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Apna Dal Political Journey: अपना दल की पूरी राजनीतिक यात्रा
Apna Dal Political Journey in Hindi: अपना दल की राजनीतिक यात्रा उत्तर प्रदेश के छोटे क्षेत्रीय दलों में संभवत, सबसे जटिल यात्राओं में से एक है।
Complete Political Journey of Apna Dal
Apna Dal Political Journey in Hindi: अपना दल की राजनीतिक यात्रा उत्तर प्रदेश के छोटे क्षेत्रीय दलों में संभवत, सबसे जटिल यात्राओं में से एक है। इसकी जटिलता केवल इसलिए नहीं है कि यह एक सीमित भौगोलिक और जातीय आधार से निकलकर संसद, केंद्र सरकार और उत्तर प्रदेश सरकार तक पहुँचा। बल्कि इसलिए भी है कि संस्थापक डॉ. सोनेलाल पटेल की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी और बेटियों के बीच नेतृत्व, संगठन, पार्टी के नाम और राजनीतिक दिशा को लेकर ऐसा संघर्ष हुआ कि मूल दल अलग-अलग धाराओं में विभाजित हो गया। आज ‘अपना दल’ नाम सुनते ही तीन राजनीतिक संदर्भ सामने आते हैं—डॉ. सोनेलाल पटेल द्वारा स्थापित मूल अपना दल, अनुप्रिया पटेल के नेतृत्व वाला अपना दल (सोनेलाल) और कृष्णा पटेल तथा पल्लवी पटेल के नेतृत्व वाला अपना दल (कमेरावादी)। इन तीनों को अलग-अलग समझे बिना पार्टी के चुनावी आँकड़ों, सांसदों, विधायकों और गठबंधनों का सही हिसाब नहीं लगाया जा सकता।
डॉ. सोनेलाल पटेल ने 1995 में जिस पार्टी की स्थापना की थी, उसका लक्ष्य केवल कुर्मी समुदाय की राजनीति करना नहीं था। उसकी वैचारिक भाषा में पिछड़े, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक, किसान और अन्य वंचित समूह शामिल थे। फिर भी उत्तर प्रदेश में उसका वास्तविक और सबसे मजबूत आधार कुर्मी–पटेल मतदाता बना। विशेषकर प्रयागराज, प्रतापगढ़, मिर्जापुर, वाराणसी, भदोही, सोनभद्र, कौशांबी और पूर्वी उत्तर प्रदेश के आसपास के जिलों में। शुरुआती वर्षों में पार्टी ने स्वतंत्र शक्ति बनने की कोशिश की। लेकिन चुनावी सफलता सीमित रही। 2002 में उसने तीन विधानसभा सीटें जीतीं, 2007 में शून्य पर आ गई और 2012 में केवल एक सीट जीत सकी। निर्णायक बदलाव 2014 में आया, जब अपना दल ने भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन किया और दोनों लोकसभा सीटें जीत लीं। इसी सफलता ने पार्टी को राष्ट्रीय पहचान दी। लेकिन इसके तुरंत बाद परिवार के भीतर ऐसा संघर्ष शुरू हुआ जिसने मूल अपना दल को दो प्रमुख गुटों में बाँट दिया।
अगस्त, 2026 की स्थिति में अनुप्रिया पटेल के नेतृत्व वाला अपना दल (सोनेलाल) राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का हिस्सा है। उसके पास लोकसभा में एक सांसद, उत्तर प्रदेश विधानसभा में उपचुनाव सहित लगभग 13 सदस्य और विधान परिषद में एक सदस्य है। राज्यसभा में पार्टी का कोई सदस्य नहीं है। दूसरी ओर अपना दल (कमेरावादी) का स्वतंत्र संसदीय प्रतिनिधित्व नहीं है। 2022 में समाजवादी पार्टी गठबंधन के अंतर्गत पल्लवी पटेल ने सिराथू विधानसभा सीट जीती थी। लेकिन उन्होंने समाजवादी पार्टी के चुनाव चिह्न पर चुनाव लड़ा था। बाद के उपचुनावों और दलगत पुनर्संयोजन के कारण मूल अपना दल के नाम से भी एक विधायक की पहचान आधिकारिक विधानसभा अभिलेखों में दिखाई देती है। इसलिए कुल प्रतिनिधित्व का हिसाब केवल चुनाव चिह्न और औपचारिक पार्टी सदस्यता के आधार पर करना आवश्यक है।
