साइबर फ्रॉड में अब पूरा बैंक खाता फ्रीज करने पर लगाम, संदिग्ध रकम रोकने और ग्राहक को सफाई का मौका देने की तैयारी

Cyber Fraud Bank Account Freeze: साइबर फ्रॉड के मामलों में अब पूरा बैंक खाता फ्रीज करने के बजाय संदिग्ध रकम पर अस्थायी रोक लगाने का प्रस्ताव है। ग्राहक को 20 दिन में सफाई देने और बैंक को 10 दिन में निर्णय लेने का मौका मिलेगा। नई व्यवस्था 1 अप्रैल 2027 से लागू करने का प्रस्ताव है।

Newstrack Network
Published on: 4 Oct 2026 9:54 PM IST (Updated on: 4 Oct 2026 9:55 PM IST)
Cyber Fraud Bank Account Freeze
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Cyber Fraud Bank Account Freeze (Image Credit-Social Media)

नई दिल्ली। आपके बैंक खाते में किसी अनजान व्यक्ति से ₹5,000 आए और बाद में पता चला कि वह रकम किसी साइबर ठगी की श्रृंखला से होकर आपके खाते तक पहुंची थी। अभी ऐसी परिस्थितियों में कई बार ग्राहक का पूरा बैंक खाता फ्रीज हो जाता है और वह अपनी वैध कमाई तक नहीं निकाल पाता। प्रस्तावित नई व्यवस्था इसी परेशानी को कम करने की कोशिश है। साइबर धोखाधड़ी में इस्तेमाल होने वाले ‘म्यूल अकाउंट’ पर कार्रवाई जारी रहेगी, लेकिन हर संदिग्ध लेनदेन के कारण पूरे बैंक खाते को अनिश्चित समय तक बंद रखने के बजाय पहले संदिग्ध रकम पर अस्थायी डेबिट रोक लगाने, ग्राहक को कारण बताने और सफाई का अवसर देने की व्यवस्था प्रस्तावित की गई है। गंभीर और असाधारण परिस्थितियों में पूरा खाता फ्रीज किया जा सकेगा। नई व्यवस्था को 1 अप्रैल 2027 से लागू करने का प्रस्ताव है।

यह बदलाव सामान्य बैंक ग्राहकों के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ऑनलाइन ठगी की रकम कई बार कुछ ही मिनटों में एक खाते से दूसरे, दूसरे से तीसरे और फिर कई अन्य खातों में भेज दी जाती है। इनमें कुछ खाते अपराधियों द्वारा जानबूझकर इस्तेमाल किए गए ‘म्यूल अकाउंट’ होते हैं, लेकिन रकम की श्रृंखला में ऐसे खाते भी आ सकते हैं जिनके मालिक को मूल अपराध की कोई जानकारी नहीं होती। उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति ने ऑनलाइन सामान बेचा और खरीदार ने जिस खाते से पैसे भेजे उसमें साइबर अपराध की रकम मौजूद थी, किसी व्यापारी को सामान्य कारोबार के बदले भुगतान मिला या किसी व्यक्ति को वैध लेनदेन के बदले ऐसी रकम प्राप्त हुई जिसकी पिछली कड़ी किसी ठगी से जुड़ी निकली। जांच में खाते का नंबर सामने आने पर यदि पूरा खाता फ्रीज कर दिया जाए तो खाताधारक अपनी बाकी वैध रकम भी इस्तेमाल नहीं कर पाता।

प्रस्तावित व्यवस्था इसी अंतर को पहचानने की कोशिश करती है। सामान्य परिस्थितियों में बैंक पूरे खाते को बंद करने के बजाय विवादित या संदिग्ध रकम पर डेबिट रोक लगा सकेगा। इसका अर्थ यह है कि जिस राशि पर साइबर धोखाधड़ी से जुड़े होने का संदेह है, उस रकम को खाते से बाहर जाने से रोका जा सकेगा, लेकिन खाते में मौजूद बाकी वैध रकम पर स्वतः रोक लगाने की आवश्यकता नहीं होगी। यदि जांच में परिस्थितियां अधिक गंभीर हों, खाते के जानबूझकर साइबर अपराध के लिए इस्तेमाल होने के संकेत मिलें या कानून लागू करने वाली एजेंसी का स्पष्ट निर्देश हो तो व्यापक रोक संभव हो सकती है।

मसौदे में संदिग्ध लेनदेन की पहचान के लिए केवल रकम को आधार बनाने के बजाय लेनदेन के पूरे व्यवहार को देखने की बात भी महत्वपूर्ण है। उपलब्ध प्रस्ताव के अनुसार ₹1,000 या उससे अधिक के संदिग्ध लेनदेन पर बैंक अस्थायी डेबिट रोक लगा सकते हैं। लेकिन इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि ₹1,000 से अधिक का प्रत्येक UPI, NEFT, IMPS या दूसरा बैंक लेनदेन जांच के दायरे में आ जाएगा। बैंक को यह देखना होगा कि लेनदेन ग्राहक के सामान्य व्यवहार से कितना अलग है, पैसा किस खाते से आया, रकम आगे कहां भेजी गई, संबंधित खातों का साइबर अपराध से कोई संबंध सामने आया है या नहीं और लेनदेन में ऐसा कोई असामान्य ढांचा दिखाई देता है या नहीं जिससे धोखाधड़ी का संदेह पैदा हो।

