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Bofors Scandal Explained: बोफोर्स कांड क्या था? एक तोप सौदा जिसने भारतीय राजनीति की दिशा बदल दी
Bofors Scandal Case Explained: बोफोर्स कांड क्या था? जानिए 1986 के तोप सौदे, कथित दलाली, राजीव गांधी, वीपी सिंह, क्वात्रोची, CBI जांच, अदालतों के फैसलों और इसके राजनीतिक प्रभाव की पूरी कहानी।
Bofors Scandal Case Explained in Hindi
Bofors Scandal Case Explained: भारतीय राजनीतिक इतिहास में बहुत कम ऐसे मामले हुए हैं जिनमें किसी रक्षा सौदे से जुड़ा भ्रष्टाचार का आरोप इतना व्यापक राजनीतिक प्रतीक बन गया हो कि उसने एक लोकप्रिय प्रधानमंत्री की ईमानदार छवि को गहरी चोट पहुँचाई। यही नहीं, सरकार बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, पत्रकारिता को नई ताकत दी, संसद से लेकर स्वीडन और स्विट्जरलैंड तक जांच चलवाई। लगभग तीन दशकों तक अदालतों में मुकदमे घुमाए और फिर भी अंततः किसी प्रमुख आरोपी को भारत में भ्रष्टाचार के अपराध में सजा न हो सकी। बोफोर्स मामला इसी विरोधाभास का नाम है। इस कांड को समझने के लिए दो बातें शुरू में ही अलग कर लेना आवश्यक हैं। पहली, भारतीय सेना द्वारा खरीदी गई बोफोर्स FH-77B 155 मिलीमीटर होवित्जर तोप स्वयं एक खराब हथियार सिद्ध नहीं हुई। इसके विपरीत 1999 के कारगिल युद्ध में इसी तोप ने ऊँची पहाड़ियों पर पाकिस्तानी ठिकानों को निशाना बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और भारतीय सेना में इसकी युद्धक्षमता की व्यापक प्रशंसा हुई। दूसरी बात यह कि विवाद तोप की सैन्य गुणवत्ता से अधिक उसके खरीद सौदे के दौरान कथित दलाली और गुप्त भुगतान पर था। इसलिए ‘बोफोर्स घोटाला’ कहने का अर्थ यह नहीं कि भारत ने बेकार तोपें खरीदीं। मूल आरोप यह था कि अच्छी या उपयुक्त मानी गई तोपों के सौदे को हासिल करने के लिए स्वीडिश कंपनी AB Bofors ने ऐसे मध्यस्थों और कंपनियों को करोड़ों रुपये के गुप्त भुगतान किए, जबकि भारत सरकार की घोषित शर्त थी कि इस रक्षा खरीद में कोई एजेंट या बिचौलिया नहीं होगा। यही अंतर पूरे मामले को समझने की कुंजी है।
क्यों बड़ी तोप की जरूरत महसूस हुई?
भारत को 1970 के दशक के उत्तरार्ध और 1980 के दशक की शुरुआत में आधुनिक 155 मिलीमीटर फील्ड आर्टिलरी की आवश्यकता महसूस हुई। सेना के पुराने तोपखाने को आधुनिक बनाना था और पाकिस्तान सहित क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों को देखते हुए ऐसी तोप चाहिए थी जिसकी मारक क्षमता अधिक हो, जो तेजी से गोले दाग सके और जवाबी दुश्मन फायर से बचने के लिए स्थान बदल सके। कई विदेशी कंपनियों की तोपों का परीक्षण हुआ और अंततः स्वीडन की AB Bofors की FH-77B तोप भारतीय सेना की तकनीकी पसंद के रूप में उभरी।
24 मार्च, 1986 को भारत सरकार और AB Bofors के बीच लगभग 1,437 करोड़ का करार हुआ, जिसके अंतर्गत 410 155 मिमी होवित्जर तोपें और संबंधित तकनीकी सहायता खरीदी जानी थी। कुछ स्रोत सौदे का मूल्य उस समय लगभग 285 मिलियन अमेरिकी डॉलर बताते हैं। बाद में दिल्ली उच्च न्यायालय ने भी अपने 2004 के फैसले में यह माना कि सेना की तकनीकी राय बोफोर्स के पक्ष में थी और विशेष रूप से उसकी ‘शूट एंड स्कूट’सक्षमता यानी गोले दागकर जल्दी स्थान बदलने की योग्यता महत्वपूर्ण थी। इसलिए इस विवाद की एक बुनियादी बात यह है कि भ्रष्टाचार के आरोप और हथियार की गुणवत्ता दो अलग प्रश्न थे। अदालत ने यह निष्कर्ष नहीं निकाला कि कोई कमतर तोप केवल रिश्वत के कारण चुनी गई थी।
