Science War: 21वीं सदी का नया विश्व—विज्ञान, सत्ता और मानवता के बीच भारत की ऐतिहासिक भूमिका

21st Century Science War: सी परिवर्तन ने चीन के उदय को वैश्विक राजनीति का केंद्रीय विषय बना दिया है।

Yogesh Mishra
Published on: 23 July 2026 6:45 PM IST
21st Century Science War
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21st Century Science War

21st Century Science War: बीसवीं शताब्दी के अधिकांश समय में विश्व राजनीति का केंद्र सैन्य शक्ति, वैचारिक संघर्ष और भू-राजनीतिक गठबंधनों के इर्द-गिर्द घूमता रहा। दो विश्वयुद्धों ने यह स्थापित कर दिया कि औद्योगिक उत्पादन और सैन्य क्षमता किसी राष्ट्र की शक्ति के मूल आधार हैं। उसके बाद शीतयुद्ध के दशकों में परमाणु हथियार, मिसाइलें, सैन्य गठबंधन और वैचारिक ध्रुवीकरण वैश्विक राजनीति के प्रमुख निर्धारक बने। सोवियत संघ और अमेरिका के बीच प्रतिस्पर्धा केवल हथियारों की नहीं थी। वह दो आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्थाओं की प्रतिस्पर्धा भी थी। लेकिन इक्कीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक तक आते-आते यह स्पष्ट होने लगा है कि शक्ति का केंद्र धीरे-धीरे बदल रहा है। टैंक, विमानवाहक पोत और परमाणु शस्त्रागार आज भी महत्त्वपूर्ण हैं, किंतु उनके पीछे काम करने वाली वास्तविक शक्ति अब प्रयोगशालाओं, विश्वविद्यालयों, डेटा केंद्रों, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्वांटम कंप्यूटिंग, सेमीकंडक्टर, जैव-प्रौद्योगिकी और अंतरिक्ष विज्ञान में निहित है। आधुनिक युद्ध का निर्णय केवल युद्धभूमि पर नहीं। बल्कि चिप निर्माण संयंत्रों, उपग्रह नेटवर्क, साइबर अवसंरचना और अनुसंधान संस्थानों में भी होने लगा है। इसलिए 21वीं सदी का सबसे बड़ा संघर्ष केवल भूभाग का नहीं बल्कि ज्ञान का संघर्ष है। केवल सीमाओं का नहीं बल्कि तकनीकी नेतृत्व का संघर्ष है। केवल वर्तमान का नहीं बल्कि भविष्य पर अधिकार का संघर्ष है।

इसी परिवर्तन ने चीन के उदय को वैश्विक राजनीति का केंद्रीय विषय बना दिया है। चीन ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी को राष्ट्रीय पुनरुत्थान की आधारशिला बनाया। विशाल औद्योगिक क्षमता विकसित की। अनुसंधान पर निवेश बढ़ाया। लाखों वैज्ञानिक और इंजीनियर तैयार किए। वैश्विक प्रतिभा को आकर्षित करने का प्रयास किया और विश्वविद्यालयों, उद्योगों तथा राज्य के बीच ऐसा समन्वय स्थापित किया जिसने उसे कुछ दशकों के भीतर विश्व की सबसे बड़ी वैज्ञानिक शक्तियों में ला खड़ा किया। यह परिवर्तन संयोग नहीं था। यह दीर्घकालिक राजनीतिक संकल्प, प्रशासनिक निरंतरता और आर्थिक निवेश का परिणाम था। चीन ने यह समझ लिया कि यदि भविष्य की तकनीकों पर नियंत्रण स्थापित किया जा सके, तो आर्थिक शक्ति, सामरिक प्रभाव और वैश्विक प्रतिष्ठा स्वतः बढ़ेगी। इसलिए उसने विज्ञान को केवल शिक्षा नीति का विषय नहीं रहने दिया; उसे राष्ट्रीय रणनीति का केंद्र बना दिया।

