BRICS Summit 2026: मोदी-शी जिनपिंग मुलाकात से क्या बदला? भारत, चीन और नई विश्व व्यवस्था

BRICS 2026 में मोदी-शी जिनपिंग की मुलाकात, भारत-चीन संबंधों में बदलाव, रात्रिभोज से शी की दूरी, रूस-अमेरिका के लिए संदेश और कृषि, स्वास्थ्य व छोटे उद्योगों से जुड़े फैसलों का विश्लेषण। जानिए दिल्ली BRICS सम्मेलन से भारत को क्या मिला और आगे क्या चुनौती है।

Yogesh Mishra
Published on: 15 Sept 2026 9:30 AM IST
BRICS Summit 2026 Live Update in Hindi
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BRICS Summit 2026 Live Update in Hindi

BRICS Summit 2026 Update: दुनिया जब एक साथ कई प्रकार के संकटों से गुजर रही है, पश्चिम एशिया युद्ध की आग में है, रूस और पश्चिम के बीच टकराव बना हुआ है, अमेरिका और चीन के बीच वैश्विक वर्चस्व की प्रतिस्पर्धा तेज है, अंतरराष्ट्रीय व्यापार नए शुल्कों और प्रतिबंधों से प्रभावित हो रहा है और संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं की उपयोगिता तथा प्रतिनिधित्व पर लगातार प्रश्न उठ रहे हैं, उसी समय नई दिल्ली में हुआ 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन केवल सदस्य देशों की एक और वार्षिक बैठक बनकर नहीं रह गया। भारत की अध्यक्षता में 12 और 13 सितंबर 2026 को आयोजित इस सम्मेलन ने यह संकेत दिया कि विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाएं अब केवल विश्व व्यवस्था में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की मांग नहीं कर रहीं, बल्कि उन नियमों, संस्थाओं और आर्थिक व्यवस्थाओं को भी बदलना चाहती हैं जिनके आधार पर पिछले आठ दशकों से विश्व राजनीति संचालित होती रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे जिस रूप में प्रस्तुत किया, उसका मूल संदेश था कि वैश्विक दक्षिण संकटों की अग्रिम पंक्ति में रहता है, लेकिन निर्णय लेने की व्यवस्था में पीछे बैठाया जाता है, इसलिए दुनिया को विशेषाधिकारों के पिरामिड से साझेदारी के मंच की ओर बढ़ना होगा। नई दिल्ली घोषणा ने इस राजनीतिक विचार को औपचारिक दस्तावेज़ में बदल दिया है। 45 पृष्ठ और 140 अनुच्छेद वाला यह दस्तावेज़ वैश्विक शासन, संयुक्त राष्ट्र सुधार, आतंकवाद, पश्चिम एशिया, व्यापार, भुगतान व्यवस्था, ऊर्जा, जलवायु, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वास्थ्य, कृषि, विकास वित्त और लोगों के बीच संपर्क तक फैला हुआ है।

इस सम्मेलन की सबसे बड़ी उपलब्धि केवल घोषणा-पत्र का तैयार होना नहीं, बल्कि उसका सर्वसम्मति से स्वीकार किया जाना है। विस्तारित ब्रिक्स के सदस्यों की राजनीतिक स्थितियां इतनी अलग हैं कि आम सहमति आसान नहीं थी। एक ओर रूस है जिसका पश्चिम से गहरा टकराव है, दूसरी ओर चीन है जो अमेरिका का सबसे बड़ा रणनीतिक प्रतिस्पर्धी है, ईरान अमेरिकी दबाव और युद्ध का सामना कर रहा है, संयुक्त अरब अमीरात के अमेरिका से निकट सुरक्षा संबंध हैं, भारत पश्चिम के साथ मजबूत आर्थिक और सामरिक रिश्ते रखते हुए अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखना चाहता है और ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, इंडोनेशिया, मिस्र तथा इथियोपिया की अपनी अलग प्राथमिकताएं हैं। पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के बीच ईरान और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों को एक ही शब्दावली पर सहमत कर लेना भारत की अध्यक्षता की कूटनीतिक सफलता मानी जाएगी। नई दिल्ली घोषणा ने तनाव कम करने, अधिकतम संयम बरतने और अंतरराष्ट्रीय विवादों के समाधान के लिए संवाद, परामर्श और कूटनीति का रास्ता अपनाने पर सहमति बनाई। समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार ईरान और अमेरिका समर्थक संयुक्त अरब अमीरात की अलग-अलग स्थितियों के कारण साझा घोषणा तैयार करना विशेष रूप से कठिन माना जा रहा था।

