Blood Pressure और Blood Sugar एक बार बढ़ने पर सामान्य क्यों नहीं होते? क्या दवा जिंदगीभर लेनी होगी?

High Blood Pressure Explained in Hindi: ब्लड प्रेशर और ब्लड शुगर बढ़ने के बाद बार-बार क्यों लौटते हैं? जानिए शरीर में क्या बदलाव होते हैं, दवा कब जरूरी होती है और टाइप-2 डायबिटीज में रिमिशन कैसे संभव है।

Yogesh Mishra
Published on: 23 Aug 2026 5:18 PM IST
High Blood Pressure Explained in Hindi
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High Blood Pressure Explained in Hindi

High Blood Pressure Explained in Hindi: क्या आपने कभी सोचा है कि बुखार कुछ दिनों में ठीक हो जाता है, संक्रमण दवा से खत्म हो जाता है और चोट भी धीरे-धीरे भर जाती है, लेकिन ब्लड प्रेशर और ब्लड शुगर एक बार बढ़ने के बाद बार-बार क्यों लौट आते हैं? क्या इसका मतलब यह है कि एक बार हाई ब्लड प्रेशर या हाई ब्लड शुगर हो गया तो अब जिंदगीभर दवा लेनी ही पड़ेगी?

इसका जवाब इतना सीधा नहीं है। हर बार ऐसा नहीं होता कि बीपी या शुगर बढ़ने के बाद वह कभी सामान्य नहीं हो सकती। कुछ लोगों का बीपी वजन कम करने, नमक कम करने, नियमित व्यायाम, बेहतर नींद या किसी दूसरी बीमारी का इलाज होने के बाद बिना दवा भी सामान्य रह सकता है। इसी तरह टाइप-2 डायबिटीज वाले कुछ लोगों में पर्याप्त और लगातार वजन कम होने के बाद शुगर लंबे समय तक सामान्य सीमा में आ सकती है। इसे डॉक्टर ‘रिमिशन’ (remission) कहते हैं।

लेकिन यहां एक अहम बात समझनी होगी। बीपी और शुगर सिर्फ शरीर की दो संख्याएं नहीं हैं। इनके पीछे दिल, गुर्दे, रक्तवाहिकाएं, पैंक्रियास, लिवर, हार्मोन, मांसपेशियां, शरीर में जमा चर्बी और आनुवंशिक प्रवृत्ति जैसी कई चीजें एक साथ काम करती हैं। जब यह पूरा तंत्र वर्षों तक बदलता रहता है तो शरीर एक नए संतुलन पर पहुंच जाता है। फिर केवल एक गोली बंद कर देने या कुछ दिन सावधानी बरतने से वह हमेशा अपनी पुरानी स्थिति में वापस नहीं लौटता।

यही वजह है कि डॉक्टर अक्सर कहते हैं कि बीमारी को कंट्रोल करना भी इलाज का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। और कुछ मामलों में शरीर को इतना बेहतर किया जा सकता है कि दवा की जरूरत ही न रहे। तो आखिर शरीर में ऐसा क्या बदल जाता है कि बीपी और शुगर को वापस सामान्य करना मुश्किल हो जाता है?

ब्लड प्रेशर बढ़ता क्यों है?

ब्लड प्रेशर को आसान भाषा में समझें तो यह इस बात पर निर्भर करता है कि दिल कितनी ताकत से खून को शरीर में पंप कर रहा है और रक्तवाहिकाएं उस खून के रास्ते में कितना प्रतिरोध (resistance) पैदा कर रही हैं।

जब धमनियां (artries) सिकुड़ने लगती हैं, उनमें कठोरता बढ़ती है, शरीर में नमक और पानी ज्यादा जमा होता है या शरीर की कुछ हार्मोन और तंत्रिका प्रणालियां लगातार रक्तचाप बढ़ाने वाले संकेत देती रहती हैं, तो बीपी बढ़ सकता है।

लेकिन ज्यादातर लोगों में इसका कोई एक कारण नहीं होता। उम्र, आनुवंशिक प्रवृत्ति, ज्यादा वजन, भोजन में ज्यादा नमक, शारीरिक गतिविधि की कमी, शराब, नींद की समस्या और गुर्दों की भूमिका, कई चीजें मिलकर रक्तचाप बढ़ा सकती हैं। यही वजह है कि हाई बीपी को केवल ‘नमक ज्यादा खाने’ की बीमारी समझना सही नहीं है।

शरीर लंबे समय तक बढ़े हुए बीपी का आदी कैसे हो जाता है?

