BRICS ईरान के लिए बड़ी उम्मीद क्यों? अमेरिका-इजरायल दबाव और भारत के सामने कठिन परीक्षा

BRICS Summit 2026 में ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन पश्चिम एशिया संकट पर मजबूत रुख की उम्मीद कर रहे हैं। जानिए BRICS में ईरान की रणनीति और Saudi-UAE की चुनौती।

Alakha Singh
Published on: 11 Sept 2026 11:57 AM IST (Updated on: 11 Sept 2026 11:58 AM IST)
BRICS ईरान के लिए बड़ी उम्मीद क्यों? अमेरिका-इजरायल दबाव और भारत के सामने कठिन परीक्षा
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BRICS Summit 2026: 18वां BRICS शिखर सम्मेलन ऐसे समय हो रहा है, जब पश्चिम एशिया में अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच संघर्ष ने क्षेत्रीय राजनीति के साथ-साथ वैश्विक ऊर्जा और व्यापार व्यवस्था को भी प्रभावित किया है। 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में होने वाली बैठक में ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन की मौजूदगी इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि तेहरान के लिए BRICS केवल आर्थिक सहयोग का मंच नहीं, बल्कि पश्चिमी दबाव के बीच कूटनीतिक और रणनीतिक सहारा भी बन चुका है।

ईरान की सबसे बड़ी उम्मीद यह है कि BRICS पश्चिमी सैन्य कार्रवाई, एकतरफा प्रतिबंधों और अंतरराष्ट्रीय कानून से जुड़े सवालों पर ऐसी भाषा अपनाए, जो तेहरान के पक्ष को जगह दे। लेकिन यही वह बिंदु है जहां ईरान की उम्मीद और BRICS की वास्तविकता अलग दिखाई देती है। समूह में अब ईरान के साथ सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात भी सदस्य हैं। पश्चिम एशिया के तीन प्रमुख देशों के हित इस समय एक-दूसरे से पूरी तरह मेल नहीं खाते। इसलिए BRICS के लिए ईरान के समर्थन में खुला और कठोर रुख अपनाना आसान नहीं होगा।

ईरान के लिए BRICS क्यों महत्वपूर्ण है?

ईरान के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल युद्ध नहीं, बल्कि युद्ध के साथ जुड़ा आर्थिक और कूटनीतिक दबाव है। अमेरिकी प्रतिबंधों ने लंबे समय से उसकी अर्थव्यवस्था, तेल व्यापार और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय लेनदेन को प्रभावित किया है। ऐसे में BRICS तेहरान को पश्चिम-केंद्रित वैश्विक व्यवस्था के बाहर वैकल्पिक साझेदारों के साथ संबंध मजबूत करने का मंच देता है।

BRICS में चीन और रूस जैसे ईरान के महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार मौजूद हैं। चीन ईरान के लिए बड़ा व्यापारिक और ऊर्जा साझेदार है, जबकि रूस के साथ तेहरान के सुरक्षा और रणनीतिक संबंध गहरे हैं। BRICS के आर्थिक एजेंडे में स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, वित्तीय सहयोग और वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था जैसे मुद्दे भी शामिल हैं। ऐसे विकल्प ईरान के लिए इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि डॉलर-आधारित वित्तीय व्यवस्था और अमेरिकी प्रतिबंध उसके व्यापार पर सीधा असर डालते हैं।

यही कारण है कि तेहरान BRICS को केवल बयान जारी करने वाले राजनीतिक मंच के रूप में नहीं, बल्कि लंबे समय में आर्थिक दबाव कम करने की संभावित व्यवस्था के रूप में देखता है।

पेजेशकियन क्या चाहते हैं?

पेजेशकियन के सामने इस सम्मेलन में दो समानांतर लक्ष्य हो सकते हैं। पहला, पश्चिम एशिया के संघर्ष पर BRICS से ऐसी सामूहिक प्रतिक्रिया हासिल करना जिसमें अमेरिका और इजरायल की कार्रवाई पर चिंता स्पष्ट हो। दूसरा, भारत, चीन और रूस जैसे देशों के साथ द्विपक्षीय स्तर पर कूटनीतिक समर्थन और आर्थिक सहयोग बढ़ाना।