डॉ. सोनेलाल पटेल और अपना दल की वैचारिक पृष्ठभूमि
डॉ. सोनेलाल पटेल उत्तर प्रदेश के उन पिछड़ा वर्ग नेताओं में थे, जिन्होंने मंडल राजनीति के दौर में यह महसूस किया कि यादवों के बीच समाजवादी पार्टी, जाटों के बीच लोकदल और राष्ट्रीय लोकदल तथा दलितों के बीच बहुजन समाज पार्टी की तरह कुर्मी और अन्य गैर-यादव पिछड़ी जातियों के पास अपना स्वतंत्र और स्थायी राजनीतिक मंच नहीं था। वे प्रारंभिक दौर में कांशीराम के बहुजन आंदोलन और बहुजन समाज पार्टी से जुड़े रहे। कांशीराम ने अनुसूचित जातियों, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों और अन्य वंचित समुदायों को ‘बहुजन’ राजनीतिक शक्ति के रूप में संगठित करने का प्रयास किया था। सोनेलाल पटेल इसी सामाजिक न्याय की धारा से निकले। लेकिन बाद में बसपा नेतृत्व और संगठनात्मक दिशा से मतभेद के कारण उन्होंने स्वतंत्र दल बनाने का रास्ता चुना।
अपना दल की स्थापना सामान्यतः 4 नवंबर, 1995 से जोड़ी जाती है। पार्टी की मूल विचारधारा में सामाजिक न्याय, जातीय जनगणना, जनसंख्या के अनुपात में संसाधनों और नौकरियों में हिस्सेदारी, किसानों की समस्याएँ, पिछड़ों और दलितों का प्रतिनिधित्व तथा प्रशासनिक व्यवस्था में वंचित समुदायों की भागीदारी शामिल थी। पार्टी ने डॉ. भीमराव आंबेडकर, सरदार वल्लभभाई पटेल, छत्रपति शाहूजी महाराज, ज्योतिबा फुले और सामाजिक न्याय की अन्य धाराओं को अपने राजनीतिक प्रतीकों में स्थान दिया। अनुप्रिया पटेल भी बाद में बार-बार यह कहती रही हैं कि जातिगत जनगणना और जनसंख्या के अनुपात में संसाधनों की भागीदारी की माँग पार्टी स्थापना से ही करती रही है।
सोनेलाल पटेल की राजनीतिक रणनीति बसपा के मूल बहुजन सिद्धांत से प्रभावित थी। लेकिन उसका सामाजिक केंद्र धीरे-धीरे कुर्मी–पटेल समुदाय बन गया। उत्तर प्रदेश में कुर्मी मतदाता राज्यव्यापी रूप से बहुमत में नहीं हैं, किंतु अनेक पूर्वी और मध्य जिलों में उनकी निर्णायक उपस्थिति है। अपना दल का शुरुआती उद्देश्य इस समुदाय को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देना था। लेकिन उसने गैर-कुर्मी पिछड़ों, दलितों और मुसलमानों को भी उम्मीदवार बनाया। इसीलिए पार्टी का इतिहास केवल एक जाति के दल के रूप में नहीं। बल्कि एक छोटे सामाजिक न्याय दल के रूप में शुरू हुआ, जो बाद में गठबंधन राजनीति के सहारे सत्ता में हिस्सेदारी तक पहुँचा।
1996 का पहला विधानसभा चुनाव
पार्टी बनने के लगभग एक वर्ष बाद 1996 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव हुए। निर्वाचन आयोग के आधिकारिक सांख्यिकीय अभिलेख में अपना दल को पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त पार्टी के रूप में दर्ज किया गया है। पार्टी ने पूर्वी उत्तर प्रदेश की सीमित सीटों पर उम्मीदवार उतारे।लेकिन कोई सीट नहीं जीत सकी। यह उसका संगठन निर्माण का प्रारंभिक चरण था। न उसके पास व्यापक संसाधन थे, न स्थापित चुनाव चिह्न की जनपहचान और न ही राज्यव्यापी संगठन। फिर भी पार्टी ने कुछ कुर्मी-बहुल क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई और आगामी चुनावों के लिए एक आधार तैयार किया। निर्वाचन आयोग की 1996 रिपोर्ट अपना दल की भागीदारी को प्रमाणित करती है, हालांकि पुराने चुनावी अभिलेखों में छोटी गैर-मान्यता प्राप्त पार्टियों का राज्यव्यापी मत-प्रतिशत आधुनिक चुनावों जैसी सुव्यवस्थित तालिका में आसानी से उपलब्ध नहीं है।