यहां ‘आदी’ शब्द का मतलब मानसिक आदत नहीं, बल्कि शरीर में होने वाला जैविक बदलाव है।

अगर किसी व्यक्ति का ब्लड प्रेशर वर्षों तक सामान्य से ज्यादा रहता है, तो छोटी रक्तवाहिकाओं की दीवारें मोटी और अपेक्षाकृत कठोर हो सकती हैं। बड़ी धमनियों की लोच भी कम हो सकती है। गुर्दे शरीर में नमक और पानी का संतुलन ऐसे तरीके से बनाए रखने लग सकते हैं जिसमें सामान्य रक्तचाप बनाए रखने के लिए पहले से ज्यादा दबाव की जरूरत पड़ती है।

यानी शुरुआत में समस्या केवल इस बात की हो सकती है कि रक्तवाहिकाएं ज्यादा सिकुड़ रही हैं या शरीर में पानी और नमक ज्यादा रुक रहा है। लेकिन समय के साथ शरीर की बनावट और काम करने का तरीका भी बदलने लगता है।

इसे एक पुराने रबर के पाइप से समझ सकते हैं। नया रबर का पाइप दबाव कम-ज्यादा होने पर आसानी से अपनी स्थिति बदल लेता है। लेकिन अगर उसे वर्षों तक बहुत ज्यादा दबाव में रखा जाए तो उसकी लोच कम हो सकती है। अब दबाव कम करने भर से वह तुरंत बिल्कुल पहले जैसा नहीं हो जाएगा।

उच्च रक्तचाप में भी कुछ ऐसा ही होता है। इसीलिए छह महीने पहले शुरू हुआ उच्च रक्तचाप और दस साल से चला आ रहा उच्च रक्तचाप एक जैसी स्थिति नहीं होते।

फिर कुछ लोगों का बीपी बिना दवा सामान्य कैसे हो जाता है?

इसका जवाब है कि हर व्यक्ति का उच्च रक्तचाप एक जैसी अवस्था में नहीं पहुंचा होता। मान लीजिए किसी व्यक्ति का वजन काफी बढ़ गया। वह भोजन में ज्यादा नमक लेता है, व्यायाम बहुत कम करता है, नींद पूरी नहीं होती और शराब भी ज्यादा लेता है। धीरे-धीरे उसका रक्तचाप बढ़कर 150/95 हो गया।

अब अगर वह पर्याप्त वजन कम करता है, नियमित शारीरिक गतिविधि शुरू करता है, नमक कम करता है, शराब घटाता है और नींद सुधारता है, तो उसका रक्तचाप काफी नीचे आ सकता है। कुछ लोगों में यह इतना सुधर सकता है कि डॉक्टर की निगरानी में दवा की मात्रा कम की जा सके या दवा बंद भी की जा सके।

लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हर व्यक्ति दवा छोड़ सकता है। अगर किसी व्यक्ति का ब्लड प्रेशर लंबे समय से बहुत ज्यादा है या उसके पीछे आनुवंशिक, गुर्दे से जुड़ा या कोई दूसरा कारण है, तो केवल लाइफ स्टाइल बदलने से बीपी पूरी तरह सामान्य न भी हो। इसलिए डॉक्टर की सलाह के बिना बीपी की दवा बंद करना सही नहीं है।

अब ब्लड शुगर की कहानी समझिए

ब्लड शुगर के मामले में सबसे पहले टाइप-1 और टाइप-2 डायबिटीज को अलग समझना जरूरी है।

टाइप-1 डायबिटीज में शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली पैंक्रियास की इंसुलिन बनाने वाली बीटा सेल्स को नुकसान पहुंचाती है। ऐसे व्यक्ति को इंसुलिन की जरूरत होती है और सामान्य जीवनशैली अपनाने भर से टाइप-1 डायबिटीज खत्म नहीं होता।

लेकिन वयस्कों में पाए जाने वाले ज्यादातर डायबिटीज की बात हो तो टाइप-2 डायबिटीज सबसे आम है। इसमें अक्सर शुरुआत इंसुलिन प्रतिरोध (resistance)से होती है। आसान भाषा में कहें तो शरीर की कोशिकाएं इंसुलिन की बात पहले जैसी अच्छी तरह नहीं सुनतीं।

अब शरीर क्या करता है?

