TRENDING TAGS :
सांसों की सेहत ताउम्र संभालें: बचपन से बुढ़ापे तक ऐसे सुरक्षित रखें फेफड़े
Lung Health: विश्व फेफड़ा दिवस 2026 की थीम ‘A Lifetime of Lung Health’ है। जानिए बचपन से बुजुर्गों तक फेफड़ों की सेहत पर प्रदूषण, तंबाकू और जीवनशैली का असर।
Lung Health
Lung Health: फेफड़ों की सेहत को हम अक्सर तब तक गंभीरता से नहीं लेते जब तक सामान्य काम करते समय सांस फूलने, लगातार खांसी, घरघराहट या बार-बार छाती में संक्रमण जैसी परेशानी शुरू न हो जाए। लेकिन फेफड़े सामान्यतः एक दिन में कमजोर नहीं होते। गर्भावस्था और बचपन में पोषण, संक्रमण और वायु प्रदूषण से लेकर किशोरावस्था में फेफड़ों के विकास, युवावस्था में धूम्रपान-वेपिंग, कार्यस्थल की धूल और रसायनों, मध्य आयु में लंबे समय के प्रदूषण और तंबाकू के असर तथा वृद्धावस्था में घटती शारीरिक क्षमता और दूसरी बीमारियों तक कई कारक मिलकर पूरी जिंदगी के श्वसन स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं। इसी सोच के साथ आज 25 सितंबर को विश्व फेफड़ा दिवस 2026 मनाया जा रहा है और इस वर्ष Forum of International Respiratory Societies यानी FIRS ने इसका विषय ‘A Lifetime of Lung Health’-‘जीवन भर फेफड़ों की सेहत’ रखा है। अभियान का मूल संदेश है कि स्वस्थ फेफड़ों की नींव जीवन के शुरुआती वर्षों में पड़ती है, लेकिन उनकी सुरक्षा हर उम्र में जारी रहनी चाहिए।
भारत में श्वसन रोगों का बोझ बहुत बड़ा है, लेकिन ‘देश में ठीक सात करोड़ लोग श्वसन रोगों से पीड़ित हैं’ जैसी एक संख्या को सभी फेफड़ा रोगों का नवीनतम आधिकारिक आंकड़ा मानना उचित नहीं होगा, क्योंकि दमा, सीओपीडी, टीबी, फेफड़ों के संक्रमण, कैंसर, ब्रॉन्किइक्टेसिस और दूसरी बीमारियों के आंकड़े अलग-अलग अध्ययनों, आयु समूहों और परिभाषाओं से आते हैं और एक ही व्यक्ति को एक से अधिक रोग भी हो सकते हैं। उदाहरण के लिए भारतीय बच्चों में दमा पर 33 अध्ययनों और 1,67,626 बच्चों के एक बड़े विश्लेषण में औसत प्रसार 7.9 प्रतिशत पाया गया, लेकिन अलग-अलग अध्ययनों में यह 2 से 18.2 प्रतिशत तक था। इसलिए ‘देश के 8 प्रतिशत बच्चों को दमा है’ को सटीक राष्ट्रीय जनगणना आंकड़ा कहने के बजाय अध्ययनों का लगभग आठ प्रतिशत का सम्मिलित अनुमान कहना अधिक सही है।
0 से 18 वर्ष: यहीं तैयार होती है जिंदगी भर की सांस लेने की क्षमता
बचपन और किशोरावस्था फेफड़ों के विकास के लिए निर्णायक समय है। जन्म के बाद भी फेफड़ों की संरचना और कार्यक्षमता विकसित होती रहती है और किशोरावस्था तथा शुरुआती वयस्क अवस्था तक उनकी क्षमता बढ़ती है। इसलिए बार-बार होने वाले गंभीर श्वसन संक्रमण, तंबाकू का परोक्ष धुआं, घर के भीतर ठोस ईंधन का धुआं, बाहरी वायु प्रदूषण, खराब पोषण और ठीक से नियंत्रित न किया गया दमा भविष्य में बच्चे की अधिकतम फेफड़ा क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं। FIRS के इस वर्ष के अभियान में भी स्वस्थ फेफड़ों के विकास और वृद्धि को जीवन भर के श्वसन स्वास्थ्य की पहली सीढ़ी माना गया है।