नई व्यवस्था में ग्राहक के लिए सबसे महत्वपूर्ण सुरक्षा सुनवाई का अवसर है। बैंक यदि खाते या संदिग्ध रकम पर अस्थायी रोक लगाता है तो ग्राहक को इसकी जानकारी और रोक का कारण बताना होगा। इसके बाद खाताधारक को अपनी स्थिति स्पष्ट करने के लिए 20 दिन तक का समय देने का प्रस्ताव है। ग्राहक बैंक स्टेटमेंट, बिल, भुगतान की रसीद, व्यापारिक लेनदेन का प्रमाण, खरीद-बिक्री का विवरण या दूसरे संबंधित दस्तावेज देकर बता सकेगा कि पैसा उसके खाते में किस कारण आया था। जवाब मिलने के बाद बैंक को 10 दिन के भीतर मामले पर निर्णय लेना होगा। ग्राहक का स्पष्टीकरण संतोषजनक मिलने और उसके खिलाफ दूसरी गंभीर सामग्री न होने पर रोक हटानी होगी।

यह प्रावधान उस समस्या को सीधे संबोधित करता है जिसमें किसी ग्राहक को कई बार यह भी ठीक से पता नहीं चलता कि उसका खाता किस शिकायत के कारण रोका गया है। रकम किसी दूसरे राज्य में हुई साइबर ठगी से जुड़ी हो सकती है और खाताधारक को उस राज्य की पुलिस या जांच एजेंसी से संपर्क करना पड़ सकता है। प्रस्तावित व्यवस्था बैंक स्तर पर शुरुआती जांच और ग्राहक को अपना पक्ष रखने का अवसर देकर ऐसे मामलों को जल्दी छांटने की कोशिश करती है।

यदि ग्राहक की सफाई संतोषजनक नहीं होती और बैंक को लेनदेन साइबर धोखाधड़ी से जुड़ा होने का संदेह बना रहता है तो मामला आगे कानून लागू करने वाली एजेंसी को भेजा जा सकेगा। इसके लिए राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल से जुड़ी Citizen Financial Cyber Fraud Reporting and Management System यानी CFCFRMS व्यवस्था का इस्तेमाल किया जा सकता है। यह वही तंत्र है जिसके जरिए साइबर वित्तीय धोखाधड़ी की शिकायत मिलने पर अलग-अलग बैंकों और वित्तीय संस्थानों के बीच तेजी से सूचना पहुंचाकर ठगी की रकम को आगे जाने से रोकने की कोशिश की जाती है।

मसौदे का दूसरा बड़ा प्रावधान रोक की अवधि से जुड़ा है। सामान्य परिस्थितियों में बैंक की ओर से लगाई गई अस्थायी डेबिट रोक 60 दिन से अधिक जारी नहीं रखने का प्रस्ताव है। इसका उद्देश्य यह है कि केवल संदेह के आधार पर किसी व्यक्ति की रकम अनिश्चित समय तक बैंक में फंसी न रहे। हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। बैंक द्वारा अपनी जोखिम निगरानी के आधार पर लगाई गई अस्थायी रोक और पुलिस, अदालत या दूसरी सक्षम कानूनी एजेंसी के आदेश से की गई जब्ती अथवा खाते पर रोक एक ही चीज नहीं है। यदि सक्षम जांच एजेंसी या अदालत कानून के तहत आगे रोक जारी रखने का आदेश देती है तो स्थिति अलग हो सकती है। इसलिए “60 दिन बाद हर हाल में खाता खुल जाएगा” कहना सही नहीं होगा।

म्यूल अकाउंट इस पूरी व्यवस्था की दूसरी तरफ हैं। साइबर अपराधी अक्सर चोरी या ठगी की रकम सीधे अपने खाते में नहीं लेते। वे दूसरे लोगों के खातों का इस्तेमाल करते हैं ताकि पैसे का वास्तविक स्रोत और अंतिम लाभार्थी छिपाया जा सके। कुछ लोग कमीशन के बदले अपना बैंक खाता, ATM कार्ड, मोबाइल नंबर, इंटरनेट बैंकिंग या UPI अपराधियों को सौंप देते हैं। कुछ मामलों में खाताधारक को पता ही नहीं होता कि उसका खाता अपराध के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। यही वजह है कि नई व्यवस्था में बैंक के लिए केवल खाते में संदिग्ध रकम आने को पर्याप्त मानने के बजाय ग्राहक के सामान्य लेनदेन व्यवहार और दूसरे खातों से संबंध देखने पर जोर दिया जा रहा है।

