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BJP-Akali Alliance: पंजाब में फिर साथ आएंगे BJP-अकाली दल? AAP की बढ़ सकती है टेंशन
BJP-Akali Alliance: पंजाब में बीजेपी और शिरोमणि अकाली दल के बीच गठबंधन की चर्चाएं फिर तेज हो गई हैं। सीट बंटवारे और नेतृत्व की चुनौतियों के बावजूद दोनों दल 2027 विधानसभा चुनाव से पहले साथ आने की संभावनाएं तलाश रहे हैं, जबकि AAP ने इस पर सियासी हमला तेज कर दिया है।
BJP-Akali Alliance: पंजाब के सियासी गलियारों में एक बार फिर से पुराने सहयोगियों यानी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और शिरोमणि अकाली दल के बीच गठबंधन की सुगबुगाहट तेज हो गई है। हाल ही में सामने आई एक मीडिया रिपोर्ट ने इस बात के पुख्ता संकेत दिए हैं कि दोनों दलों के बीच सुलह के दरवाजे अभी पूरी तरह से बंद नहीं हुए हैं। इस नई चर्चा ने जहां राज्य के राजनीतिक पारे को चढ़ा दिया है, वहीं सत्ताधारी आम आदमी पार्टी (AAP) ने भी दोनों दलों पर अपने जुबानी हमले तेज कर दिए हैं।
बताया जा रहा है कि आगामी 20 से 22 जून तक बीजेपी अध्यक्ष पंजाब के दौरे पर रहने वाले हैं। इस दौरान वे कई अहम कार्यक्रमों में हिस्सा लेंगे और राज्य के आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर पार्टी की रणनीति पर मंथन करेंगे। वैसे, दोनों दलों के बीच दूरियां मिटाने की कोशिशें 2024 के लोकसभा चुनावों से पहले भी हुई थीं। उस वक्त गठबंधन की बातचीत लगभग तय मानी जा रही थी, लेकिन सीटों के बंटवारे पर आकर पेंच फंस गया। अकाली दल ने बीजेपी को 13 में से महज 3 सीटों का प्रस्ताव दिया था, जो भगवा दल को नामंजूर था और इसी वजह से बात बनते-बनते बिगड़ गई।
कैसे टूटा था दशकों पुराना 'हिंदू-सिख' गठजोड़?
पंजाब में बीजेपी और अकाली दल का साथ कोई एक-दो साल का नहीं, बल्कि दशकों पुराना रहा है। इसे हमेशा से राज्य में एक आदर्श 'हिंदू-सिख' गठबंधन के रूप में देखा जाता था। साल 2007 से लेकर 2017 तक इस गठबंधन ने लगातार पंजाब की सत्ता पर राज किया। हालांकि, 2017 के विधानसभा और फिर 2019 के लोकसभा चुनावों में इस गठबंधन को कुछ झटके जरूर लगे, फिर भी हरसिमरत कौर बादल को केंद्र सरकार के मंत्रिमंडल में जगह मिली।
असली दरार 2020 में आई, जब विवादित कृषि कानूनों के मुद्दे पर अकाली दल ने बीजेपी से अपनी पुरानी दोस्ती तोड़ ली और सरकार से बाहर आ गए। इसके बाद 2022 का विधानसभा चुनाव और 2024 का लोकसभा चुनाव दोनों ने अपनी-अपनी राह पर चलकर लड़ा।
आखिर क्यों एक-दूसरे की मजबूरी हैं दोनों दल?