जब एक खबर ने मचा दिया तहलका
सौदा होने के लगभग तेरह महीने बाद, 16 अप्रैल, 1987 को स्वीडिश रेडियो ने वह खबर प्रसारित की जिसने भारतीय राजनीति को हिला दिया। प्रसारण में आरोप लगाया गया कि बोफोर्स ने भारतीय सौदा हासिल करने के लिए भारत में प्रभावशाली लोगों और अधिकारियों तक पहुँच रखने वाले मध्यस्थों को गुप्त भुगतान किए थे। बाद में स्वीडन में हुई जांच और दस्तावेजों ने यह दिखाया कि बोफोर्स ने विभिन्न विदेशी खातों और कंपनियों को बड़ी रकम दी थी। स्वीडिश रेडियो के खुलासे के पीछे बाद में Sten Lindström नामक स्वीडिश पुलिस अधिकारी की महत्वपूर्ण भूमिका सामने आई, जिन्होंने वर्षों बाद स्वीकार किया कि उन्होंने जांच से जुड़े सैकड़ों दस्तावेज भारतीय पत्रकार चित्रा सुब्रमण्यम को उपलब्ध कराए थे, क्योंकि उन्हें विश्वास नहीं था कि सरकारी तंत्र मामले की तह तक जाएगा।
स्वीडिश रेडियो ने 2012 में Lindström की भूमिका को सार्वजनिक रूप से दर्ज किया और बताया कि उन्होंने 350 से अधिक दस्तावेज लीक किए थे। भारत में इस कहानी को आगे बढ़ाने में पत्रकार चित्रा सुब्रमण्यम और एन. राम की भूमिका ऐतिहासिक रही।’ द हिंदू ‘ ने स्विस बैंक खातों, कंपनियों के नाम, भुगतान समझौतों और बोफोर्स अधिकारियों के पत्राचार से जुड़े दस्तावेज प्रकाशित किए। बाद में यह पत्रकारिता ‘ इंडियन एक्सप्रेस’ और अन्य अखबारों तक भी पहुँची। बोफोर्स इसलिए केवल एक भ्रष्टाचार जांच नहीं था। उसने भारतीय खोजी पत्रकारिता की शक्ति को भी नई पहचान दी।
राजीव गाँधी थे प्रधानमंत्री
उस समय प्रधानमंत्री राजीव गांधी थे। 1984 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस ने ऐतिहासिक बहुमत प्राप्त किया था। राजीव गांधी भारतीय राजनीति में आधुनिकता, कंप्यूटर, नई पीढ़ी और अपेक्षाकृत स्वच्छ प्रशासन के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किए जाते थे। इसलिए बोफोर्स का राजनीतिक प्रभाव किसी सामान्य सरकार पर लगे भ्रष्टाचार आरोप से कहीं अधिक था। 20 अप्रैल, 1987 को राजीव गांधी ने लोकसभा में कहा कि सौदे में कोई मध्यस्थ नहीं था और कोई रिश्वत नहीं दी गई थी।
बाद की जांच में समस्या यहीं से गहरी हुई, क्योंकि यह सामने आया कि बोफोर्स ने कुछ विदेशी कंपनियों और व्यक्तियों को भुगतान अवश्य किए थे। इसलिए भले ही राजीव गांधी को व्यक्तिगत रूप से धन मिलने का प्रमाण अदालत में स्थापित नहीं हुआ, सरकार की प्रारंभिक पूर्ण अस्वीकृति बाद में राजनीतिक रूप से कमजोर पड़ी। विपक्ष ने इसी अंतर को ‘कवर-अप’ के आरोप में बदल दिया, यदि पैसा गया था तो सरकार ने पहले क्यों कहा कि कोई भुगतान नहीं हुआ, किसे भुगतान हुआ और सरकार उसकी पहचान सार्वजनिक कराने में इतनी धीमी क्यों रही? राजीव गांधी की व्यक्तिगत आपराधिक संलिप्तता साबित करने और उनकी सरकार द्वारा मामले को राजनीतिक रूप से ठीक से न संभाल पाने के बीच यही वह अंतर है जो बोफोर्स के राजनीतिक इतिहास में अक्सर धुंधला हो जाता है।
संयुक्त संसदीय समिति की जांच