पैंक्रियास ज्यादा इंसुलिन बनाकर इसकी भरपाई करने की कोशिश करता है। कुछ समय तक यह व्यवस्था काम करती रहती है। इसलिए इंसुलिन प्रतिरोध बढ़ने के बावजूद खून में शुगर सामान्य रह सकती है। व्यक्ति को पता भी नहीं चलता कि शरीर के भीतर कुछ गड़बड़ चल रही है। लेकिन वर्षों तक पैंक्रियास को अतिरिक्त मेहनत करनी पड़े तो उसकी इंसुलिन बनाने वाली बीटा कोशिकाओं की क्षमता कम हो सकती है। फिर एक समय ऐसा आता है जब शरीर को जितने इंसुलिन की जरूरत है, पैंक्रियास उतना बना नहीं पाता। तब ब्लड शुगर बढ़ने लगती है।

यानी जिस दिन जांच में पहली बार शुगर 180 या 200 मिलीग्राम प्रति डेसीलीटर आई, जरूरी नहीं कि मधुमेह उसी दिन शुरू हुआ हो। उसके पीछे चल रही जैविक प्रक्रिया कई साल पहले शुरू हो सकती है।

शुगर बढ़ना सिर्फ ज्यादा मीठा खाने की कहानी नहीं है

अक्सर लोग कहते हैं कि ज्यादा मिठाई खाने से डायबिटीज हो गया। लेकिन टाइप-2 डायबिटीज इससे कहीं ज्यादा जटिल है। शरीर में अतिरिक्त चर्बी, खासकर पेट और शरीर के अंदरूनी अंगों के आसपास जमा चर्बी, इंसुलिन प्रतिरोध बढ़ा सकती है। लिवर जरूरत से ज्यादा ग्लूकोज खून में छोड़ सकता है। मांसपेशियां इंसुलिन के प्रति कम संवेदनशील हो सकती हैं और अग्न्याशय पर लगातार अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।

इस तरह एक दुष्चक्र बन सकता है।

इंसुलिन प्रतिरोध बढ़ा तो ज्यादा इंसुलिन चाहिए। अग्न्याशय ज्यादा काम करता है। समय के साथ उसकी क्षमता कम हो सकती है। शुगर बढ़ती है। बढ़ी हुई शुगर और बिगड़ा हुआ चयापचय समस्या को और आगे बढ़ा सकते हैं।

यही कारण है कि टाइप-2 मधुमेह को केवल ‘चीनी ज्यादा खाने’ का नतीजा कहना गलत है।

लेकिन यहां एक अच्छी खबर भी है

टाइप-2 डायबिटीज के शुरुआती चरण में शरीर के इस बिगड़े हुए संतुलन को काफी हद तक पीछे मोड़ा जा सकता है। अगर किसी व्यक्ति के शरीर में अतिरिक्त चर्बी बीमारी का बड़ा कारण है और वह पर्याप्त वजन कम कर लेता है, तो यकृत और पैंक्रियास के आसपास जमा अतिरिक्त चर्बी कम हो सकती है। इससे इंसुलिन के प्रति शरीर की संवेदनशीलता बेहतर हो सकती है और कुछ लोगों में पैंक्रियास की कार्यक्षमता भी बेहतर हो सकती है।

नतीजा यह हो सकता है कि रक्त शुगर मधुमेह की सीमा से नीचे आ जाए और कुछ समय तक बिना दवा के भी सामान्य बनी रहे। यही वह स्थिति है जिसे डॉक्टर ‘रिमिशन’ कहते हैं।

रिमिशन और इलाज में क्या फर्क है?