यह पश्चिम-विरोधी मोर्चा है या नई बहुध्रुवीय व्यवस्था?

ब्रिक्स को समझने में सबसे बड़ी गलती यह होगी कि इसे केवल अमेरिका और पश्चिम के विरुद्ध बने संगठन के रूप में देखा जाए। चीन और रूस निस्संदेह ब्रिक्स को पश्चिम-प्रधान विश्व व्यवस्था के विकल्प और शक्ति-संतुलन के साधन के रूप में अधिक आक्रामक ढंग से देखते हैं, लेकिन भारत की दृष्टि इससे अलग है। भारत ब्रिक्स को पश्चिम-विरोधी सैन्य अथवा वैचारिक गठबंधन बनाने के बजाय एक ऐसे मंच के रूप में आगे बढ़ाना चाहता है जहां वैश्विक दक्षिण को अधिक प्रतिनिधित्व मिले, लेकिन सदस्य देश अमेरिका, यूरोप अथवा अन्य विकसित अर्थव्यवस्थाओं के साथ अपने संबंध बनाए रखने के लिए स्वतंत्र रहें। मोदी का यह कहना कि ब्रिक्स “किसी के खिलाफ नहीं” है, इसी रणनीतिक अंतर को अभिव्यक्त करता है। भारत की कोशिश है कि वह एक तरफ चीन और रूस जैसे देशों के साथ बहुध्रुवीय व्यवस्था की मांग करे और दूसरी तरफ अमेरिका, यूरोप, जापान तथा अन्य पश्चिमी साझेदारों के साथ अपने आर्थिक और रणनीतिक संबंध भी मजबूत रखे। यही कारण है कि नई दिल्ली सम्मेलन भारत की विदेश नीति के उस मॉडल का प्रदर्शन भी है जिसमें एक ही समय रूस से रणनीतिक मित्रता, अमेरिका से साझेदारी, चीन से नियंत्रित प्रतिस्पर्धा और वैश्विक दक्षिण के नेतृत्व का दावा साथ-साथ चलाया जा रहा है।

चीन की दृष्टि थोड़ी अलग है। बीजिंग ब्रिक्स को उस अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में परिवर्तन के साधन के रूप में देखता है जिसमें डॉलर, पश्चिमी वित्तीय संस्थाओं और अमेरिका-यूरोप के रणनीतिक प्रभाव की केंद्रीय भूमिका रही है। राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने नई दिल्ली में ब्रिक्स को वैश्विक दक्षिण की प्रमुख शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया और सदस्य देशों से दुनिया में शांति और विकास के लिए अधिक सक्रिय भूमिका लेने को कहा। रूस की प्राथमिकता भी काफी हद तक इसी दिशा में है क्योंकि पश्चिमी प्रतिबंधों ने मॉस्को के लिए गैर-पश्चिमी आर्थिक और वित्तीय नेटवर्क का महत्व बढ़ा दिया है। भारत इन उद्देश्यों के कुछ हिस्सों से सहमत है, विशेषकर अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में सुधार, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और वैश्विक दक्षिण के प्रतिनिधित्व के प्रश्न पर, लेकिन वह ऐसी किसी व्यवस्था से बचना चाहता है जिसमें ब्रिक्स चीन-प्रधान या स्पष्ट अमेरिका-विरोधी संगठन बन जाए। यही ब्रिक्स का सबसे महत्वपूर्ण आंतरिक तनाव है और आने वाले वर्षों में इसकी दिशा इसी बात से तय होगी कि भारत जैसी शक्तियां इसे संतुलित मंच बनाए रख पाती हैं या चीन और रूस की पश्चिम-विरोधी धुरी अधिक प्रभावशाली होती जाती है।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद भारत को समर्थन मिला, लेकिन स्थायी सदस्यता अभी बहुत दूर

