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Jain Heritage Return 2026: सदियों पुरानी जैन धरोहर पर ब्रिटेन का बड़ा फैसला, लौटेंगी दुर्लभ पांडुलिपियां
Britain Jain Manuscripts Return 2026: ब्रिटेन के वेलकम कलेक्शन ने जैन समुदाय की 2000 से ज्यादा दुर्लभ पांडुलिपियां लौटाने का फैसला किया, जानिए भारत की इस ऐतिहासिक धरोहर की घर वापसी की पूरी कहानी।
Britain Jain Manuscripts Return 2026 India Rare Jain Heritage
Britain Jain Heritage Return 2026 India: भारत सदियों से ज्ञान, संस्कृति और अनमोल धरोहरों का केंद्र रहा है। यहां की प्राचीन पांडुलिपियां, मंदिर, शास्त्र और कलाकृतियां आज भी दुनिया को हैरान कर देती हैं। यही वजह है कि अलग-अलग समयखंडों में भारत की अनेक ऐतिहासिक विरासतें विदेशों तक पहुंचीं और वहां भी अपनी अलग पहचान बनाती रहीं। अब ऐसी ही एक ऐतिहासिक धरोहर की घर वापसी होने जा रही है। ब्रिटेन के लंदन स्थित वेलकम कलेक्शन ने फैसला किया है कि वह जैन समुदाय की 2,000 से ज्यादा दुर्लभ पांडुलिपियां वापस करेगा। इनमें शुरुआती हिंदी, संस्कृत, प्राकृत, गुजराती और राजस्थानी भाषाओं में लिखे दुर्लभ ग्रंथ शामिल हैं, जिन्हें दक्षिण एशिया के बाहर जैन पांडुलिपियों का सबसे बड़ा संग्रह माना जाता है। 15वीं से 19वीं सदी के बीच की ये पांडुलिपियां केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि भारत की समृद्ध साहित्यिक, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक परंपरा का जीवंत प्रमाण हैं।
वर्षों की बातचीत के बाद हुआ फैसला
इन पांडुलिपियों की वापसी का फैसला इंस्टीट्यूट ऑफ जैनोलॉजी और वेलकम कलेक्शन के बीच लंबे समय से चल रही बातचीत और सहयोग का परिणाम माना जा रहा है। यह कदम केवल वस्तुओं की वापसी नहीं, बल्कि सांस्कृतिक न्याय और ऐतिहासिक जिम्मेदारी की दिशा में भी बड़ा उदाहरण बनकर सामने आया है।
दुनियाभर में हाल के वर्षों में कई संग्रहालयों और संस्थानों पर औपनिवेशिक दौर में ले जाई गई सांस्कृतिक धरोहरों को उनके मूल देशों और समुदायों को लौटाने का दबाव बढ़ा है। ऐसे माहौल में वेलकम कलेक्शन का यह निर्णय काफी अहम माना जा रहा है।
बेहद दुर्लभ और अनमोल हैं ये पांडुलिपियां
इस संग्रह में धर्म, दर्शन, साहित्य, आयुर्वेद, चिकित्सा और समाज से जुड़े अनेक ग्रंथ शामिल हैं। इनमें सबसे चर्चित पांडुलिपियों में 16वीं सदी की शुरुआत की रंगीन 'कल्पसूत्र' की दुर्लभ प्रति शामिल है। जैन धर्म में कल्पसूत्र का विशेष महत्व है और इसमें भगवान महावीर सहित जैन तीर्थंकरों के जीवन का विस्तृत वर्णन मिलता है।
इसके अलावा 1688 की एक बेहद पतली और नाजुक पांडुलिपि भी इस संग्रह का हिस्सा है, जिसे 'वैद्यमनोत्सव' की सबसे पुरानी बची हुई प्रति माना जा रहा है। यह ग्रंथ मूल रूप से 1592 में लिखा गया था और इसे शुरुआती हिंदी का पहला चिकित्सा ग्रंथ माना जाता है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि उस समय भारतीय भाषाओं में चिकित्सा विज्ञान और लोक ज्ञान कितनी गहराई से विकसित हो चुका था।
विशेषज्ञों के मुताबिक इन पांडुलिपियों में कई ऐसे दस्तावेज भी मौजूद हैं जो भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से पहले नैतिक प्रतिरोध और अहिंसक विचारों की झलक दिखाते हैं। माना जाता है कि बाद में महात्मा गांधी ने भी इसी तरह के नैतिक सिद्धांतों को व्यापक रूप से अपनाया और लोकप्रिय बनाया।