यह चुनावी शुरुआत सीटों के स्तर पर विफल थी। लेकिन संगठनात्मक दृष्टि से महत्वपूर्ण थी। सोनेलाल पटेल ने पार्टी को केवल चुनाव के समय सक्रिय होने वाला मंच न बनाकर सभाओं, जातीय चेतना सम्मेलनों, सामाजिक न्याय अभियानों और पिछड़ा वर्ग प्रतिनिधित्व की माँगों से जोड़ने का प्रयास किया। वाराणसी के बेनियाबाग सहित पूर्वांचल में आयोजित रैलियों ने पार्टी को पहचान दिलाई। 1999 में पार्टी कार्यकर्ताओं पर पुलिस कार्रवाई भी हुई, जिसे संगठन ने अपने आंदोलनकारी इतिहास का हिस्सा बनाया।
2002: तीन विधायक और पहली बड़ी सफलता
2002 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव अपना दल के इतिहास का पहला वास्तविक चुनाव था। पार्टी ने तीन विधानसभा सीटें जीतीं। निर्वाचन परिणामों में अपना दल के तीन विधायक दर्ज हैं। इनमें इलाहाबाद पश्चिम से अतीक अहमद और गंगापुर से सुरेंद्र सिंह पटेल प्रमुख थे। तीसरी सफलता भी पूर्वी उत्तर प्रदेश के उसके प्रभाव क्षेत्र से आई। गंगापुर में सुरेंद्र सिंह पटेल ने 48,171 मत प्राप्त कर भाजपा प्रत्याशी को पराजित किया। इस चुनाव में अपना दल ने समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी दोनों के सामाजिक समीकरणों को कुछ क्षेत्रों में प्रभावित किया और यह प्रमाणित किया कि वह केवल प्रतीकात्मक संगठन नहीं। बल्कि स्थानीय स्तर पर सीट जीतने की क्षमता रखने वाला दल बन चुका है।
हालाँकि इस सफलता के साथ पार्टी की राजनीतिक छवि पर विवाद भी जुड़ा। इलाहाबाद पश्चिम से अतीक अहमद जैसे बाहुबली नेता की जीत ने अपना दल को तत्काल विधायी प्रतिनिधित्व तो दिया। लेकिन पार्टी की सामाजिक न्याय और आंदोलनकारी पहचान के साथ आपराधिक छवि वाले नेताओं को टिकट देने का प्रश्न भी उठा। उत्तर प्रदेश की उस दौर की राजनीति में लगभग सभी प्रमुख दल स्थानीय प्रभावशाली और आपराधिक पृष्ठभूमि वाले नेताओं को उम्मीदवार बना रहे थे।लेकिन अपना दल जैसी छोटी वैचारिक पार्टी के लिए यह अंतर्विरोध अधिक स्पष्ट था।
2002 की तीन सीटें आज भी मूल अपना दल के स्वतंत्र चुनावी इतिहास की सबसे बड़ी विधानसभा सफलता मानी जा सकती हैं। बाद के वर्षों में अनुप्रिया पटेल के नेतृत्व वाला दल इससे अधिक सीटें जीता। लेकिन वह भाजपा के साथ सीट-वितरण और संयुक्त चुनावी मशीनरी के अंतर्गत हुआ। 2002 की सफलता मूल दल की स्वतंत्र या लगभग स्वतंत्र संगठनात्मक क्षमता का परिणाम थी।
2007: भाजपा के साथ समझौता, लेकिन शून्य सीट
2007 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अपना दल ने भाजपा और जनता दल यूनाइटेड के साथ चुनावी समझौता किया। उपलब्ध निर्वाचन विवरण के अनुसार भाजपा ने 350, अपना दल ने लगभग 36 और जनता दल यूनाइटेड ने लगभग 16 सीटों पर उम्मीदवार उतारे। कुछ अतिरिक्त सीटों पर स्थानीय समझौते या मित्रवत मुकाबले भी हुए। यह अपना दल का भाजपा के साथ पहला महत्वपूर्ण चुनावी सहयोग था। उस समय भाजपा उत्तर प्रदेश में कमजोर हो रही थी और अपना दल पूर्वांचल के कुर्मी मतों में प्रभाव का दावा करता था। दोनों दलों का समझौता सामाजिक दृष्टि से भाजपा के सवर्ण–शहरी आधार और अपना दल के गैर-यादव पिछड़ा आधार को जोड़ने का प्रयोग था।
