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भगदड़ और मौतें: भारत बन रहा है भीड़ से होने वाली त्रासदियों का केंद्र!
Crowd Stampedes in India: भारत में भगदड़ और भीड़ से होने वाली त्रासदियों का सिलसिला लंबे समय से जारी है। जानिए कोलकाता से लेकर मंधारदेवी, नैना देवी और दतिया तक हुए बड़े हादसों से क्या सीख मिलती है और भीड़ प्रबंधन कैसे बेहतर किया जा सकता है।
Crowd Stampedes in India
Crowd Stampedes in India: कोलकाता के एक दुर्गा पूजा पंडाल में भगदड़ से हुई मौतों ने एक बार फिर भारत में भीड़ प्रबंधन और सार्वजनिक आयोजनों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। धार्मिक आस्था और उत्सवों के बीच हुई इस त्रासदी ने उन पुराने हादसों की याद ताजा कर दी है, जिनमें सैकड़ों लोगों की जान चली गई थी। प्रयागराज के कुंभ से लेकर हाथरस के सत्संग और विभिन्न मंदिरों में हुई भगदड़ तक, बार-बार सामने आती ऐसी घटनाएं बताती हैं कि बड़े आयोजनों में भीड़ को सुरक्षित ढंग से संभालना अब भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
दरअसल, भारत में बड़ी भीड़ वाले धार्मिक आयोजनों के दौरान होने वाले हादसों का सिलसिला लंबे समय से जारी है। सवाल यह है कि बार-बार होने वाली इन त्रासदियों के बावजूद ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं बन पाई है, जिससे भीड़ का दबाव बढ़ने पर भी लोगों की जान बचाई जा सके।कोलकाता की घटना को भी इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने की जरूरत है।
दुर्घटनाओं का नक्शा: भारत और पश्चिमी अफ्रीका संवेदनशील क्षेत्र
दुनियाभर में भगदड़ और भीड़ के दबाव से होने वाले हादसों पर 2023 में प्रकाशित एक वैज्ञानिक अध्ययन भारत के लिए गंभीर चेतावनी देता है। सेफ्टी साइंस जर्नल में प्रकाशित इस शोध में वैज्ञानिकों ने वर्ष 1900 से 2019 के बीच हुई भीड़ संबंधी 281 प्रमुख दुर्घटनाओं का डेटाबेस तैयार किया था। इसमें उन घटनाओं को शामिल किया गया, जिनमें कम से कम एक व्यक्ति की मौत हुई या दस अथवा उससे अधिक लोग घायल हुए।
अध्ययन के अनुसार, भारत और पश्चिमी अफ्रीका दुनिया में भीड़ संबंधी दुर्घटनाओं के प्रमुख केंद्रों में शामिल हैं। शोधकर्ताओं ने पाया कि समय के साथ इन हादसों की रिपोर्ट की गई संख्या में वृद्धि हुई है। वर्ष 1990 से 1999 के दौरान ऐसी घटनाओं की औसत संख्या लगभग तीन प्रतिवर्ष थी, जो 2010 से 2019 के बीच बढ़कर लगभग 12 प्रतिवर्ष हो गई।
हालांकि, शोधकर्ताओं ने यह भी स्पष्ट किया कि इस बढ़ोतरी का एक हिस्सा संचार तकनीक, इंटरनेट और सोशल मीडिया के प्रसार के कारण हो सकता है, जिनसे दुर्घटनाओं की जानकारी पहले की तुलना में अधिक व्यापक रूप से सामने आने लगी है। इसलिए आंकड़ों में वृद्धि को केवल वास्तविक हादसों की संख्या में बढ़ोतरी के रूप में नहीं देखा जा सकता।
सुरक्षा उपायों से रोकी जा सकती हैं मौतें
शोधकर्ताओं का मानना है कि भीड़ संबंधी दुर्घटनाओं का व्यवस्थित डेटाबेस तैयार करना और उनका वैज्ञानिक विश्लेषण करना भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने में मददगार हो सकता है।
अध्ययन से जुड़े शोधकर्ताओं में टोक्यो विश्वविद्यालय के क्लाउडियो फेलिचियानी और न्यू साउथ वेल्स विश्वविद्यालय के मिलाद हागानी शामिल हैं। शोध में भीड़ संबंधी दुर्घटनाओं के भौगोलिक वितरण, उनके कारणों और समय के साथ बदलते स्वरूप का विश्लेषण किया गया है।
