BJP Vs Nihang Sikhs: बीजेपी के लिए कैसे बड़ी मुश्किल बन गए हैं निहंग सिख

JP Vs Nihang Sikhs: कर्णप्रयाग में निहंग सिखों और स्थानीय लोगों के बीच हुआ विवाद अब बीजेपी के लिए बड़ा राजनीतिक संकट बन गया है। उत्तराखंड और पंजाब विधानसभा चुनावों से पहले यह मामला कानून-व्यवस्था से आगे बढ़कर वोट बैंक की राजनीति का केंद्र बन गया है।

Shivam Shrivastava
Published on: 26 Jun 2026 3:21 PM IST
BJP Vs Nihang Sikhs:  बीजेपी के लिए कैसे बड़ी मुश्किल बन गए हैं निहंग सिख
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BJP Vs Nihang Sikhs: देवभूमि उत्तराखंड के कर्णप्रयाग में शुरू हुआ एक मामूली सा विवाद अब भारतीय जनता पार्टी के लिए एक बड़ा सियासी सिरदर्द बन चुका है। दरअसल, निहंग सिखों और स्थानीय लोगों के बीच हुई यह झड़प सिर्फ कानून-व्यवस्था का मसला नहीं रह गई है, बल्कि इसका सीधा असर आने वाले विधानसभा चुनावों पर पड़ने वाला है।

पंजाब और उत्तराखंड दोनों ही राज्यों में चुनाव करीब हैं। चूंकि उत्तराखंड में बीजेपी सत्ता में है, इसलिए इस पूरे विवाद को सुलझाने और सियासी नुकसान से बचने की सबसे बड़ी चुनौती उसी के कंधों पर है। श्री हेमकुंड साहिब यात्रा के चलते इस वक्त हजारों श्रद्धालु और निहंग सिखों के जत्थे उत्तराखंड पहुंच रहे हैं, जिससे यह पूरा मामला और भी ज्यादा संवेदनशील हो गया है।

कर्णप्रयाग का वो झगड़ा जिसने पकड़ा तूल

इस पूरे बवाल की जड़ में 16 जून की एक घटना है। कर्णप्रयाग के मुख्य बाजार में पार्किंग को लेकर स्थानीय निवासियों और निहंग सिखों के बीच मामूली कहासुनी हो गई थी, जिसने देखते ही देखते हिंसक रूप ले लिया।

आरोप है कि निहंग सिखों ने अपनी तलवारें निकाल लीं, जिससे चार स्थानीय लोग बुरी तरह घायल हो गए। इस घटना के बाद उत्तराखंड पुलिस ने तुरंत एक्शन लिया और एफआईआर दर्ज करते हुए पंजाब के मोहाली से ताल्लुक रखने वाले चार निहंग सिखों को गिरफ्तार कर लिया।

गुरुद्वारे पर चढ़ा पारा और बढ़ता गतिरोध

गिरफ्तारी की खबर जैसे ही फैली, निहंग सिख भड़क उठे। अपने साथियों को छुड़ाने की जिद में उन्होंने रुद्रप्रयाग जिले के नगरासू स्थित एक गुरुद्वारे पर डेरा डाल दिया। हालात इतने तनावपूर्ण हो गए कि निहंग सिख पूरे चार दिन तक गुरुद्वारे की छत पर चढ़े रहे। पुलिस और स्थानीय प्रशासन को उन्हें नीचे उतारने और शांत करने में भारी मशक्कत का सामना करना पड़ा।

मामला यहीं नहीं रुका। इस घटनाक्रम के बाद पंजाब से निहंग सिखों का एक और जत्था उत्तराखंड की तरफ कूच कर गया और पुलिस की तमाम बैरिकेडिंग को धता बताते हुए जबरन राज्य की सीमा में दाखिल हो गया।

उनकी बस एक ही मांग है कि गिरफ्तार किए गए उनके सभी साथियों को बिना शर्त रिहा किया जाए। इस बीच पंजाब के कई बड़े सिख संगठनों ने भी इस मुद्दे को लपक लिया है और सीधे उत्तराखंड के डीजीपी से मुलाकात कर दबाव बनाना शुरू कर दिया है।

पहाड़ के लोगों में सुलगता आक्रोश

एक तरफ सिख संगठन दबाव बना रहे हैं, तो दूसरी तरफ उत्तराखंड के स्थानीय लोगों में भी भारी गुस्सा है। पहाड़ के लोगों का सीधा आरोप है कि निहंग सिखों ने अभद्र और आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल करके उनके स्वाभिमान और पहचान को ठेस पहुंचाई है। उत्तराखंड क्रांति दल जैसे क्षेत्रीय दलों ने इस मुद्दे को हाथों-हाथ लिया है और सरकार से सख्त कार्रवाई की मांग की है।

