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इस गांव में इलाज के लिए शहर जाने की जरूरत नहीं, 50 बेड के अस्पताल में हुए 1,000 घुटना प्रत्यारोपण
Chittoor News: आंध्र प्रदेश के एक गांव में स्वास्थ्य सुविधाओं की ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसने ग्रामीण विकास की सोच बदल दी। आखिर कैसे यहां इलाज से लेकर रोजगार तक बदली जिंदगी?
फोटो-सोशल मीडिया
Chittoor News: देश के अधिकांश गांवों में गंभीर बीमारी का इलाज कराने के लिए लोगों को बड़े शहरों की ओर भागना पड़ता है। विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी, महंगी जांच और अस्पतालों की दूरी ग्रामीण परिवारों के लिए बड़ी चुनौती होती है। लेकिन आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले का अरगोंडा गांव ग्रामीण विकास की एक अलग तस्वीर पेश कर रहा है। यहां आधुनिक अस्पताल में घुटना प्रत्यारोपण जैसी जटिल सर्जरी होती है, विशेषज्ञ चिकित्सकों से परामर्श मिलता है और जरूरतमंदों को कई बीमारियों का निशुल्क उपचार भी उपलब्ध कराया जाता है। इतना ही नहीं, गांव में बच्चों की शिक्षा, गर्भवती महिलाओं के पोषण, बुजुर्गों की देखभाल और महिलाओं के रोजगार की व्यवस्था भी विकसित की गई है। अपोलो हॉस्पिटल्स समूह के संस्थापक और पद्म विभूषण से सम्मानित डॉ. प्रताप सी. रेड्डी ने अपने पैतृक गांव में इस पहल की शुरुआत की थी। आज यह मॉडल 334 गांवों तक फैल चुका है और कार्यक्रम के अनुसार 2.17 लाख से अधिक लोगों तक विभिन्न सेवाएं पहुंच चुकी हैं। 
वर्ष 2000 में खुला अस्पताल, अब तक 12 हजार से अधिक ऑपरेशन
अरगोंडा में बदलाव की शुरुआत वर्ष 2000 में हुई, जब डॉ. प्रताप सी. रेड्डी ने यहां 50 बिस्तरों का अस्पताल स्थापित कराया। इससे पहले ग्रामीणों को सामान्य चिकित्सा सेवाओं के लिए भी कई बार 20 से 60 किलोमीटर दूर जाना पड़ता था। विशेषज्ञ उपचार के लिए चित्तूर अथवा दूसरे शहरों पर निर्भर रहना पड़ता था। अस्पताल के आंकड़ों के अनुसार, पिछले 26 वर्षों में यहां 1.67 लाख से अधिक मरीजों का उपचार और 12 हजार से ज्यादा ऑपरेशन किए गए हैं। इनमें घुटना प्रत्यारोपण की एक हजार से अधिक सर्जरी शामिल हैं। वर्ष 2019 में इस अस्पताल में कुल 100 घुटना प्रत्यारोपण पूरे हुए थे। वर्ष 2022 तक संख्या 500 और अब एक हजार तक पहुंच गई है। ग्रामीण अस्पताल में इतनी बड़ी संख्या में जटिल जोड़ प्रत्यारोपण होना महत्वपूर्ण उपलब्धि है। इससे उन मरीजों को विशेष लाभ मिला है, जिनके लिए महानगरों में जाकर इलाज कराना आर्थिक और व्यावहारिक रूप से कठिन होता है। 
2013 में शुरू हुआ 'टोटल हेल्थ', बीमारी के साथ उसके कारणों पर भी ध्यान
डॉ. रेड्डी ने 27 अक्टूबर 2013 को अरगोंडा से 'टोटल हेल्थ' कार्यक्रम शुरू किया। अपोलो समूह की कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व पहल के अंतर्गत संचालित इस कार्यक्रम की अवधारणा केवल बीमारी का इलाज करना नहीं, बल्कि लोगों को स्वस्थ रखने वाली परिस्थितियां विकसित करना है। इसमें पोषण, स्वच्छ पेयजल, साफ-सफाई, स्वास्थ्य शिक्षा, नियमित जांच और रोजगार को एक-दूसरे से जोड़ा गया है। इसके अंतर्गत घर-घर स्वास्थ्य सर्वेक्षण कर मधुमेह, उच्च रक्तचाप, खून की कमी और दूसरी बीमारियों की पहचान की जाती है। गांवों में मोबाइल चिकित्सा इकाइयां भेजी जाती हैं, जिनमें डॉक्टर, नर्स, तकनीकी कर्मचारी, जांच उपकरण और दवाएं उपलब्ध रहती हैं। दूरस्थ स्थानों पर टेलीमेडिसिन के जरिए विशेषज्ञों से परामर्श भी कराया जाता है। उद्देश्य यह है कि बीमारी गंभीर होने से पहले उसकी पहचान और उपचार हो सके। 
