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Assam Flood 2026: हर साल डूबता असम, ब्रह्मपुत्र की विनाशलीला और स्थायी समाधान की चुनौती
Assam Flood 2026: विशेषज्ञों का मानना है कि असम की बाढ़ सिर्फ एक प्राकृतिक आपदा नहीं है।
Assam Flood 2026
Assam Flood 2026: भारत में मानसून जहां अधिकांश राज्यों के लिए राहत लेकर आता है वहीं असम के लिए यह हर साल भय, विस्थापन और तबाही का दूसरा नाम बन जाता है। मानसून के आगमन के साथ ही ब्रह्मपुत्र और उसकी दर्जनों सहायक नदियां उफान पर आ जाती हैं। लाखों लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं, हजारों हेक्टेयर कृषि भूमि डूब जाती है और विश्व प्रसिद्ध काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान तक इस त्रासदी से अछूता नहीं रहता। बाढ़ का पानी जंगलों में घुसते ही गैंडे, हाथी, हिरण और अन्य वन्यजीव सुरक्षित स्थानों की तलाश में राष्ट्रीय राजमार्गों की ओर पलायन करने लगते हैं, जहां बड़ी संख्या में उनकी मौतें भी होती हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि असम की बाढ़ सिर्फ एक प्राकृतिक आपदा नहीं है। यह भौगोलिक परिस्थितियों, जलवायु परिवर्तन, दशकों पुरानी नीतिगत खामियों, जर्जर बुनियादी ढांचे और कमजोर नदी प्रबंधन का मिला जुला परिणाम है। यही कारण है कि हर साल राहत कार्यों पर हजारों करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद समस्या स्थायी रूप से हल नहीं हो पाई है।
ब्रह्मपुत्र का भूगोल ही क्यों बन जाता है तबाही की वजह?
असम की बाढ़ की सबसे बड़ी वजह ब्रह्मपुत्र नदी का विशाल और जटिल नदी तंत्र है। तिब्बत से निकलकर अरुणाचल प्रदेश के पहाड़ी इलाकों से अत्यधिक वेग के साथ बहती हुई ब्रह्मपुत्र जब असम के मैदानी भाग में प्रवेश करती है तो उसका प्रवाह अचानक धीमा हो जाता है। असम का मैदानी क्षेत्र औसतन केवल 80 से 100 किलोमीटर चौड़ा है, जबकि नदी अपने साथ हिमालय से आने वाले विशाल जल प्रवाह को लेकर आती है। इतने सीमित भूभाग में इतना अधिक पानी समाहित नहीं हो पाता और नदी अपने किनारे तोड़कर दूर-दूर तक फैल जाती है।
स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब असम के भीतर ही ब्रह्मपुत्र में 50 से अधिक बड़ी सहायक नदियां आकर मिलती हैं। उत्तर से सुबनसिरी, जिया-भरेली, मानस और दक्षिण से कॉपिली, धनसिरी जैसी नदियां मानसून के दौरान एक साथ उफान पर होती हैं। परिणामस्वरूप पूरे नदी तंत्र में जलस्तर तेजी से बढ़ता है और बाढ़ व्यापक रूप ले लेती है।
हिमालय दुनिया के सबसे युवा पर्वतों में गिना जाता है। इसकी चट्टानें अपेक्षाकृत कमजोर और भुरभुरी हैं। मानसून के दौरान नदियां भारी मात्रा में मिट्टी, रेत और चट्टानों का मलबा बहाकर लाती हैं। असम के समतल क्षेत्र में पहुंचते ही यह गाद नदी के तल में जमा होने लगती है। धीरे-धीरे नदी की गहराई कम होती जाती है और उसका तल ऊपर उठने लगता है। नतीजतन, थोड़ी सी ज्यादा बारिश भी नदी को किनारे तोड़ने पर मजबूर कर देती है। 1950 में आए 8.6 तीव्रता के विनाशकारी असम भूकंप ने इस समस्या को और बढ़ा दिया। भूकंप और उसके बाद हुए बड़े पैमाने पर भूस्खलनों ने ब्रह्मपुत्र के प्राकृतिक प्रवाह को बदल दिया। नदी तल में भारी मात्रा में गाद जमा हुई और कई स्थानों पर नदी का मार्ग भी परिवर्तित हो गया। विशेषज्ञ मानते हैं कि आज की बाढ़ समस्या की जड़ें काफी हद तक उसी भूगर्भीय परिवर्तन से जुड़ी हुई हैं।
जलवायु परिवर्तन ने बढ़ाई मुश्किलें
पिछले एक दशक में जलवायु परिवर्तन ने असम की बाढ़ को और अधिक अनिश्चित और खतरनाक बना दिया है। अब मानसून के दौरान कम समय में अत्यधिक वर्षा की घटनाएं बढ़ रही हैं। इसके साथ ही हिमालयी ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से ब्रह्मपुत्र में जल प्रवाह बढ़ रहा है। मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि भविष्य में चरम वर्षा की घटनाओं में और वृद्धि होने की आशंका है, जिससे बाढ़ का जोखिम लगातार बढ़ सकता है।
तटबंध बने समाधान या नई समस्या?
