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Bihar MLC Election: सिर्फ एक सीट और इतने पेंच! तेजस्वी के लिये क्यों सिरदर्द बन गया एमएलसी चुनाव
Bihar MLC Election: बिहार विधान परिषद की एक सीट के लिए राजद में गहरा मंथन जारी है। जानें क्यों शिवचंद्र राम, सुनील सिंह और ओवैसी के दांव के बीच यह चुनाव तेजस्वी यादव के लिए अग्निपरीक्षा बन गया है।
Tejashwi Yadav
Bihar MLC Election: बिहार में विधान परिषद चुनाव की सरगर्मी अपने चरम पर है। नामांकन की प्रक्रिया शुरू हुए कई दिन बीत चुके हैं, लेकिन राजद के खेमे में सन्नाटा पसरा है। यह सन्नाटा किसी कमजोरी का नहीं, बल्कि एक गहरे राजनीतिक मंथन का संकेत है। पार्टी के सामने इस समय सबसे बड़ा संकट विपक्ष से मुकाबला करना नहीं, बल्कि आंतरिक समीकरणों और सामाजिक प्राथमिकताओं के बीच एक बारीक संतुलन साधना है।
फिलहाल राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव सिंगापुर में स्वास्थ्य लाभ ले रहे हैं, जिसके कारण पटना में पूरी कमान तेजस्वी यादव के हाथों में है। विधान परिषद की इस इकलौती सीट के लिए सही चेहरे का चुनाव अब पूरी तरह तेजस्वी के विवेक पर निर्भर है।
दावेदारों की लंबी फेहरिस्त और बढ़ता सस्पेंस
पार्टी के भीतर एक अनार और सौ बीमार वाली स्थिति बनी हुई है। चर्चाओं के बाजार में कई दिग्गज नेताओं के नाम तैर रहे हैं। एक पक्ष का मानना है कि पार्टी को अपने उन पुराने सिपाहियों को तरजीह देनी चाहिए जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी संगठन का साथ नहीं छोड़ा।
सूत्रों की मानें तो पूर्व मंत्री शिवचंद्र राम का नाम इस दौड़ में सबसे आगे चल रहा है। दलित समुदाय से आने वाले शिवचंद्र राम को मैदान में उतारकर राजद 'ए-टू-जेड' की अपनी नई राजनीति और सामाजिक न्याय के संदेश को और पुख्ता कर सकती है। वहीं दूसरी ओर, निवर्तमान एमएलसी सुनील सिंह की दावेदारी भी उतनी ही मजबूत मानी जा रही है। संगठन में उनकी पकड़ और अनुभव को दरकिनार करना नेतृत्व के लिए एक बड़ी चुनौती होगी।
पारिवारिक साख और सांगठनिक निष्ठा की कसौटी
राजद के गलियारों में सबसे तीखी बहस इस बात पर है कि क्या पार्टी किसी पारिवारिक सदस्य को मौका देगी या फिर किसी जमीनी कार्यकर्ता पर भरोसा जताएगी। यह फैसला तेजस्वी यादव के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। उन्हें एक तरफ परिवार की उम्मीदों को देखना है, तो दूसरी तरफ कार्यकर्ताओं के मनोबल को ऊंचा रखना है। जानकारों का कहना है कि यहाँ तेजस्वी को भावनाओं के बजाय शुद्ध राजनीतिक नफे-नुकसान को तौलना होगा।
ओवैसी का दांव और महागठबंधन की पेचीदगियां
इस पूरी लड़ाई में एआईएमआईएम (AIMIM) की एंट्री ने मामले को और दिलचस्प बना दिया है। ओवैसी की पार्टी का दावा है कि पिछले राज्यसभा चुनावों के दौरान जो समर्थन उन्होंने महागठबंधन को दिया था, उसके बदले उन्हें राजनीतिक सहयोग का वादा मिला था। अब वे इसी आधार पर अपना हक मांग रहे हैं। हालांकि, अपनी सीमित सीटों में से एक सीट सहयोगी को देना राजद के लिए घाटे का सौदा साबित हो सकता है, क्योंकि इससे पार्टी के भीतर बगावत के सुर तेज होने का डर है।
विधान परिषद की यह एक सीट केवल एक सदन की सदस्यता भर नहीं है, बल्कि यह 2025 के विधानसभा चुनाव से पहले राजद के 'विजन' का ट्रेलर होगी। इस चयन से यह साफ हो जाएगा कि तेजस्वी यादव की प्राथमिकता क्या है सामाजिक संतुलन, पुराने वफादारों का सम्मान या फिर गठबंधन धर्म का पालन?
फिलहाल बिहार की सियासत में सबकी नजरें तेजस्वी यादव के कलम पर टिकी हैं। वे जिस नाम पर मुहर लगाएंगे, वह न केवल पार्टी की दिशा तय करेगा बल्कि नेतृत्व की नई शैली का भी परिचय देगा। यह देखना रोमांचक होगा कि इस राजनीतिक शतरंज की बिसात पर तेजस्वी का अगला मोहरा कौन होता है।


