या बहुत कम होने पर उल्टी, तेज़ प्यास, कंपकंपी या बेहोशी हो, तो भी तुरंत मदद लें। बिना लक्षण के थोड़ा अलग नंबर देखकर घबराना ज़रूरी नहीं।सही तरीके से दोहराया मापन और डॉक्टर की राय ज़्यादा उपयोगी है।

असली समझ 120/80 या 100 जैसा नंबर याद रखने में नहीं, बल्कि यह जानने में है कि यह नंबर कब, कैसे और किस व्यक्ति में मापा गया और उसके पीछे शरीर की पूरी कहानी क्या है।

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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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