विवाद बढ़ने पर सरकार ने संयुक्त संसदीय समिति बनाई। अगस्त 1987 में बी. शंकरानंद की अध्यक्षता में JPC गठित हुई। विपक्ष ने इसकी संरचना पर आपत्ति की और आरोप लगाया कि कांग्रेस बहुमत वाली समिति निष्पक्ष जांच नहीं कर सकती। समिति ने उपलब्ध दस्तावेजों और सरकारी जानकारी के आधार पर जांच की और अप्रैल 1988 में रिपोर्ट दी। उसका निष्कर्ष था कि उपलब्ध प्रमाणों से यह स्थापित नहीं होता कि बोफोर्स द्वारा कुल 319.4 मिलियन स्वीडिश क्रोनर के भुगतान ने किसी भारतीय कानून का उल्लंघन किया था। उसने यह भी कहा कि किसी मध्यस्थ की भूमिका या रिश्वत दिए जाने का पर्याप्त प्रमाण उसके सामने नहीं था। लेकिन बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने W.N. Chadha मामले में इस JPC रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए यह भी नोट किया कि समिति को पूरी सामग्री नहीं मिल सकी थी और बोफोर्स ने भी सभी संबंधित दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए थे। इसलिए JPC की रिपोर्ट ने विवाद समाप्त नहीं किया। विपक्ष ने इसे सरकार को बचाने वाली रिपोर्ट कहा और नए विदेशी दस्तावेज सामने आने के बाद इसकी विश्वसनीयता राजनीतिक रूप से लगातार चुनौती के घेरे में रही।
सीएजी और सीबीआई जाँच
इसी समय नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी CAG ने भी रक्षा सौदे की प्रक्रिया की जांच की। बोफोर्स विवाद का बड़ा हिस्सा केवल ‘किस खाते में पैसा गया’ तक सीमित नहीं था।यह भी पूछा गया कि खरीद प्रक्रिया में निर्णय कितनी तेजी से हुआ। दूसरे प्रतिस्पर्धी प्रस्तावों की तुलना कैसे हुई और कथित एजेंटों को भुगतान क्यों किया गया जबकि सरकार की नीति बिचौलियों से बचने की थी।
1990 में सत्ता परिवर्तन के बाद CBI ने औपचारिक आपराधिक जांच शुरू की। 22 जनवरी, 1990 को प्राथमिकी दर्ज की गई, जिसमें तत्कालीन बोफोर्स प्रमुख Martin Ardbo, कथित एजेंट विन चड्ढा और हिंदुजा बंधुओं सहित अन्य लोगों पर आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी और जालसाजी जैसे आरोपों की जांच शुरू हुई। बाद में इसमें इतालवी कारोबारी Ottavio Quattrocchi प्रमुख नाम बनकर उभरे।
वीपी सिंह की भूमिका
बोफोर्स कांड के राजनीतिक विस्फोट में विश्वनाथ प्रताप सिंह की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण थी। वी.पी. सिंह राजीव गांधी सरकार में पहले वित्त मंत्री और बाद में रक्षा मंत्री रहे थे। वित्त मंत्री के रूप में वे कर चोरी और विदेशी खातों के खिलाफ कार्रवाई के कारण लोकप्रिय हो रहे थे। बाद में रक्षा मंत्रालय में आने के बाद रक्षा खरीद से जुड़े प्रश्नों पर उनका सरकार से टकराव बढ़ा। यह कहना सरल होगा कि बोफोर्स का मूल खुलासा वी.पी. सिंह ने किया लेकिन वास्तविक प्रारंभिक खुलासा स्वीडिश रेडियो और बाद में खोजी पत्रकारिता से हुआ था फिर भी वी.पी. सिंह ने उस मुद्दे को भारतीय राजनीति के सबसे शक्तिशाली भ्रष्टाचार-विरोधी अभियान में बदल दिया। राजीव गांधी से उनका अलगाव हुआ, वे सरकार से बाहर आए और धीरे-धीरे विपक्षी राजनीति के केंद्र बन गए। ‘राजा नहीं फकीर है, देश की तकदीर है’ जैसे नारों के साथ उनकी ईमानदार छवि को राजीव गांधी की कथित बोफोर्स छवि के सामने रखा गया। 1989 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का बहुमत समाप्त हो गया। वी.पी. सिंह के नेतृत्व में जनता दल की सरकार बनी। यह कहना अतिशयोक्ति होगा कि कांग्रेस केवल बोफोर्स के कारण हारी। क्योंकि उस समय पंजाब, श्रीलंका, सामाजिक समीकरण और सरकार-विरोधी अन्य कारक भी थे। लेकिन इतिहासकारों और राजनीतिक विश्लेषकों में व्यापक सहमति है कि बोफोर्स ने राजीव गांधी की सबसे बड़ी राजनीतिक पूँजी, उनकी व्यक्तिगत स्वच्छ और आधुनिक छवि, को गहरी क्षति पहुँचाई।
