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CEC ज्ञानेश कुमार पर चल सकता है मुकदमा…पुराने केस में क्यों नहीं चलेगा धारा 16 का कवच?
CEC Gyanesh Kumar Row: ज्ञानेश कुमार के 2006 के पुराने केस में जांच को लेकर सवाल उठ रहा है। जानिए CEC को मिली धारा 16 की इम्युनिटी पुराने गैर-आधिकारिक कार्यों पर क्यों लागू नहीं होती।
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CEC Gyanesh Kumar Row: भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त यानी सीईसी (Chief Election Commissioner) का पद देश की चुनावी व्यवस्था में बेहद संवेदनशील माना जाता है। मुख्य चुनाव आयुक्त पूरे देश की लोकतांत्रिक और चुनाव व्यवस्था से जुड़ी जिम्मेदारियों को संभालने वाला महत्वपूर्ण संवैधानिक अधिकारी होता है। भारत के राष्ट्रपति मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करते हैं। इससे पहले एक चयन समिति मुख्य चुनाव आयुक्त के नाम पर आखिरी मुहर लगाती है। इस चयन समिति में प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष और एक कैबिनेट मंत्री शामिल होते हैं।
लेकिन मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार (Gyanesh Kumar) से जुड़े एक पुराने मामले की जांच के आदेश के बाद एक अहम कानूनी सवाल सामने आया है। सवाल यह है कि जब किसी व्यक्ति को सीईसी के पद पर रहते हुए विशेष कानूनी संरक्षण हासिल है, तो क्या उसके सीईसी बनने से पहले किए गए कथित कामों की जांच या मुकदमा चलाया जा सकता है।
यही सवाल संविधान के अनुच्छेद 324 (Article 324) और मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम, 2023 (Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners Act, 2023) की धारा 16 (Section 16) के संदर्भ में महत्वपूर्ण हो जाता है।
CEC के खिलाफ मुकदमा चलाने पर क्या है नियम?
संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग (Election Commission) को स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की जिम्मेदारी दी गई है। चुनाव आयोग की इस स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों को विशेष कानूनी संरक्षण दिया गया है।
इसका सीधा मतलब यह है कि कोई भी अदालत मुख्य चुनाव आयुक्त या चुनाव आयुक्त के खिलाफ सिविल या आपराधिक कार्यवाही नहीं चला सकती, अगर जिस काम को आधार बनाकर कार्रवाई की जा रही है, वह उनके आधिकारिक कर्तव्य या कार्य के निर्वहन में या उसके दौरान किया गया हो।
यानी अगर सीईसी अपने आधिकारिक पद पर रहते हुए चुनाव से जुड़ा कोई फैसला लेते हैं, आदेश जारी करते हैं या अपने संवैधानिक दायित्व के तहत कोई काम करते हैं, तो उस काम के आधार पर उनके खिलाफ अदालत में सिविल या आपराधिक मुकदमा चलाने पर कानून विशेष सुरक्षा देता है।
धारा 16 में क्या लिखा है?
इस कानूनी सुरक्षा को 2023 में पारित मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम की धारा 16 में स्पष्ट किया गया है। धारा 16 के मुताबिक, कोई भी अदालत मौजूदा या पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त अथवा चुनाव आयुक्त के खिलाफ सिविल या आपराधिक कार्यवाही नहीं चला सकती, अगर वह कार्य उनके आधिकारिक कर्तव्य या कार्य के निर्वहन में या उसके दौरान किया गया हो।
यानी यह सुरक्षा केवल उस समय तक सीमित नहीं है, जब कोई व्यक्ति सीईसी या चुनाव आयुक्त के पद पर है। यह सुरक्षा उनके पद से हटने या रिटायर होने के बाद भी बनी रहती है।
इसका मतलब यह हुआ कि अगर किसी व्यक्ति ने सीईसी या चुनाव आयुक्त रहते हुए अपने आधिकारिक दायित्व के तहत कोई फैसला लिया था, तो रिटायरमेंट के बाद भी उस फैसले को आधार बनाकर उसके खिलाफ सिविल या आपराधिक कार्यवाही शुरू करना सामान्य स्थिति में धारा 16 के संरक्षण के दायरे में आएगा।
क्या CEC को हर अपराध में इम्युनिटी है?
