Anant Singh Politics: अनंत सिंह मोकामा का 'डॉन’, जिसने बिहार चुनाव का केंद्रबिंदु बना दिया

Anant Singh Politics in Bihar: अनंत सिंह मोकामा के एक कुख्यात गैंगस्टर-राजनेता हैं, जो जेडीयू के विधायक भी रह चुके हैं।

Yogesh Mishra
Published on: 1 Nov 2025 12:34 PM IST (Updated on: 1 Nov 2025 3:24 PM IST)
Bihar Viral Leader Don Anant Singh Crime History Politics in Bihar Assembly Election 2025
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Bihar Viral Leader Don Anant Singh Crime History Politics in Bihar Assembly Election 2025

Anant Singh Politics in Bihar Election: 1980 और 1990 के दशक के बाहुबली दुलारचंद यादव की 30 अक्तूबर की दोपहर मोकामा में हत्या के बाद मोकामा विधानसभा क्षेत्र एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में आ गया है। दुलारचंद बिहार की राजनीति के दो सूरमाओं नीतीश कुमार और लालू यादव दोनों के ही क़रीबी रहे। इस हत्याकांड में अनंत कुमार सिंह पर प्राथमिकी दर्ज हुई है। दुलारचंद यादव जनसुराज के पीयूष प्रियदर्शी के समर्थन में प्रचार कर रहे थे जब उनकी हत्या हुई। इस सीट से अनंत सिंह चुनाव जीतते रहे हैं। इस हत्याकांड ने बिहार की राजनीति में बाहुबलियों के वर्चस्व को एक बार फिर साबित कर दिया है। यहां गौर करने की बात यह है कि साल 1990 से सिर्फ़ एक विधानसभा काल यानी 2000 के पांच साल को छोड़कर इस सीट पर बाहुबली अनंत सिंह के परिवार को कब्जा रहा है। इलाक़े में अनंत सिंह को 'छोटे सरकार' भी कहा जाता है। अनंत सिंह एक कुख्यात गैंगस्टर-राजनेता हैं, जो जेडीयू के विधायक भी रह चुके हैं। उनकी कहानी बिहार की अपराध और राजनीति की गहरी जड़ों को उजागर करती है।

पृष्ठभूमि: 'चाचा’ से विधायक तक का सफर

उदय: अनंत सिंह, जिन्हें ‘छोटे सरकार’ भी कहा जाता है, का राजनीतिक सफर जेडीयू के साथ जुड़ा रहा। वह 2005 और 2010 में मोकामा विधानसभा सीट से जेडीयू के टिकट पर विधायक चुने गए। 2015 में आईएनडी और 2020 में राजद के टिकट पर चुने गए लेकिन अदालत द्वारा दोषी करार दिये जाने के बाद उन्हें इस्तीफा देना पड़ा और उनकी जगह उनकी पत्नी निवार्चित हुईं।


आपराधिक इतिहास: अनंत सिंह के खिलाफ कई गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं, जिनमें हत्या, अपहरण, और बंदूक तस्करी जैसे आरोप शामिल हैं। इसके अलावा जमीन हड़पने के कई मामले भी उन पर दर्ज हैं। बाढ़ क्षेत्र विशेष रूप से बिहार की दो अगड़ी जातियों , भूमिहारों और राजपूतों के बीच जातीय युद्धों के लिए बदनाम रहा है । इस खतरनाक संघर्ष में वह अपने समुदाय के रॉबिनहुड के रूप में उभरे। आज भी हालात यह है कि क्षेत्र के लोग अपहरण या हत्या के डर से रात में बाहर जाने से परहेज करते हैं। यह बिहार में अपराध और राजनीति के गठजोड़ का एक क्लासिक उदाहरण है।

मुजफ्फरपुर स्थिति: मुजफ्फरपुर की राजनीति की बात करें तो इस क्षेत्र में अनंत सिंह का खुद का कोई वर्चस्व नहीं हैं लेकिन अपने बड़े भाई दिलीप सिंह के नाते उन्हें एक दबंग और प्रभावशाली शख्सियत के रूप में जाना जाता है। उनका नाम अक्सर स्थानीय अपराधिक घटनाओं और भूमि अतिक्रमण के मामलों में उछलता रहा है।