लेकिन परिणाम अपना दल के लिए निराशाजनक रहे। वह एक भी सीट नहीं जीत सकी। भाजपा भी केवल 51 सीटों तक सीमित रह गई और मायावती के नेतृत्व में बहुजन समाज पार्टी ने 206 सीटों के साथ स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया। अपना दल के उम्मीदवार कई क्षेत्रों में प्रभावी मुकाबला तो कर सके।लेकिन पार्टी का वोट सीट में परिवर्तित नहीं हुआ। इस चुनाव ने दो बातें स्पष्ट कीं—पहली, अपना दल के पास सीमित सामाजिक प्रभाव था। लेकिन उसे जीत में बदलने के लिए किसी बड़े सहयोगी के मतों का वास्तविक हस्तांतरण आवश्यक था।दूसरी, केवल गठबंधन कर लेना पर्याप्त नहीं था, क्योंकि स्थानीय स्तर पर भाजपा और अपना दल के कार्यकर्ताओं के बीच पूर्ण समन्वय नहीं बन पाया।
इस चुनाव के बाद पार्टी पर संगठनात्मक दबाव बढ़ा। स्वतंत्र विस्तार की आकांक्षा और बड़े दल के साथ गठबंधन की आवश्यकता के बीच संतुलन उसका स्थायी राजनीतिक प्रश्न बन गया। यही दुविधा आगे अनुप्रिया पटेल और कृष्णा पटेल गुटों की रणनीति में भी दिखाई देती है।
2009: संस्थापक की मृत्यु और नेतृत्व का संकट
17 अक्टूबर, 2009 को डॉ. सोनेलाल पटेल की सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई। यह अपना दल के इतिहास का निर्णायक मोड़ था। पार्टी एक ऐसे नेता पर अत्यधिक निर्भर थी जिसने संगठन बनाया, सामाजिक आधार तैयार किया और अलग-अलग जिलों के नेताओं को व्यक्तिगत संबंधों से जोड़ा था। उनके निधन के बाद स्वाभाविक उत्तराधिकार की स्पष्ट और सर्वमान्य व्यवस्था नहीं थी। उनकी पत्नी कृष्णा पटेल को संगठन का नेतृत्व मिला। लेकिन उनकी बेटियों—विशेषकर अनुप्रिया पटेल और पल्लवी पटेल—की राजनीतिक भूमिका भी तेजी से बढ़ने लगी।
सोनेलाल पटेल की मृत्यु के बाद पार्टी में दो प्रकार की शक्ति उभरी। कृष्णा पटेल मूल संगठन, पुराने कार्यकर्ताओं और संस्थापक परिवार की वरिष्ठता का प्रतिनिधित्व करती थीं। अनुप्रिया पटेल युवा, शिक्षित, प्रभावशाली वक्ता और चुनावी राजनीति में सक्रिय चेहरा बनकर सामने आईं। पल्लवी पटेल संगठनात्मक और पारिवारिक स्तर पर अपनी माँ के अधिक निकट रहीं। प्रारंभ में यह भिन्नता खुला विभाजन नहीं थी। लेकिन आगे चलकर पार्टी के नियंत्रण, टिकट वितरण और भाजपा से संबंधों को लेकर यही तनाव निर्णायक संघर्ष में बदल गया।
2012: अनुप्रिया पटेल बनीं विधायक
2012 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अपना दल ने 76 सीटों पर चुनाव लड़ा और लगभग 0.90 प्रतिशत राज्यव्यापी वोट प्राप्त किया। पार्टी केवल एक सीट जीत सकी—वाराणसी जिले की रोहनिया सीट से अनुप्रिया पटेल विधायक निर्वाचित हुईं। यह चुनाव अनुप्रिया के व्यक्तिगत राजनीतिक उदय का प्रारंभ था। दूसरी ओर, पार्टी के अधिकांश प्रत्याशियों की जमानत जब्त हुई और यह भी स्पष्ट हुआ कि सोनेलाल पटेल की मृत्यु के बाद संगठन को व्यापक चुनावी सफलता नहीं मिल पा रही थी।
विधानसभा चुनाव स्वरूप लड़ी सीटें जीती सीटें राज्यव्यापी वोट
1996 मूल अपना दल सीमित सीटें 0 पुराने अभिलेख में पृथक प्रतिशत अस्पष्ट
2002 मूल अपना दल अनेक सीटें 3 लगभग 2% से कम
2007 भाजपा गठबंधन लगभग 36 0 गठबंधन के भीतर सीमित
2012 मूल अपना दल 76 1 0.90%
2017 अपना दल (सोनेलाल), एनडीए 11 9 0.98%
2022 अपना दल (सोनेलाल), एनडीए 17 12 1.62%
2022 अपना दल (कमेरावादी), सपा गठबंधन