विशेष रूप से धार्मिक आयोजनों में सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने की जरूरत है। बड़े आयोजनों में लोगों के प्रवेश और निकास के लिए अलग-अलग रास्ते, भीड़ की संख्या पर निगरानी, पर्याप्त निकासी मार्ग, प्रशिक्षित सुरक्षा कर्मी और आपातकालीन चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध होनी चाहिए।
कोलकाता की घटना एक बार फिर इस सवाल को सामने लाती है कि क्या आयोजनों की लोकप्रियता और वहां जुटने वाली भीड़ के अनुपात में सुरक्षा इंतजाम किए जा रहे हैं।
हादसों और आर्थिक-सामाजिक परिस्थितियों का संबंध
शोध में कम और मध्यम आय वाले देशों में भीड़ संबंधी दुर्घटनाओं की अधिक मौजूदगी भी सामने आई। भारत जैसे घनी आबादी वाले देश में धार्मिक आयोजनों, त्योहारों और सार्वजनिक समारोहों के दौरान बड़ी संख्या में लोगों का एक ही स्थान पर जुटना आम बात है।
तेजी से शहरीकरण, सीमित सार्वजनिक स्थानों और परिवहन व्यवस्था पर बढ़ते दबाव के बीच भीड़ प्रबंधन की चुनौती और गंभीर हो जाती है। विशेष रूप से संकरे रास्तों, पुलों, रेलवे स्टेशनों, नदी के घाटों और मंदिरों के आसपास भीड़ का दबाव खतरनाक स्थिति पैदा कर सकता है। हालांकि, किसी दुर्घटना के लिए केवल आबादी के घनत्व या आर्थिक स्थिति को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। आयोजन की योजना, उपलब्ध जगह, प्रवेश और निकास की व्यवस्था, सुरक्षा प्रबंधन और आपातकालीन परिस्थितियों में प्रशासन की प्रतिक्रिया भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
खेल आयोजनों से सीखने की जरूरत
शोध में यह भी सामने आया कि समय के साथ भीड़ संबंधी दुर्घटनाओं में खेल आयोजनों की हिस्सेदारी घटी है, जबकि धार्मिक आयोजनों में ऐसी घटनाओं की मौजूदगी बढ़ी है।
खेल आयोजनों में प्रवेश नियंत्रण, दर्शकों की क्षमता निर्धारित करने, निकासी मार्गों की योजना बनाने और सुरक्षा संबंधी दिशा-निर्देशों को लागू करने पर लंबे समय से काम किया गया है। ब्रिटेन में खेल स्थलों की सुरक्षा के लिए तैयार की गई ग्रीन गाइड भी इसी तरह के प्रयासों का उदाहरण है।
धार्मिक - सांस्कृतिक आयोजनों में ऐसी व्यवस्थाएं लागू करना कई बार अधिक चुनौतीपूर्ण होता है। इनमें प्रवेश अक्सर निःशुल्क होता है, लोगों की संख्या का सटीक अनुमान लगाना कठिन होता है और बड़ी संख्या में लोग एक ही समय पर पहुंच जाते हैं।
लेकिन इन चुनौतियों का अर्थ यह नहीं है कि सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम नहीं किए जा सकते। आयोजकों और प्रशासन को संभावित भीड़ का अनुमान लगाकर उसी के अनुसार व्यवस्था करनी चाहिए। यदि किसी स्थान की क्षमता पूरी हो चुकी है, तो नए लोगों के प्रवेश को अस्थायी रूप से रोकना भी जरूरी है।
देश के बड़े भगदड़ हादसे: हर बार सामने आई सुरक्षा की चुनौती
भारत में पिछले कुछ दशकों के दौरान कई बड़े हादसे हुए हैं। इनमें धार्मिक आयोजनों के अलावा सार्वजनिक समारोहों और त्योहारों के दौरान हुई दुर्घटनाएं भी शामिल हैं।
मंधारदेवी मंदिर, महाराष्ट्र (2005): 25 जनवरी, 2005 को सतारा जिले के मंधारदेवी मंदिर में वार्षिक तीर्थयात्रा के दौरान भगदड़ मच गई थी। इस दुर्घटना में 340 से अधिक लोगों की मौत हुई थी। फिसलन भरी सीढ़ियों और श्रद्धालुओं की भारी भीड़ ने हादसे को गंभीर बना दिया था।