मान लीजिए किसी व्यक्ति का लंबे समय से HbA1c 8.5 प्रतिशत था। उसने पर्याप्त वजन कम किया, खान-पान और शारीरिक गतिविधि में बड़ा बदलाव किया और कुछ समय बाद बिना दवा उसका HbA1c 5.9 प्रतिशत हो गया। यह बहुत बड़ी सफलता है। लेकिन डॉक्टर यह नहीं कहेंगे कि मधुमेह हमेशा के लिए खत्म हो गया।

क्यों?

क्योंकि अगर कुछ साल बाद वजन फिर बढ़ गया, शरीर में चर्बी बढ़ी और इंसुलिन प्रतिरोध वापस आया तो शुगर फिर बढ़ सकती है। इसीलिए ‘इलाज’ या ‘क्योर’ की जगह ‘रिमिशन’ शब्द इस्तेमाल किया जाता है। रिमिशन का मतलब है कि इस समय बीमारी सक्रिय रूप में दिखाई नहीं दे रही या उसके मानक सामान्य सीमा में हैं, लेकिन भविष्य में उसके वापस आने का जोखिम पूरी तरह खत्म नहीं माना जाता।

शरीर पुरानी स्वस्थ अवस्था में पूरी तरह क्यों नहीं लौट पाता?

इसका सबसे आसान जवाब है कि शरीर में उसका इतिहास जमा होता रहता है। उम्र बढ़ती है। रक्तवाहिकाओं की लोच बदलती है। गुर्दों में बदलाव हो सकते हैं। अग्न्याशय की कुछ बीटा कोशिकाओं की क्षमता कम हो सकती है। मांसपेशियों और वसा ऊतक का इंसुलिन के प्रति व्यवहार बदल सकता है।

और अगर कई साल तक बीपी या शुगर बहुत ज्यादा रही है तो शरीर के अलग-अलग अंगों पर उसका असर भी जमा हो सकता है।

यानी आज बीपी और शुगर सामान्य कर देने का मतलब यह नहीं कि पिछले दस साल में शरीर पर पड़ा हर असर मिट गया।

इसे ऐसे समझिए - अगर किसी सड़क पर दस साल तक भारी वाहन चलते रहें तो सड़क पर उसका असर पड़ सकता है। बाद में भारी वाहनों को हटाने से सड़क पर आगे का दबाव कम हो जाएगा, लेकिन सड़क तुरंत नई जैसी नहीं बन जाएगी। शरीर भी कुछ इसी तरह काम करता है।

क्या शरीर का कोई ‘सेट पॉइंट’ बदल जाता है?

कुछ हद तक यह समझने के लिए ‘सेट पॉइंट’ का उदाहरण उपयोगी है, लेकिन इसे बिल्कुल शाब्दिक अर्थ में नहीं लेना चाहिए।

हमारा शरीर तापमान, पानी, नमक, ग्लूकोज और रक्तचाप जैसी चीजों को एक निश्चित सीमा में रखने की लगातार कोशिश करता है।

लेकिन यह काम किसी एक स्विच से नहीं होता। इसके पीछे दिमाग, हार्मोन, गुर्दे, रक्तवाहिकाएं, अग्न्याशय, यकृत और दूसरे अंगों की कई प्रणालियां साथ काम करती हैं। लंबे समय तक मोटापा, इंसुलिन प्रतिरोध, ज्यादा नमक या दूसरी समस्याएं बनी रहें तो इन प्रणालियों का संतुलन बदल सकता है। यानी शरीर एक नए, लेकिन अस्वस्थ संतुलन पर टिक सकता है। दवा इस व्यवस्था के एक या कई रास्तों पर असर डालकर उसे सुरक्षित सीमा में वापस लाने में मदद करती है।

फिर दवा बंद करते ही बीपी या शुगर क्यों बढ़ सकती है?

