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Avocado Farming: 'डॉग फ्रूट' से सुपरफूड बना एवोकाडो, किसानों के लिए बना मुनाफे का नया विकल्प
Avocado Farming: भारत में एवोकाडो की मांग तेजी से बढ़ी है। घरेलू उत्पादन 9 हजार टन के करीब है, जबकि सालाना आयात 15 हजार टन पहुंच गया है।
'डॉग फ्रूट' से सुपरफूड बना एवोकाडो, किसानों के लिए बना मुनाफे का नया विकल्प (Photo- Social Media)
Avocado Farming: कभी भारतीय बागानों में महज कॉफी के पौधों को छाया देने के लिए लगाए जाने वाले और जमीन पर गिरकर कुत्तों-मवेशियों का निवाला बनने के कारण 'डॉग फ्रूट' कहलाने वाला एवोकाडो अब देश का सबसे लोकप्रिय सुपरफूड बन चुका है। मेट्रो शहरों के आधुनिक खान-पान से लेकर सौंदर्य उत्पादों तक इसकी मांग में भारी उछाल आया है। घरेलू बाजार में खपत का दायरा इतना बढ़ गया है कि भारत को हर साल लगभग 15,000 टन एवोकाडो आयात करना पड़ रहा है, जबकि देश का कुल घरेलू उत्पादन अभी 8,000 से 9,000 टन के आसपास ही सीमित है। मांग और आपूर्ति के इस भारी अंतर ने भारतीय किसानों के लिए व्यावसायिक खेती का एक नया और आकर्षक द्वार खोल दिया है।
पारंपरिक फसलों पर जलवायु की मार, एवोकाडो बना ढाल
केरल और कर्नाटक के पहाड़ी क्षेत्रों में कॉफी, चाय और काली मिर्च जैसी नकदी फसलों पर जलवायु परिवर्तन (अनियमित वर्षा और अत्यधिक गर्मी) का बुरा असर पड़ रहा है। ऐसे में किसान जोखिम कम करने के लिए फसल विविधीकरण (क्रॉप डायवर्सिफिकेशन) के तहत एवोकाडो को मुख्य फसल के रूप में अपना रहे हैं।
वायनाड का उदाहरण: केरल के वायनाड स्थित 'कॉटनाड प्लांटेशन' ने एवोकाडो को करीब 40 एकड़ में मुख्य फसल बना लिया है। प्लांटेशन के ग्रुप मैनेजर मधु बोपैया के अनुसार, पिछले साल उन्हें 10 से 15 टन उत्पादन मिला, जिसे अगले 3-4 वर्षों में बढ़ाकर 40 से 50 टन करने का लक्ष्य है।
सेलेब्रिटी प्रभाव: वर्ष 2011 के आसपास जब बॉलीवुड अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी सहित कई हस्तियों ने स्किनकेयर और डाइट में इसके फायदों का जिक्र किया, तब से मेट्रो शहरों के मध्यम और उच्च वर्ग में इसकी मांग तेजी से बढ़ी।
पोषक तत्वों की खान है यह फल
हेल्दी फैट: इसमें मुख्य रूप से 'मोनोअनसैचुरेटेड फैटी एसिड' (MUFA) होता है, जो हृदय स्वास्थ्य और खराब कोलेस्ट्रॉल (LDL) को घटाने में मददगार है।
विटामिन और मिनरल्स: यह फाइबर, पोटैशियम, फोलेट, विटामिन ई, के, सी और बी-कॉम्प्लेक्स से भरपूर है। इसी कारण फिटनेस फ्रीक्स के ब्रेकफास्ट, एवोकाडो टोस्ट, सलाद और स्मूदी में इसकी मांग लगातार बढ़ रही है।
हास्पिटैलिटी सेक्टर में 'विदेशी किस्मों' की ज्यादा मांग
भारत के प्रीमियम रेस्तरां और होटलों में स्थानीय फलों के मुकाबले विदेशी किस्मों को प्राथमिकता दी जा रही है।
गुणवत्ता और निरंतरता: मुंबई के हंगर इंक हॉस्पिटैलिटी के एग्जीक्यूटिव शेफ हुसैन शहजाद का कहना है कि भारतीय एवोकाडो के स्वाद, आकार, बनावट (टेक्सचर) और पकने की प्रक्रिया में मौसम व इलाके के अनुसार काफी भिन्नता होती है, जिसके चलते शेफ आयातित फलों को तरजीह देते हैं।
हॉस और पिंकर्टन की नर्सरी: देश में अब 'हॉस' (Hass) और 'पिंकर्टन' (Pinkerton) जैसी लोकप्रिय अंतरराष्ट्रीय किस्मों की कलमबंद (ग्राफ्टेड) पौध की मांग बढ़ी है। भोपाल स्थित इंडो-इजरायल एवोकाडो नर्सरी के हर्षित गोदहा के अनुसार, वे पिछले पांच वर्षों में विभिन्न राज्यों के किसानों को लगभग 18 हजार उन्नत पौधे उपलब्ध करा चुके हैं।
व्यावसायिक खेती की चुनौतियां और तकनीकी पहलू
कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक, एवोकाडो की खेती केवल बीज बोकर नहीं की जा सकती:
ग्राफ्टिंग जरूरी: स्थानीय मिट्टी के अनुकूल रूटस्टॉक (जड़) पर उन्नत विदेशी किस्म की टहनी को ग्राफ्ट करके ही व्यावसायिक पौध तैयार की जाती है।
कटाई-छंटाई (प्रूनिंग): पेड़ 6-7 साल में 25 फीट तक ऊंचे हो जाते हैं, इसलिए व्यावसायिक पैदावार के लिए नियमित कैनोपी मैनेजमेंट जरूरी है।
क्रॉस-पॉलिनेशन: बेहतर फलन के लिए बाग में 'टाइप-ए' और 'टाइप-बी' दोनों किस्मों के पौधों को सही अनुपात में लगाना आवश्यक होता है।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और बंगलूरू स्थित भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान (IIHR) भी स्थानीय जलवायु के अनुरूप हाई-यील्ड किस्में तैयार करने में जुटे हैं, ताकि आयात पर निर्भरता घटाकर भारतीय किसानों को इस वैश्विक बूम का सीधा वित्तीय लाभ मिल सके।


