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Cyclone Arnab Update: आ रहा तूफान! आंध्र से UP तक भारी बारिश का अलर्ट, जानें आपके राज्य का हाल
Cyclone Arnab Alert Update: चक्रवात अर्नब 28 अक्टूबर को आंध्र प्रदेश तट से टकरा सकता है। IMD ने भारी बारिश और तेज हवाओं का अनुमान जताया है। जानें बिहार, झारखंड और पूर्वी यूपी का मौसम अलर्ट।
Cyclone Arnab Live Update Today Rain Alert | Chakravarti Tufan Kab a Raha Hai | Newstrack Hindi
Cyclone Arnab Alert Update: भारत के पूर्वी समुद्री तट पर एक बार फिर बड़े प्राकृतिक संकट का ख़तरा मंडरा रहा है। बंगाल की खाड़ी में विकसित चक्रवाती तूफ़ान 'अर्नब' ने 26 अक्टूबर की रात अत्यंत गंभीर चक्रवाती तूफ़ान का रूप धारण कर लिया। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के अनुसार, यह तूफ़ान 28 अक्टूबर की पूर्वाह्न आंध्र प्रदेश और केंद्रशासित प्रदेश पुडुचेरी के यानम क्षेत्र के निकट समुद्र तट से टकरा सकता है। इसका संभावित रास्ता आंध्र प्रदेश के बापटला से विशाखापत्तनम के बीच निर्धारित किया गया है। फिलहाल यानम और काकीनाडा के आसपास का समुद्री क्षेत्र विशेष चिंता का केंद्र बना हुआ है। तूफ़ान के समुद्र तट से टकराने के समय लगातार चलने वाली हवाओं की रफ्तार 115 से 125 किलोमीटर प्रति घंटा और बीच-बीच में हवा के तेज झोंकों की गति 140 किलोमीटर प्रति घंटा तक पहुंचने का अनुमान है। आंध्र प्रदेश के अतिरिक्त ओडिशा, तेलंगाना, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, झारखंड, बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश तक इसका प्रभाव पहुंच सकता है। 
यह विस्तृत रिपोर्ट 27 अक्टूबर 2026 को उपलब्ध मौसम विभाग के बुलेटिन तथा आज प्रकाशित समाचार एजेंसियों की रिपोर्टों पर आधारित है। तूफ़ान की दिशा, गति और तीव्रता के अनुमान अगले बुलेटिन में बदल सकते हैं।
अर्नब की मौजूदा स्थिति : कितनी बढ़ चुकी है तूफ़ान की ताकत?
चक्रवाती तूफ़ान अर्नब की ताकत जिस तेजी से बढ़ी है, उससे मौसम वैज्ञानिकों और आपदा प्रबंधन एजेंसियों की चिंता बढ़ गई है। 26 अक्टूबर की सुबह यह एक सामान्य चक्रवाती तूफ़ान था, लेकिन उसी दिन शाम तक इसने गंभीर चक्रवाती तूफ़ान का रूप ले लिया। रात लगभग 11:30 बजे तक यह 'वेरी सीवियर साइक्लोनिक स्टॉर्म' अर्थात अत्यंत गंभीर चक्रवाती तूफ़ान की श्रेणी में पहुंच चुका था।
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के 27 अक्टूबर को सुबह 2:30 बजे के आकलन के मुताबिक इसका केंद्र विशाखापत्तनम से लगभग 300 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व और काकीनाडा से लगभग 360 किलोमीटर पूर्व-दक्षिण-पूर्व में स्थित था। उस समय तूफ़ान पिछले छह घंटों में लगभग 25 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से पश्चिम-उत्तर-पश्चिम दिशा में बढ़ा था। दिन में प्रकाशित बाद की रिपोर्टों में भी इसके आंध्र प्रदेश और यानम तट की ओर बढ़ने की पुष्टि की गई है। यहां यह समझना जरूरी है कि तूफ़ान की आगे बढ़ने की गति और उसके भीतर घूमने वाली हवाओं की गति दो अलग-अलग बातें हैं। तूफ़ान का केंद्र 20 से 25 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से आगे बढ़ सकता है, जबकि उसके आसपास की हवाएं 100 किलोमीटर प्रति घंटे से कहीं अधिक तेज हो सकती हैं। 
समुद्र तट से कब और कहां टकराएगा अर्नब?