क्योंकि दवा अक्सर बीमारी पैदा करने वाली जैविक प्रक्रिया को नियंत्रित कर रही होती है। रक्तचाप की कुछ दवाएं रक्तवाहिकाओं को फैलाती हैं, कुछ शरीर से अतिरिक्त नमक और पानी निकालने में मदद करती हैं और कुछ रक्तचाप बढ़ाने वाले हार्मोन की गतिविधि को कम करती हैं।

मधुमेह की दवाएं अलग-अलग तरीकों से काम करती हैं। कुछ यकृत से ग्लूकोज का उत्पादन कम करती हैं, कुछ इंसुलिन के प्रति शरीर की संवेदनशीलता बढ़ाती हैं और कुछ अग्न्याशय को इंसुलिन बनाने में मदद करती हैं।

इसलिए दवा बंद करते ही अगर मूल समस्या अभी भी मौजूद है तो रक्तचाप या शुगर फिर बढ़ सकती है।

इसमें दवा की कोई ‘विफलता’ नहीं है।

अगर चश्मा पहनने से आपको साफ दिखाई देता है तो इसका मतलब यह नहीं कि चश्मा आपकी आंख को ठीक करने में असफल रहा। उसने अपना काम किया और आपकी दृष्टि को सामान्य किया।

इसी तरह दवा से 125/75 का रक्तचाप मिलना वास्तविक सुधार है। दवा से नियंत्रित शुगर भी शरीर के लिए वास्तविक फायदा है।

क्या उच्च रक्तचाप भी रिमिशन में जा सकता है?

मधुमेह की तरह उच्च रक्तचाप के लिए रिमिशन की कोई उतनी सर्वमान्य औपचारिक परिभाषा नहीं है। लेकिन व्यवहार में कुछ लोगों का रक्तचाप लंबे समय तक बिना दवा सामान्य रह सकता है।

खासकर तब, जब रक्तचाप बढ़ने में वजन, ज्यादा नमक, शराब, नींद में सांस रुकने की समस्या, कुछ दवाएं या कोई दूसरा उपचार योग्य कारण बड़ी भूमिका निभा रहा हो। मगर उम्र और आनुवंशिक प्रवृत्ति से जुड़ा प्राथमिक उच्च रक्तचाप कई लोगों में लंबे समय तक नियंत्रण मांग सकता है। यानी किसी एक व्यक्ति का अनुभव दूसरे व्यक्ति पर लागू नहीं किया जा सकता।

आधुनिक चिकित्सा हर बीमारी को पूरी तरह ठीक क्यों नहीं कर पाती?

इसका एक बड़ा कारण यह है कि उच्च रक्तचाप और टाइप-2 मधुमेह किसी एक खराब अंग की बीमारी नहीं हैं।

अगर शरीर में कोई जीवाणु संक्रमण है तो सही दवा देकर जीवाणु को खत्म किया जा सकता है। अगर अपेंडिक्स में गंभीर समस्या है तो उसे ऑपरेशन से निकाल सकते हैं।

लेकिन उच्च रक्तचाप या टाइप-2 मधुमेह में ऐसा कोई एक ‘दुश्मन’ नहीं है जिसे शरीर से निकाल दिया जाए।

यह पूरे शरीर की कई प्रणालियों के बीच लंबे समय में बने असंतुलन की समस्या है। इसलिए आधुनिक चिकित्सा का लक्ष्य कई बार बीमारी को जड़ से खत्म करना नहीं, बल्कि उसके कारण होने वाले नुकसान को रोकना और व्यक्ति को लंबे समय तक स्वस्थ रखना होता है।

बीमारी जितनी जल्दी पकड़े, वापसी की संभावना उतनी ज्यादा

यही कारण है कि शुरुआती पहचान इतनी महत्वपूर्ण है।

प्री डायबिटीज के समय शरीर में बदलाव अपेक्षाकृत ज्यादा सुधारे जा सकते हैं। नए-नए शुरू हुए टाइप-2 मधुमेह में भी पर्याप्त वजन घटाने और जीवनशैली में बदलाव से रिमिशन की संभावना लंबे समय से मधुमेह वाले व्यक्ति की तुलना में ज्यादा हो सकती है।

उच्च रक्तचाप में भी यही बात लागू होती है। जितनी जल्दी कारणों को पहचाना और नियंत्रित किया जाए, उतना ही बेहतर। इसलिए यह सोच कि ‘अभी तो थोड़ी शुगर बढ़ी है, बाद में देखेंगे’ या ‘बीपी थोड़ा ही ज्यादा है’ नुकसानदेह हो सकती है। कई बार शरीर की समस्या रिपोर्ट में पहली बार दिखाई देने से बहुत पहले शुरू हो चुकी होती है।

क्या जीवनशैली से हर बीपी और शुगर ठीक हो सकती है?