इससे साइबर ठगी के पीड़ित व्यक्ति के हित और संदिग्ध खाते के निर्दोष ग्राहक के अधिकार के बीच संतुलन बनाने की कोशिश दिखाई देती है। यदि ठगी की रकम तुरंत पकड़ में आती है तो उसे आगे जाने से रोकना आवश्यक है, क्योंकि साइबर अपराधी पैसा तेजी से कई खातों में बांटकर निकाल लेते हैं। दूसरी तरफ यदि किसी निर्दोष व्यक्ति के खाते में संदिग्ध श्रृंखला से केवल कुछ हजार रुपये आए हैं और उसके खाते में उसकी तनख्वाह या कारोबार के लाखों रुपये भी पड़े हैं तो पूरी रकम रोक देना उसके लिए गंभीर आर्थिक परेशानी पैदा कर सकता है। प्रस्तावित ‘राशि आधारित रोक’ इसी समस्या का समाधान खोजने की दिशा में है।

इस पूरी कवायद की पृष्ठभूमि में अदालतों में पहुंचे ऐसे मामले भी हैं जिनमें साइबर अपराध की जांच के दौरान बैंक खातों पर व्यापक और लंबे समय तक रोक लगाने पर सवाल उठे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी साइबर धोखाधड़ी से जुड़ी रकम और बैंक खातों पर कार्रवाई के लिए अधिक स्पष्ट तथा एकरूप प्रक्रिया की आवश्यकता पर जोर दिया है। इसी क्रम में RBI, बैंकिंग व्यवस्था, गृह मंत्रालय के साइबर अपराध तंत्र और अन्य संबंधित पक्षों के बीच ऐसी मानक प्रक्रिया बनाने की दिशा में काम हुआ है जिससे अपराधियों के पैसे को तेजी से रोका जा सके, लेकिन निर्दोष ग्राहक अनिश्चितकालीन बैंकिंग प्रतिबंध का शिकार न हो।

ग्राहकों को यहां एक सावधानी और समझनी चाहिए। नई व्यवस्था का अर्थ यह नहीं है कि संदिग्ध रकम खाते में आने के बाद उसे तुरंत निकाल लेना सुरक्षित होगा। यदि किसी अनजान स्रोत से असामान्य रकम खाते में आए तो उसे खर्च या आगे स्थानांतरित करने के बजाय बैंक को सूचना देना बेहतर है। कोई व्यक्ति कमीशन देकर बैंक खाता इस्तेमाल करने, खाते में रकम मंगाकर दूसरे खाते में भेजने, नकद निकालकर देने या अपना ATM, UPI और इंटरनेट बैंकिंग किसी और को इस्तेमाल करने के लिए कहे तो इससे दूर रहना चाहिए। ऐसा खाता बाद में म्यूल अकाउंट की जांच में आ सकता है और खाताधारक को गंभीर कानूनी परेशानी हो सकती है।

यदि साइबर ठगी हो जाए तो जितनी जल्दी शिकायत दर्ज होती है, रकम रोकने की संभावना उतनी बेहतर रहती है। इसके लिए राष्ट्रीय साइबर अपराध हेल्पलाइन 1930 और राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल का इस्तेमाल किया जा सकता है। बैंक को भी तत्काल सूचना देनी चाहिए। लेकिन किसी व्यक्ति का खाता साइबर शिकायत के कारण रोक दिया गया हो और वह स्वयं ठगी में शामिल न हो तो प्रस्तावित नई व्यवस्था उसके लिए बैंक के सामने दस्तावेजों के साथ अपना पक्ष रखने का स्पष्ट रास्ता तैयार करती है।

1 अप्रैल 2027 से प्रस्तावित व्यवस्था का सबसे बड़ा बदलाव इसलिए केवल म्यूल अकाउंट पर सख्ती नहीं, बल्कि निर्दोष खाताधारक के अधिकारों की सुरक्षा भी है। ₹1,000 या उससे अधिक का संदिग्ध लेनदेन सामने आने पर अस्थायी रोक, ग्राहक को कारण की जानकारी, 20 दिन में सफाई का अवसर, जवाब के बाद बैंक के लिए 10 दिन में निर्णय और सामान्य बैंक-स्तरीय रोक को 60 दिन तक सीमित करने जैसे प्रावधान यदि अंतिम नियमों में इसी रूप में रहते हैं तो साइबर अपराध की रकम रोकने और सामान्य ग्राहक की पूरी बैंकिंग जिंदगी ठप होने से बचाने के बीच अधिक स्पष्ट प्रक्रिया बन सकती है। फिलहाल ये मसौदे के प्रावधान हैं, इसलिए अंतिम नियम जारी होने पर यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि RBI इनमें क्या बदलाव करता है और पुलिस या दूसरी कानून प्रवर्तन एजेंसियों के आदेश से लगने वाली रोक के लिए अंतिम प्रक्रिया क्या निर्धारित की जाती है।

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