पेजेशकियन ने अगस्त के अंत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से SCO सम्मेलन के दौरान मुलाकात की थी। मोदी ने उस बैठक में पश्चिम एशिया में तनाव कम करने, संवाद और कूटनीति के जरिए समाधान तथा व्यापारिक और समुद्री आवाजाही की सुरक्षा पर जोर दिया था। भारत ने यह भी कहा था कि वह BRICS और SCO जैसे बहुपक्षीय मंचों पर ईरान के साथ सहयोग जारी रखने को तैयार है।

इससे संकेत मिलता है कि भारत ईरान के साथ संवाद के लिए तैयार है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि नई दिल्ली BRICS को किसी एक देश के खिलाफ राजनीतिक गठबंधन में बदलना चाहेगी।

सबसे बड़ी अड़चन: सऊदी अरब और UAE

यही BRICS की सबसे बड़ी परीक्षा है। ईरान के साथ सऊदी अरब और UAE का संबंध पिछले वर्षों में सुधार की दिशा में जरूर बढ़ा है, लेकिन मौजूदा युद्ध ने पुराने रणनीतिक मतभेदों को फिर सामने ला दिया है। UAE और ईरान के बीच सैन्य हमलों को लेकर सार्वजनिक मतभेद BRICS की बैठकों में भी सामने आ चुके हैं। BRICS के शेरपाओं को संयुक्त घोषणा में पश्चिम एशिया युद्ध को लेकर ऐसी भाषा तैयार करनी पड़ रही है जिसे तेहरान, अबू धाबी और रियाद कि तीनों स्वीकार कर सकें।

यही वजह है कि BRICS के लिए सबसे आसान रास्ता किसी एक पक्ष का समर्थन करना नहीं, बल्कि युद्धविराम, संप्रभुता, अंतरराष्ट्रीय कानून, नागरिकों की सुरक्षा और बातचीत जैसे व्यापक सिद्धांतों पर जोर देना हो सकता है।

भारत की भूमिका सबसे कठिन

इस पूरे समीकरण में भारत की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। एक तरफ नई दिल्ली के ईरान के साथ ऐतिहासिक और रणनीतिक संबंध हैं। चाबहार बंदरगाह भारत के लिए मध्य एशिया तक पहुंच का अहम रास्ता है। दूसरी तरफ भारत के सऊदी अरब और UAE के साथ भी मजबूत ऊर्जा, निवेश, व्यापार और रणनीतिक संबंध हैं। इसके अलावा अमेरिका भारत का महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार है।

इसलिए भारत के लिए BRICS में ईरान के पक्ष में खुलकर खड़ा होना उतना ही मुश्किल है जितना ईरान की चिंताओं को पूरी तरह नजरअंदाज करना।

भारत की घोषित प्राथमिकता भी टकराव बढ़ाने के बजाय संवाद और कूटनीति रही है। मोदी-पेजेशकियन की हालिया बैठक में भारत ने पश्चिम एशिया में स्थायी शांति, तनाव कम करने और समुद्री व्यापार की स्वतंत्रता पर जोर दिया था।

इसका मतलब है कि नई दिल्ली की संभावित रणनीति ईरान का विरोध करना नहीं, लेकिन BRICS को अमेरिका-विरोधी सैन्य-राजनीतिक मंच बनने से रोकना हो सकती है।

क्या BRICS ईरान के लिए सुरक्षा कवच बन सकता है?

यहीं उम्मीद और वास्तविकता के बीच अंतर समझना जरूरी है। BRICS NATO जैसी सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था नहीं है। अगर किसी सदस्य पर सैन्य हमला होता है तो दूसरे सदस्य उसकी रक्षा के लिए सैन्य रूप से हस्तक्षेप करने के लिए बाध्य नहीं हैं। इसलिए ईरान के लिए BRICS तत्काल सैन्य सुरक्षा गारंटी नहीं दे सकता। लेकिन राजनीतिक और आर्थिक स्तर पर इसकी उपयोगिता बड़ी है।

BRICS में 11 सदस्य देश हैं और ये देश मिलकर दुनिया की करीब 49.5 फीसदी आबादी, लगभग 40 फीसदी वैश्विक GDP और करीब 26 फीसदी वैश्विक व्यापार का प्रतिनिधित्व करते हैं।

इसका अर्थ है कि BRICS की सामूहिक राजनीतिक भाषा को पूरी तरह नजरअंदाज करना पश्चिमी देशों के लिए भी आसान नहीं होगा। ईरान के लिए यही इस संगठन की सबसे बड़ी ताकत है।