बच्चे को रात में बार-बार खांसी आती हो, खेलते या दौड़ते समय दूसरे बच्चों की तुलना में जल्दी थकता हो, सांस लेते समय सीटी जैसी आवाज आती हो, बार-बार सीने में जकड़न होती हो अथवा खांसी के कारण खेलना छोड़ता हो तो इसे हर बार ‘मौसम बदलने की खांसी’ समझना ठीक नहीं है। दूसरी ओर सोते समय लगातार मुंह से सांस लेना केवल फेफड़ों की बीमारी का लक्षण नहीं है, नाक बंद रहने, एलर्जी या एडिनॉइड जैसी दूसरी वजहें भी हो सकती हैं। इसलिए लक्षणों के आधार पर स्वयं दमा घोषित करने के बजाय चिकित्सकीय जांच जरूरी है।
बच्चों में एक बड़ी गलती इनहेलर से डरना है। चिकित्सक द्वारा दमा के लिए दिया गया इनहेलर ‘आदत डालने वाली दवा’ नहीं होता। सही तकनीक से ली गई इनहेल्ड दवा सीधे श्वसन मार्ग तक पहुंचती है और कई परिस्थितियों में दमा नियंत्रण का सबसे प्रभावी तरीका होती है। इसी तरह बार-बार अपने स्तर पर कफ सिरप, एंटीबायोटिक या स्टेरॉयड देना भी उचित नहीं है। घर और कार को तंबाकू के धुएं से मुक्त रखना, बच्चे को उम्र के अनुसार नियमित खेलकूद के लिए प्रोत्साहित करना, संतुलित पोषण देना, निर्धारित टीके समय पर लगवाना और दमा अथवा एलर्जी होने पर उसका नियमित उपचार इस उम्र में फेफड़ों के लिए सबसे बड़ा निवेश है।
18 से 40 वर्ष: फेफड़े मजबूत लगते हैं, नुकसान चुपचाप शुरू हो सकता है
युवावस्था में फेफड़ों की क्षमता सामान्यतः अच्छी होती है, इसलिए शुरुआती नुकसान लंबे समय तक दिखाई नहीं देता। यही वह दौर भी है जब सिगरेट, बीड़ी, हुक्का और वेपिंग जैसी आदतें शुरू हो सकती हैं। ‘हुक्का सिगरेट से सुरक्षित है’ या ‘वेपिंग में केवल भाप जाती है’ जैसी धारणाएं वैज्ञानिक रूप से सही नहीं हैं। इनसे निकोटीन और दूसरे हानिकारक रसायनों का संपर्क हो सकता है। इसके अलावा लगातार खराब वायु गुणवत्ता, यातायात का धुआं, निर्माण स्थलों की धूल, सिलिका, एस्बेस्टस, धातु या रासायनिक धुएं जैसे कार्यस्थलीय संपर्क वर्षों में फेफड़ों पर संचयी प्रभाव डाल सकते हैं।
इस उम्र में कई लोग लगातार खांसी को एलर्जी, मौसम, तनाव या प्रदूषण कहकर महीनों टालते रहते हैं। सामान्य सीढ़ियां चढ़ने, दौड़ने या पहले आसानी से किए जाने वाले काम में असामान्य सांस फूलना, बार-बार घरघराहट, लंबे समय की खांसी, लगातार बलगम या बार-बार संक्रमण को जांच की जरूरत हो सकती है। अगरबत्ती, धूप, सुगंधित मोमबत्ती और रूम फ्रेशनर भी कुछ संवेदनशील या दमा वाले लोगों में लक्षण बढ़ा सकते हैं, हालांकि हर व्यक्ति में इनका प्रभाव समान नहीं होता।
इस आयु में सबसे प्रभावी बचाव धूम्रपान शुरू ही न करना या कर रहे हों तो छोड़ना है। दूसरे व्यक्ति के तंबाकू धुएं से भी बचना चाहिए। अत्यधिक प्रदूषण वाले समय में सड़क किनारे भारी व्यायाम करने के बजाय अपेक्षाकृत स्वच्छ स्थान और समय चुनना बेहतर है। नियमित शारीरिक सक्रियता हृदय और श्वसन तंत्र की समग्र क्षमता बढ़ाती है, लेकिन ‘फेफड़ों को साफ करने’ वाली किसी विशेष चाय, भाप, पूरक आहार या घरेलू नुस्खे का वैज्ञानिक विकल्प धूम्रपान छोड़ने, प्रदूषण कम करने और बीमारी का उचित इलाज कराने के बराबर नहीं है।
40 से 60 वर्ष: उम्र नहीं, अपनी पुरानी क्षमता से तुलना कीजिए