सोशल मीडिया पर भी दोनों तरफ से वीडियो युद्ध छिड़ा हुआ है, जिससे माहौल और गर्म हो गया है। स्थानीय जनता इस बात से भी खासी खफा है कि चार दिन तक गुरुद्वारे में बवाल काटने वाले निहंगों पर कोई सख्त एक्शन लेने के बजाय उन्हें आराम से पंजाब वापस जाने दिया गया। हालांकि, राज्य सरकार लगातार यह दावा कर रही है कि वह किसी के दबाव में नहीं आएगी और कार्रवाई पूरी तरह से कानून के दायरे में ही होगी।

पंजाब जीतने के मिशन पर लटकी तलवार

इस पूरे विवाद ने बीजेपी को एक बेहद अजीब स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया है। पंजाब में सिख समुदाय की आबादी करीब 58 से 60 प्रतिशत है और यह वर्ग राजनीतिक रूप से वहां की सबसे बड़ी ताकत है। बीजेपी इस बार पंजाब की सभी 117 विधानसभा सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने जा रही है और उसने वहां एक मजबूत सोशल इंजीनियरिंग का ताना-बाना बुना है।

दिल्ली और पश्चिम बंगाल के बाद पार्टी का पूरा फोकस अब पंजाब पर है। जट सिख समुदाय को साधने के लिए केवल सिंह ढिल्लों को अहम जिम्मेदारी दी गई है, रवनीत सिंह बिट्टू को मोदी कैबिनेट में जगह मिली है और हिंदू चेहरों में तरुण चुघ को राज्यसभा भेजा गया है। इसके अलावा हरियाणा के सीएम नायब सिंह सैनी लगातार पंजाब के दौरे कर रहे हैं और खुद अमित शाह पूरी चुनावी रणनीति पर नजर रखे हुए हैं। पार्टी जानती है कि सरकार बनाना भले ही मुश्किल हो, लेकिन वह खुद को एक मजबूत विकल्प के तौर पर स्थापित करना चाहती है। अब इस निहंग विवाद से पंजाब के सिखों में जो नाराजगी पनप रही है, वह बीजेपी के इस पूरे मिशन पर पानी फेर सकती है।

आगे कुआं पीछे खाई वाली स्थिति

संकट सिर्फ पंजाब तक सीमित नहीं है, उत्तराखंड का अपना सियासी समीकरण भी बीजेपी की नींद उड़ाए हुए है। उत्तराखंड के तराई क्षेत्रों, खासकर उधम सिंह नगर जिले के रुद्रपुर, काशीपुर, गदरपुर और देहरादून के मैदानी इलाकों में सिख मतदाता किसी भी उम्मीदवार की जीत-हार तय करने का माद्दा रखते हैं।

अगर बीजेपी की राज्य सरकार पंजाब के दबाव में आकर गिरफ्तार निहंगों को छोड़ देती है, तो उसे उत्तराखंड के अपने कोर वोटर्स यानी पहाड़ी जनता के भयंकर आक्रोश का सामना करना पड़ेगा। वहीं, अगर वह सख्त रवैया अपनाती है, तो पंजाब में पार्टी की जड़ें जमाने की सारी कोशिशें धरी की धरी रह जाएंगी।

यह पूरी तरह से एक 'आगे कुआं, पीछे खाई' वाली स्थिति है। अब यह देखना वाकई दिलचस्प होगा कि बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व इस संवेदनशील और वोट बैंक से जुड़े हाई-वोल्टेज ड्रामे को शांत करने के लिए बीच का कौन सा रास्ता निकालता है।

Shivam Shrivastava
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Shivam Shrivastava

शिवम उत्तर प्रदेश के एक युवा और उभरते पत्रकार हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में लगभग 4 वर्षों का अनुभव प्राप्त है। वे राजनीति, अपराध, स्वास्थ्य और हाइपरलोकल खबरों की गहरी समझ रखते हैं और समसामयिक मुद्दों पर सटीक व प्रभावशाली रिपोर्टिंग के लिए जाने जाते हैं। उनकी विशेष रुचि डाटा-ड्रिवन पत्रकारिता और विश्लेषणात्मक रिपोर्टिंग में है, जिससे उनकी खबरें अधिक तथ्यात्मक और विश्वसनीय बनती हैं। वे जमीनी स्तर की रिपोर्टिंग के साथ-साथ डिजिटल मीडिया के बदलते स्वरूप को भी समझते हैं। लेखन और रिसर्च में उनकी मजबूत पकड़ उन्हें एक सक्षम और जिम्मेदार पत्रकार के रूप में स्थापित करती है।

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