पल्लवी पटेल सिराथू से जीतीं।लेकिन उन्होंने समाजवादी पार्टी के चुनाव चिह्न पर चुनाव लड़ा था।इसलिए आधिकारिक परिणाम में सीट समाजवादी पार्टी के खाते में दर्ज हुई, यद्यपि वे अपना दल कमेरावादी की नेता थीं। 2022 के अलग-अलग आँकड़ा-संकलनों में कमेरावादी प्रत्याशियों और सहयोगी चिह्न पर लड़े प्रत्याशियों के वर्गीकरण के कारण संख्या में अंतर दिखाई देता है।
2014: भाजपा से गठबंधन और राष्ट्रीय राजनीति में प्रवेश
2014 के लोकसभा चुनाव ने अपना दल की राजनीति पूरी तरह बदल दी। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा उत्तर प्रदेश में गैर-यादव पिछड़ी जातियों तक पहुँच बढ़ाना चाहती थी। अपना दल का कुर्मी–पटेल आधार भाजपा की इस रणनीति के लिए उपयोगी था। दोनों दलों के बीच समझौता हुआ और अपना दल को दो लोकसभा सीटें—मिर्जापुर और प्रतापगढ़—दी गईं। अनुप्रिया पटेल मिर्जापुर से और कुंवर हरिवंश सिंह प्रतापगढ़ से उम्मीदवार बने। दोनों चुनाव जीत गए। उत्तर प्रदेश में अपना दल को लगभग 1.00 प्रतिशत वोट मिला। लेकिन केवल दो सीटों पर चुनाव लड़ने के कारण उसका सीट-रूपांतरण सौ प्रतिशत रहा। भाजपा ने 71 और अपना दल ने दो सीटें जीतकर उत्तर प्रदेश की 80 में से 73 सीटें एनडीए के खाते में डाल दीं।
लोकसभा चुनाव पार्टी/गुट गठबंधन लड़ी सीटें जीती सीटें उत्तर प्रदेश में वोट
1996–2009 मूल अपना दल विभिन्न/स्वतंत्र अनेक सीमित प्रयास 0 बहुत सीमित
2014 मूल अपना दल भाजपा–एनडीए 2 2 लगभग 1.00%
2019 अपना दल (सोनेलाल) भाजपा–एनडीए 2 2 लगभग 1.21%
2024 अपना दल (सोनेलाल) भाजपा–एनडीए 2 1 लगभग 1% से कम
अब तक का चुनाव-वार योग दोनों सफल धाराओं
अपना दल की ओर से लोकसभा पहुँचे अलग-अलग व्यक्तियों की संख्या तीन रही है, जबकि आम चुनावों में जीती गई सीटों का चुनाव-वार योग पाँच है।
2014 के बाद परिवार में संघर्ष कैसे शुरू हुआ?
2014 में अनुप्रिया पटेल लोकसभा पहुँच गईं और उन्हें रोहनिया विधानसभा सीट से इस्तीफा देना पड़ा। यहीं से पार्टी के भीतर खुला संघर्ष शुरू हुआ। अनुप्रिया चाहती थीं कि रोहनिया उपचुनाव में उनके पति आशीष पटेल को उम्मीदवार बनाया जाए। लेकिन पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष और उनकी माँ कृष्णा पटेल ने स्वयं चुनाव लड़ने का निर्णय लिया। अनुप्रिया ने माँ के चुनाव प्रचार से दूरी बनाई और कृष्णा पटेल उपचुनाव हार गईं। इसके बाद दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर पार्टी-विरोधी गतिविधियों और संगठन पर कब्जा करने के आरोप लगाए।
कृष्णा पटेल और पल्लवी पटेल का आरोप था कि अनुप्रिया और आशीष पटेल पार्टी के संगठन को अपने नियंत्रण में ले रहे हैं तथा पुराने कार्यकर्ताओं की उपेक्षा कर रहे हैं। अनुप्रिया पक्ष का तर्क था कि 2014 की लोकसभा सफलता और भाजपा गठबंधन ने पार्टी को वास्तविक राजनीतिक शक्ति दी है, इसलिए संगठन को नए चुनावी ढाँचे के अनुसार चलाना आवश्यक है। विवाद धीरे-धीरे केवल टिकट का नहीं रहा।प्रश्न यह बन गया कि सोनेलाल पटेल की वास्तविक राजनीतिक विरासत का उत्तराधिकारी कौन है।
जनवरी 2015 में कृष्णा पटेल के नेतृत्व वाले संगठन ने अनुप्रिया पटेल और उनके समर्थकों को पार्टी से निष्कासित करने की घोषणा की। दूसरी ओर अनुप्रिया समर्थकों ने कृष्णा पटेल की कार्रवाई को असंवैधानिक बताया। संगठन, राष्ट्रीय अध्यक्ष पद और पार्टी के नाम को लेकर मामला निर्वाचन आयोग और न्यायालय तक पहुँचा। यह अपना दल की सबसे बड़ी और स्थायी टूट थी।
अपना दल तीन नामों में कैसे बँटा?