भारत के लिए नई दिल्ली घोषणा का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक हिस्सा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार से संबंधित है। घोषणा स्पष्ट रूप से कहती है कि संयुक्त राष्ट्र और उसकी सुरक्षा परिषद में व्यापक सुधार होना चाहिए, विकासशील देशों का प्रतिनिधित्व बढ़ाया जाना चाहिए और एशिया, अफ्रीका तथा लैटिन अमेरिका की उभरती शक्तियों को वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में बड़ी भूमिका मिलनी चाहिए। इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य चीन और रूस ने भारत तथा ब्राजील की संयुक्त राष्ट्र, “जिसमें उसकी सुरक्षा परिषद भी शामिल है”, में बड़ी भूमिका निभाने की आकांक्षा का समर्थन दोहराया है। घोषणा यह भी मानती है कि सुरक्षा परिषद में सुधार का उद्देश्य वैश्विक दक्षिण की आवाज को मजबूत करना होना चाहिए।

यह भारत की कूटनीतिक उपलब्धि है, लेकिन इसे भारत की स्थायी सदस्यता के लिए चीन की स्पष्ट स्वीकृति समझना सही नहीं होगा। कूटनीतिक भाषा में “भारत की बड़ी भूमिका की आकांक्षा का समर्थन” और “भारत को सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनाने का स्पष्ट समर्थन” दो अलग चीजें हैं। चीन ने वर्षों से इसी प्रकार की सावधानीपूर्ण भाषा अपनाई है। इसलिए दिल्ली घोषणा का महत्व यह है कि बीजिंग भारत की दावेदारी को खुले तौर पर रोकने वाली भाषा नहीं अपना रहा, लेकिन अभी उसने भारत की स्थायी सदस्यता और वीटो अधिकार का स्पष्ट समर्थन भी नहीं दिया है। मोदी ने सम्मेलन में इससे आगे जाकर कहा कि सुरक्षा परिषद सुधार को अनिश्चितकाल तक टाला नहीं जा सकता और इसके लिए निश्चित समयसीमा तथा स्पष्ट परिणाम होने चाहिए। उन्होंने वैश्विक वित्तीय संस्थाओं में भी मतदान अधिकार, नेतृत्व पदों और नीतिगत प्राथमिकताओं को आज की आर्थिक वास्तविकताओं के अनुरूप बदलने की मांग की। यह मूलतः भारत का यह तर्क है कि 1945 में बनी संस्थागत व्यवस्था 2026 की दुनिया का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकती।

यहां भारत की वास्तविक चुनौती चीन ही है। रूस लंबे समय से भारत की स्थायी सदस्यता का अपेक्षाकृत स्पष्ट समर्थक रहा है, अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन भी विभिन्न अवसरों पर समर्थन व्यक्त कर चुके हैं, लेकिन चीन की स्थिति अस्पष्ट बनी हुई है। इसलिए ब्रिक्स घोषणा का सकारात्मक पहलू यह है कि चीन भारत को सुरक्षा परिषद के भीतर बड़ी भूमिका देने की दिशा में लिखित सहमति का हिस्सा बना, लेकिन भारत के दीर्घकालिक लक्ष्य की दृष्टि से इसे मंजिल नहीं बल्कि एक मध्यवर्ती कूटनीतिक उपलब्धि माना जाना चाहिए।

