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एशिया में आने वाला है भयानक संकट! इस देश ने बजा दी खतरे की घंटी, खाने के भी पड़ सकते हैं लाले
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच जापान ने एशियाई देशों से अपने इमरजेंसी तेल भंडार को मजबूत करने की अपील की है।
Asia Oil Crisis Alert: पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने दुनिया के सामने तेल की सप्लाई को लेकर बड़ी चिंता खड़ी कर दी है। अगर कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित होती है, तो इसका असर सिर्फ पेट्रोल-डीजल की कीमतों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि कारखानों, गाड़ियों और आम लोगों की रसोई तक पहुंच सकता है। इसी खतरे को देखते हुए जापान ने एशियाई देशों से अपने इमरजेंसी तेल भंडार को मजबूत करने की अपील की है। ऐसे में भारत समेत कई देशों में तेल से लेकर खाने के गैस तक में कमी आ सकती है।
जापान का कहना है कि मौजूदा हालात में ऊर्जा सुरक्षा को सबसे ज्यादा प्राथमिकता देने की जरूरत है। दरअसल, एशिया के कई बड़े देश अपनी तेल जरूरतों के लिए दूसरे देशों पर निर्भर हैं। ऐसे में अगर तेल की सप्लाई के अहम रास्तों पर कोई रुकावट आती है, तो कई देशों के सामने ईंधन की किल्लत का खतरा पैदा हो सकता है। अब सवाल है कि आखिर जापान ने ऐसी चेतावनी क्यों दी है, एशिया पर इसका कितना असर पड़ सकता है और इस संकट से निपटने के लिए किन देशों के पास कितना तेल जमा है?
जापान ने क्यों दी तेल भंडार बढ़ाने की सलाह?
जापान के ट्रेड मिनिस्टर र्योसेई अकाजावा ने अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा मंच की वर्चुअल बैठक में एशियाई देशों से अपील की कि वे अपने तेल भंडार को मजबूत करें। जापान का मानना है कि पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने की स्थिति में तेल की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। ऐसे समय में पहले से जमा किया गया तेल किसी भी देश के लिए बड़ी राहत साबित हो सकता है।
जापान ने यह भी कहा कि मध्य पूर्व के तेल उत्पादक देशों और एशिया के तेल आयात करने वाले देशों के बीच बेहतर तालमेल जरूरी है। उसने दोनों पक्षों के बीच एक पुल की भूमिका निभाने की पेशकश की, ताकि तेल की सप्लाई को स्थिर बनाए रखने की कोशिश की जा सके।
एशियाई देशों के सामने क्यों बढ़ सकता है संकट?
एशिया के कई देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा दूसरे देशों से आने वाले कच्चे तेल से पूरा करते हैं। ऐसे में अगर युद्ध या किसी दूसरी वजह से तेल की आपूर्ति रुकती है, तो इसका सीधा असर इन देशों पर पड़ सकता है। तेल की कमी से परिवहन, उद्योग और बिजली उत्पादन जैसी गतिविधियां प्रभावित हो सकती हैं। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने पर पेट्रोल-डीजल महंगा होने का दबाव भी बन सकता है।
जापान जैसे देश के लिए यह चिंता और बड़ी है, क्योंकि उसकी तेल जरूरतों का 90 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा मध्य पूर्व से आता है। ऐसे में वहां लंबे समय तक तनाव बने रहने या तेल की ढुलाई प्रभावित होने पर जापान की ऊर्जा सुरक्षा पर दबाव बढ़ सकता है।
होर्मुज जलडमरूमध्य पर क्यों टिकी हैं नजरें?
पश्चिम एशिया के मौजूदा तनाव के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य का रास्ता भी अहम माना जा रहा है। यह समुद्री रास्ता वैश्विक तेल व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। अगर यहां जहाजों की आवाजाही किसी सैन्य तनाव या दूसरी वजह से प्रभावित होती है, तो तेल की सप्लाई पर असर पड़ सकता है।
भारत, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे बड़े तेल आयातक देशों के लिए इस रास्ते में किसी भी तरह की रुकावट चिंता बढ़ा सकती है। हालांकि, सप्लाई पर वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि तनाव कितना बढ़ता है और तेल की ढुलाई कितनी प्रभावित होती है।
ग्रीन एनर्जी से पहले ऊर्जा सुरक्षा पर जोर
मौजूदा हालात में जापान ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता देने की बात कर रहा है। इसका मतलब है कि देशों को सबसे पहले यह सुनिश्चित करना होगा कि उनकी जरूरत के मुताबिक तेल और दूसरे ऊर्जा संसाधन उपलब्ध रहें। अगर उद्योगों और परिवहन के लिए जरूरी ईंधन ही नहीं होगा, तो आर्थिक गतिविधियों पर दबाव बढ़ सकता है।
जापान की अगुवाई वाली एशिया जीरो एमिशन कम्युनिटी की रणनीति में भी ऊर्जा सुरक्षा का महत्व बढ़ा है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि ग्रीन एनर्जी की जरूरत खत्म हो गई है। मौजूदा संकट ने सिर्फ यह दिखाया है कि ऊर्जा के नए स्रोत विकसित करने के साथ-साथ पारंपरिक ईंधन की भरोसेमंद आपूर्ति और इमरजेंसी भंडार बनाए रखना भी जरूरी है।
चीन के पास सबसे बड़ा रणनीतिक तेल भंडार होने का दावा
दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, रणनीतिक तेल भंडार के मामले में चीन सबसे आगे बताया गया है। चीन के पास करीब 1.397 अरब बैरल कच्चे तेल का भंडार होने का दावा किया गया है। अमेरिका के रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व में लगभग 413 मिलियन बैरल तेल बताया गया है, जबकि जापान के पास करीब 263 मिलियन बैरल का रणनीतिक भंडार होने का उल्लेख है। इन आंकड़ों के आधार और उनकी मौजूदा स्थिति की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है, क्योंकि देशों के तेल भंडार समय के साथ बदलते रहते हैं।
रणनीतिक तेल भंडार का मकसद ही यही होता है कि जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में सप्लाई बाधित हो या कोई बड़ा संकट आए, तो देश कुछ समय तक अपने जरूरी कामकाज जारी रख सकें। ऐसे भंडार आपात स्थिति में राहत दे सकते हैं, लेकिन वे लंबे समय तक चलने वाली सप्लाई बाधा का पूरा विकल्प नहीं होते।
अब एशियाई देशों के सामने क्या चुनौती है?
पश्चिम एशिया में तनाव के बीच एशियाई देशों के लिए सबसे बड़ी चुनौती तेल की लगातार और सुरक्षित आपूर्ति बनाए रखना है। इसके लिए इमरजेंसी भंडार मजबूत करना, तेल खरीदने के स्रोत बढ़ाना और उत्पादक देशों के साथ सहयोग बनाए रखना अहम हो सकता है।
जापान की चेतावनी इसी खतरे की ओर इशारा करती है कि तेल की सप्लाई में रुकावट आने पर उसका असर कई देशों की अर्थव्यवस्था और आम लोगों की जिंदगी पर पड़ सकता है। हालांकि, अभी तेल की किल्लत या कीमतों में किसी निश्चित उछाल को तय मानना सही नहीं होगा। इसका असर पश्चिम एशिया के हालात और वैश्विक तेल आपूर्ति में होने वाले वास्तविक बदलावों पर निर्भर करेगा।


