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CJP प्रदर्शन मामला: सुप्रीम कोर्ट की फटकार, छात्र को नोटिस देने वाला मजिस्ट्रेट निलंबित
Delhi News: सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेश के बावजूद छात्र को नोटिस देने पर उत्तर प्रदेश सरकार ने कार्यकारी मजिस्ट्रेट को निलंबित किया, अदालत ने मामले में कड़ी नाराजगी जताई।
CJP प्रदर्शन मामला: सुप्रीम कोर्ट की फटकार, छात्र को नोटिस देने वाला मजिस्ट्रेट निलंबित (Photo- Social Media)
New Delhi: कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के छात्र प्रदर्शनों से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेश के बावजूद गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के छात्र अक्षत त्रिपाठी के खिलाफ निवारक कार्रवाई शुरू करना ग्रेटर नोएडा प्रशासन के एक अधिकारी को भारी पड़ गया है। सुप्रीम कोर्ट की कड़ी नाराजगी के एक दिन बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने छात्र को पांच लाख रुपये का निजी बंधपत्र देने संबंधी नोटिस जारी करने वाले कार्यकारी मजिस्ट्रेट को निलंबित कर दिया। गुरुवार, 10 सितंबर को सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट को इस कार्रवाई की जानकारी दी। एक दिन पहले मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सवाल किया था कि जब सर्वोच्च न्यायालय पहले ही छात्र प्रदर्शनकारियों से जुड़ी एफआईआर और कार्यवाही समाप्त करने तथा उनके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई नहीं करने का स्पष्ट आदेश दे चुका है, तब कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने ऐसा नोटिस जारी करने की हिम्मत कैसे की।
मामला गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय में बीए-एलएलबी द्वितीय वर्ष के 20 वर्षीय छात्र अक्षत त्रिपाठी से जुड़ा है। अक्षत स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया की गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय इकाई के सचिव भी हैं। उन्होंने जुलाई में दिल्ली के जंतर-मंतर पर सीजेपी से जुड़े छात्र प्रदर्शन में हिस्सा लिया था। ग्रेटर नोएडा के कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने 4 सितंबर को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 130 के तहत उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किया। यह कार्यवाही धारा 126 और 135 के तहत शुरू की गई निवारक प्रक्रिया से निकली थी। पुलिस रिपोर्ट में आरोप लगाया गया था कि अक्षत विश्वविद्यालय के दूसरे छात्रों के बीच सरकार-विरोधी और कथित रूप से भ्रामक बातें फैला रहे थे और उन्हें सीजेपी के प्रदर्शन में शामिल होने के लिए प्रेरित कर रहे थे, जिससे परिसर में तनाव और शांति भंग होने की आशंका पैदा हो सकती थी। इसी आधार पर उनसे पूछा गया कि उन्हें छह महीने तक शांति बनाए रखने के लिए पांच लाख रुपये का निजी बंधपत्र और इतनी ही रकम के दो स्थानीय सक्षम जमानतदार देने का आदेश क्यों न दिया जाए। अक्षत ने आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि उनका कोई आपराधिक इतिहास नहीं है और वे यह जानना चाहते हैं कि आखिर किस आधार पर उनके खिलाफ ऐसी कार्रवाई शुरू की गई।
इस नोटिस ने इसलिए गंभीर कानूनी सवाल खड़ा किया क्योंकि इससे केवल तीन दिन पहले, 1 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट सीजेपी के नेतृत्व में हुए छात्र प्रदर्शनों से संबंधित मामलों में व्यापक आदेश दे चुका था। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ, जिसमें जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल थे, ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए 20 से 25 जुलाई के प्रदर्शनों से जुड़ी एफआईआर और कार्यवाही समाप्त करने का आदेश दिया था। अदालत का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना भी था कि प्रदर्शन में शामिल छात्रों का भविष्य इन मुकदमों के कारण प्रभावित न हो। हालांकि अदालत ने 2,873 ऐसे व्यक्तियों के मामले में अलग जांच की अनुमति दी थी, जिनके बारे में दिल्ली पुलिस ने गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि होने का दावा किया था।
इसके बावजूद 4 सितंबर को अक्षत के खिलाफ निवारक कार्रवाई शुरू हुई। मामला सामने आने के बाद जांच की गई और अगले दिन 5 सितंबर को नोटिस निरस्त कर दिया गया। पुलिस की ओर से बाद में कहा गया कि जिस सूचना के आधार पर कार्रवाई शुरू की गई थी, वह जांच में गलत पाई गई। पुलिस ने यह भी स्पष्ट किया कि गौतमबुद्ध नगर में पुलिस आयुक्त प्रणाली लागू होने के कारण यह कार्रवाई कार्यकारी मजिस्ट्रेट की व्यवस्था के तहत हुई थी और जिलाधिकारी का इस नोटिस को जारी करने से संबंध नहीं था। नोटिस जारी करने से जुड़े कर्मचारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू किए जाने की जानकारी भी सामने आई।