अगर किसी व्यक्ति का रक्तचाप बहुत ज्यादा है तो केवल यह सोचकर दवा छोड़ देना कि ‘मैं नमक कम कर दूंगा’ खतरनाक हो सकता है। इसी तरह अगर किसी व्यक्ति की शुगर बहुत ज्यादा है और डॉक्टर ने दवा या इंसुलिन की सलाह दी है तो केवल घरेलू नुस्खों के भरोसे इलाज रोक देना गंभीर नुकसान कर सकता है।

जीवनशैली बहुत शक्तिशाली है, लेकिन हर व्यक्ति और हर बीमारी की अवस्था में अकेली पर्याप्त नहीं होती। दवा और जीवनशैली को एक-दूसरे का दुश्मन समझना भी गलत है। कई बार सबसे अच्छा परिणाम दोनों के साथ मिलने से आता है।

टाइप-2 मधुमेह में वजन इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

कई लोगों में शरीर की अतिरिक्त चर्बी, खासकर पेट और अंदरूनी अंगों के आसपास जमा चर्बी, इंसुलिन प्रतिरोध में बड़ी भूमिका निभाती है।

जब वजन पर्याप्त मात्रा में कम होता है तो शरीर के ऊर्जा इस्तेमाल करने का तरीका बदल सकता है। यकृत में जमा अतिरिक्त चर्बी कम हो सकती है और अग्न्याशय की कार्यक्षमता में सुधार हो सकता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हर टाइप-2 मधुमेह वाला व्यक्ति केवल वजन कम करके बीमारी को रिमिशन में ला सकता है।

कुछ लोगों को सामान्य वजन पर भी मधुमेह हो सकता है। खासकर दक्षिण एशियाई आबादी में अपेक्षाकृत कम वजन पर भी टाइप-2 मधुमेह का जोखिम देखा जाता है।

आनुवंशिकी, शरीर में चर्बी का वितरण और अग्न्याशय की क्षमता भी महत्वपूर्ण हैं।

क्या वर्षों की पुरानी क्षति वापस ठीक हो सकती है?

कुछ हद तक हां, लेकिन हमेशा पूरी तरह नहीं।

उदाहरण के लिए रक्तचाप नियंत्रित होने के बाद हृदय पर पड़ा अतिरिक्त दबाव कम हो सकता है और कुछ बदलावों में सुधार हो सकता है।

मधुमेह का अच्छा नियंत्रण आगे होने वाली आंख, गुर्दे और नसों की क्षति का खतरा कम कर सकता है।

लेकिन अगर वर्षों में गंभीर और स्थायी संरचनात्मक नुकसान हो चुका है तो केवल बीपी या शुगर सामान्य करने से हर नुकसान मिट नहीं जाता।

यही कारण है कि बीमारी की रोकथाम और शुरुआती इलाज इतना महत्वपूर्ण है।

क्या आनुवंशिकता भी वजह है?

बिल्कुल। कुछ लोगों में परिवार के कारण उच्च रक्तचाप का जोखिम ज्यादा होता है। कुछ लोगों में टाइप-2 मधुमेह की आनुवंशिक प्रवृत्ति ज्यादा होती है।

आप जीवनशैली से इस जोखिम को काफी कम कर सकते हैं, लेकिन अपनी आनुवंशिक संरचना को नहीं बदल सकते। इसीलिए दो लोग एक जैसा भोजन करें, समान वजन रखें और समान जीवनशैली अपनाएं, फिर भी दोनों का बीपी या शुगर का जोखिम एक जैसा होना जरूरी नहीं है।