मध्य आयु में एक उपयोगी सवाल यह है कि क्या जो काम छह महीने या एक वर्ष पहले आसानी से कर लेते थे, अब वही करते हुए अधिक सांस फूलती है? उम्र के साथ फेफड़ों की कार्यक्षमता में प्राकृतिक बदलाव आते हैं, लेकिन सांस फूलने में स्पष्ट वृद्धि को केवल ‘उम्र बढ़ रही है’ कहकर छोड़ देना उचित नहीं है। खासकर लंबे समय तक धूम्रपान करने वाले, घर या कार्यस्थल पर धुएं के संपर्क में रहे लोग, निर्माण, खनन, पत्थर काटने, फैक्टरी, वेल्डिंग या पेंटिंग जैसे व्यवसायों में काम करने वाले लोगों को नए लक्षणों पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
सुबह लगातार बलगम आना, पुरानी खांसी, पहले से जल्दी सांस फूलना, बार-बार छाती में संक्रमण, अस्पष्ट कारण से वजन या भूख कम होना अथवा बलगम में खून की लकीर दिखना चिकित्सकीय जांच का कारण है। खास तौर पर खांसी में खून को केवल गले की खराश मानकर टालना ठीक नहीं है, क्योंकि इसके पीछे संक्रमण और टीबी से लेकर ब्रॉन्किइक्टेसिस या कैंसर तक कई कारण हो सकते हैं। इसका अर्थ यह भी नहीं कि खून दिखने वाला हर व्यक्ति कैंसर से पीड़ित है, बल्कि यह ऐसा संकेत है जिसकी वजह चिकित्सक से पता करानी चाहिए।
भारत में सीओपीडी यानी Chronic Obstructive Pulmonary Disease का बोझ महत्वपूर्ण है। हाल में प्रकाशित भारतीय अध्ययनों के एक व्यापक विश्लेषण में वयस्क पुरुषों में सम्मिलित प्रसार लगभग 16 प्रतिशत और महिलाओं में 9 प्रतिशत पाया गया, जबकि 18 से 59 वर्ष के समूह में यह करीब 17 प्रतिशत और 60 वर्ष से अधिक में 27 प्रतिशत था। लेकिन इसे ‘भारत के हर 18-59 वर्षीय व्यक्ति में 17 प्रतिशत को सीओपीडी है’ जैसा निर्विवाद राष्ट्रीय सर्वेक्षण आंकड़ा नहीं माना जाना चाहिए, क्योंकि यह अलग-अलग अध्ययनों का सम्मिलित अनुमान है और अध्ययनों में काफी विविधता थी। इसी विश्लेषण में धूम्रपान करने वाले वयस्कों में प्रसार काफी अधिक पाया गया।
60 वर्ष से ऊपर: सांस फूलना सिर्फ फेफड़ों की बीमारी नहीं
बढ़ती उम्र के साथ फेफड़ों की लोच, छाती की मांसपेशियों की ताकत और शारीरिक सहनशीलता कम हो सकती है, लेकिन सामान्य काम में तेजी से बढ़ती सांस की परेशानी को ‘बुढ़ापे का असर’ मान लेना खतरनाक हो सकता है। नहाने, कपड़े पहनने या घर के भीतर चलने में पहले से बहुत अधिक सांस फूलना, सपाट बिस्तर पर लेटने में परेशानी, सांस फूलने के साथ पैर और टखने सूजना अथवा चलने की क्षमता लगातार कम होना केवल फेफड़ों ही नहीं बल्कि हृदय रोग, एनीमिया और दूसरी बीमारियों की ओर भी संकेत कर सकता है।
भारत के Longitudinal Ageing Study of India के पहले चरण में 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों में स्वयं बताई गई पुरानी फेफड़ा बीमारी का प्रसार 8.3 प्रतिशत दर्ज किया गया था। इस आयु में टीकाकरण भी विशेष महत्व रखता है, लेकिन भारत में वयस्क टीकाकरण की पहुंच बेहद कम रही है। LASI के 2017-18 आंकड़ों पर आधारित अध्ययन में 45 वर्ष और उससे अधिक आयु के केवल 1.5 प्रतिशत लोगों ने कभी इन्फ्लुएंजा का टीका लगवाने और 0.6 प्रतिशत ने न्यूमोकोकल टीका लगवाने की जानकारी दी थी। इसलिए ‘60+ में 1.5 प्रतिशत ने फ्लू टीका लगवाया’ कहने के बजाय यह स्पष्ट करना जरूरी है कि 1.5 प्रतिशत का आंकड़ा 45 वर्ष से अधिक आयु के लोगों के पुराने LASI आंकड़ों पर आधारित है।