यहां सबसे अहम बात यह है कि धारा 16 को इस तरह नहीं समझा जा सकता कि मुख्य चुनाव आयुक्त को हर तरह के अपराध में पूरी इम्युनिटी (Immunity) हासिल है। कानून की भाषा इस सुरक्षा को उस काम, चीज या शब्द से जोड़ती है, जो आधिकारिक ड्यूटी या काम को पूरा करते समय या ऐसा करने का दिखावा करते हुए किया या कहा गया हो।
इसलिए यह कहना पूरी तरह सही नहीं होगा कि सीईसी को हर अपराध में पूर्ण कानूनी सुरक्षा मिली हुई है। धारा 16 में गिरफ्तारी (Arrest), पुलिस जांच (Police Investigation) या पुलिस हिरासत (Police Custody) जैसे शब्द सीधे तौर पर नहीं लिखे गए हैं। इसमें यह कहा गया है कि अदालत धारा के दायरे में आने वाली सिविल या क्रिमिनल कार्यवाही को स्वीकार या जारी नहीं रखेगी।
यही वजह है कि किसी मामले में जांच या गिरफ्तारी पर इस प्रावधान का वास्तविक प्रभाव क्या होगा, यह आरोपों की प्रकृति और अदालत की कानूनी व्याख्या पर निर्भर करेगा।
अब ज्ञानेश कुमार का पुराना मामला क्यों चर्चा में है?
हाल ही में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर केरल से एक पुराना मामला फिर चर्चा में आया है। केरल की कांग्रेस सरकार ने 4 अक्टूबर 2026 को ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विजिलेंस एंड एंटी-करप्शन ब्यूरो (Vigilance and Anti-Corruption Bureau) जांच का आदेश दिया है।
यह मामला उस समय का है, जब ज्ञानेश कुमार मुख्य चुनाव आयुक्त नहीं थे। मामला 2006 का है और उस समय वह केरल कैडर के आईएएस अधिकारी (IAS Officer) के रूप में राज्य के लोक निर्माण विभाग यानी पीडब्ल्यूडी (PWD) के सचिव थे।
यहीं से यह सवाल पैदा होता है कि क्या किसी व्यक्ति के सीईसी बनने से पहले के कथित कृत्यों की जांच बाद में भी की जा सकती है।
क्या था 2006 का मामला?
केरल के गृह मंत्री रमेश चेन्निथला के अनुसार, मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर केरल लोक निर्माण विभाग के सचिव रहते हुए गड़बड़ी के आरोप हैं। इस मामले में भ्रष्टाचार के आरोपों के साथ साल 2006 में मलेशियाई सिविल इंजीनियर लीसी बीन की आत्महत्या का मामला भी जुड़ा है। लीसी बीन इंडो-मलेशियन ज्वाइंट वेंचर यानी पीएटीआई-बीईएल (PATI-BEL) से जुड़े हुए थे।
यानी जिस अवधि के आरोपों की जांच की जा रही है, उस समय ज्ञानेश कुमार मुख्य चुनाव आयुक्त के पद पर नहीं थे। वह राज्य सरकार में एक अधिकारी के रूप में काम कर रहे थे। क्या CEC बनने के बाद पुराने आरोपों पर जांच हो सकती है। यही इस पूरे मामले का सबसे अहम कानूनी सवाल है।
संविधान के अनुच्छेद 324(5) और मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 16 में दी गई सुरक्षा उन कार्यों से जुड़ी है, जो व्यक्ति मुख्य चुनाव आयुक्त या चुनाव आयुक्त के रूप में अपनी आधिकारिक ड्यूटी निभाते हुए करता है। अनुच्छेद 324(5) में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग (Impeachment) की प्रक्रिया का भी प्रावधान है।
लेकिन ये प्रावधान उस समय किए गए कथित कार्यों पर लागू नहीं होते, जब संबंधित व्यक्ति सीईसी या चुनाव आयुक्त के पद पर था ही नहीं। यानी अगर किसी व्यक्ति पर जिला कमिश्नर, सचिव या किसी दूसरे सरकारी पद पर रहते हुए कथित भ्रष्टाचार, कदाचार या आपराधिक मामले से जुड़े आरोप हैं, तो बाद में सीईसी बनने से उन पुराने आरोपों पर स्वतः कानूनी इम्युनिटी नहीं मिल जाती।
