"क्या पूरे पुरुष समाज का ठेका आपने ले रखा है?" CJI सूर्यकांत ने कोर्ट में छात्र को लगाई कड़ी फटकार

CJI Surya Kant News: भारत के सर्वोच्च न्यायालय में आज 11 मई यानी सोमवार को एक ऐसी जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई हुई, जिसने अदालत को बेहद नाराज कर दिया।

Priya Singh Bisen
Published on: 11 May 2026 3:23 PM IST
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CJI Surya Kant News: भारत के सर्वोच्च न्यायालय में आज 11 मई यानी सोमवार को एक ऐसी जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई हुई, जिसने अदालत को बेहद नाराज कर दिया। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने हिंदू विवाह अधिनियम की एक धारा को चुनौती देने वाले लॉ स्टूडेंट को कड़ी फटकार लगाई और कहा कि अदालत का इस्तेमाल निजी दुश्मनी निकालने के लिए नहीं किया जा सकता।

लॉ के छात्र ने की याचिका दाखिल

दरअसल, लॉ के छात्र जितेंद्र सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(2)(iii) की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी थी। इस प्रावधान के अंतर्गत पत्नी को यह खासतौर से अधिकार दिया गया है कि यदि पति के खिलाफ गुजारा भत्ता (Maintenance) का आदेश पारित होने के एक साल या उससे ज्यादा वक़्त बाद भी दोनों साथ रहना शुरू नहीं करते हैं, तो पत्नी तलाक की अर्जी दाखिल कर सकती है।

याचिकाकर्ता का कहना था कि यह प्रावधान सिर्फ महिलाओं को अधिकार प्रदान करता है और पुरुषों के साथ भेदभाव करता है। उसने कोर्ट से मांग की कि इस धारा को "जेंडर न्यूट्रल" बनाया जाए ताकि पुरुषों को भी समान अधिकार मिल सके।

"आप पूरे पुरुष समाज का प्रतिनिधित्व कैसे कर सकते हैं?"

इस मामले की सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्य बागची की पीठ ने याचिकाकर्ता से कई सवाल पूछे। मुख्य न्यायाधीश ने तीखे अंदाज में कहा, “आप इस कानून से व्यक्तिगत रूप से कैसे प्रभावित हो रहे हैं? क्या आपको लगता है कि पूरे पुरुष समाज का प्रतिनिधित्व आप ही करते हैं?”

कोर्ट के सवालों के जवाब में छात्र ने स्वीकार किया कि वह बीते 7-8 सालों से वैवाहिक मुकदमों में बुरी तरह से उलझा हुआ है। इस पर CJI सूर्यकांत ने कहा कि यह याचिका जनहित से अधिक निजी विवाद का हिस्सा लगती है।

उन्होंने कहा, “आप इस PIL के माष्यम से अपना निजी बदला लेना चाहते हैं। हम आप पर जुर्माना क्यों न लगाएं? उम्मीद है कि आप कानून की पढ़ाई केवल इसी उद्देश्य से नहीं कर रहे होंगे।”

अदालत ने सुनवाई से किया इनकार

सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर सुनवाई करने से साफ मना कर दिया। अदालत ने साफ़ किया कि जनहित याचिकाओं का मकसद समाज के व्यापक हित से जुड़े मुद्दों को उठाना होता है, न कि व्यक्तिगत विवादों को संवैधानिक मुद्दा बनाकर पेश करना।

सुनवाई के दौरान जस्टिस जोयमाल्य बागची ने भी महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि संविधान सरकार को महिलाओं और बच्चों के लिए खास प्रावधान बनाने की अनुमति देता है। उन्होंने कहा, “यदि आप हर मामले में पूरी तरह समानता चाहते हैं, तो इसके लिए संविधान में संशोधन कराना होगा। यह एक विशेष कानून है, जिसे महिलाओं की सुरक्षा और अधिकारों को ध्यान में रखकर बनाया गया है।”

सोशल मीडिया पर भी चर्चा तेज

सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया पर भी तगड़ी बहस छिड़ गई है। कुछ लोग अदालत के रुख का समर्थन कर रहे हैं, जबकि कुछ लोग कानूनों को जेंडर न्यूट्रल बनाने की मांग उठा रहे हैं। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट रूप से संकेत दिया कि व्यक्तिगत मामलों को जनहित याचिका का रूप देकर न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग स्वीकार नहीं किया जाएगा।

Priya Singh Bisen

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