होर्मुज से लेकर तेल बाजार तक, मामला सिर्फ ईरान का नहीं

ईरान-अमेरिका संघर्ष का असर अब केवल सैन्य मोर्चे तक सीमित नहीं है। पश्चिम एशिया की स्थिति वैश्विक ऊर्जा बाजार और समुद्री व्यापार के लिए भी चिंता का विषय बन चुकी है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक है। यहां तनाव बढ़ने का सीधा असर तेल की कीमतों, शिपिंग लागत और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर पड़ सकता है।

इसीलिए BRICS के सदस्य देशों के लिए ईरान के साथ राजनीतिक एकजुटता और क्षेत्रीय स्थिरता के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। भारत ने भी साफ किया है कि वाणिज्यिक जहाजों, समुद्री कर्मचारियों और नागरिक बुनियादी ढांचे को नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए।

संयुक्त घोषणा पर क्यों टिकी हैं निगाहें?

BRICS का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश उसके नेताओं की बैठक से ज्यादा उसके संयुक्त दस्तावेज में दिखाई देगा। अगर सदस्य देश पश्चिम एशिया पर सहमति बनाने में सफल होते हैं तो यह BRICS की बढ़ती वैश्विक राजनीतिक भूमिका का संकेत होगा।

लेकिन अगर ईरान, UAE और सऊदी अरब की अलग-अलग प्राथमिकताओं के कारण संयुक्त घोषणा पर सहमति नहीं बनती, तो यह संगठन की आंतरिक सीमाओं को भी उजागर करेगा। रिपोर्टों के मुताबिक BRICS के शेरपा पहले से ही पश्चिम एशिया युद्ध और फिलिस्तीन पर दस्तावेज की भाषा को लेकर मतभेद दूर करने में जुटे हैं।

यह समस्या नई नहीं है। BRICS का विस्तार जितना हुआ है, उसके भीतर हितों की विविधता भी उतनी ही बढ़ी है। अब यह केवल रूस-चीन-केंद्रित समूह नहीं है। इसमें भारत, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, इंडोनेशिया, ईरान, सऊदी अरब और UAE जैसे अलग-अलग रणनीतिक हित रखने वाले देश शामिल हैं।

ईरान के लिए उम्मीद बड़ी, लेकिन सीमित

ईरान के लिए नई दिल्ली BRICS सम्मेलन एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक अवसर है। तेहरान को यहां चीन और रूस से राजनीतिक समर्थन, भारत से संवाद और आर्थिक सहयोग की संभावनाएं तथा BRICS के मंच से पश्चिमी दबाव के खिलाफ व्यापक वैश्विक आवाज मिल सकती है।

लेकिन ईरान यह उम्मीद नहीं कर सकता कि BRICS अमेरिका के खिलाफ एकजुट होकर उसके पक्ष में खड़ा हो जाएगा। सऊदी अरब और UAE की मौजूदगी, भारत के संतुलित रुख और BRICS के भीतर अलग-अलग राष्ट्रीय हित इस संभावना को सीमित करते हैं।

इसलिए पेजेशकियन के लिए असली सफलता शायद कोई कठोर anti-US प्रस्ताव हासिल करना नहीं, बल्कि BRICS के संयुक्त दस्तावेज में ईरान की संप्रभुता, अंतरराष्ट्रीय कानून, युद्धविराम, बातचीत और एकतरफा प्रतिबंधों के खिलाफ सिद्धांतों को जगह दिलाना होगी।

यही वह रास्ता है जिसमें ईरान को BRICS से सबसे अधिक लाभ मिल सकता है: एक सैन्य सुरक्षा कवच के रूप में नहीं, बल्कि ऐसी बहुध्रुवीय दुनिया के राजनीतिक और आर्थिक मंच के रूप में, जहां तेहरान पश्चिमी दबाव के बीच अकेला न रहे।

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Alakha Singh is a journalist with having more than one decade of experience in digital media. Alakha Singh has covered Loksabha Elections 2014 and 2019 closely with the several state assembly elections. He has expertise in SEO oriented content writing on various topics and issues. At HT Digital Alakha Singh has been recognised as one of the top performer of the team for many years continuously. Earlier he worked with HT Digital for more than 8 years and 2.5 years with Amar Ujala web. In initial days of his career Alakha Singh also worked as a reporter (stringer) with NBT Gurgaon. He pursued P.G. Diploma from South Campus, University of Delhi in 2013 and MAMC from Kurukshetra University in 2014. He Belongs to District Banda of Uttar Pradesh.

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