इसी आधार पर राज्य सरकार या सक्षम जांच एजेंसी ऐसे पुराने मामलों की जांच कर सकती है, एफआईआर दर्ज कर सकती है और परिस्थितियों के मुताबिक मुकदमा चलाने की प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है।
लेकिन जांच में भी कई कानूनी शर्तें लागू होंगी
इसका मतलब यह भी नहीं है कि पुराने आरोपों से जुड़े हर मामले में कार्रवाई अपने आप हो जाएगी। ऐसे मामलों में कानून की दूसरी शर्तें भी लागू होती हैं। मसलन, कुछ मामलों में समय-सीमा यानी लिमिटेशन (Limitation) का सवाल उठ सकता है। अगर किसी अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई के लिए उसके सर्विस नियमों के तहत पूर्व अनुमति या सेंक्शन जरूरी है, तो वह प्रक्रिया भी पूरी करनी होगी।
इसके अलावा अगर किसी जांच को दुर्भावनापूर्ण यानी मालाफाइड (Mala Fide) माना जाता है, तो उसे अदालत में चुनौती दी जा सकती है। इसलिए किसी मामले में जांच शुरू होना और अदालत में आरोप साबित होना दो अलग-अलग बातें हैं। जांच में किसी व्यक्ति पर आरोप सामने आना अलग प्रक्रिया है और उसके खिलाफ अदालत में अभियोजन यानी प्रॉसिक्यूशन (Prosecution) चलना अलग कानूनी चरण है।
DGP की राय के बाद जांच का आदेश
केरल के गृह मंत्री रमेश चेन्निथला ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ जांच की घोषणा डायरेक्टर जनरल ऑफ प्रॉसिक्यूशन यानी डीजीपी (Director General of Prosecution) की कानूनी राय के बाद की है।
द न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, डीजीपी की राय में यह कहा गया कि ‘अपराध कभी खत्म नहीं होता’ एक बुनियादी कानूनी सिद्धांत है।
राय में कहा गया कि भ्रष्टाचार, अधिकार का दुरुपयोग, अनुचित लाभ उठाना और आत्महत्या के लिए उकसाने जैसे गंभीर अपराधों के कानूनी परिणाम केवल समय बीत जाने से अपने आप खत्म नहीं हो जाते। ऐसे मामलों में अदालत आरोपी व्यक्ति को जवाबदेह ठहरा सकती है।
तो क्या ज्ञानेश कुमार को पुराने मामले में इम्युनिटी नहीं मिलेगी?
पूरे मामले को आसान भाषा में समझें तो मुख्य चुनाव आयुक्त को मिली कानूनी सुरक्षा उनके आधिकारिक चुनावी काम से जुड़ी है। यह सुरक्षा उन कार्यों के लिए है, जो उन्होंने सीईसी या चुनाव आयुक्त के रूप में अपनी आधिकारिक जिम्मेदारी निभाते हुए किए हैं।
लेकिन अगर आरोप उस समय के हैं, जब वह सीईसी नहीं थे और किसी दूसरे सरकारी पद पर काम कर रहे थे, तो बाद में सीईसी बनने से उन कथित पुराने अपराधों पर अपने आप पूर्ण कानूनी इम्युनिटी नहीं मिल जाती।
हालांकि किसी मामले में वास्तव में जांच होगी, गिरफ्तारी की स्थिति बनेगी या अदालत में अभियोजन चल सकेगा या नहीं, इसका अंतिम फैसला संबंधित कानूनी प्रावधानों, मामले के तथ्यों और अदालत की व्याख्या पर निर्भर करेगा।
यानी सीईसी के पद को मिली सुरक्षा का दायरा मुख्य रूप से उनके आधिकारिक चुनावी कार्यों से जुड़ा है। पुराने गैर-चुनावी कार्यकाल से जुड़े कथित अपराधों के लिए इस पद को अपने आप पूर्ण इम्युनिटी देने वाला प्रावधान नहीं माना जा सकता।