मोतियाबिंद से कैंसर तक, जरूरतमंदों के लिए उपचार की व्यवस्था
अरगोंडा में कई स्वास्थ्य सेवाएं निशुल्क या मामूली पंजीकरण शुल्क पर उपलब्ध कराई जाती हैं। जरूरतमंद मरीजों के मोतियाबिंद ऑपरेशन, चुनिंदा कैंसर रोगियों के उपचार और बच्चों की हृदय संबंधी सर्जरी के लिए भी सहायता की व्यवस्था की गई है। बच्चों की हृदय सर्जरी के बाद दीर्घकालिक फॉलोअप की सुविधा भी बताई गई है। मधुमेह और उच्च रक्तचाप जैसी लंबे समय तक चलने वाली बीमारियों के प्रबंधन के लिए नियमित जांच और चिकित्सकीय परामर्श दिया जाता है। कार्यक्रम के उपलब्ध विवरण के अनुसार, आंखों की जांच के लिए आयोजित शिविरों में हजारों ग्रामीणों की स्क्रीनिंग की गई है। जरूरतमंद लोगों को चश्मे उपलब्ध कराने और मोतियाबिंद के ऑपरेशन कराने में भी मदद दी गई है। हालांकि, सभी उपचार हर व्यक्ति के लिए निशुल्क नहीं हैं। सुविधा, पात्रता और बीमारी की प्रकृति के अनुसार शुल्क तथा सहायता की शर्तें अलग हो सकती हैं। 
दस हजार बच्चों की स्वास्थ्य जांच, गर्भवती महिलाओं को पोषण सहायता
इस ग्रामीण विकास मॉडल में बच्चों की सेहत पर विशेष ध्यान दिया गया है। सरकारी स्कूलों के दस हजार से अधिक विद्यार्थियों की आंखों, कानों, दांतों और एनीमिया संबंधी जांच कराई गई है। जिन बच्चों में दृष्टिदोष पाया गया, उन्हें चश्मे और आवश्यक चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराई गई। गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं के लिए पोषण कार्यक्रम संचालित किए जाते हैं। इनके अंतर्गत स्वास्थ्य जांच, पौष्टिक भोजन और शिशुओं की देखभाल संबंधी जानकारी दी जाती है। आशा कार्यकर्ताओं और स्थानीय स्वास्थ्यकर्मियों को भी कार्यक्रम से जोड़ा गया है। प्रारंभिक सर्वेक्षणों में क्षेत्र की 26.1 प्रतिशत आबादी में खून की कमी और 42 प्रतिशत परिवारों में खुले में शौच जैसी समस्याएं सामने आई थीं। इन निष्कर्षों के आधार पर स्वच्छता, पोषण और स्वास्थ्य व्यवहार सुधारने के कार्यक्रम विकसित किए गए। 
तीन सौ से अधिक महिलाओं को रोजगार, युवाओं को तकनीकी प्रशिक्षण
अरगोंडा की इस पहल का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना है। यहां सिलाई, वस्त्र निर्माण, जूट के उत्पाद और दूसरी आजीविका संबंधी गतिविधियों के लिए प्रशिक्षण केंद्र स्थापित किए गए हैं। इनसे जुड़ी उत्पादन इकाइयों में 300 से अधिक महिलाओं को काम मिलने की जानकारी है। महिलाओं को केवल प्रशिक्षण देने के बजाय उत्पाद तैयार करने और आय अर्जित करने के अवसर भी उपलब्ध कराए जाते हैं। युवाओं के लिए एयर कंडीशनिंग और रेफ्रिजरेशन उपकरणों की मरम्मत का प्रशिक्षण भी शुरू किया गया है। इसका उद्देश्य ग्रामीण युवाओं को ऐसे कौशल देना है जिनकी स्थानीय और शहरी बाजारों में मांग है। इससे रोजगार के लिए पूरी तरह कृषि या महानगरों की ओर पलायन पर निर्भर रहने की आवश्यकता कम हो सकती है। 
बुजुर्गों के लिए डे-केयर सेंटर, पढ़ने और मनोरंजन की सुविधा