मौसम विभाग के अनुसार, अर्नब के 27 अक्टूबर की शाम तक पश्चिम-उत्तर-पश्चिम दिशा में बढ़ते रहने और उसके बाद उत्तर-पश्चिम दिशा की ओर मुड़ने की संभावना है। मौजूदा पूर्वानुमान के आधार पर तूफ़ान 28 अक्टूबर की सुबह से पूर्वाह्न के बीच आंध्र प्रदेश के समुद्री तट से टकरा सकता है। मौसम विज्ञान की भाषा में इस प्रक्रिया को 'लैंडफॉल' कहा जाता है। लैंडफॉल का अर्थ केवल समुद्र तट पर तेज हवाओं का पहुंचना नहीं, बल्कि चक्रवात के केंद्रीय हिस्से का समुद्र से भूमि पर प्रवेश करना होता है। इसका प्रभाव लैंडफॉल से कई घंटे पहले शुरू हो सकता है और तूफ़ान के केंद्र के आगे निकल जाने के बाद भी जारी रह सकता है। तट से टकराने वाले स्थान के निर्धारण में मामूली बदलाव भी महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि चक्रवात के केंद्र के दाएं और बाएं हिस्सों में हवा की दिशा, समुद्री जल के उठने की स्थिति और विनाश की तीव्रता अलग-अलग हो सकती है। बापटला से विशाखापत्तनम के बीच संभावित क्षेत्र काफी विस्तृत है। इसलिए केवल यानम या काकीनाडा ही नहीं, इस पूरे तटीय विस्तार में रहने वाले लोगों को खतरे की परिधि में माना जा रहा है। 
समुद्र की लहरें बन सकती हैं हवाओं से भी बड़ा खतरा
अर्नब के कारण होने वाली सबसे गंभीर आशंकाओं में समुद्री जल का तटीय बस्तियों में प्रवेश करना शामिल है। इसे 'स्टॉर्म सर्ज' या तूफ़ानी समुद्री उछाल कहा जाता है। उपलब्ध पूर्वानुमानों में सामान्य खगोलीय ज्वार के स्तर से लगभग एक से दो मीटर तक अतिरिक्त जलस्तर बढ़ने की आशंका जताई गई है। विशेष रूप से काकीनाडा और यानम के आसपास के निचले तटीय इलाकों में इसका जोखिम अधिक बताया गया है। समुद्र में जब अत्यंत कम वायुदाब वाला चक्रवात विकसित होता है, तब उसकी तेज हवाएं पानी को लगातार तट की ओर धकेलती हैं। इस कारण समुद्री जल सामान्य स्तर से ऊपर उठने लगता है। यदि उसी समय समुद्र में ऊंचा ज्वार भी हो, तो तटीय इलाकों में पानी के प्रवेश का खतरा और बढ़ जाता है। यह ध्यान रखना चाहिए कि एक या दो मीटर का अनुमान समुद्र के सामान्य ज्वार से ऊपर उठने वाले अतिरिक्त जलस्तर का है, हर समुद्री लहर की ऊंचाई का नहीं। वास्तविक लहरें इससे बड़ी हो सकती हैं। समुद्र में उठती लहरों और तट पर जमा होते अतिरिक्त समुद्री पानी का सम्मिलित प्रभाव मकानों, सड़कों, बंदरगाहों, मछुआरों की बस्तियों, खेतों और बिजली की व्यवस्था के लिए गंभीर संकट पैदा कर सकता है। 
तटीय इलाकों में लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने का अभियान
तूफ़ान से संभावित जनहानि को रोकने के लिए प्रशासनिक तैयारियां तेज कर दी गई हैं। अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी रॉयटर्स की 27 अक्टूबर की रिपोर्ट के मुताबिक आंध्र प्रदेश में सोमवार रात तक लगभग 50 हजार लोगों को सुरक्षित आश्रय स्थलों तक पहुंचाया जा चुका था। राज्य में करीब चार लाख लोगों को सुरक्षित स्थानों पर ले जाने की आवश्यकता का अनुमान लगाया गया था और अभियान जारी था। ओडिशा में भी एहतियाती उपाय अपनाए गए हैं। वहां पांच जिलों में मंगलवार और बुधवार