इतालवी कारोबारी की भूमिका
बोफोर्स आरोपों में सबसे चर्चित नाम Ottavio Quattrocchi का था। वे इतालवी इंजीनियर और कारोबारी थे तथा भारत में इतालवी कंपनी Snamprogetti से जुड़े थे। गांधी परिवार के सामाजिक परिचय के कारण उनका नाम राजनीतिक रूप से अत्यंत संवेदनशील बन गया। आरोप था कि बोफोर्स से जुड़ी रकम उनकी नियंत्रित कंपनी एई सर्विसेज के माध्यम से पहुँची। सीबीआई ने 1999 में दाखिल आरोपपत्र में क्वात्रोची को प्रमुख आरोपी बनाया। लेकिन यह तथ्य अलग रखना आवश्यक है कि क्वात्रोची पर आरोप गंभीर थे और उनके खातों तक धन का निशान जांच एजेंसियों ने खोजा, किंतु उन्हें भारत में कभी अदालत के सामने पूर्ण मुकदमे का सामना नहीं करना पड़ा और इसलिए उन पर आरोप न्यायिक परीक्षण में दोषसिद्धि तक नहीं पहुँचे। जुलाई 1993 में वे भारत छोड़कर चले गए। उनके खिलाफ रेड कॉर्नर नोटिस जारी हुआ। मलेशिया और बाद में अर्जेंटीना से प्रत्यर्पण की कोशिश हुई।लेकिन भारत उन्हें वापस नहीं ला सका। 2007 में अर्जेंटीना में उन्हें हिरासत में लिया गया। लेकिन भारतीय प्रत्यर्पण प्रयास सफल नहीं हुआ। अंततः सीबीआई ने 2009 में कहा कि आगे मुकदमा चलाना व्यावहारिक रूप से उचित नहीं है और 4 मार्च, 2011 को दिल्ली की अदालत ने उसके खिलाफ मामला वापस लेने की अनुमति दे दी। अदालत ने वर्षों के खर्च और प्रत्यर्पण विफलताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि जब मुकदमे को तार्किक निष्कर्ष तक पहुँचाना संभव नहीं दिखता तो उसे अनंत समय तक जारी रखना उचित नहीं। क्वात्रोची की 2013 में इटली में मृत्यु हो गई।
क्वात्रोची प्रकरण की सबसे राजनीतिक रूप से विस्फोटक घटनाओं में से एक उनके लंदन बैंक खातों का खुलना था। ब्रिटेन में उनके दो खाते, जिनमें लगभग 3 मिलियन यूरो और 1 मिलियन डॉलर थे, 2003 में भारतीय अनुरोध पर फ्रीज किए गए थे। लेकिन दिसंबर 2005 में भारतीय पक्ष ने ब्रिटिश अधिकारियों को बताया कि उपलब्ध सामग्री से इन खातों की रकम को बोफोर्स भुगतान से जोड़ना सिद्ध नहीं किया जा सका था। इसके बाद जनवरी, 2006 में खाते खोल दिए गए और रकम निकाल ली गई। यह उस समय UPA सरकार के लिए बड़ा राजनीतिक संकट बना। विपक्ष ने आरोप लगाया कि कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकार ने गांधी परिवार के परिचित व्यक्ति को राहत पहुँचाई। सरकार और सीबीआई का पक्ष था कि अदालत में टिकने योग्य संबंध स्थापित नहीं हो पाया था। उपलब्ध समकालीन रिपोर्टों के अनुसार सीबीआई ने ब्रिटिश अभियोजन अधिकारियों को यही बताया था कि वह खातों की रकम को कथित बोफोर्स भुगतान से जोड़ने में सफल नहीं हुई थी। कानून की दृष्टि से यह सबूत की कमजोरी का मामला बताया गया। लेकिन राजनीति में इससे ‘कवर-अप’ का आरोप पुनर्जीवित हो गया। यही बोफोर्स की पूरी कहानी का एक स्थायी पैटर्न था, जहाँ कानूनी रूप से अपर्याप्त प्रमाण और राजनीतिक रूप से संदेह पैदा करने वाली घटनाएँ बार-बार एक-दूसरे के सामने खड़ी दिखाई दीं।
हिंदुजा बंधुओं के नाम भी जुड़े