पंजाब बीजेपी के कद्दावर नेता और पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह साफ कह चुके हैं कि अकाली दल के बिना बीजेपी के लिए 2027 तो दूर, 2032 में भी सरकार बनाना मुमकिन नहीं है। प्रदेश के दिग्गज नेता सुनील जाखड़ का भी यही मानना है। इन बयानों के पीछे राज्य का जमीनी सियासी गणित छिपा है।
दरअसल, बीजेपी पर मुख्य रूप से 'हिंदू पार्टी' होने का ठप्पा है, जबकि अकाली दल को 'सिख' समुदाय की नुमाइंदगी करने वाला माना जाता है। दोनों के अलग होने से हिंदू और सिख वोट बैंक बुरी तरह बंट गया, जिसका सीधा फायदा आम आदमी पार्टी को मिला। आज के हालात में अकाली दल का जमीनी कैडर तो मजबूत है, लेकिन पार्टी एक गंभीर नेतृत्व संकट से जूझ रही है। वहीं दूसरी तरफ, बीजेपी के पास पीएम मोदी के रूप में मजबूत केंद्रीय नेतृत्व और बड़े चेहरों की लंबी कतार तो है, लेकिन पंजाब में उनकी जमीनी पकड़ आज भी कमजोर है। दोनों दलों के अकेले चुनाव लड़ने से सत्ता उनसे कोसों दूर हो गई है, जिसके चलते उनके कार्यकर्ताओं का मनोबल भी काफी गिर चुका है।
अलग राहें चुनने का भारी चुनावी नुकसान
पंजाब की राजनीति का सिरमौर रहा अकाली दल 2017 से ही ढलान पर है, जब वे महज 15 सीटों पर सिमट गए थे। रही-सही कसर 2022 के विधानसभा चुनावों ने पूरी कर दी। इस चुनाव में गठबंधन टूटने का सबसे भयानक असर दिखा। बीजेपी केवल 2 सीटों पर अटक गई और अकाली दल सिर्फ 3 सीटें ही जीत सका। यह अकाली दल के इतिहास की सबसे करारी हार थी, जहां सियासत के दिग्गज प्रकाश सिंह बादल और पार्टी अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल जैसे दिग्गज भी अपना किला नहीं बचा सके।
वोट शेयर के मामले में भी अकाली दल 2017 के मुकाबले करीब 7 फीसदी लुढ़ककर 18.38 प्रतिशत पर आ गया। वहीं, कांग्रेस से कई बड़े नेताओं को तोड़ने और पूरी ताकत झोंकने के बावजूद बीजेपी महज 6.6 फीसदी वोट ही हासिल कर सकी, जो पिछले चुनाव से बस थोड़ा ही ज्यादा था।
सुलह की राह में कौन सी हैं बड़ी मुश्किलें?
भले ही दोनों दलों को एक-दूसरे की जरूरत हो, लेकिन राह इतनी आसान नहीं है। अपने पिछले पंजाब दौरे पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने स्पष्ट कर दिया था कि पार्टी अपने दम पर मैदान में उतरेगी। बीजेपी ने अपनी रणनीति बदलते हुए हरियाणा के पूर्व सीएम (एक ओबीसी चेहरा) को मैदान में उतारकर और पंजाब में एक जट्ट सिख को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर यह संदेश दे दिया है कि वे अब सिख और पिछड़े वोटों के लिए पूरी तरह अकाली दल के मोहताज नहीं हैं।
गठबंधन में सबसे बड़ी अड़चन शर्तों की है। अकाली दल फिर से 2017 से पहले वाले फॉर्मूले पर गठबंधन चाहता है, लेकिन बीजेपी का मानना है कि अब उसका कद बढ़ चुका है। साफ शब्दों में कहें तो बीजेपी अब पंजाब में किसी भी सूरत में 'जूनियर पार्टनर' बनकर नहीं रहना चाहती।
पांच दशकों तक रहे साथ
शिरोमणि अकाली दल को बीजेपी का सबसे पुराना और वफादार साथी माना जाता था। इनकी राजनीतिक दोस्ती 1969 में शुरू हुई थी, जब जनसंघ ने अकाली सरकार को बाहर से समर्थन दिया था। 1992 तक दोनों दल चुनाव अलग लड़ते थे लेकिन नतीजों के बाद साथ आ जाते थे। 1994 तक अकाली दल सिर्फ सिखों की पार्टी थी, लेकिन इसके बाद उन्होंने अन्य धर्मों के लिए भी अपने दरवाजे खोले।
साल 1997 से दोनों ने बाकायदा एक साथ मिलकर चुनाव लड़ना शुरू किया और पंजाब में एक बेहद कामयाब राजनीतिक पारी खेली। यह ऐतिहासिक सफर 2020 में किसान कानूनों के कड़े विरोध के साथ थम गया। अलग होने के बाद अकाली दल ने बहुजन समाज पार्टी के साथ मिलकर भी चुनावी नैया पार लगाने की कोशिश की, लेकिन यह नया प्रयोग पूरी तरह असफल रहा। आज हालात ऐसे हैं कि दोनों ही पार्टियों के भीतर दबी जुबान में एक साथ आने की मांग उठने लगी है, लेकिन यह तय है कि गठबंधन पर आखिरी मुहर दोनों दलों का आलाकमान ही लगाएगा।