मूल अपना दल —डॉ. सोनेलाल पटेल द्वारा 1995 में स्थापित मूल पार्टी का संगठनात्मक दावा कृष्णा पटेल के पास रहा। उन्होंने स्वयं को मूल अपना दल की राष्ट्रीय अध्यक्ष बताया। चुनाव आयोग और न्यायिक विवादों के कारण पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न का उपयोग कई बार विवादित रहा। यही धारा बाद में अपना दल (कमेरावादी) के रूप में अधिक स्पष्ट हुई।
अपना दल (सोनेलाल)—अनुप्रिया पटेल समर्थक नेताओं ने अलग संगठन खड़ा किया। 14 दिसंबर, 2016 को अपना दल (सोनेलाल) के रूप में नया दल स्थापित और पंजीकृत हुआ। इस नाम में ‘सोनेलाल’ जोड़कर अनुप्रिया गुट ने संस्थापक की विरासत पर अपना दावा स्पष्ट किया। नया दल राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में शामिल रहा और भाजपा ने भी व्यवहारिक रूप से अनुप्रिया पटेल को अपना प्रमुख सहयोगी माना।
अपना दल (कमेरावादी)—कृष्णा पटेल और पल्लवी पटेल के नेतृत्व वाली धारा ने अपना दल (कमेरावादी) नाम अपनाया। ‘कमेरावादी’ शब्द का अर्थ मेहनतकश या श्रमजीवी समाज की राजनीति से जोड़ा गया। इस गुट ने दावा किया कि वह सोनेलाल पटेल के मूल बहुजन, किसान और सामाजिक न्याय के विचारों के अधिक निकट है, जबकि अनुप्रिया गुट भाजपा के साथ सत्ता-केंद्रित समझौते की ओर चला गया है।
इस प्रकार विभाजन केवल माँ और बेटी के बीच व्यक्तिगत संघर्ष नहीं रहा। दोनों गुटों की राजनीतिक दिशा भी अलग हो गई—अनुप्रिया पटेल भाजपा और एनडीए के साथ स्थायी गठबंधन में चली गईं, जबकि कृष्णा और पल्लवी पटेल ने भाजपा-विरोधी दलों, विशेषकर समाजवादी पार्टी के साथ सहयोग का रास्ता अपनाया।
2017: अपना दल (सोनेलाल) की नौ सीटें
2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अपना दल (सोनेलाल) ने भाजपा और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के साथ एनडीए के अंतर्गत चुनाव लड़ा। अपना दल (सोनेलाल) को 11 सीटें मिलीं और उसने नौ सीटें जीत लीं। पार्टी को कुल 8,51,336 वोट और 0.98 प्रतिशत राज्यव्यापी मत मिले। केवल 11 सीटों पर चुनाव लड़कर नौ जीतना अत्यंत ऊँची सफलता दर थी। इसके विपरीत कांग्रेस ने 114 सीटों पर लड़कर केवल सात सीटें जीतीं। इस परिणाम के बाद अपना दल (सोनेलाल) उत्तर प्रदेश विधानसभा में भाजपा के सहयोगियों में सबसे प्रभावशाली दलों में शामिल हो गया।
हालाँकि 0.98 प्रतिशत वोट को पार्टी की संपूर्ण सामाजिक ताकत नहीं माना जा सकता। उसने केवल 11 चुनी हुई सीटों पर चुनाव लड़ा था और अनेक क्षेत्रों में उसके समर्थकों ने भाजपा उम्मीदवारों को वोट दिया। इसी प्रकार उसकी सीटों पर भाजपा का सवर्ण, पिछड़ा, दलित और हिंदुत्व समर्थक मत भी अपना दल प्रत्याशियों को मिला। इसलिए गठबंधन में किसी छोटे दल की वास्तविक शक्ति केवल उसके राज्यव्यापी वोट प्रतिशत से नहीं आँकी जा सकती। उसका महत्व इस बात में था कि वह कुछ क्षेत्रों में कुर्मी मतों को एनडीए से जोड़ने की क्षमता रखता था।
2017 के बाद अनुप्रिया पटेल केंद्र की राजनीति में और आशीष पटेल उत्तर प्रदेश संगठन तथा सरकार में प्रभावशाली हुए। आशीष पटेल 2018 में उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य बने। बाद में उन्हें योगी आदित्यनाथ सरकार में तकनीकी शिक्षा, उपभोक्ता संरक्षण तथा बाट-माप से संबंधित विभाग मिले। 2024 में उन्हें पुनः विधान परिषद सदस्य चुना गया। अगस्त 2026 में अपना दल (सोनेलाल) का विधान परिषद में एक सदस्य है।
