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Bashir Badr Shayari: ख़ुदा हमको ऐसा खुदाई न दे, कि अपने सिवा कुछ दिखाई न दे
Bashir Badr Shayari aur Ghazal: एक शायर जिसने अपनी ग़ज़लों से हमें ज़िंदगी का फलसफ़ा सिखाया...
Bashir Badr Smriti Shesh Shayari aur Ghazal
Bashir Badr Shayari aur Ghazal: स्मृति शेष: बशीर बद्र (15 February 1935- 28 May 2026)
एक शायर जिसने अपनी ग़ज़लों से हमें ज़िंदगी का फलसफ़ा सिखाया
सन् 1997-98 के आसपास की बात है। लखनऊ महोत्सव तब हजरतगंज के बेगम हजरतमहल पार्क में हुआ करता था। और इस महोत्सव का सबसे महत्वपूर्ण इवेंट यहां होने वाला मुशायरा होता था। देश-दुनिया के बड़े-बड़े शायर यहां अपना कलाम पढ़ते थे। ऐसी ही जाड़े की एक सर्द रात को करीब एक बजे के लगभग बशीर बद्र साहब को सुनने का मौका मिला था। तब ‘हिन्दुस्तान’ अखबार के अपने कुछ सहयोगियों के साथ अखबार छोडने के बाद वहां गया था। उस सर्द रात को सुने दो शेर आज भी कानों में गूंजते रहते हैं-
परखना मत परखने में कोई अपना नहीं रहता
किसी भी आइने में देर तक चेहरा नहीं रहता।
बड़े लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना
जहाँ दरिया समुंदर से मिला दरिया नहीं रहता।
दो लाइनों में पूरी कहानी कहने का हुनर-
दो लाइनों में जिंदगी का पूरा फसलफ़ा लिख देने का क्या ख़ूब हुनर था उनके पास। जो बात एक लंबी कहानी में कही जाती वो बात बशीर बद्र साहब अपने एक शेर में कह देते थे। ऊपर वाले ने कुछ ऐसे हुनर से नवाज़ा था उनको। छोटी बहर की ग़ज़लों के उस्ताद थे वे। हमारे दौर के महानतम शायर ने इस दुनिया को शारीरिक रूप से 28 मई 2026 को अलविदा कह दिया। लेकिन बशीर बद्र मरते नहीं हैं। जब-जब किसी आम या ख़ास इंसान को अपने जज़्बात के लिए शब्द नहीं मिलेंगे उसे बशीर बद्र साहब सहारा देने आ ही जाएंगे। यही वजह है कि संसद हो या कि राज्यों की विधानसभाएं बहस के दौरान नेताओं ने अपनी बात कहने के लिए बशीर साहब के शेरों का कई बार सहारा लिया है।
शायर ही नहीं, दार्शनिक भी-
बशीर बद्र साहब को सिर्फ एक शायर के तौर पर देखना उनके साथ नाइंसाफी होगी। वे एक दार्शनिक भी थे। यह दर्शन उनकी कई ग़ज़लों में नुमाया हुआ था। मसलन उनके इस एक शेर पर ग़ौर फरमाइए-
ख़ुदा हमको ऐसा खुदाई न दे
कि अपने सिवा कुछ दिखाई न दे।
या फिर कि ये कहना-
दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे
जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों।
या कि ज़िंदगी को कुछ ऐसे महसूस करना हो-
ज़िंदगी तू ने मुझे क़ब्र से कम दी है ज़मीं
पाँव फैलाऊँ तो दीवार में सर लगता है।
इश्क से लेकर सामाजिक और राजनीतिक हालात सब पर लिखा-
बशीर बद्र साहब की खास बात ये है कि इश्क, मुहब्बत से लेकर समाजिक और राजनीतिक नज़रिए से भी उन्होंने ग़ज़लें लिखीं। 1987 में मेरठ में हुए दंगों में जब उनका घर जला दिया गया, उनकी पूरी लाइब्रेरी और पांडुलिपियां जलकर राख हो गईं तब पूरे माहौल के बाद उपजे हालात को उन्होंने कुछ इस तरह दो लाइनों में बयां किया-
लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में।
या कि टूटते भरोसे पर ये कहना कि-
कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से
ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो।
या कि ये-
मोहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला
अगर गले नहीं मिलता तो हाथ भी न मिला।
या कि उनका यह बहुत ही लोकप्रिय शेर-
कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी
यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता।
कहने का मतलब कि इंसान किसी मजबूरी में भी आपका साथ छोड़ सकता है, उसे दोष मत दो। यही मानवीयता उन्हें महानतम शायरों की श्रेणी में खड़ा करती है। एक बड़े उदार और मानवीय शायर के रूप में उनका कद निश्चित ही दुनिया के सर्वकालीन शायरों में स्थापित है। बद्र साहब के कई शेर तो मुहावरे की तरह इस्तेमाल होते हैं। बशीर बद्र साहब की ग़ज़लों की लोकप्रियता का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि भारत और पाकिस्तान के कई गायकों ने इनकी ग़ज़लों को सुरों में ढाला है। इनमें जगजीत सिंह और नूरजहां जैसे महान गायक शामिल हैं।
आम इंसान की भावनाओं की शब्द दिए-
जब कोई शायर दर्द की इंतहा से गुजर कर कुछ लिखता है तो कैसा लिखता है यह बशीर साहब ने हमें बताया। दो लाइनों में कलेजा निकाल कर रख देना किसे कहते हैं इसे उनके इस शेर में देखिए-
ख़ुदा की इतनी बड़ी काएनात में मैंने
बस एक शख़्स को माँगा मुझे वही न मिला।
हमने ग़ज़लों की दुनिया के बेताज बादशाह मिर्जा ग़ालिब साहब को तो नहीं देखा लेकिन बशीर बद्र साहब को देखा है। और हम कह सकते हैं कि ग़ालिब की परंपरा के एक महान शायर का इस दुनिया से जाना ना सिर्फ ग़ज़ल की दुनिया की बड़ी क्षति है बल्कि इंसानियत की दुनिया को भी धक्का लगा है। तो अगली बार जब भी इश्क में, दर्द में, भावनाओं के असीम ज्वारभाटों में जब हमें शब्द ना मिलें तो बशीर बद्र साहब को याद करना वे जरूर अपनी झोली से कुछ अच्छे शेर आपके सुपुर्द करेंगे।
अलविदा बशीर बद्र साहब।