पहलगाम आतंकवादी हमला - भारत के लिए सम्मेलन की सबसे स्पष्ट कूटनीतिक सफलता

नई दिल्ली घोषणा में भारत की सबसे ठोस सफलता आतंकवाद के प्रश्न पर दिखाई देती है। घोषणा ने 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले का नाम लेकर “कड़े शब्दों में” विरोध किया, जिसमें 26 लोग मारे गए थे। इससे आगे बढ़कर दस्तावेज़ ने आतंकवाद के प्रति शून्य सहिष्णुता की बात की, सीमा पार आतंकवादियों की आवाजाही, आतंकवाद के वित्तपोषण और सुरक्षित ठिकानों पर कार्रवाई की मांग की, आतंकवाद से निपटने में दोहरे मानदंडों को अस्वीकार किया तथा संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित सभी आतंकवादियों और आतंकवादी संगठनों के विरुद्ध समन्वित कार्रवाई की अपील की। घोषणा में यह भी स्पष्ट किया गया कि आतंकवाद को किसी धर्म, राष्ट्रीयता, सभ्यता या जातीय समूह से नहीं जोड़ा जाना चाहिए और आतंकवादी गतिविधियों में शामिल अथवा उनका समर्थन करने वालों को कानून के सामने जवाबदेह बनाया जाना चाहिए।

इस भाषा का महत्व चीन के कारण और बढ़ जाता है। पाकिस्तान चीन का निकट रणनीतिक सहयोगी है और आतंकवाद से जुड़े कुछ मामलों में संयुक्त राष्ट्र स्तर पर भारत और चीन के मतभेद पहले सामने आते रहे हैं। ऐसे में चीन का उस घोषणा पर सहमत होना जिसमें पहलगाम हमले का स्पष्ट उल्लेख, सीमा पार आतंकवाद, वित्तपोषण, सुरक्षित ठिकानों और संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित आतंकवादियों के विरुद्ध कार्रवाई की मांग शामिल है, भारत के लिए महत्वपूर्ण कूटनीतिक लाभ है। लेकिन यहां भी अतिशयोक्ति से बचना चाहिए। घोषणा पाकिस्तान का नाम नहीं लेती और न ही भारत की ‘ऑपरेशन सिंदूर’ से संबंधित सैन्य कार्रवाई का समर्थन करती है। इसलिए उपलब्धि यह है कि भारत आतंकवाद की अपनी मूल शब्दावली को ब्रिक्स की सर्वसम्मत घोषणा में शामिल कराने में सफल हुआ, यह नहीं कि सभी ब्रिक्स देशों ने भारत-पाकिस्तान विवाद पर भारतीय दृष्टिकोण स्वीकार कर लिया।

पश्चिम एशिया - जहां नई दिल्ली की मध्यस्थ कूटनीति की सबसे कठिन परीक्षा हुई

नई दिल्ली घोषणा के सबसे कठिन हिस्सों में पश्चिम एशिया की स्थिति थी। ब्रिक्स के भीतर स्वयं ऐसे देश मौजूद हैं जो इस संकट के अलग-अलग पक्षों से जुड़े हैं। ईरान संगठन का सदस्य है, संयुक्त अरब अमीरात अमेरिका का घनिष्ठ साझेदार है, चीन के ईरान और खाड़ी दोनों से गहरे संबंध हैं, रूस की अपनी रणनीतिक प्राथमिकताएं हैं और भारत के इजराइल, खाड़ी देशों, ईरान तथा अमेरिका सभी के साथ महत्वपूर्ण संबंध हैं। इस जटिल स्थिति के बीच घोषणा ने किसी एक देश की राजनीतिक शब्दावली अपनाने के बजाय “अधिकतम संयम”, तनाव को और बढ़ाने वाले कदमों से बचने तथा विवादों के शांतिपूर्ण समाधान पर जोर दिया। इसने नागरिकों की सुरक्षा, संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के सम्मान को भी महत्व दिया।