2019: दोनों लोकसभा सीटों पर फिर जीत
2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने अपना दल (सोनेलाल) को फिर दो सीटें दीं। अनुप्रिया पटेल मिर्जापुर और पकौड़ी लाल कोल रॉबर्ट्सगंज से उम्मीदवार बने। दोनों जीत गए। पार्टी को उत्तर प्रदेश में लगभग 10.39 लाख वोट और 1.21 प्रतिशत मत मिले। भाजपा ने 62 और अपना दल ने दो सीटें जीतकर एनडीए को उत्तर प्रदेश में कुल 64 सीटें दिलाईं।
यह परिणाम महत्वपूर्ण था क्योंकि 2014 की मोदी लहर की तुलना में भाजपा की सीटें कम हुईं। लेकिन अपना दल ने अपनी दोनों सीटें बचा लीं। अनुप्रिया पटेल की मिर्जापुर में व्यक्तिगत पकड़, भाजपा का वोट हस्तांतरण, कुर्मी मतदाता, गैर-यादव पिछड़े और कुछ दलित समुदायों का समर्थन इस सफलता के आधार बने। रॉबर्ट्सगंज अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीट थी, जहाँ पकौड़ी लाल कोल की जीत ने यह संदेश दिया कि पार्टी केवल कुर्मी उम्मीदवारों तक सीमित नहीं है।
फिर भी भाजपा और अपना दल के संबंध पूरी तरह तनावमुक्त नहीं रहे। मंत्रालय, सीट-वितरण, राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग, आरक्षण, जातिगत जनगणना और सरकारी नियुक्तियों में पिछड़ों की हिस्सेदारी को लेकर अनुप्रिया पटेल समय-समय पर अपनी अलग स्थिति रखती रहीं। यह संबंध साझेदारी और दबाव—दोनों पर आधारित रहा। अपना दल भाजपा से अलग होने की स्थिति में सीमित सीटों तक सिमट सकता था, जबकि भाजपा को पूर्वांचल में कुर्मी नेतृत्व के प्रतीकात्मक और चुनावी सहयोग की आवश्यकता थी।
2022: एक परिवार, दो विरोधी गठबंधनों में
2022 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव अपना दल परिवार के विभाजन का सबसे स्पष्ट चुनावी प्रदर्शन था। अनुप्रिया पटेल का अपना दल (सोनेलाल) भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए में था, जबकि कृष्णा और पल्लवी पटेल का अपना दल (कमेरावादी) अखिलेश यादव के नेतृत्व वाले समाजवादी पार्टी गठबंधन में शामिल हुआ।
अपना दल (सोनेलाल) का प्रदर्शन
अपना दल (सोनेलाल) ने 17 सीटों पर चुनाव लड़कर 12 सीटें जीतीं। उसे 14,93,181 वोट और 1.62 प्रतिशत राज्यव्यापी मत मिले। नौ से बढ़कर 12 विधायक होने के बाद वह विधानसभा में भाजपा और समाजवादी पार्टी के बाद सीटों की संख्या के आधार पर तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बन गई। उसने कांग्रेस, बसपा, रालोद और सुभासपा से अधिक सीटें जीतीं।
अपना दल (कमेरावादी) और पल्लवी पटेल
समाजवादी पार्टी गठबंधन ने पल्लवी पटेल को सिराथू से उम्मीदवार बनाया। उन्होंने समाजवादी पार्टी के चुनाव चिह्न पर चुनाव लड़ते हुए उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य को पराजित किया। राजनीतिक रूप से यह अपना दल कमेरावादी की सबसे बड़ी जीत थी। लेकिन निर्वाचन आयोग की पार्टीवार तालिका में सीट समाजवादी पार्टी के खाते में दर्ज हुई। कमेरावादी धारा से जुड़े अन्य प्रत्याशियों को सफलता नहीं मिली। अलग चुनावी पहचान से दर्ज वोट लगभग 0.28 प्रतिशत के आसपास रहा।