को विद्यालयों तथा महाविद्यालयों को बंद रखने का निर्णय लिया गया। रेल परिवहन भी प्रभावित हुआ है। रॉयटर्स के मुताबिक कम से कम 12 रेलगाड़ियां रद्द की गईं और दक्षिणी तटीय क्षेत्र के 53 रेल मार्गों पर दो दिनों के लिए सेवाएं निलंबित करने की सूचना दी गई। इससे स्पष्ट है कि प्रशासन इस तूफ़ान को केवल सामान्य मौसमी व्यवधान नहीं मान रहा, बल्कि एक बड़े आपदा जोखिम के रूप में देख रहा है। भारत सरकार के कैबिनेट सचिव डॉ. टी. वी. सोमनाथन ने भी 26 अक्टूबर को राष्ट्रीय संकट प्रबंधन समिति की बैठक की अध्यक्षता करके तैयारियों की समीक्षा की। 
आंध्र प्रदेश से उत्तर प्रदेश तक कहां-कहां होगी भारी बारिश?
चक्रवाती तूफ़ान अर्नब का असर केवल समुद्री तट तक सीमित नहीं रहने वाला है। मौसम विभाग के पूर्वानुमान के अनुसार 27 और 28 अक्टूबर को तटीय आंध्र प्रदेश तथा यानम में कुछ स्थानों पर अत्यधिक भारी बारिश हो सकती है। 28 अक्टूबर को ओडिशा और 28-29 अक्टूबर को छत्तीसगढ़ के कुछ हिस्सों में भी इसी श्रेणी की वर्षा की आशंका जताई गई है। तेलंगाना और महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र में 28 अक्टूबर को भारी से बहुत भारी वर्षा का अनुमान है। इसके बाद वर्षा का दायरा झारखंड, बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश की ओर बढ़ने की संभावना है। झारखंड में 29 अक्टूबर तथा बिहार में 29 और 30 अक्टूबर को कुछ स्थानों पर भारी से बहुत भारी वर्षा हो सकती है। मौसम विभाग ने पूर्वी उत्तर प्रदेश में 29 अक्टूबर को अत्यधिक भारी बारिश और 30 अक्टूबर को बहुत भारी वर्षा की चेतावनी भी दी है। पश्चिम बंगाल में दक्षिण 24 परगना, पूर्व और पश्चिम मेदिनीपुर, झाड़ग्राम, पुरुलिया, बांकुड़ा तथा पश्चिम बर्धमान जैसे जिलों में 28 और 29 अक्टूबर को भारी वर्षा की संभावना है। दार्जिलिंग, कलिम्पोंग, अलीपुरद्वार और जलपाईगुड़ी में 29-30 अक्टूबर को भारी बारिश का अनुमान है। 
उत्तर प्रदेश और बिहार के लिए यह स्थिति इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि समुद्री तट से सैकड़ों किलोमीटर दूर पहुंचने के बावजूद किसी चक्रवात का अवशेष काफी नमी लेकर चल सकता है। भूमि पर पहुंचने के बाद समुद्र से ऊर्जा की आपूर्ति घटने के कारण चक्रवात की हवा की ताकत सामान्यतः कम होने लगती है, लेकिन उसका निम्न वायुदाब वाला क्षेत्र और व्यापक बादल समूह कई दिनों तक बने रह सकते हैं। यही कारण है कि समुद्र तट से टकराने के बाद कमजोर होता तूफ़ान भी दूरदराज के इलाकों में भारी बारिश करा सकता है। पूर्वी उत्तर प्रदेश में अक्टूबर के आखिरी दिनों में इतनी अधिक वर्षा का अनुमान कृषि के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। धान की कटाई और खेतों में रखी उपज प्रभावित हो सकती है। निचले इलाकों में जलभराव तथा कुछ नदियों के जलस्तर में वृद्धि की आशंका भी बनी रहेगी। हालांकि इन संभावित नुकसानों को निश्चित परिणाम नहीं माना जाना चाहिए। इनकी गंभीरता वास्तविक वर्षा, स्थानीय जलनिकासी और नदियों की स्थिति पर निर्भर करेगी। 
अर्नब का नाम किसने रखा और इसका अर्थ क्या है?