हिंदुजा बंधु—श्रीचंद, गोपीचंद और प्रकाश हिंदुजा—भी बोफोर्स जांच के महत्वपूर्ण आरोपी बने। सीबीआई का आरोप था कि बोफोर्स से कुछ रकम उन कंपनियों और खातों में गई जिनका उनसे संबंध था। स्वीडिश रेडियो की बाद की रिपोर्ट में भी यह दर्ज किया गया कि हिंदुजा पक्ष ने बोफोर्स से धन मिलने से इनकार नहीं किया। लेकिन उनका कहना था कि उसका भारतीय तोप सौदे से रिश्वत के रूप में कोई संबंध नहीं था।
2000 में सीबीआई ने उनके खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया। लेकिन अदालत में अभियोजन की सबसे बड़ी समस्या यह रही कि विदेशी दस्तावेजों को भारतीय साक्ष्य कानून के अनुरूप प्रमाणित रूप में प्रस्तुत करने, भुगतान और किसी भारतीय सार्वजनिक अधिकारी के बीच आपराधिक रिश्वत संबंध स्थापित करने और कथित साजिश की पूरी श्रृंखला साबित करने में वह सफल नहीं हुआ।
हाई कोर्ट का फैसला
4 फरवरी, 2004 को दिल्ली उच्च न्यायालय ने राजीव गांधी और तत्कालीन रक्षा सचिव एस.के. भटनागर से जुड़े भ्रष्टाचार और सार्वजनिक पद के दुरुपयोग संबंधी आरोपों को खारिज कर दिया। न्यायमूर्ति जे.डी. कपूर ने अपने फैसले में कठोर शब्दों में कहा कि लंबे समय की सीबीआई जांच के बावजूद किसी सार्वजनिक सेवक को रिश्वत मिलने का प्रमाण सामने नहीं आया। अदालत ने यह माना कि कुछ ‘ कमीशन एजेंट ‘ को बोफोर्स से भुगतान मिला था। लेकिन उस रकम को राजीव गांधी या अन्य सरकारी अधिकारियों के लिए रखी गई रिश्वत सिद्ध करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य नहीं था।
अदालत ने राजीव गांधी के विरुद्ध रिश्वत लेने का मामला स्थापित नहीं माना। लेकिन इससे यह भी स्वतः सिद्ध नहीं होता कि बोफोर्स ने कोई गुप्त भुगतान ही नहीं किया था। विदेशी खातों और कंपनियों में भुगतान के दस्तावेज मौजूद थे। विवाद इस बात पर था कि उनका वैधानिक चरित्र क्या था ? वे किस सेवा के लिए दिए गए और क्या उन्हें भारतीय सरकारी निर्णयकर्ताओं तक रिश्वत के रूप में जोड़ा जा सकता था ? बोफोर्स की राजनीतिक कथा ने अक्सर इन दोनों अलग बातों को मिला दिया - ‘कमीशन की रकम थी’ और ‘राजीव गांधी ने रिश्वत ली।’ पहली बात के समर्थन में महत्वपूर्ण दस्तावेजी सामग्री सामने आई; दूसरी बात अदालत में साबित नहीं हो सकी।
पूरा केस ही ध्वस्त हो गया
31 मई, 2005 को दिल्ली उच्च न्यायालय ने हिंदुजा बंधुओं और बोफोर्स कंपनी के खिलाफ शेष आपराधिक कार्यवाही भी खारिज कर दी। इस फैसले के बाद बोफोर्स केस का मुख्य न्यायिक ढाँचा लगभग ढह गया। सीबीआई ने उस समय उच्चतम न्यायालय में तुरंत अपील नहीं की। तेरह वर्ष बाद 2018 में एजेंसी ने दिल्ली उच्च न्यायालय के 2005 के फैसले को चुनौती देने का प्रयास किया। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने 2 नवंबर, 2018 को अत्यधिक देरी के आधार पर उसकी अपील खारिज कर दी और कहा कि देरी को उचित ठहराने के लिए दिए गए कारण संतोषजनक नहीं हैं। हालांकि उस समय एक निजी याचिकाकर्ता अजय अग्रवाल की अपील अलग से लंबित थी। इस मामले में एक और घटनाक्रम भी हुआ, 6 अगस्त, 2026 को सर्वोच्च न्यायालय ने अजय अग्रवाल की वह लंबे समय से लंबित याचिका भी खारिज कर दी, जिसमें 2005 के दिल्ली उच्च न्यायालय के हिंदुजा बंधुओं को राहत देने वाले आदेश को चुनौती दी गई थी। इससे हिंदुजा प्रकरण से जुड़ी लंबी न्यायिक चुनौती का लगभग अंतिम अध्याय भी बंद हो गया है...आगे पढ़ने के लिए Next Page पर क्लिक करें