फ्लू, न्यूमोकोकल और दूसरे आवश्यक टीके उम्र, पुरानी बीमारी, पहले के टीकाकरण और चिकित्सकीय जोखिम के अनुसार तय होते हैं। इसलिए हर बुजुर्ग के लिए एक जैसी सूची मानने के बजाय चिकित्सक से व्यक्तिगत सलाह लेना बेहतर है। पहले से सीओपीडी या दमा की दवा अथवा इनहेलर ले रहे बुजुर्गों को केवल इसलिए दवा बंद नहीं करनी चाहिए कि कुछ दिनों से लक्षण नहीं हैं।
सांसों की जांच: हर व्यक्ति को CT या PFT कराने की जरूरत नहीं
फेफड़ों की जांच का अर्थ हर स्वस्थ व्यक्ति का हर वर्ष CT स्कैन या स्पायरोमेट्री कराना नहीं है। स्पायरोमेट्री या पल्मोनरी फंक्शन टेस्ट यह पता लगाने में मदद करता है कि व्यक्ति कितनी हवा बाहर निकाल सकता है और कितनी तेजी से निकाल सकता है। दमा, सीओपीडी या अस्पष्ट लंबे समय की सांस की परेशानी में चिकित्सक इसे लिख सकता है। छाती का एक्स-रे निमोनिया, टीबी या दूसरी परिस्थितियों में जरूरत के अनुसार उपयोगी हो सकता है, जबकि CT स्कैन फेफड़ों की संरचना को अधिक बारीकी से दिखाता है लेकिन विकिरण के कारण इसे बिना चिकित्सकीय आवश्यकता नियमित जांच की तरह कराना उचित नहीं है।
पल्स ऑक्सीमीटर खून में ऑक्सीजन संतृप्ति का अनुमान देता है, लेकिन यह स्वयं बीमारी का निदान नहीं करता और गलत फिटिंग, ठंडी उंगलियां, हलचल तथा उपकरण की गुणवत्ता से परिणाम प्रभावित हो सकते हैं। लंबे समय की खांसी, बुखार, वजन घटना या टीबी का संदेह होने पर बलगम की आणविक जांच सहित उपयुक्त परीक्षण किए जा सकते हैं। एलर्जी जांच, रक्त परीक्षण, नींद की जांच और ब्रॉन्कोस्कोपी जैसी जांचें रोग और लक्षणों के आधार पर चुनिंदा मरीजों में होती हैं।
दमा से फाइब्रोसिस तक-फेफड़ों की बीमारियां एक जैसी नहीं
दमा में श्वसन नलियों में सूजन और समय-समय पर संकुचन से घरघराहट, खांसी, सीने में जकड़न और सांस फूल सकती है। सीओपीडी में वायु प्रवाह की बाधा लंबे समय तक बनी रहती है और पुरानी खांसी, बलगम तथा सांस फूलना सामान्य लक्षण हैं। निमोनिया फेफड़ों का संक्रमण है जिसमें बुखार, खांसी और सांस की परेशानी हो सकती है। टीबी संक्रामक बीमारी है और लंबे समय की खांसी, बुखार, रात में पसीना तथा वजन घटना इसके संभावित संकेत हैं।
फेफड़ों के कैंसर में लगातार या बदलती खांसी, खांसी में खून, वजन कम होना या छाती में दर्द जैसे लक्षण हो सकते हैं, लेकिन शुरुआती चरण में लक्षण न भी हों। पल्मोनरी फाइब्रोसिस में फेफड़ों के ऊतकों में दाग और कठोरता बढ़ने से सूखी खांसी तथा सांस फूल सकती है। ब्रॉन्किइक्टेसिस में श्वसन नलियां स्थायी रूप से चौड़ी और क्षतिग्रस्त हो सकती हैं, जिससे लगातार अधिक बलगम और बार-बार संक्रमण हो सकता है। इन बीमारियों के लक्षण एक-दूसरे से मिल सकते हैं, इसलिए केवल लक्षण देखकर स्वयं निदान करना सही नहीं है।
धूम्रपान अकेला दुश्मन नहीं-प्रदूषण और काम की जगह भी मायने रखती है
तंबाकू फेफड़ों के लिए सबसे महत्वपूर्ण रोके जा सकने वाले जोखिमों में है, लेकिन जो व्यक्ति कभी धूम्रपान नहीं करता उसे फेफड़ों की बीमारी नहीं होगी, यह मानना भी गलत है। घर के भीतर ठोस ईंधन का धुआं, दूसरे व्यक्ति की सिगरेट का धुआं, बाहरी वायु प्रदूषण, निर्माण और खनन की धूल, सिलिका, कुछ औद्योगिक रसायन, बार-बार के श्वसन संक्रमण, एलर्जी, आनुवंशिक स्थितियां और कुछ ऑटोइम्यून बीमारियां भी जोखिम बढ़ा सकती हैं। हाल के भारतीय सीओपीडी विश्लेषण में बायोमास ईंधन इस्तेमाल करने वालों में स्वच्छ ईंधन इस्तेमाल करने वालों की तुलना में अधिक प्रसार मिला, हालांकि ऐसे अध्ययनों से किसी एक व्यक्ति में बीमारी का कारण निश्चित नहीं किया जा सकता।