गाजा और फिलिस्तीन पर ब्रिक्स का रुख अपेक्षाकृत स्पष्ट है। घोषणा फिलिस्तीनी लोगों के जबरन विस्थापन का विरोध करती है, गाजा में मानवीय स्थिति पर चिंता जताती है और फिलिस्तीन प्रश्न के राजनीतिक समाधान की आवश्यकता पर जोर देती है। व्यापक रूप से ब्रिक्स दो-राष्ट्र समाधान और फिलिस्तीन की अंतरराष्ट्रीय स्थिति को मजबूत करने के पक्ष में रहा है। भारत के लिए यहां संतुलन कठिन है क्योंकि पिछले वर्षों में इजराइल के साथ उसके रणनीतिक और रक्षा संबंध मजबूत हुए हैं, लेकिन वह स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य के अपने पुराने समर्थन को भी बनाए रखता है। इसलिए दिल्ली की भाषा भारत की उसी संतुलनकारी नीति के अनुकूल है जिसमें आतंकवाद का विरोध, इजराइल के सुरक्षा हितों की समझ और फिलिस्तीनी राज्य के समर्थन को एक साथ रखा जाता है।

एक और उल्लेखनीय बात यह है कि 2026 की नई दिल्ली घोषणा में रूस-यूक्रेन युद्ध का नाम लेकर उल्लेख नहीं किया गया, जबकि 2024 के कजान और 2025 के रियो घोषणापत्रों में इसका उल्लेख था। इसके स्थान पर सभी अंतरराष्ट्रीय संघर्षों को संवाद और कूटनीति से हल करने की सामान्य भाषा अपनाई गई। इसे रूस के लिए अनुकूल माना जा सकता है, लेकिन भारत के लिए भी यह उपयोगी है क्योंकि नई दिल्ली लगातार यूक्रेन संकट पर किसी एक खेमे की भाषा अपनाने से बचती रही है। इस अनुपस्थिति को एक प्रकार का कूटनीतिक समझौता कहा जा सकता है, सदस्य देशों के गहरे मतभेद वाले मुद्दे को इस प्रकार लिखा गया कि घोषणा टूटे नहीं।

व्यापार, अमेरिकी शुल्क और आर्थिक प्रतिबंध

नई दिल्ली घोषणा में एकतरफा शुल्क और गैर-शुल्क उपायों पर चिंता व्यक्त की गई है और कहा गया है कि ऐसे कदम अंतरराष्ट्रीय व्यापार को विकृत कर सकते हैं तथा विश्व अर्थव्यवस्था और आपूर्ति शृंखलाओं को नुकसान पहुंचा सकते हैं। वर्तमान वैश्विक संदर्भ में इस भाषा को अमेरिका द्वारा लगाए गए विभिन्न प्रतिबंधों और शुल्कों की पृष्ठभूमि से अलग करके नहीं देखा जा सकता। रूस और ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंध, चीन-अमेरिका व्यापारिक प्रतिस्पर्धा और विभिन्न देशों पर शुल्क के बढ़ते प्रयोग ने ब्रिक्स देशों में यह चिंता पैदा की है कि डॉलर और पश्चिमी आर्थिक संस्थाओं का उपयोग राजनीतिक दबाव के औजार के रूप में किया जा सकता है। घोषणा इसी चिंता को संस्थागत भाषा देती है।

लेकिन यहां भारत की स्थिति फिर विशिष्ट है। भारत भी एकतरफा आर्थिक दबाव और संरक्षणवाद का विरोध करता है, लेकिन वह वैश्विक व्यापार व्यवस्था से अलग आर्थिक शिविर नहीं बनाना चाहता। भारत की अर्थव्यवस्था अमेरिका, यूरोप, खाड़ी, जापान और दक्षिण-पूर्व एशिया से भी गहराई से जुड़ी है। इसलिए दिल्ली घोषणा में विश्व व्यापार संगठन को मजबूत करने और नियम-आधारित व्यापार व्यवस्था में सुधार की बात ज्यादा महत्वपूर्ण है। भारत की दृष्टि पश्चिमी व्यवस्था को तोड़ने के बजाय उसमें विकासशील देशों का हिस्सा और प्रभाव बढ़ाने की है, जबकि चीन और रूस वैकल्पिक प्रणालियों के निर्माण पर अधिक जोर देते हैं।

क्या ब्रिक्स डॉलर को खत्म करने जा रहा है?