इस चक्रवाती तूफ़ान का नाम 'अर्नब' बांग्लादेश ने प्रस्तावित किया था। बांग्ला भाषा में इसका अर्थ 'समुद्र' या 'महासागर' होता है। अंतरराष्ट्रीय मौसम विज्ञान संगठन यानी डब्ल्यूएमओ की सूची में इसका उच्चारण 'ओरनब' दिया गया है। यह नाम अचानक नहीं रखा गया। उत्तरी हिंद महासागर में विकसित होने वाले चक्रवातों का नामकरण पहले से तैयार अंतरराष्ट्रीय सूची के आधार पर किया जाता है। इस व्यवस्था में भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान, श्रीलंका, मालदीव, म्यांमार, ओमान, ईरान, कतर, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, यमन और थाईलैंड सहित 13 देशों की भागीदारी है। इन देशों की ओर से दिए गए नाम निर्धारित क्रम में इस्तेमाल किए जाते हैं। बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में किसी मौसम प्रणाली के चक्रवाती तूफ़ान की श्रेणी में पहुंचने पर नई दिल्ली स्थित क्षेत्रीय विशिष्ट मौसम विज्ञान केंद्र उसे सूची के अनुसार नाम प्रदान करता है। इससे मौसम संबंधी चेतावनियां जारी करने, समुद्री जहाजों को सतर्क करने और अलग-अलग तूफ़ानों की पहचान करने में सुविधा होती है। 
नामकरण की वर्तमान व्यवस्था के अंतर्गत 2020 में नई सूची स्वीकार की गई थी। इसका पहला नाम 'निसर्ग' था। इसी सूची में 'बिपरजॉय', 'अर्नब', 'तेज', 'मिचौंग', 'रेमल' और अनेक अन्य नाम शामिल किए गए थे। इस सूची की एक विशेषता यह है कि नामों का इस्तेमाल किसी एक देश के भौगोलिक क्षेत्र के आधार पर नहीं किया जाता। उदाहरण के लिए बांग्लादेश द्वारा दिया गया नाम अरब सागर में पैदा हुए तूफ़ान को भी मिल सकता है और भारत द्वारा सुझाया गया नाम बंगाल की खाड़ी के चक्रवात को भी। नाम का उद्देश्य तूफ़ान की राष्ट्रीय पहचान निर्धारित करना नहीं, बल्कि मौसम विज्ञान और जनसंचार में उसकी अलग पहचान स्थापित करना है। 
आखिर समुद्र में कैसे पैदा होता है चक्रवाती तूफ़ान?