मामला यहीं समाप्त नहीं हुआ। अक्षत त्रिपाठी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर नोटिस और उससे जुड़ी कार्यवाही को चुनौती दी। उनकी याचिका में कहा गया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धाराओं 126 और 135 के जरिए ऐसी निवारक कार्यवाही करना वास्तव में सुप्रीम कोर्ट के 1 सितंबर के आदेश को दूसरे रास्ते से निष्प्रभावी करने जैसा है। याचिका में संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के उल्लंघन का भी सवाल उठाया गया है। अक्षत ने यह भी कहा कि पांच लाख रुपये का निजी बंधपत्र और समान रकम के दो जमानतदार मांगना व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर गंभीर असर डालता है, जबकि जवाब देने के लिए केवल एक दिन दिया जाना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत था। याचिका में जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की मांग भी की गई। मामले का शीर्षक ‘अक्षत त्रिपाठी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य’ है और इसे डायरी संख्या 55734/2026 के रूप में दर्ज किया गया।
बुधवार को वरिष्ठ अधिवक्ता बिश्वजीत भट्टाचार्य ने मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ के सामने यह मामला उठाया। मुख्य न्यायाधीश ने कड़ी नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा कि सर्वोच्च न्यायालय का आदेश बिल्कुल स्पष्ट था कि प्रदर्शन में भाग लेने के कारण छात्रों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई नहीं होनी चाहिए। अदालत ने सवाल किया कि ऐसे स्पष्ट आदेश के बावजूद कार्यकारी मजिस्ट्रेट नोटिस कैसे जारी कर सकता है। पीठ ने संबंधित अधिकारी से स्पष्टीकरण मांगने की बात कही। इसके बाद गुरुवार को सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि नोटिस जारी करने वाले मजिस्ट्रेट को निलंबित कर दिया गया है। इस तरह मामला केवल नोटिस वापस लेने तक सीमित नहीं रहा बल्कि संबंधित अधिकारी के खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई तक पहुंच गया।
इसी सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश से जुड़ा एक दूसरा महत्वपूर्ण मामला भी सामने आया। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि नोएडा के श्रमिक आंदोलन से जुड़े मामले में दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा और कार्यकर्ता आकृति चौधरी की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत हिरासत रद्द करने वाले इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी जाएगी। आकृति को अप्रैल में नोएडा के श्रमिक आंदोलन से जुड़े मामले में हिरासत में लिया गया था और बाद में मई में उनके खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लगाया गया। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2 सितंबर को उनकी रासुका हिरासत को रद्द करते हुए प्रशासन की कार्रवाई पर असाधारण रूप से कठोर टिप्पणी की।
जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की पीठ ने आकृति की हिरासत को मनमाना बताते हुए उन्हें पांच लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया और कहा कि यह राशि गौतमबुद्ध नगर की जिलाधिकारी मेधा रूपम तथा कार्रवाई के लिए जिम्मेदार अन्य अधिकारियों के वेतन से वसूली जाए। हाईकोर्ट ने प्रशासनिक रिकॉर्ड में गड़बड़ियों पर भी गंभीर सवाल उठाए और कहा कि नौकरशाहों और पुलिस अधिकारियों की निष्ठा संविधान के प्रति होनी चाहिए, न कि राजनीतिक कार्यपालिका के प्रति। अदालत ने यहां तक चेतावनी दी कि यदि अधिकारियों द्वारा शक्तियों का इस प्रकार इस्तेमाल जारी रहा तो उत्तर प्रदेश को एक ‘ऑरवेलियन डिस्टोपिया’, यानी अत्यधिक दमन और नियंत्रण वाली व्यवस्था में बदलने का खतरा पैदा हो सकता है। उत्तर प्रदेश सरकार अब इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की तैयारी में है।
अक्षत त्रिपाठी और आकृति चौधरी के दोनों मामले लगभग एक ही समय न्यायपालिका के सामने आने के कारण प्रशासनिक शक्तियों, शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार और नागरिक स्वतंत्रता को लेकर व्यापक सवाल खड़े कर रहे हैं। अक्षत के मामले में सुप्रीम कोर्ट के पहले से मौजूद स्पष्ट आदेश के बावजूद निवारक नोटिस जारी होना और आकृति के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के इस्तेमाल पर इतनी कठोर टिप्पणी करना बताता है कि अदालतें अब यह भी जांच रही हैं कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर इस्तेमाल की जाने वाली असाधारण या निवारक शक्तियां कहीं नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों को दबाने का साधन तो नहीं बन रही हैं। अक्षत मामले में मजिस्ट्रेट का निलंबन इस विवाद का अब तक का सबसे महत्वपूर्ण नया घटनाक्रम है।