औपनिवेशिक दौर में भारत से बाहर गई थीं पांडुलिपियां
वेलकम कलेक्शन के अनुसार, इन पांडुलिपियों का बड़ा हिस्सा औपनिवेशिक काल के दौरान ब्रिटिश उद्यमी सर हेनरी वेलकम के लिए खरीदा गया था। जानकारी के मुताबिक ये सामग्री पंजाब के एक जैन मंदिर से ली गई थी, जो अब अस्तित्व में नहीं है।
रिपोर्टों के अनुसार उस समय इन पांडुलिपियों को बेहद कम कीमत पर खरीदा गया था और इस प्रक्रिया में मूल मालिकों या समुदाय के हितों का पर्याप्त ध्यान नहीं रखा गया। यही वजह है कि अब इनकी वापसी को केवल संग्रहालयीय प्रक्रिया नहीं बल्कि ऐतिहासिक सुधार के रूप में भी देखा जा रहा है। इतिहासकारों का मानना है कि औपनिवेशिक शासन के दौरान भारत, अफ्रीका और एशिया के कई देशों से बड़ी मात्रा में कला, मूर्तियां, पांडुलिपियां और सांस्कृतिक धरोहर यूरोप पहुंचाई गई थीं। इनमें से कई वस्तुएं आज भी पश्चिमी संग्रहालयों में मौजूद हैं।
पहले यूनिवर्सिटी ऑफ बर्मिंघम में रखा जाएगा संग्रह
समझौते के तहत इन पांडुलिपियों को सीधे भारत नहीं भेजा जाएगा। पहले इन्हें यूनिवर्सिटी ऑफ़ बर्मिंघम के धर्मनाथ नेटवर्क इन जैन स्टडीज में रखा जाएगा। वहां इनका अध्ययन, संरक्षण और डिजिटलीकरण किया जाएगा ताकि शोधकर्ता, विद्यार्थी और जैन समुदाय के लोग इन तक आसानी से पहुंच सकें। विशेषज्ञों का कहना है कि कई पांडुलिपियां इतनी पुरानी और नाजुक हैं कि उन्हें तुरंत स्थानांतरित करना जोखिम भरा हो सकता है। इसलिए पहले इनके संरक्षण और अध्ययन पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।
जैन समुदाय के लिए भावनात्मक पल
इंस्टीट्यूट ऑफ जैनोलॉजी के मैनेजिंग ट्रस्टी मेहुल संघराजका ने इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि इससे जैन विद्वता को नई दिशा मिलेगी और समुदाय को अपनी सांस्कृतिक विरासत के साथ दोबारा जुड़ने का अवसर मिलेगा।
उन्होंने यह भी कहा कि वेलकम कलेक्शन ने दशकों तक इन पांडुलिपियों की अच्छी तरह देखभाल की, जिसके लिए संस्था धन्यवाद की पात्र है। उनके मुताबिक अब जरूरत इस बात की है कि इन ग्रंथों को नई पीढ़ी तक पहुंचाया जाए ताकि लोग अपने इतिहास और ज्ञान परंपरा को बेहतर ढंग से समझ सकें।
नैतिक जिम्मेदारी का उदाहरण बना फैसला
वेलकम कलेक्शन के एसोसिएट डायरेक्टर डैनियल मार्टिन ने कहा कि यह सहयोग दोनों पक्षों के बीच विश्वास और सम्मान का मजबूत उदाहरण है। उन्होंने इसे सांस्कृतिक विरासत को नैतिक तरीके से संभालने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया। पिछले कुछ वर्षों में दुनिया के कई बड़े संग्रहालय इसी तरह की पहल कर चुके हैं। यूरोप और अमेरिका के संस्थानों पर लगातार दबाव बढ़ रहा है कि वे औपनिवेशिक दौर में ले जाई गई वस्तुओं की उत्पत्ति और स्वामित्व की निष्पक्ष समीक्षा करें।
कैटलॉगिंग का काम पहले ही हो चुका है
इन पांडुलिपियों को व्यवस्थित रूप से संरक्षित और सूचीबद्ध करने का काम 2000 के शुरुआती वर्षों में शुरू हुआ था। इस प्रक्रिया में दो कन्हैयालाल वीर जी और डॉक्टर कल्पना सेठ ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