2025 के चुनाव में अनंत सिंह का नाम एक बार फिर राजनीतिक भय और आतंक के बल राजनीतिक समीकरणों पर प्रभाव डालने के लिए उछला है। इस समय तो वह जेल से बाहर हैं लेकिन जब वह जेल के अंदर थे तब भी यह माना जाने लगा था कि अनंत सिंह जेल से ही फोन के जरिए अपने इलाके की राजनीति को प्रभावित कर रहे हैं। उनके समर्थक और विरोधी दोनों ही उनकी राय और 'आदेश’ को गंभीरता से लेते थे। इसने चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल खड़े होने स्वाभाविक हैं। अनंत सिह का झुकाव किसी भी उम्मीदवार के लिए एक बड़ा फायदा या नुकसान हो सकता है, क्योंकि वह एक विशिष्ट वोट बैंक और डर के माध्यम से प्रभाव डाल सकते हैं।


राजनीतिक दलों की भूमिका और प्रतिक्रिया

जेडीयू: जेडीयू ने अनंत सिंह से औपचारिक रूप से दूरी बना ली थी। पार्टी नेता यह दावा करते थे कि उनका पार्टी से कोई लेना-देना नहीं रह गया है। हालांकि, विपक्ष लगातार यह सवाल उठाता रहा कि कैसे एक पूर्व जेडीयू विधायक इतना प्रभावशाली बना हुआ है। लेकिन अब अनंत सिंह के जदयू के टिकट पर चुनाव लड़ने से सारा खेल खुलकर सामने आ गया है। भाजपा, जेडीयू की सहयोगी होने के नाते, इस मुद्दे पर सफाई देने की कोशिश करती रही। उन्होंने भी अनंत सिंह से दूरी बनाई और कहा कि कानून अपना काम करेगा।


विपक्ष (राजद और कांग्रेस): विपक्ष के लिए, अनंत सिंह एक हथियार थे। तेजस्वी यादव और राहुल गांधी लगातार अनंत सिंह का उदाहरण देकर नीतीश कुमार की सरकार और एनडीए पर 'अपराधीकरण की राजनीति’ को बढ़ावा देने का आरोप लगाते रहे। उन्होंने कहा कि यह बिहार में 'जंगल राज’ वापसी का प्रतीक है।

चुनाव आयोग और प्रशासन की भूमिका

अनंत सिंह के मामले ने चुनाव आयोग और प्रशासनिक तंत्र की क्षमता और इच्छाशक्ति पर भी सवाल खड़े किए।

अनंत सिंह का चुनाव में उभरना कोई अलग घटना नहीं है, बल्कि यह बिहार की राजनीति में मौजूद एक सतत समस्या की ओर इशारा करता है।

1. अपराध और राजनीति का सिम्बायोसिस: अनंत सिंह का केस दिखाता है कि कैसे एक व्यक्ति अपराधिक पृष्ठभूमि का होते हुए भी राजनीतिक रूप से प्रासंगिक बना रह सकता है। उनका प्रभाव सीधे चुनाव लड़ने तक सीमित नहीं, बल्कि डर और भय के माध्यम से राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित करने तक है।

2. चुनावी नैरेटिव का हिस्सा: विपक्ष ने अनंत सिंह को 'जंगल राज’ की वापसी का प्रतीक बनाकर एनडीए सरकार पर प्रहार किया। इसने एनडीए को एक रक्षात्मक स्थिति में ला दिया।

3. सिस्टम की कमजोरी: यह घटना हमारी कानून व्यवस्था और जेल प्रणाली की कमजोरियों को भी दर्शाती है।

4. जनता के लिए संदेश: आम जनता के लिए, अनंत सिंह का नाम डर और अराजकता का प्रतीक है। उनकी उपस्थिति चुनावी प्रक्रिया में भय का तत्व घोलती है और लोकतंत्र की मूल भावना को कमजोर करती है।

अंततः, अनंत सिंह का प्रसंग बिहार के चुनाव की एक ऐसी कहानी है जो चुनाव के बाद भी खत्म नहीं हुई। यह एक स्थायी समस्या का प्रतीक है, जिससे निपटने के लिए न केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता है, बल्कि कानून व्यवस्था तंत्र में मौलिक सुधार की भी जरूरत है। जब तक बिहार की राजनीति से अपराध और भय का यह गठजोड़ पूरी तरह से खत्म नहीं हो जाता, तब तक अनंत सिंह जैसे चरित्र प्रासंगिक बने रहेंगे।

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