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India China Border Tension: अरुणाचल पर चीन क्यों खड़ा कर रहा है नया विवाद?
अरुणाचल प्रदेश में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच कई स्थानों पर फेस-ऑफ की पुष्टि हुई है। जानिए चीन की सैलामी स्लाइसिंग रणनीति, मेडोग हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट और भारत-चीन सीमा विवाद के पीछे की पूरी कहानी।
India China Border Tension: भारत और चीन के बीच सीमा पर तनाव कम होने और रिश्तों में सुधार के दावों के बीच अरुणाचल प्रदेश से आई खबरों ने एक बार फिर ड्रैगन की मंशा पर सवाल खड़े कर दिए हैं। वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच कई स्थानों पर आमना-सामना होने की पुष्टि के बाद यह बहस तेज हो गई है कि क्या बीजिंग पूर्वोत्तर भारत में अपनी रणनीतिक मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश कर रहा है? क्या चीन की यह गतिविधियां सामान्य गश्त का हिस्सा हैं या भारत के खिलाफ धीरे-धीरे जमीन पर अपनी स्थिति मजबूत करने की नई रणनीति?
भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) के महानिदेशक शत्रुजीत कपूर ने अरुणाचल प्रदेश में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच कई स्थानों पर फेस-ऑफ की पुष्टि की है। उन्होंने बताया कि पिछले कुछ दिनों में अलग-अलग स्थानों पर ऐसी स्थिति बनी और यह सिलसिला जारी है। हालांकि, इन घटनाओं में शारीरिक झड़प हुई या नहीं, इसकी आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है। सबसे बड़ी चिंता यह है कि सरकार ने अभी तक इन टकरावों के सटीक स्थान और परिस्थितियों का खुलासा नहीं किया है।
क्या चीन फिर आजमा रहा है 'सैलामी स्लाइसिंग' रणनीति?
चीन की सीमा रणनीति को समझने के लिए 'सैलामी स्लाइसिंग' की अवधारणा महत्वपूर्ण है। इसके तहत किसी विवादित क्षेत्र में एक बार में बड़ा सैन्य कदम उठाने के बजाय छोटे-छोटे कदमों से धीरे-धीरे अपनी मौजूदगी और नियंत्रण बढ़ाने की कोशिश की जाती है। इससे विरोधी देश के सामने हर घटना पर बड़ी सैन्य प्रतिक्रिया देने की चुनौती खड़ी हो जाती है।
भारत के लिए सवाल यह है कि अरुणाचल में हालिया गतिविधियां सिर्फ गश्त के दौरान होने वाले आमने-सामने के मामले हैं या चीन किसी नए इलाके में अपनी उपस्थिति बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।
चीन मामलों के विशेषज्ञ और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से जुड़े अरविंद येलेरी के मुताबिक, पूर्वी सेक्टर में चीन का रणनीतिक फोकस बढ़ा है। तिब्बत में 60 हजार मेगावाट क्षमता वाली मेडोग जलविद्युत परियोजना की घोषणा के बाद चीन इस इलाके में बुनियादी ढांचे, सैन्य संसाधनों, इंजीनियरों और मशीनरी की तैनाती बढ़ा रहा है।
यह गतिविधियां इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि सीमा पर केवल सैनिकों की संख्या ही मायने नहीं रखती, बल्कि सड़क, पुल, सुरंग और सैन्य लॉजिस्टिक्स भी किसी देश की रणनीतिक क्षमता को निर्धारित करते हैं।
अरुणाचल पर चीन का दावा, मैकमोहन लाइन को नहीं मानता ड्रैगन
अरुणाचल प्रदेश भारत और चीन के बीच सबसे संवेदनशील सीमा विवादों में से एक है। चीन इस भारतीय राज्य को दक्षिणी तिब्बत का हिस्सा बताकर अपना दावा करता है। भारत इस दावे को पूरी तरह खारिज करता है और अरुणाचल प्रदेश को अपना अभिन्न अंग मानता है।
विवाद की जड़ 1914 में ब्रिटिश शासन के दौरान निर्धारित मैकमोहन लाइन से जुड़ी है। भारत इसे अंतरराष्ट्रीय सीमा के निर्धारण का आधार मानता है, जबकि चीन इसे स्वीकार नहीं करता।
भारत के पूर्व राजनयिक गौतम बंबावले के मुताबिक, सीमा पर टकराव की सबसे बड़ी वजह यह है कि दोनों देशों के बीच LAC को लेकर कोई साझा और स्पष्ट समझौता नहीं है। दोनों देशों की सेनाएं अपने-अपने दावे वाले क्षेत्रों में गश्त करती हैं और कई जगह उनके गश्ती मार्ग एक-दूसरे से टकराते हैं।
भारत के अनुसार, दोनों देशों के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा की लंबाई करीब 3,488 किलोमीटर है। हालांकि, चीन इस लंबाई और सीमा के स्वरूप को अलग तरीके से देखता है।
2020 के गलवान संघर्ष की यादें, क्या फिर बिगड़ सकते हैं रिश्ते?