इस कार्यक्रम में बुजुर्गों की देखभाल को भी शामिल किया गया है। अरगोंडा में वर्ष 2018 में वृद्धजन डे-केयर सेंटर शुरू किया गया था। यहां बुजुर्गों के लिए दिन के समय बैठने, अखबार पढ़ने, टेलीविजन देखने, आपस में बातचीत करने और मनोरंजन की व्यवस्था की गई है। पोषण केंद्रों के माध्यम से उन्हें भोजन और स्वास्थ्य संबंधी सहायता भी दी जाती है। इसका उद्देश्य ऐसे बुजुर्गों को सामाजिक सहयोग उपलब्ध कराना है, जिनके परिवार के सदस्य कामकाज के कारण दिनभर घर से बाहर रहते हैं या जिनके पास पर्याप्त पारिवारिक सहारा नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों में बुजुर्गों के अकेलेपन और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को देखते हुए इस तरह की सामुदायिक व्यवस्था उपयोगी हो सकती है। 
पांच जिलों के 334 गांवों तक पहुंचा मॉडल
अरगोंडा में शुरू हुई पहल का विस्तार अब दूसरे ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों तक किया गया है। वर्ष 2020 में कार्यक्रम को अमराबाद क्षेत्र के चेंचू जनजातीय समुदाय तक पहुंचाया गया। जंगलों और दुर्गम क्षेत्रों में रहने वाले इन परिवारों के लिए स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचना कठिन होता है। इसलिए मोबाइल चिकित्सा इकाइयों और प्रशिक्षित स्थानीय स्वास्थ्य स्वयंसेवकों की सहायता ली जा रही है। अपोलो के वर्ष 2025 के पर्यावरण एवं सामाजिक उत्तरदायित्व विवरण में 334 गांवों और पांच जिलों में कार्यक्रम के विस्तार का उल्लेख है। कार्यक्रम की वेबसाइट पर 2,17,343 लोगों तक पहुंचने का आंकड़ा दिया गया है। हालांकि, इस संख्या को विशिष्ट लाभार्थियों, नियमित मरीजों या सभी सेवाओं के संयुक्त लाभार्थियों की समान श्रेणी नहीं माना जाना चाहिए। 
ग्रामीण विकास का ऐसा मॉडल जिसे दूसरे राज्यों में भी अपनाया जा सकता है
अरगोंडा का अनुभव ग्रामीण विकास की एक महत्वपूर्ण अवधारणा सामने रखता है। केवल गांव में अस्पताल खोल देने से ग्रामीण जीवन की सभी समस्याएं दूर नहीं होतीं। बीमारी की रोकथाम, स्वच्छ पानी, संतुलित पोषण, बच्चों की शिक्षा और परिवार की आय भी स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं। इस मॉडल में इन सभी पहलुओं को एक साथ विकसित करने का प्रयास किया गया है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि चिकित्सा सेवाओं को गांव के सामाजिक और आर्थिक जीवन से जोड़ा गया है।
हालांकि, अरगोंडा की व्यवस्था निजी संस्थान की सामाजिक जिम्मेदारी पहल और स्वास्थ्य संबंधी बुनियादी ढांचे के सहयोग से विकसित हुई है। इसे दूसरे स्थानों पर लागू करने के लिए नियमित वित्तीय सहायता, प्रशिक्षित चिकित्सक, स्थानीय समुदाय की भागीदारी और लंबे समय तक सेवाएं जारी रखने की व्यवस्था आवश्यक होगी। इसकी सफलता को परखने के लिए स्वास्थ्य परिणामों, पारिवारिक चिकित्सा खर्च, रोजगार से आय और पलायन पर प्रभाव का स्वतंत्र मूल्यांकन भी महत्वपूर्ण है।
अरगोंडा की कहानी का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि गांवों को बेहतर बनाने के लिए लोगों को शहर भेजना ही एकमात्र रास्ता नहीं है। स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा की सुविधाएं गांवों तक पहुंचाकर भी ग्रामीण जीवन में बड़ा बदलाव लाया जा सकता है।


