BJP के मिशन पंजाब में ये 5 बड़े रोड़े! इन चक्रव्यूह में फंसी भाजपा, क्या 2027 में टूटेगा हार का तिलस्म?

पश्चिम बंगाल के बाद अब पंजाब भी उन चुनिंदा राज्यों में शामिल है जहां बीजेपी की सरकार नहीं है। पार्टी यहां अपना आधार बढ़ाने की कोशिश कर रही है, लेकिन कुछ मुद्दे उसकी राह में बाधा बन रहे हैं।

Shivam
Published on: 6 May 2026 3:30 PM IST (Updated on: 6 May 2026 3:30 PM IST)
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भारतीय जनता पार्टी इस समय देश के राजनीतिक मानचित्र पर सबसे प्रभावशाली शक्ति बनकर उभरी है। उत्तर भारत के लगभग सभी प्रमुख राज्यों में अपनी पैठ जमाने और हाल ही में पश्चिम बंगाल में ऐतिहासिक जीत दर्ज कर अपनी सरकार बनाने का सपना पूरा करने के बाद अब भाजपा का पूरा ध्यान पंजाब पर केंद्रित हो गया है। बंगाल में मिली बड़ी सफलता ने पार्टी के कार्यकर्ताओं में नया उत्साह भर दिया है और अब भाजपा नेतृत्व जल्द ही पंजाब में भी इसी तरह के करिश्मे की उम्मीद लगाए बैठा है। हालांकि, पंजाब की सियासी जमीन भाजपा के लिए उतनी आसान नहीं रही है जितनी कि अन्य हिंदी भाषी राज्यों में रही है।

पंजाब में भाजपा की मौजूदा स्थिति को देखें तो पार्टी अभी भी सिर्फ दो विधायकों के साथ संघर्ष कर रही है। दशकों तक शिरोमणि अकाली दल के साथ 'छोटे भाई' की भूमिका में रहने वाली भाजपा ने साल 2020 में कृषि कानूनों के विवाद के बाद गठबंधन टूटने पर अपनी राहें अलग कर ली थीं। गठबंधन से अलग होने के बाद भाजपा ने विधानसभा और लोकसभा चुनाव अपने दम पर लड़े। विधानसभा चुनाव में पार्टी को महज 6.6 प्रतिशत वोट मिले, लेकिन लोकसभा चुनावों में पार्टी ने अकेले लड़कर 18.56 प्रतिशत वोट हासिल किए। भले ही भाजपा कोई सीट नहीं जीत सकी, लेकिन वह पंजाब में तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर जरूर उभरी है, जो राज्य की बदलती राजनीति का संकेत है।

किसानों की नाराजगी और विश्वास की बहाली

पंजाब की राजनीति की धुरी हमेशा से किसानी और खेती के इर्द-गिर्द घूमती रही है। तीन कृषि कानूनों के खिलाफ हुए लंबे आंदोलन ने पंजाब के ग्रामीण इलाकों में भाजपा की छवि को खासा प्रभावित किया है। दिल्ली की सीमाओं पर महीनों तक बैठे किसानों और सरकार के बीच जो गतिरोध पैदा हुआ, उसने भाजपा के खिलाफ एक अविश्वास की भावना पैदा कर दी। हालांकि केंद्र सरकार ने बाद में इन कानूनों को वापस ले लिया, लेकिन ग्रामीण पंजाब में पार्टी को लेकर आज भी कड़ा विरोध देखने को मिलता है। भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती अब इस छवि को सुधारने और किसानों के बीच अपनी विश्वसनीयता बहाल करने की है।

क्षेत्रीय पहचान और संवेदनशील मुद्दे

पंजाब की राजनीति में केवल चुनावी गणित ही नहीं, बल्कि क्षेत्रीय पहचान और अस्मिता से जुड़े मुद्दे भी बेहद संवेदनशील रहे हैं। चंडीगढ़ पर अधिकार का मामला हो या पंजाब यूनिवर्सिटी के प्रशासनिक ढांचे में बदलाव की कोशिश, इन मुद्दों ने स्थानीय स्तर पर भाजपा की राह मुश्किल की है। चंडीगढ़ में प्रशासक के रूप में एलजी की नियुक्ति के प्रस्ताव और पंजाब यूनिवर्सिटी को केंद्रीय विश्वविद्यालय बनाने की अटकलों ने राज्य के युवाओं और राजनीतिक दलों को लामबंद कर दिया है। इसके अलावा, नदियों के पानी का मुद्दा भी पंजाबियों के लिए एक भावनात्मक पहलू है, जहाँ भाजपा को अक्सर पंजाब विरोधी धारणा का सामना करना पड़ता है।

एक बड़ी बाधा भाजपा की 'हिंदू पार्टी' वाली छवि भी रही है। पंजाब एक सिख बहुल राज्य है और यहाँ की राजनीति में पंथक मुद्दों का गहरा प्रभाव है। अब तक भाजपा शहरी हिंदू वोट बैंक तक सीमित रही है, लेकिन बंगाल में अपनी रणनीति बदलने वाली भाजपा अब पंजाब में भी सिखों और ग्रामीण वर्गों को साधने की पुरजोर कोशिश कर रही है।

2027 का रोडमैप और बदलती रणनीति

आगामी 2027 के विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए भाजपा ने अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। पार्टी अब केवल शहरी क्षेत्रों तक सीमित न रहकर सिखों और दलितों के बीच अपनी पैठ बढ़ा रही है। हाल के दिनों में शिरोमणि अकाली दल और कांग्रेस के कई दिग्गज सिख नेताओं ने भाजपा का दामन थामा है, जिससे पार्टी की संगठन शक्ति को बल मिला है। भाजपा अब खुद को सिख धर्म और उसकी परंपराओं के सबसे बड़े रक्षक के रूप में पेश करने की कोशिश कर रही है। बंगाल में जीत के बाद भाजपा के शीर्ष नेतृत्व का मानना है कि यदि सही सामाजिक समीकरण बिठाए जाएं, तो पंजाब की सत्ता पर काबिज होना नामुमकिन नहीं है।

पंजाब की सियासत इस समय एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। जहाँ पारंपरिक दल कमजोर हुए हैं, वहीं भाजपा खुद को एक सशक्त विकल्प के रूप में स्थापित करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या भाजपा बंगाल वाला करिश्मा पंजाब की धरती पर दोहरा पाएगी।

Shivam

Shivam

Shivam is a multimedia journalist.

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