दूसरी ओर अमेरिका का अनुभव यह बताता है कि खुला समाज, स्वतंत्र विश्वविद्यालय, वैश्विक प्रतिभा, निजी उद्यम, जोखिम लेने वाली पूँजी और अकादमिक स्वतंत्रता मिलकर किस प्रकार अद्भुत नवाचार क्षमता पैदा कर सकते हैं। अमेरिका की सबसे बड़ी शक्ति केवल उसका धन नहीं बल्कि उसकी संस्थागत संरचना है। वहाँ किसी छात्र का विचार कुछ वर्षों में शोध-पत्र, पेटेंट, स्टार्टअप और वैश्विक कंपनी में बदल सकता है। विश्वविद्यालय, उद्योग, रक्षा अनुसंधान, निवेशक और उद्यमी एक ऐसे पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करते हैं जिसमें नई तकनीक को विकसित होने और बाजार तक पहुँचने का अवसर मिलता है। यही कारण है कि अनेक उभरती प्रौद्योगिकियों में अमेरिका आज भी अग्रणी बना हुआ है। उसकी चुनौती अब यह नहीं है कि उसके पास प्रतिभा की कमी है। बल्कि यह है कि वह बदलती वैश्विक प्रतिस्पर्धा के बीच अपने नेतृत्व को कैसे बनाए रखे।

चीन और अमेरिका की यह प्रतिस्पर्धा केवल दो राष्ट्रों के बीच नहीं है। यह दो अलग-अलग नवाचार मॉडलों के बीच भी है। एक ओर अत्यधिक समन्वित, राज्य-प्रेरित और दीर्घकालिक योजना आधारित मॉडल है। दूसरी ओर अपेक्षाकृत विकेंद्रीकृत, प्रतिस्पर्धी और उद्यमशील मॉडल है। दोनों की अपनी-अपनी शक्तियाँ और सीमाएँ हैं। चीन संसाधनों का तेज़ी से केंद्रीकरण कर सकता है। लेकिन उसे पारदर्शिता, वैश्विक विश्वास और रचनात्मक स्वतंत्रता से जुड़े प्रश्नों का सामना करना पड़ता है। अमेरिका मौलिक अनुसंधान, उद्यमशीलता और वैश्विक प्रतिभा आकर्षित करने में अग्रणी है, किंतु उसकी लोकतांत्रिक राजनीति, सामाजिक विभाजन और अत्यधिक प्रतिस्पर्धी व्यवस्था भी अनेक चुनौतियाँ उत्पन्न करती है। भविष्य की वैज्ञानिक दौड़ में कौन आगे रहेगा, इसका उत्तर आज निश्चित रूप से कोई नहीं दे सकता। इतना अवश्य स्पष्ट है कि दोनों राष्ट्र विज्ञान को अपनी राष्ट्रीय शक्ति के केंद्र में रख चुके हैं।

भारत के लिए इस पूरी प्रतिस्पर्धा का सबसे बड़ा संदेश यह है कि वह स्वयं को केवल दर्शक बनाकर नहीं रख सकता। भारत यदि केवल विशाल उपभोक्ता बाजार बना रहा, विदेशी तकनीकों का आयात करता रहा और अपनी प्रतिभा को विदेशों के लिए तैयार करता रहा, तो वह आर्थिक रूप से बढ़ते हुए भी तकनीकी दृष्टि से आश्रित बना रहेगा। लेकिन यदि वह विज्ञान, शिक्षा, उद्योग और लोकतंत्र की अपनी विशिष्ट शक्तियों को एक साथ जोड़ सके, तो वह एक तीसरा मॉडल प्रस्तुत कर सकता है—ऐसा मॉडल जिसमें वैज्ञानिक उत्कृष्टता और लोकतांत्रिक स्वतंत्रता एक-दूसरे की विरोधी नहीं बल्कि सहयोगी हों। जिसमें आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय साथ-साथ चलें। जिसमें तकनीकी प्रगति का उद्देश्य केवल लाभ अधिकतम करना नहीं बल्कि मानवीय विकास भी हो। भारत की सभ्यता ने सदियों तक ज्ञान को शक्ति का नहीं बल्कि लोककल्याण का साधन माना है। आधुनिक विज्ञान की कठोर पद्धति और भारतीय बौद्धिक परंपरा का यह संगम यदि सही ढंग से विकसित किया जाए, तो वह विश्व को एक नया दृष्टिकोण दे सकता है।

