AI और डीपफेक का खतरा: भारत में कानून कितना तैयार, नकली वीडियो-ऑडियो की पहचान कैसे करें?

AI Deepfake Law: आर्टीफीशियल इंटेलिजेंस (एआई) ने जहां हेल्थ, एजुकेशन, रिसर्च और इंडस्ट्री में नई संभावनाएं पैदा की हैं वहीं इसी तकनीक ने साइबर अपराधियों को भी बेहद ताकतवर हथियार दे दिया है।

Yogesh Mishra
Published on: 29 July 2026 4:50 PM IST
AI Deepfake India Law
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AI Deepfake India Law 

AI Deepfake India Law: आर्टीफीशियल इंटेलिजेंस (एआई) ने जहां हेल्थ, एजुकेशन, रिसर्च और इंडस्ट्री में नई संभावनाएं पैदा की हैं वहीं इसी तकनीक ने साइबर अपराधियों को भी बेहद ताकतवर हथियार दे दिया है। आज कुछ मिनटों में किसी व्यक्ति की आवाज की हूबहू नकल की जा सकती है, उसका चेहरा किसी दूसरे वीडियो पर लगाया जा सकता है या ऐसा वीडियो तैयार किया जा सकता है जिसमें वह ऐसी बातें करता हुआ दिखाई दे जो उसने कभी कही ही नहीं। इसे ही डीपफेक (Deepfake) कहा जाता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में साइबर क्राइम का सबसे बड़ा खतरा सिर्फ हैकिंग नहीं, बल्कि भरोसे पर हमला होगा। अगर लोग यह पहचान ही नहीं पाएंगे कि सामने दिख रही आवाज या वीडियो असली है या नकली, तो बैंकिंग, चुनाव, न्याय व्यवस्था, मीडिया और निजी प्रतिष्ठा, सभी प्रभावित हो सकते हैं।

भारत में एआई और डीपफेक पर क्या है कानूनी व्यवस्था?

भारत में अभी यूरोपीय संघ (EU AI Act) की तरह AI के लिए कोई अलग व्यापक कानून नहीं है। फिलहाल AI और डीपफेक से जुड़े मामलों को सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (IT Act), IT Rules, डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) Act तथा भारतीय दंड कानूनों के विभिन्न प्रावधानों के माध्यम से नियंत्रित किया जा रहा है।

2026 में केंद्र सरकार ने AI से तैयार सामग्री और डीपफेक पर निगरानी को और सख्त किया है। आईटी नियमों में संशोधन कर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर एआई से बनी (AI-generated) या सिंथेटिक कंटेंट के संबंध में अधिक जवाबदेही तय की गई है। सरकार ने ऐसे कंटेंट की पहचान, लेबलिंग और शिकायत मिलने पर तेजी से कार्रवाई की व्यवस्था को मजबूत किया है। हाल के महीनों में केंद्र सरकार ने यह भी संकेत दिया है कि डिजिटल अरेस्ट और डीपफेक जैसे अपराधों को अलग कानूनी श्रेणी में लाने के लिए विशेष कानून पर विचार किया जा रहा है, क्योंकि मौजूदा कानून इन नई तकनीकों से जुड़े अपराधों को स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं करते।

सरकार और एजेंसियां क्या कर रही हैं?

गृह मंत्रालय के तहत भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) ने वित्तीय संस्थानों और नागरिकों को एआई (AI) आधारित साइबर फ्रॉड से सतर्क रहने की सलाह दी है। एडवाइजरी में चेतावनी दी गई है कि अपराधी अब डीपफेक वीडियो, सिंथेटिक पहचान (Synthetic Identity), फर्जी वीडियो केवाईसी (KYC) और फेस ऑथेंटिकेशन को बायपास करने जैसी तकनीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं।

इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने भी सोशल मीडिया कंपनियों को स्पष्ट किया है कि एआई से तैयार भ्रामक सामग्री, फर्जी वीडियो और डीपफेक के प्रसार को रोकना उनकी कानूनी जिम्मेदारी है।

दुनिया में क्या चल रहा है?