ब्रिक्स के बारे में सबसे ज्यादा प्रचार जिस विषय पर होता है, वह डॉलर के विकल्प का है। नई दिल्ली सम्मेलन ने किसी साझा ब्रिक्स मुद्रा की घोषणा नहीं की है। इसके बजाय ज्यादा व्यावहारिक दिशा अपनाई गई है, सदस्य देशों के बीच व्यापार और निवेश में स्थानीय मुद्राओं के उपयोग को बढ़ाना, राष्ट्रीय भुगतान प्रणालियों के बीच संपर्क की संभावना तलाशना, सीमा पार भुगतान को तेज और सुरक्षित बनाना और न्यू डेवलपमेंट बैंक के माध्यम से स्थानीय मुद्रा में ऋण को बढ़ावा देना। ब्रिक्स भुगतान कार्यबल राष्ट्रीय प्रणालियों के बीच तकनीकी तालमेल के उपायों का अध्ययन कर रहा है।

इस अंतर को समझना आवश्यक है। डॉलर को रातों-रात हटाना आर्थिक रूप से संभव नहीं है क्योंकि वैश्विक व्यापार, विदेशी मुद्रा भंडार, ऊर्जा बाजार, ऋण और पूंजी बाजार में डॉलर की भूमिका बहुत गहरी है। लेकिन यदि चीन-भारत व्यापार का कुछ हिस्सा युआन और रुपये में, रूस-भारत व्यापार का हिस्सा रुपये और रूबल में और अन्य ब्रिक्स देशों का व्यापार उनकी अपनी मुद्राओं में बढ़ता है, तो लंबे समय में डॉलर पर निर्भरता घट सकती है। इसे “डॉलर का अंत” कहना अतिरंजना होगी, लेकिन “डॉलर निर्भरता का क्रमिक विविधीकरण” कहना उचित होगा। नई दिल्ली घोषणा इसी दूसरे रास्ते पर चलती दिखाई देती है।

न्यू डेवलपमेंट बैंक - ब्रिक्स के नारे से संस्था बनने का सबसे महत्वपूर्ण साधन

ब्रिक्स की विश्वसनीयता केवल राजनीतिक घोषणाओं से नहीं बल्कि संस्थागत क्षमता से तय होगी और इस दृष्टि से न्यू डेवलपमेंट बैंक उसका सबसे महत्वपूर्ण प्रयोग है। नई दिल्ली घोषणा बैंक की सदस्यता बढ़ाने, अधिक वित्तीय संसाधन जुटाने, स्थानीय मुद्रा में ऋण बढ़ाने और स्वच्छ ऊर्जा, परिवहन, जल, स्वच्छता, सामाजिक अवसंरचना तथा डिजिटल संपर्क जैसी परियोजनाओं में निवेश का समर्थन करती है। इसके साथ ब्रिक्स बहुपक्षीय गारंटी व्यवस्था और प्रस्तावित नए निवेश मंच जैसे तंत्रों पर भी काम कर रहा है, ताकि विकासशील देशों में परियोजनाओं की वित्तीय लागत कम की जा सके और निजी पूंजी आकर्षित हो।

यहीं ब्रिक्स की दीर्घकालिक परीक्षा होगी। यदि समूह विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की आलोचना तो करे लेकिन विकासशील देशों को वास्तविक वित्तीय विकल्प न दे पाए तो उसका प्रभाव सीमित रहेगा। यदि न्यू डेवलपमेंट बैंक स्थानीय मुद्रा ऋण, बुनियादी ढांचा और विकास परियोजनाओं में बड़े पैमाने पर वित्त उपलब्ध करा सके तो ब्रिक्स वैश्विक दक्षिण के लिए व्यावहारिक संस्था बन सकता है। भारत का हित इसी दूसरे रास्ते में है क्योंकि उसे भी भारी बुनियादी ढांचा निवेश, ऊर्जा परिवर्तन, शहरों, परिवहन और तकनीकी प्रणालियों के लिए दीर्घकालिक पूंजी की आवश्यकता है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता - भारत ने अपनी फरवरी की पहल को ब्रिक्स एजेंडे में पहुंचाया