उम्र भी एक बड़ी वजह है

हम उम्र बढ़ना बंद नहीं कर सकते। उम्र के साथ रक्तवाहिकाएं कठोर होती हैं। मांसपेशियों की मात्रा और गतिविधि बदल सकती है। शरीर का ऊर्जा इस्तेमाल करने का तरीका बदल सकता है। गुर्दों की कार्यक्षमता में भी बदलाव आ सकते हैं। इसलिए जो जीवनशैली 25 साल की उम्र में आपका बीपी 110/70 रखती थी, जरूरी नहीं कि 65 साल की उम्र में भी वही परिणाम दे। यह दवा की विफलता नहीं है। यह मानव शरीर की उम्र बढ़ने की प्रक्रिया है।

सबसे बड़ी समस्या यह है कि बीमारी पैदा करने वाला माहौल अक्सर वही रहता है

कल्पना कीजिए कोई व्यक्ति रोज 10 घंटे बैठकर काम करता है। नींद पूरी नहीं होती। लगातार तनाव रहता है। भोजन में नमक और अत्यधिक प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थ ज्यादा हैं। शारीरिक गतिविधि बहुत कम है और वजन लगातार बढ़ रहा है। अब उसे बीपी की दवा दे दी गई।

दवा रक्तचाप कम कर सकती है। लेकिन वह व्यक्ति की नौकरी, तनाव, नींद, भोजन और शारीरिक निष्क्रियता को नहीं बदलती।

इसलिए कई बार चिकित्सा बीमारी के जैविक परिणाम को नियंत्रित करती है, जबकि बीमारी पैदा करने वाली परिस्थितियां वैसी ही बनी रहती हैं। यहीं से यह गलत धारणा पैदा होती है कि ‘डॉक्टर बीमारी ठीक नहीं करते, बस दवा चलाते रहते हैं।’ असलियत इससे कहीं ज्यादा जटिल है।

तो क्या ‘दवा से सामान्य’ होना कम अच्छा है?

अगर किसी व्यक्ति का रक्तचाप दवा के साथ 120/80 रहता है तो वह रक्तचाप किसी भी तरह ‘नकली’ नहीं है।

अगर दवा की मदद से किसी व्यक्ति की शुगर सुरक्षित सीमा में रहती है तो उसका शरीर वास्तव में लाभ पा रहा है। चिकित्सा में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह नहीं है कि संख्या दवा से सामान्य हुई या बिना दवा के।सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या रक्तचाप और शुगर सुरक्षित सीमा में हैं और क्या इससे हृदय, मस्तिष्क, गुर्दे, आंखों और नसों को नुकसान का जोखिम कम हो रहा है।

अगर किसी व्यक्ति ने दवा की मदद से अगले 20-30 साल स्ट्रोक, हार्ट अटैक, गुर्दे की बीमारी या दूसरी गंभीर जटिलताओं से खुद को बचाए रखा, तो इसे ‘सिर्फ नियंत्रण’ कहना चिकित्सा की उपलब्धि को छोटा करना होगा।

फिर ‘कंट्रोल’ शब्द इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

क्योंकि पुरानी बीमारियों में नियंत्रण का मतलब हार मानना नहीं है। मान लीजिए किसी व्यक्ति में आनुवंशिक कारणों से बीपी बढ़ने की प्रवृत्ति है। दवा, सही भोजन, व्यायाम और वजन नियंत्रण की मदद से उसका रक्तचाप वर्षों तक सामान्य रहता है। उस व्यक्ति को स्ट्रोक नहीं हुआ, हृदय पर अतिरिक्त दबाव नहीं पड़ा और गुर्दे सुरक्षित रहे। क्या हम कहेंगे कि उसका इलाज सफल नहीं हुआ क्योंकि बीमारी जड़ से खत्म नहीं हुई?

नहीं। यही आधुनिक चिकित्सा की असली ताकत है।

वह हमेशा शरीर को ‘फैक्टरी रीसेट’ नहीं कर सकती, लेकिन वह बीमारी को इतना नियंत्रित कर सकती है कि व्यक्ति लंबे समय तक स्वस्थ जीवन जी सके।

तो क्या कभी दवा से छुटकारा मिल सकता है?