यह चुनाव अपना दल के विभाजन का सबसे बड़ा विरोधाभास सामने लाया। एक ही संस्थापक की दो बेटियाँ राज्य के दो मुख्य विरोधी गठबंधनों में थीं। अनुप्रिया पटेल भाजपा के साथ सरकार में थीं, जबकि पल्लवी पटेल समाजवादी पार्टी गठबंधन की विधायक बनीं। कुर्मी मतदाता भी अलग-अलग क्षेत्रों में भाजपा–अपना दल, समाजवादी पार्टी और अन्य दलों के बीच विभाजित हुआ।
2022 के बाद कमेरावादी–सपा संबंधों में दरार
पल्लवी पटेल की सिराथू जीत के बाद कुछ समय तक अपना दल कमेरावादी और समाजवादी पार्टी का सहयोग जारी रहा।लेकिन राज्यसभा चुनाव, लोकसभा सीट-वितरण और संगठनात्मक सम्मान को लेकर मतभेद उभरने लगे। पल्लवी पटेल ने आरोप लगाया कि समाजवादी पार्टी अपने पीडीए दावे के अनुरूप पिछड़ों और दलितों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं दे रही। अखिलेश यादव और पल्लवी के बीच सार्वजनिक बयानबाजी हुई तथा 2024 के लोकसभा चुनाव तक दोनों दलों की निकटता लगभग समाप्त हो गई।
कमेरावादी गुट ने प्रारंभ में इंडिया गठबंधन के भीतर सीटें माँगीं।,लेकिन समाजवादी पार्टी ने उसकी माँग स्वीकार नहीं की। पल्लवी पटेल ने असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम के साथ पीडीएम—पिछड़ा, दलित और मुस्लिम मोर्चा बनाने की कोशिश की। यह प्रयोग 2024 में उल्लेखनीय चुनावी सफलता नहीं दिला सका। इससे कमेरावादी गुट की सबसे बड़ी कमजोरी सामने आई—उसके पास एक चर्चित विधायक और संस्थापक परिवार की विरासत तो थी।लेकिन स्वतंत्र चुनावी संगठन और स्थायी मत-आधार सीमित था।
2024 का लोकसभा चुनाव: एक सीट बची, रॉबर्ट्सगंज हारी
2024 के लोकसभा चुनाव में अपना दल (सोनेलाल) एनडीए के साथ रहा और उसे फिर मिर्जापुर तथा रॉबर्ट्सगंज की दो सीटें मिलीं। अनुप्रिया पटेल ने मिर्जापुर में समाजवादी पार्टी के रमेश चंद्र बिंद को 37,810 मतों से हराया। अनुप्रिया को 4,71,631 और सपा उम्मीदवार को 4,33,821 वोट मिले। रॉबर्ट्सगंज में अपना दल प्रत्याशी पराजित हो गया। इस प्रकार 2014 और 2019 में दो-दो सीटें जीतने वाली पार्टी 2024 में एक सीट पर आ गई।
रॉबर्ट्सगंज की हार और उत्तर प्रदेश में भाजपा–एनडीए की व्यापक गिरावट के बाद अपना दल (सोनेलाल) ने अपनी सभी संगठनात्मक इकाइयाँ भंग करके पुनर्गठन की घोषणा की। चुनावी विश्लेषणों में यह बात सामने आई कि कुर्मी मतों का एक हिस्सा समाजवादी पार्टी–कांग्रेस गठबंधन की ओर गया और समाजवादी पार्टी ने बड़ी संख्या में कुर्मी उम्मीदवार उतारकर अनुप्रिया पटेल की सामाजिक दावेदारी को चुनौती दी। 2026 तक अनुप्रिया पटेल ने पार्टी कार्यकर्ताओं से कुर्मी समुदाय से आगे बढ़कर अन्य पिछड़ों, दलितों, सवर्णों, व्यापारियों, शिक्षकों और अल्पसंख्यकों के बीच संगठन बढ़ाने को कहा है। भाग–पंद्रह
लोकसभा में कुल कितने लोग पहुँचे?
अपना दल की विभिन्न धाराओं से अब तक लोकसभा पहुँचने वाले अलग-अलग व्यक्तियों का स्पष्ट हिसाब इस प्रकार है—
नेता निर्वाचन वर्ष लोकसभा क्षेत्र
अनुप्रिया पटेल 2014, 2019, 2024 मिर्जापुर
कुंवर हरिवंश सिंह 2014 प्रतापगढ़
पकौड़ी लाल कोल 2019 रॉब