चक्रवाती तूफ़ान के जन्म की कहानी समुद्र की सतह पर उपलब्ध ऊष्मा और वायुमंडल में बनने वाले निम्न दबाव से शुरू होती है। उष्णकटिबंधीय समुद्री क्षेत्रों में जब पानी का तापमान पर्याप्त अधिक होता है, सामान्यतः लगभग 26.5 डिग्री सेल्सियस या उससे ऊपर, तो समुद्र से बड़ी मात्रा में जलवाष्प वायुमंडल में पहुंचती है। यह गर्म और नम हवा ऊपर उठती है। ऊपर जाकर ठंडी होने पर जलवाष्प संघनित होकर बादलों और वर्षा की बूंदों में बदलती है। इस प्रक्रिया में गुप्त ऊष्मा मुक्त होती है, जो आसपास की हवा को गर्म करके उसे और ऊपर उठने में सहायता करती है। नीचे के वातावरण में दबाव घटने लगता है और आसपास की हवा तेजी से इस कम दबाव वाले क्षेत्र की ओर आने लगती है। यदि वातावरण की अन्य परिस्थितियां अनुकूल हों तो बादलों और हवाओं की यह प्रणाली संगठित होकर चक्रवात का रूप लेने लगती है।
लेकिन केवल गर्म समुद्र होने से चक्रवात नहीं बन जाता। उसके लिए समुद्री सतह से पर्याप्त ऊंचाई तक नमी उपलब्ध होना, हवा के ऊपरी और निचले स्तरों की गति में अत्यधिक अंतर न होना तथा वायुमंडल में पहले से किसी प्रकार का घूर्णन मौजूद होना भी महत्वपूर्ण है। हवा के विभिन्न स्तरों की गति और दिशा में अंतर को 'विंड शियर' कहा जाता है। यदि यह अंतर बहुत अधिक हो, तो तूफ़ान की ऊर्ध्वाधर संरचना बिखर सकती है। पृथ्वी के घूमने के कारण उत्पन्न 'कोरिओलिस प्रभाव' हवाओं को सीधे केंद्र में पहुंचने के बजाय उसके चारों ओर घूमने में सहायता करता है। उत्तरी गोलार्ध में चक्रवात सामान्यतः घड़ी की सुइयों के विपरीत दिशा में घूमते हैं, जबकि दक्षिणी गोलार्ध में उनकी दिशा इसके उलट होती है। भूमध्य रेखा के बिल्कुल पास कोरिओलिस प्रभाव कमजोर होता है, इसलिए वहां संगठित उष्णकटिबंधीय चक्रवातों का बनना अपेक्षाकृत दुर्लभ है।
अर्नब के विकास में बंगाल की खाड़ी की गर्म समुद्री सतह महत्वपूर्ण रही है। मौसम विश्लेषण संस्था वेदरन्यूज़ के 26 अक्टूबर के आकलन के अनुसार तूफ़ान के आसपास समुद्री सतह का तापमान लगभग 30 डिग्री सेल्सियस था। इसके अतिरिक्त ऊपरी वायुमंडल में हवा के बाहर निकलने के अनुकूल रास्ते तथा 'मैडेन-जूलियन ऑसिलेशन' नामक उष्णकटिबंधीय मौसमी गतिविधि की अनुकूल अवस्था ने भी इसके मजबूत होने में भूमिका निभाई। मैडेन-जूलियन ऑसिलेशन उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में बादलों, वर्षा और वायुमंडलीय संवहन की ऐसी व्यापक गतिविधि है जो समय के साथ पूर्व की ओर बढ़ती है। इसकी अनुकूल अवस्था चक्रवात के विकास में सहायक हो सकती है। 
चक्रवात के बीचोबीच क्या होता है और उसकी आंख क्यों बनती है?