कुछ लोगों में हां। उच्च रक्तचाप में वजन कम होने, नमक कम करने, नियमित व्यायाम, बेहतर नींद या किसी मूल कारण का इलाज होने के बाद डॉक्टर की निगरानी में दवा कम या बंद की जा सकती है।

टाइप-2 मधुमेह में भी पर्याप्त और टिकाऊ वजन घटने के बाद कुछ लोगों में रिमिशन संभव है। लेकिन यह फैसला व्यक्ति खुद नहीं करता। डॉक्टर आम तौर पर कई बार की जांच और लंबे समय की स्थिति देखकर तय करते हैं कि दवा कम की जा सकती है या नहीं।

इसलिए ‘मेरी शुगर अब सामान्य है, मैं दवा बंद कर रहा हूं’ या ‘बीपी ठीक लग रहा है, गोली की जरूरत नहीं’ जैसी सोच खतरनाक हो सकती है।

आखिर शरीर को पूरी तरह ‘फैक्टरी रीसेट’ क्यों नहीं कर सकते?

क्योंकि शरीर कोई कंप्यूटर नहीं है।

उसमें कोई ऐसा बटन नहीं है जिसे दबाकर 20 साल पीछे की जैविक स्थिति वापस लाई जा सके।

शरीर की उम्र बढ़ती है। आनुवंशिक प्रवृत्ति बनी रहती है। रक्तवाहिकाओं में बदलाव जमा हो सकते हैं। अग्न्याशय की क्षमता कम हो सकती है। गुर्दे और दूसरे अंग वर्षों के दबाव का असर झेल सकते हैं।

फिर भी शरीर में सुधार की क्षमता बहुत बड़ी है।

बीपी कम किया जा सकता है। शुगर सामान्य की जा सकती है। इंसुलिन संवेदनशीलता सुधर सकती है। वजन घटाया जा सकता है। हृदय और गुर्दों को आगे होने वाले नुकसान से बचाया जा सकता है। और कुछ लोगों में टाइप-2 मधुमेह रिमिशन में भी जा सकता है।

इसलिए ‘या तो पूरी तरह ठीक, या फिर जिंदगीभर बीमार’—यह सोच सही नहीं है।

सबसे अच्छा मौका कब होता है?

जितना जल्दी बीमारी पकड़ी जाए, उतना अच्छा।

पूर्व-मधुमेह के समय। नए-नए शुरू हुए टाइप-2 मधुमेह में। शुरुआती उच्च रक्तचाप में। उस समय जब अभी बड़ी अंग-क्षति नहीं हुई हो और वजन, भोजन, नींद तथा शारीरिक गतिविधि बीमारी में बड़ी भूमिका निभा रहे हों।

यही वह समय है जब शरीर के बिगड़े संतुलन को वापस बेहतर दिशा में ले जाने की संभावना सबसे ज्यादा होती है।

याद रखें, बीमारी जितनी पुरानी होती जाती है, शरीर को पूरी तरह पहले जैसा बनाना उतना कठिन हो सकता है।

लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि एक बार बीपी या शुगर बढ़ गई तो अब जिंदगीभर सिर्फ दवा ही एक रास्ता है।

कुछ लोगों का रक्तचाप बड़े जीवनशैली बदलाव या मूल कारण के इलाज के बाद बिना दवा सामान्य रह सकता है। टाइप-2 मधुमेह में भी कुछ लोगों को रिमिशन मिल सकती है। दूसरी ओर, बहुत से लोगों के लिए दवा लंबे समय तक लेना ही सबसे सुरक्षित और प्रभावी रास्ता होता है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि दवा से नियंत्रित बीपी या शुगर भी वास्तविक इलाज का हिस्सा है।

आधुनिक चिकित्सा हमेशा शरीर को उसकी पुरानी अवस्था में वापस नहीं ले जा सकती, लेकिन वह बिगड़े हुए संतुलन को सुरक्षित सीमा में ला सकती है, कई बार उसे काफी हद तक उलट सकती है और सबसे जरूरी बात, वह शरीर को आगे होने वाले गंभीर नुकसान से बचा सकती है।

Yogesh Mishra
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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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