यहाँ एक और गहरा प्रश्न सामने आता है। क्या विज्ञान स्वयं मानवता को बेहतर भविष्य की ओर ले जाएगा? इतिहास इसका सरल उत्तर नहीं देता। वही विज्ञान जिसने जीवनरक्षक दवाएँ विकसित कीं, उसने परमाणु बम भी बनाया। वही कृत्रिम बुद्धिमत्ता जो रोगों का निदान कर सकती है, वह व्यापक निगरानी और दुष्प्रचार का साधन भी बन सकती है। वही जैव-प्रौद्योगिकी जो खाद्य सुरक्षा बढ़ा सकती है, वह जैविक हथियारों के जोखिम भी उत्पन्न कर सकती है। इसलिए 21वीं सदी का प्रश्न केवल यह नहीं है कि कौन-सा देश सबसे अधिक वैज्ञानिक होगा। बल्कि यह भी है कि वह अपनी वैज्ञानिक शक्ति का उपयोग किस उद्देश्य के लिए करेगा। विज्ञान नैतिकता का विकल्प नहीं है। वह एक साधन है, जिसका स्वरूप उसके उपयोग से निर्धारित होता है।

यहीं भारत की ऐतिहासिक भूमिका सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण हो सकती है। भारत यदि वैज्ञानिक प्रगति को लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व, मानव गरिमा, पर्यावरणीय संतुलन और वैश्विक सहयोग के साथ जोड़ सके, तो वह केवल तकनीकी शक्ति नहीं। बल्कि नैतिक नेतृत्व भी प्रदान कर सकता है। विश्व को ऐसी वैज्ञानिक महाशक्ति की आवश्यकता है, जो ज्ञान का उपयोग प्रभुत्व स्थापित करने के बजाय साझी प्रगति के लिए करे। जो कृत्रिम बुद्धिमत्ता को मानव बुद्धि का प्रतिस्थापन नहीं बल्कि सहयोगी बनाए। जो स्वास्थ्य, जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा, कृषि और शिक्षा जैसी वैश्विक चुनौतियों के समाधान में विज्ञान को साझा संपत्ति के रूप में देखे। भारत की विदेश नीति, लोकतांत्रिक अनुभव और विकास की चुनौतियाँ उसे इस संतुलित दृष्टि के लिए विशिष्ट आधार प्रदान करती हैं।

यह भी ध्यान रखना चाहिए कि आने वाले वर्षों में विज्ञान का अर्थ केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं रहेगा। डेटा नया संसाधन होगा, एल्गोरिद्म नई अवसंरचना होंगे, चिप नई ऊर्जा की तरह रणनीतिक बनेंगे और प्रतिभा सबसे मूल्यवान राष्ट्रीय संपत्ति होगी। जो राष्ट्र अपने बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देगा, अपने विश्वविद्यालयों को स्वतंत्रता देगा, अपने वैज्ञानिकों को सम्मान देगा और अपने उद्योगों को नवाचार के लिए प्रेरित करेगा, वही भविष्य का नेतृत्व करेगा। इसलिए राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक नीति, शिक्षा सुधार और वैज्ञानिक अनुसंधान को अब अलग-अलग विषयों के रूप में नहीं देखा जा सकता। वे एक ही राष्ट्रीय परियोजना के विभिन्न आयाम हैं।