स्वतंत्रता के बाद असम में बाढ़ रोकने का सबसे बड़ा उपाय तटबंधों का निर्माण माना गया। 1954 की भीषण बाढ़ के बाद बड़े पैमाने पर मिट्टी के तटबंध बनाए गए और आज राज्य में 4,500 किलोमीटर से अधिक लंबे तटबंध मौजूद हैं। शुरुआती वर्षों में इन तटबंधों ने गांवों और खेती को कुछ हद तक सुरक्षा दी, लेकिन समय के साथ यही व्यवस्था नई समस्याओं का कारण बन गई। अधिकांश तटबंध 1950, 1960 और 1970 के दशक में बनाए गए थे और उनकी उपयोग अवधि काफी पहले समाप्त हो चुकी है। हर वर्ष मानसून से पहले इनकी मरम्मत पर करोड़ों रुपये खर्च होते हैं, लेकिन अक्सर गुणवत्ता और भ्रष्टाचार को लेकर सवाल उठते रहे हैं।
जब तेज जल प्रवाह के कारण कोई तटबंध टूटता है तो अचानक आने वाली बाढ़ सामान्य बाढ़ से कहीं अधिक विनाशकारी साबित होती है। दूसरी ओर तटबंध नदी को प्राकृतिक रूप से फैलने से रोकते हैं, जिससे गाद लगातार नदी के भीतर ही जमा होती रहती है और नदी तल आसपास के गांवों से भी ऊंचा हो जाता है। परिणामस्वरूप खतरा हर वर्ष और बढ़ता जाता है।
बाढ़ नियंत्रण के लिए सरकारों ने क्या किया?
असम में बाढ़ नियंत्रण की सरकारी रणनीति को मोटे तौर पर तीन चरणों में बांटा जा सकता है।
पहला चरण 1954 के बाद शुरू हुआ, जब राष्ट्रीय बाढ़ नियंत्रण नीति के तहत बड़े पैमाने पर तटबंध बनाए गए।
दूसरा चरण 1980 में आया, जब संसद के अधिनियम के जरिए ब्रह्मपुत्र बोर्ड का गठन किया गया। इसका उद्देश्य पूरे ब्रह्मपुत्र बेसिन के लिए समग्र बाढ़ प्रबंधन योजना तैयार करना था। हालांकि पर्याप्त वित्तीय अधिकार, तकनीकी संसाधन और अंतर-राज्यीय समन्वय के अभाव में बोर्ड की अधिकांश योजनाएं कागजों तक ही सीमित रह गईं।
तीसरे चरण में वर्ष 2000 के बाद आधुनिक तकनीकों को अपनाने की शुरुआत हुई। जियो-ट्यूब और जियो-बैग तकनीक से नदी किनारों को मजबूत करने, इसरो, नेसाक और केंद्रीय जल आयोग के सहयोग से रियल टाइम फ्लड फोरकास्टिंग सिस्टम विकसित करने तथा विश्व बैंक और एशियाई विकास बैंक की सहायता से कई परियोजनाएं शुरू की गईं। इन प्रयासों से चेतावनी प्रणाली में सुधार जरूर हुआ, लेकिन बाढ़ की मूल समस्या अब भी जस की तस बनी हुई है।
कटाव: बाढ़ से भी बड़ा संकट
असम की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक नदी कटाव है, जिस पर अपेक्षाकृत कम चर्चा होती है। 1950 से अब तक ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियां लगभग 4.27 लाख हेक्टेयर भूमि निगल चुकी हैं, जो राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल के सात प्रतिशत से अधिक के बराबर है। हर वर्ष हजारों परिवार अपनी जमीन और घर हमेशा के लिए खो देते हैं। कई लोग तटबंधों, सड़कों और सरकारी भूमि पर अस्थायी झोपड़ियां बनाकर रहने को मजबूर हैं। लंबे समय तक नदी कटाव को आपदा राहत व्यवस्था में पर्याप्त महत्व नहीं मिला, जिससे लाखों प्रभावित परिवार स्थायी पुनर्वास से वंचित रह गए।