भारत और चीन के संबंधों पर जून 2020 के गलवान संघर्ष का साया अब भी बना हुआ है। पूर्वी लद्दाख में दोनों देशों के सैनिकों के बीच हुई हिंसक झड़प में भारत के 20 जवान शहीद हुए थे। चीन ने बाद में अपने चार सैनिकों की मौत स्वीकार की थी।
इस घटना के बाद दोनों देशों के बीच सैन्य तनाव बढ़ गया और सीमा पर सैनिकों तथा सैन्य संसाधनों की भारी तैनाती हुई। लंबे सैन्य और कूटनीतिक प्रयासों के बाद रिश्तों को सामान्य बनाने की कोशिशें शुरू हुईं।
लेकिन अरुणाचल में ताजा घटनाक्रम ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या दोनों देशों के शीर्ष नेताओं के बीच बनी सहमति जमीन पर वास्तविक शांति में बदल पा रही है?
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल कूटनीतिक बातचीत पर्याप्त नहीं है। इसके लिए सीमा पर सैनिकों की तैनाती, गश्त के नियमों और विवादित क्षेत्रों में आपसी संयम को लेकर ठोस व्यवस्था जरूरी है।
चीन की गतिविधियों पर भारत सरकार का क्या कहना है?
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने इन घटनाओं के लिए चीनी सैनिकों के गश्ती मार्गों में बदलाव को जिम्मेदार बताया। उनके मुताबिक, जब चीनी सैनिक स्थापित गश्ती पैटर्न से अलग रास्तों पर जाते हैं तो सीमा पर तनाव की स्थिति पैदा होती है।
दूसरी ओर, चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गुओ जियाकुन ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि चीनी सैनिक सामान्य गश्त कर रहे हैं और दोनों देशों के बीच हुए समझौतों का पालन कर रहे हैं।
अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने भी सीमा पर स्थिति को सामान्य बताया है। हालांकि, उन्होंने यह स्वीकार किया कि सीमा का पूरी तरह सीमांकन नहीं हुआ है और चीन मैकमोहन लाइन को मान्यता नहीं देता।
कांग्रेस ने इस मामले में केंद्र सरकार पर निशाना साधा है। पार्टी महासचिव जयराम रमेश ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार की चुप्पी पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि सरकार चीनी गतिविधियों पर सख्त रुख अपनाने के बजाय उन्हें सामान्य बताने की कोशिश कर रही है।
पूर्व राजनयिक की चेतावनी- घुसपैठ की जगह और विस्तार बेहद अहम
भारत के पूर्व राजनयिक अशोक कंठा ने चेताया है कि पूर्वी सेक्टर में चीनी सैनिकों की गतिविधियां नई नहीं हैं, लेकिन उनका स्थान और विस्तार बेहद महत्वपूर्ण है।
उनके मुताबिक, यदि चीनी सैनिक भारतीय दावे वाले क्षेत्र में पहले से अधिक अंदर तक घुस आए हैं, किसी नए इलाके में अपनी मौजूदगी स्थापित कर चुके हैं या पहले से मौजूद स्थिति का विस्तार कर रहे हैं, तो यह गंभीर घटनाक्रम होगा।
भारत और चीन के बीच 1993, 1996, 2005, 2012 और 2013 में सीमा पर शांति बनाए रखने से जुड़े समझौते हुए थे। इन समझौतों में LAC का सम्मान करने और एकतरफा तरीके से यथास्थिति बदलने से बचने की प्रतिबद्धता जताई गई थी।
भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
अरुणाचल प्रदेश में ताजा फेस-ऑफ ने भारत के सामने दोहरी चुनौती खड़ी कर दी है। एक तरफ चीन की सैन्य और बुनियादी ढांचे से जुड़ी बढ़ती क्षमता पर नजर रखना जरूरी है, वहीं दूसरी तरफ सीमा पर किसी भी छोटी घटना को बड़े सैन्य संघर्ष में बदलने से रोकना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि चीन ने किसी नए क्षेत्र में अपनी स्थिति मजबूत की है या हालिया घटनाएं गश्त के दौरान होने वाले सामान्य टकराव तक सीमित हैं। लेकिन एक बात साफ है- गलवान के बाद भारत-चीन संबंधों में आई कूटनीतिक नरमी को सीमा पर स्थायी शांति का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या चीन केवल सीमा पर अपनी गश्त के दायरे को लेकर दबाव बना रहा है या पूर्वोत्तर में भारत की रणनीतिक स्थिति को धीरे-धीरे चुनौती देने की तैयारी कर रहा है? इसका जवाब आने वाले दिनों में सीमा पर वास्तविक गतिविधियों और भारत की सैन्य-कूटनीतिक प्रतिक्रिया से ही मिलेगा।