इस पुस्तक की यात्रा एक साधारण प्रश्न से आरंभ हुई थी—क्या अनेक नोबेल पुरस्कार विजेता चीन चले गए हैं? उस प्रश्न का उत्तर खोजते-खोजते हमने पाया कि वास्तविक प्रश्न व्यक्तियों का नहीं, प्रणालियों का है। कोई भी राष्ट्र केवल कुछ महान वैज्ञानिकों के कारण महाशक्ति नहीं बनता। वह तब बनता है जब उसकी पूरी व्यवस्था प्रतिभा को जन्म देती है, उसे विकसित करती है, उसका सम्मान करती है और उसके ज्ञान को समाज की प्रगति में बदल देती है। यही कारण है कि चीन का अध्ययन केवल चीन को समझने के लिए नहीं। बल्कि भारत को समझने के लिए भी आवश्यक है। दूसरों की सफलता और असफलता दोनों से सीखना किसी भी परिपक्व राष्ट्र की पहचान होती है।

अंततः यह स्वीकार करना होगा कि 21वीं सदी की वास्तविक प्रतिस्पर्धा देशों के बीच कम और समय के विरुद्ध अधिक है। जो राष्ट्र आज निर्णय लेगा, वही कल नेतृत्व करेगा। जो आज अनुसंधान में निवेश करेगा, वही कल उद्योग का स्वामी होगा। जो आज अपने विद्यालयों और विश्वविद्यालयों को सशक्त करेगा, वही कल वैश्विक ज्ञान अर्थव्यवस्था का केंद्र बनेगा। और जो आज विज्ञान को राष्ट्रीय संस्कृति का हिस्सा बनाएगा, वही आने वाली पीढ़ियों के लिए समृद्धि, सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित कर सकेगा। इतिहास अवसर देता है लेकिन वह किसी की प्रतीक्षा नहीं करता।

इतिहास ने भारत को अवसर दिया है। अब यह भारत की वैज्ञानिक, राजनीतिक, औद्योगिक और शैक्षिक नेतृत्व क्षमता पर निर्भर करेगा कि वह इस अवसर को भविष्य की शक्ति में बदल पाता है या नहीं।भारत आज उसी ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है जहाँ निर्णय केवल वर्तमान सरकारों या संस्थाओं का नहीं, बल्कि पूरे समाज का होगा। क्या हम विज्ञान को परीक्षा का विषय मानते रहेंगे या राष्ट्रीय चरित्र का हिस्सा बनाएँगे? क्या हम प्रतिभा को विदेश भेजने वाली व्यवस्था बने रहेंगे या उसे विश्वस्तरीय अवसर अपने देश में देंगे? क्या हम तकनीक के उपभोक्ता रहेंगे या उसके निर्माता बनेंगे? इन प्रश्नों के उत्तर ही भारत की 2047 की पहचान तय करेंगे।

यदि एक वाक्य में निष्कर्ष लिखा जाए, तो वह यह होगा—21वीं सदी में विश्व नेतृत्व का मार्ग युद्धभूमि से नहीं, प्रयोगशालाओं से होकर जाता है। और जो राष्ट्र विज्ञान, शिक्षा, उद्योग तथा नैतिक दृष्टि का संतुलित समन्वय कर लेगा, वही भविष्य का वास्तविक नेतृत्व करेगा।

इसी विश्वास के साथ यह चर्चा समाप्त नहीं होती, बल्कि एक राष्ट्रीय संवाद का प्रारंभ करती है। क्योंकि विज्ञान की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वह किसी अंतिम निष्कर्ष पर नहीं रुकता। वह हर उत्तर के बाद एक नया प्रश्न पूछता है। भारत के सामने भी अब सबसे बड़ा प्रश्न यही है—क्या वह आने वाले पच्चीस वर्षों में केवल विकसित अर्थव्यवस्था बनेगा या ज्ञान, विज्ञान और मानवीय नेतृत्व की ऐसी शक्ति बनेगा जो विश्व व्यवस्था को नई दिशा दे सके? इस प्रश्न का उत्तर भविष्य नहीं देगा; इसका उत्तर भारत आज अपने निर्णयों से लिखेगा।

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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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