राहत शिविरों की हकीकत
बाढ़ के दौरान बनाए जाने वाले राहत शिविरों की स्थिति भी चिंता का विषय बनी रहती है। कई शिविरों में साफ पेयजल, शौचालय, स्वच्छता, महिलाओं और बच्चों के लिए स्वास्थ्य सेवाओं तथा आवश्यक दवाओं का अभाव देखने को मिलता है। राहत कार्य अक्सर भोजन के पैकेट, तिरपाल और अस्थायी आश्रय तक सीमित रह जाते हैं, जबकि आजीविका, शिक्षा और स्थायी पुनर्वास जैसे मुद्दे पीछे छूट जाते हैं।
क्या कोई स्थायी समाधान है?
विशेषज्ञों का मानना है कि असम को पूरी तरह बाढ़ मुक्त बनाना शायद संभव नहीं है, क्योंकि ब्रह्मपुत्र का प्राकृतिक स्वरूप ही बाढ़ आधारित नदी का है। इसलिए लक्ष्य बाढ़ को रोकना नहीं, बल्कि उसके साथ सुरक्षित तरीके से जीने की रणनीति विकसित करना होना चाहिए। इसके लिए चयनित क्षेत्रों में वैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर ड्रेजिंग कर नदी की गहराई बढ़ाने और निकाली गई गाद का उपयोग तटबंधों एवं सड़कों के निर्माण में किया जा सकता है। नदी के प्राकृतिक बाढ़ मैदानों, बील, दलदली क्षेत्रों को अतिक्रमण से मुक्त कर उन्हें अतिरिक्त पानी के प्राकृतिक भंडार के रूप में विकसित करना होगा।
ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों, विशेषकर अरुणाचल प्रदेश में बड़े पैमाने पर वनीकरण, जल संरक्षण और मृदा संरक्षण कार्यक्रमों को बढ़ावा देना होगा ताकि नदियों में गाद का प्रवाह कम हो। चीन के तिब्बत क्षेत्र से आने वाले ब्रह्मपुत्र के जल प्रवाह संबंधी वास्तविक समय के आंकड़ों के आदान-प्रदान के लिए कूटनीतिक सहयोग भी मजबूत करना होगा।
साथ ही पारंपरिक मिट्टी के तटबंधों की जगह आधुनिक इंजीनियरिंग तकनीक, जियो-मैटेरियल, कंक्रीट संरचनाओं और स्मार्ट सेंसर आधारित निगरानी प्रणाली विकसित करनी होगी। बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में असम की पारंपरिक 'चांग घर' शैली के ऊंचे मकानों को आधुनिक निर्माण तकनीक के साथ बढ़ावा देना भी नुकसान कम करने का प्रभावी उपाय हो सकता है।
असम की बाढ़ यह बताती है कि केवल तटबंध बनाना, राहत सामग्री बांटना और हर साल मरम्मत पर खर्च करना स्थायी समाधान नहीं है। आवश्यकता ऐसी समग्र नदी प्रबंधन नीति की है जो ब्रह्मपुत्र को एक जीवित नदी तंत्र के रूप में समझे, उसके प्राकृतिक प्रवाह का सम्मान करे और विकास, पर्यावरण तथा स्थानीय समुदायों के हितों के बीच संतुलन स्थापित करे।