नैना देवी मंदिर, हिमाचल प्रदेश (2008): 3 अगस्त, 2008 को बिलासपुर जिले के नैना देवी मंदिर में भगदड़ मचने से 162 लोगों की मौत हो गई थी। चट्टान गिरने की अफवाह के बाद लोगों में अफरा-तफरी फैल गई थी।
जोधपुर, राजस्थान (2008): 30 सितंबर, 2008 को मेहरानगढ़ किले के पास स्थित चामुंडा देवी मंदिर में भगदड़ हुई थी। इस हादसे में 200 से अधिक श्रद्धालुओं की मौत हुई थी। यह घटना भी धार्मिक स्थल पर भीड़ प्रबंधन की गंभीर चुनौतियों का उदाहरण बनी।
प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश (2010): 4 मार्च, 2010 को कृपालु महाराज के राम जानकी मंदिर में मुफ्त भोजन और कपड़े लेने के लिए जुटी भीड़ के दौरान भगदड़ मच गई थी। इस दुर्घटना में लगभग 63 लोगों की जान चली गई थी।
दतिया, मध्य प्रदेश (2013): 13 अक्टूबर, 2013 को रतनगढ़ मंदिर के पास सिंध नदी पर बने पुल पर भगदड़ मचने से कम से कम 115 लोगों की मौत हो गई थी। नवरात्रि के दौरान जुटी भीड़ के बीच पुल के ढहने की अफवाह फैलने से अफरा-तफरी की स्थिति पैदा हो गई थी।
पटना, बिहार (2014): 3 अक्टूबर, 2014 को दशहरा समारोह समाप्त होने के बाद गांधी मैदान में भगदड़ मच गई थी। इस दुर्घटना में 32 लोगों की मौत हुई थी और कई अन्य घायल हुए थे।
राजमुंदरी, आंध्र प्रदेश (2015): 14 जुलाई, 2015 को गोदावरी नदी के तट पर पुष्करम उत्सव के दौरान भगदड़ में 27 तीर्थयात्रियों की मौत हो गई थी।
इन घटनाओं के अलावा भी भारत में मंदिरों, तीर्थस्थलों, रेलवे स्टेशनों और अन्य सार्वजनिक स्थानों पर भीड़ के दबाव से लोगों की जान जाने के मामले सामने आते रहे हैं।
धार्मिक आस्था के साथ सुरक्षा भी जरूरी
कोलकाता के दुर्गा पूजा पंडाल में हुई ताजा घटना ने एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है कि भीड़ प्रबंधन को केवल आयोजन के समय की प्रशासनिक जिम्मेदारी मानकर नहीं छोड़ा जा सकता। इसके लिए आयोजन से पहले ही जोखिम का आकलन करना, भीड़ की संभावित संख्या का अनुमान लगाना और आपातकालीन परिस्थितियों से निपटने की तैयारी करना जरूरी है।
हर बड़े धार्मिक आयोजन में यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि प्रवेश और निकास के रास्ते पर्याप्त चौड़े हों, भीड़ को एक ही दिशा में व्यवस्थित रूप से आगे बढ़ाया जाए और किसी भी आपात स्थिति में लोगों को सुरक्षित बाहर निकालने की व्यवस्था हो। आयोजकों को स्थानीय प्रशासन, पुलिस, दमकल विभाग और चिकित्सा सेवाओं के साथ समन्वय करके काम करना चाहिए।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भीड़ में दबाव बढ़ने या रास्ता अवरुद्ध होने के संकेत मिलते ही समय रहते कार्रवाई की जाए। किसी अफवाह या अचानक पैदा हुई घबराहट से स्थिति बिगड़ने से रोकने के लिए स्पष्ट घोषणाओं और प्रशिक्षित कर्मियों की मौजूदगी भी जरूरी है।
कोलकाता की त्रासदी और देश में पहले हुए अनेक हादसे यही संदेश देते हैं कि धार्मिक आस्था और जनसुरक्षा एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। उचित योजना, जवाबदेही और वैज्ञानिक भीड़ प्रबंधन से ऐसी दुर्घटनाओं के जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है।