वायु प्रदूषण का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि इससे बचाव केवल व्यक्ति के व्यवहार पर निर्भर नहीं है। घर में धूम्रपान रोकना व्यक्ति के नियंत्रण में हो सकता है, लेकिन शहर की खराब हवा, सड़क की धूल और औद्योगिक प्रदूषण के लिए सार्वजनिक नीति और सामुदायिक कार्रवाई की जरूरत होती है। विश्व फेफड़ा दिवस का संदेश भी व्यक्तिगत इलाज के साथ स्वच्छ हवा और आवश्यक श्वसन उपचार तक समान पहुंच की जरूरत पर जोर देता है।
इन संकेतों पर इंतजार नहीं, तुरंत चिकित्सा सहायता जरूरी
अचानक बहुत तेजी से सांस फूलना, सांस लेने में अत्यधिक कठिनाई, होंठ या चेहरा नीला पड़ना, खांसी में अधिक खून आना, सांस की तकलीफ के साथ सीने में तेज दर्द, बेहोशी या भ्रम जैसी स्थिति गंभीर संकेत हो सकते हैं। ऑक्सीमीटर पर ऑक्सीजन लगातार असामान्य रूप से कम दिखाई दे और साथ में सांस की तकलीफ हो तो भी चिकित्सकीय मूल्यांकन में देरी नहीं करनी चाहिए। ऑक्सीजन के लिए हर व्यक्ति पर लागू एक अकेली संख्या तय करना ठीक नहीं है क्योंकि सीओपीडी जैसी कुछ पुरानी स्थितियों में व्यक्ति का सामान्य स्तर अलग हो सकता है, इसलिए संख्या के साथ लक्षण और उसकी सामान्य स्थिति भी महत्वपूर्ण हैं।
फेफड़ों की अच्छी सेहत के तीन मूल मंत्र
पूरी जिंदगी के लिए फेफड़ों की सुरक्षा को तीन सरल सिद्धांतों में समझा जा सकता है। पहला, धुएं से दूरी-सिगरेट, बीड़ी, हुक्का, वेपिंग और दूसरे के तंबाकू धुएं से बचना, घर में पर्याप्त हवा का आवागमन रखना और जहां संभव हो धूल तथा हानिकारक रसायनों का संपर्क कम करना। दूसरा, शरीर को सक्रिय रखना-उम्र, स्वास्थ्य और चिकित्सकीय स्थिति के अनुसार नियमित चलना और व्यायाम करना, क्योंकि शारीरिक सक्रियता केवल मांसपेशियों को नहीं बल्कि हृदय और श्वसन तंत्र की कार्यक्षमता को भी बनाए रखने में मदद करती है। तीसरा, लक्षणों को समय पर पहचानना-लंबी खांसी, घरघराहट, लगातार बलगम, बार-बार संक्रमण या बढ़ती सांस की परेशानी को महीनों तक टालने के बजाय जरूरत के अनुसार जांच और उपचार कराना।
विश्व फेफड़ा दिवस 2026 का ‘A Lifetime of Lung Health’ संदेश इसी सोच को सामने रखता है कि फेफड़ों की कहानी बुढ़ापे में शुरू नहीं होती। बच्चे के विकसित होते फेफड़े, किशोर की स्वच्छ हवा, युवा का तंबाकू से दूर रहना, कामकाजी व्यक्ति का धूल और रसायनों से बचाव, मध्य आयु में शुरुआती लक्षणों की पहचान और वृद्धावस्था में उचित उपचार तथा टीकाकरण-ये सभी एक ही जीवन यात्रा के हिस्से हैं। फेफड़ों की अच्छी सेहत का सबसे बड़ा रहस्य किसी एक जांच, दवा या घरेलू नुस्खे में नहीं, बल्कि दशकों तक उन्हें अनावश्यक धुएं और प्रदूषण से बचाने, शरीर को सक्रिय रखने और बीमारी के शुरुआती संकेतों को समय पर पहचानने में है-क्योंकि सांस की कीमत अक्सर हमें तभी समझ आती है जब सहज सांस लेना मुश्किल होने लगता है।