नई दिल्ली घोषणा में कृत्रिम बुद्धिमत्ता को केवल तकनीकी विषय नहीं बल्कि विकास और वैश्विक शासन के प्रश्न के रूप में रखा गया है। दस्तावेज़ कहता है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता आर्थिक वृद्धि और सतत विकास की विशाल संभावनाएं रखती है, लेकिन इसके संसाधनों की पहुंच, सुरक्षा, विश्वसनीयता, समावेशिता और जोखिम-नियंत्रण पर अंतरराष्ट्रीय सहयोग आवश्यक है, विशेषकर वैश्विक दक्षिण के देशों के लिए। घोषणा ने फरवरी 2026 में भारत द्वारा आयोजित कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रभाव शिखर सम्मेलन की सराहना की और साथ ही शंघाई में आयोजित विश्व कृत्रिम बुद्धिमत्ता सम्मेलन का भी उल्लेख किया। सदस्य देशों ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता के वैश्विक शासन पर पहले से स्वीकार ब्रिक्स नेताओं के वक्तव्य को लागू करने की प्रतिबद्धता जताई।

यह क्षेत्र भविष्य में भारत-चीन सहयोग और प्रतिस्पर्धा दोनों का केंद्र बनेगा। चीन बड़े कृत्रिम बुद्धिमत्ता मॉडल, चिप, डेटा और औद्योगिक स्वचालन में शक्तिशाली खिलाड़ी है, जबकि भारत डिजिटल सार्वजनिक ढांचे, विशाल प्रतिभा आधार, सॉफ्टवेयर और कम लागत वाले जन-उपयोगी तकनीकी समाधान के आधार पर अलग मॉडल प्रस्तुत करना चाहता है। भारत की कोशिश यह है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता का वैश्विक शासन केवल अमेरिका, चीन और यूरोप के बीच तय न हो बल्कि विकासशील देशों को भी उसमें स्थान मिले। नई दिल्ली घोषणा में “वैश्विक दक्षिण” के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता संसाधनों की पहुंच का स्पष्ट उल्लेख इसी भारतीय प्राथमिकता की सफलता है।

ऊर्जा और जलवायु - विकासशील देशों ने पश्चिमी दबाव के विरुद्ध अपना रास्ता रखा

ऊर्जा प्रश्न पर घोषणा का रुख अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसमें नवीकरणीय ऊर्जा का समर्थन किया गया है लेकिन साथ ही यह स्वीकार किया गया है कि जीवाश्म ईंधन, परमाणु ऊर्जा, जलविद्युत, हाइड्रोजन, जैव ऊर्जा और अन्य स्रोत भी विभिन्न देशों की ऊर्जा सुरक्षा में भूमिका निभाते रहेंगे। ऊर्जा परिवर्तन को न्यायसंगत, व्यवस्थित, समतामूलक और समावेशी बनाने पर जोर है। इसका अर्थ यह है कि ब्रिक्स विकासशील देशों पर ऐसे कठोर जलवायु मॉडल थोपने के पक्ष में नहीं है जिसमें उनकी ऊर्जा आवश्यकताओं और विकास स्तर की उपेक्षा हो। भारत के लिए यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। भारत तेजी से नवीकरणीय ऊर्जा बढ़ा रहा है लेकिन कोयला और अन्य पारंपरिक ऊर्जा स्रोत अभी भी उसकी ऊर्जा सुरक्षा का बड़ा आधार हैं। यदि विकसित देश यह अपेक्षा करें कि भारत अपनी औद्योगिक और ऊर्जा जरूरतों की अनदेखी करके उसी गति से जीवाश्म ईंधन छोड़े जिस गति से समृद्ध अर्थव्यवस्थाएं छोड़ सकती हैं, तो भारत इसे न्यायसंगत नहीं मानता। ब्रिक्स की भाषा “साझी लेकिन अलग-अलग जिम्मेदारियों” की पुरानी जलवायु अवधारणा को फिर मजबूत करती है।

Yogesh Mishra
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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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