भारत अभी एआई के लिए अलग कानून बनाने की प्रक्रिया में है, लेकिन कई देशों ने पहले ही ठोस कदम उठा दिए हैं। जैसेकि, यूरोपीय संघ (European Union) ने EU AI Act लागू किया है, जिसमें AI सिस्टम्स को रिस्क के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में बांटा गया है। उच्च जोखिम वाले AI सिस्टम पर कड़े नियम लागू किए गए हैं और उल्लंघन पर भारी आर्थिक दंड का प्रावधान है।

अमेरिका में अभी फ़ेडरल स्तर पर एक व्यापक AI कानून नहीं है, लेकिन कई राज्यों ने चुनावी डीपफेक, फर्जी राजनीतिक विज्ञापनों और बिना सहमति के बनाए गए AI वीडियो पर अलग-अलग कानून बनाए हैं। बड़ी टेक कंपनियां भी स्वयं वॉटरमार्किंग और कंटेंट लेबलिंग जैसी तकनीकें डेवलप कर रही हैं।

चीन ने एआई से बने कंटेंट के लिए दुनिया के सबसे कड़े नियमों में से एक लागू किया है। वहां AI से तैयार वीडियो, ऑडियो और तस्वीरों को स्पष्ट रूप से लेबल करना अनिवार्य है। साथ ही AI सेवा देने वाली कंपनियों पर यूजर्स की पहचान वेरीफाई करने और रिकॉर्ड सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी भी डाली गई है।

ब्रिटेन फिलहाल व्यापक AI कानून के बजाय क्षेत्रवार नियमन की नीति अपना रहा है, जबकि सिंगापुर और जापान इनोवेशन और सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने वाले मॉडल पर काम कर रहे हैं।

कैसे पहचानें डीपफेक वीडियो - ऑडियो

हालांकि नई एआई तकनीक के कारण डीपफेक की पहचान करना पहले की तुलना में कठिन हो गया है, लेकिन कुछ संकेत अब भी मदद कर सकते हैं।

अगर किसी वीडियो में होंठों की गति और आवाज पूरी तरह मेल नहीं खा रही हो, चेहरे के हाव-भाव अस्वाभाविक लगें, आंखों की पलकें बहुत कम झपक रही हों या रोशनी और छाया चेहरे पर असंगत दिखाई दें, तो सतर्क हो जाना चाहिए।

अगर किसी परिचित व्यक्ति की आवाज में अचानक पैसे मांगने का फोन आए, तो सिर्फ आवाज पर भरोसा न करें। उसी व्यक्ति को उसके पुराने नंबर पर दोबारा कॉल करके या किसी अन्य माध्यम से संपर्क कर पुष्टि करें।

सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो को बिना वेरीफाई किये साझा न करें। कई बार पुराने वीडियो को एआई की मदद से नया रूप देकर गलत संदर्भ में वायरल किया जाता है।

सोशल मीडिया पर अपनी आवाज और चेहरे वाले वीडियो जरूरत से ज्यादा सार्वजनिक न करें, क्योंकि इन्हीं का उपयोग कर अपराधी वॉयस क्लोनिंग और डीपफेक तैयार कर सकते हैं।

अगर कोई वीडियो बहुत सनसनीखेज लगे, किसी बड़े नेता, अभिनेता या अधिकारी का विवादित बयान दिखाए या तुरंत शेयर करने के लिए उकसाए, तो पहले उसके स्रोत की जांच करें। प्रतिष्ठित समाचार संस्थानों या संबंधित व्यक्ति के आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट से पुष्टि करें।

बैंक, पुलिस, सीबीआई, ईडी या किसी सरकारी एजेंसी का अधिकारी बनकर यदि कोई वीडियो कॉल करे और पैसे ट्रांसफर करने या गोपनीय जानकारी देने को कहे, तो तुरंत कॉल समाप्त करें। कोई भी सरकारी एजेंसी वीडियो कॉल पर धन जमा कराने का आदेश नहीं देती।

सबसे बड़ी चुनौती भरोसे की

एआई और डीपफेक केवल तकनीकी समस्या नहीं हैं, बल्कि यह लोकतंत्र, वित्तीय सुरक्षा, व्यक्तिगत प्रतिष्ठा और सामाजिक विश्वास से जुड़ी चुनौती बन चुके हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं होगा। इसके साथ एआई पहचानने वाली तकनीकों, डिजिटल साक्षरता, मजबूत साइबर सुरक्षा और नागरिक जागरूकता पर समान रूप से निवेश करना होगा।

भारत ने एआई नियमन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाने शुरू कर दिए हैं, लेकिन तकनीक जिस गति से विकसित हो रही है, उसके मुकाबले कानूनों और संस्थागत व्यवस्था को भी उतनी ही तेजी से विकसित करना होगा। तभी डिजिटल अरेस्ट, डीपफेक और एआई आधारित साइबर अपराधों के बढ़ते खतरे पर प्रभावी नियंत्रण संभव हो सकेगा।

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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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