इंस्टीट्यूट ऑफ जैनोलॉजी की मदद से इन पांडुलिपियों का विस्तृत कैटलॉग तैयार किया गया। समझौते के अनुसार यह कैटलॉग और उससे जुड़े नोट्स अब वेलकम कलेक्शन की वेबसाइट पर भी उपलब्ध कराए जाएंगे, ताकि दुनियाभर के शोधकर्ता इनका उपयोग कर सकें।
शोधकर्ताओं और विद्यार्थियों को होगा बड़ा फायदा
डॉ. मैरी-हेलेन गोरिस ने कहा कि सभी संस्थाएं मिलकर काम करेंगी ताकि ये पांडुलिपियां केवल संग्रहालयों तक सीमित न रहें बल्कि छात्रों, शोधकर्ताओं और आम लोगों तक भी पहुंच सकें डॉ. मैरी-हेलेन गोरिस एक विदुषी और शोधकर्ता हैं, जो ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ़ बर्मिंघम में जैन अध्ययन और भारतीय दर्शन से जुड़े अकादमिक कार्यों से जुड़ी हुई हैं।
वे विशेष रूप से जैन दर्शन, भारतीय बौद्धिक परंपरा और प्राचीन पांडुलिपियों पर शोध के लिए जानी जाती हैं। जैन पांडुलिपियों की वापसी और संरक्षण से जुड़े इस प्रोजेक्ट में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका बताई गई है। उन्होंने कहा है कि इन दुर्लभ पांडुलिपियों को छात्रों, शोधकर्ताओं और आम लोगों तक पहुंचाने के लिए सभी संस्थाएं मिलकर काम करेंगी, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग इस सांस्कृतिक विरासत का अध्ययन कर सकें। विशेषज्ञों का मानना है कि इन ग्रंथों के अध्ययन से भारतीय भाषाओं, चिकित्सा विज्ञान, दर्शन और सामाजिक इतिहास के कई अनछुए पहलुओं पर नई जानकारी सामने आ सकती है। खासकर शुरुआती हिंदी और प्राकृत साहित्य के अध्ययन में यह संग्रह बेहद उपयोगी साबित होगा।
सांस्कृतिक विरासत बचाने की बढ़ती मुहिम
दुनियाभर में अब सांस्कृतिक विरासत की वापसी को लेकर नई बहस तेज हो गई है। भारत भी लंबे समय से विदेशों में मौजूद अपनी कई ऐतिहासिक मूर्तियों, कलाकृतियों और पांडुलिपियों की वापसी की मांग करता रहा है। पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन से कई प्राचीन भारतीय मूर्तियां और कलाकृतियां वापस लाई गई हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि सांस्कृतिक धरोहर केवल पुरानी वस्तुएं नहीं होतीं, बल्कि वे किसी समाज की पहचान, स्मृति और इतिहास का हिस्सा होती हैं। ऐसे में जैन पांडुलिपियों की यह वापसी केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि सांस्कृतिक सम्मान और ऐतिहासिक न्याय की दिशा में बड़ा कदम मानी जा रही है। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने भी कहा है कि लंदन से मां वाग्देवी की प्रतिमा को वापस भोजशाला लाया जाएगा। जिसकी तैयारियां अब शुरू हो चुकी हैं।
नई पीढ़ी को मिलेगा अपने इतिहास से जुड़ने का मौका
डिजिटल तकनीक और आधुनिक संरक्षण प्रणाली के जरिए अब इन पांडुलिपियों को ज्यादा लोगों तक पहुंचाने की योजना है। इससे नई पीढ़ी भारतीय ज्ञान परंपरा, जैन दर्शन और प्राचीन साहित्य को करीब से समझ सकेगी।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इन ग्रंथों का अनुवाद और डिजिटलीकरण बड़े स्तर पर किया गया, तो आने वाले वर्षों में भारतीय इतिहास और संस्कृति पर शोध को नई दिशा मिल सकती है। जैन समुदाय के लिए यह केवल धरोहर वापसी नहीं, बल्कि अपनी जड़ों और बौद्धिक परंपरा से दोबारा जुड़ने का ऐतिहासिक अवसर माना जा रहा है।