शक्तिशाली चक्रवात के केंद्र में कभी-कभी अपेक्षाकृत शांत और साफ आकाश वाला क्षेत्र बन जाता है, जिसे 'आई ऑफ द साइक्लोन' अर्थात चक्रवात की आंख कहा जाता है। यह क्षेत्र कई किलोमीटर से लेकर कुछ दर्जन किलोमीटर तक चौड़ा हो सकता है। इसके चारों तरफ अत्यंत घने बादलों और तेज हवाओं की एक दीवार जैसी संरचना होती है, जिसे 'आईवॉल' कहते हैं। चक्रवात की सबसे तेज हवाएं और सर्वाधिक तीव्र वर्षा प्रायः इसी आईवॉल के आसपास पाई जाती हैं। इसलिए तूफ़ान का केंद्र किसी स्थान के ऊपर पहुंचने पर कभी-कभी कुछ समय के लिए हवा और बारिश कम होने का भ्रम हो सकता है। लेकिन इसके बाद आईवॉल का दूसरा हिस्सा पहुंचने पर फिर विनाशकारी हवाएं चल सकती हैं। सभी चक्रवातों में स्पष्ट आंख बनना आवश्यक नहीं है। चक्रवात की शक्ति, आकार और उसके आसपास की वायुमंडलीय परिस्थितियां इसके बनने और टिके रहने को प्रभावित करती हैं।
इसी तरह किसी तूफ़ान का आकार और उसकी तीव्रता भी अलग-अलग होती हैं। कोई अपेक्षाकृत छोटे क्षेत्र में सीमित चक्रवात अत्यंत तेज हवाएं उत्पन्न कर सकता है, जबकि व्यापक क्षेत्र में फैला कम तीव्रता वाला चक्रवात अनेक राज्यों में भारी वर्षा करा सकता है। इसलिए केवल अधिकतम हवा की गति के आधार पर उसके कुल नुकसान का अनुमान नहीं लगाया जा सकता। चक्रवात कितनी देर तक किसी क्षेत्र के आसपास बना रहता है, उसमें कितनी नमी उपलब्ध है, समुद्री तट की बनावट कैसी है और जनसंख्या का घनत्व कितना है, ये सभी कारक उसकी विनाशकारी क्षमता निर्धारित करते हैं।
साधारण तूफ़ान और अत्यंत गंभीर चक्रवात में क्या अंतर है?
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग समुद्र में विकसित होने वाली कम दबाव की प्रणालियों को उनकी अधिकतम लगातार हवा की गति के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में रखता है। जब हवा की गति लगभग 31 से 49 किलोमीटर प्रति घंटा होती है, तो पर्याप्त संगठित प्रणाली को 'डिप्रेशन' अर्थात अवदाब कहा जाता है। इसके बाद 50 से 61 किलोमीटर प्रति घंटे की गति पर यह 'डीप डिप्रेशन' यानी गहरे अवदाब की श्रेणी में पहुंचती है। 62 से 88 किलोमीटर प्रति घंटे की गति वाली प्रणाली 'साइक्लोनिक स्टॉर्म' अर्थात चक्रवाती तूफ़ान कहलाती है। 89 से 117 किलोमीटर प्रति घंटे पर यह गंभीर चक्रवाती तूफ़ान और 118 से 166 किलोमीटर प्रति घंटे पर अत्यंत गंभीर चक्रवाती तूफ़ान की श्रेणी में आती है। इसके बाद 167 से 221 किलोमीटर प्रति घंटे की गति पर 'एक्सट्रीमली सीवियर साइक्लोनिक स्टॉर्म' और 222 किलोमीटर प्रति घंटे या उससे अधिक की गति पर 'सुपर साइक्लोनिक स्टॉर्म' माना जाता है। ये सीमाएं अधिकतम लगातार चलने वाली हवाओं के लिए हैं, क्षणिक तेज झोंकों के लिए नहीं। 
अर्नब का वर्तमान वर्गीकरण अत्यंत गंभीर चक्रवाती तूफ़ान का है। हालांकि तट से टकराने के समय लगातार हवाओं की गति 115 से 125 किलोमीटर प्रति घंटे रहने का अनुमान बताया गया है। यह संख्या दो श्रेणियों की सीमा के आसपास आती है। इसलिए किसी तूफ़ान की आधिकारिक श्रेणी और उसके भविष्य में तट से टकराने के समय अनुमानित हवा की गति को अलग-अलग समझना चाहिए। उसकी तीव्रता में समुद्र के ऊपर रहते हुए भी बदलाव हो सकता है। 
बंगाल की खाड़ी में बार-बार क्यों आते हैं ऐसे तूफ़ान?
भारत के आसपास दो प्रमुख समुद्री क्षेत्र हैं। एक ओर अरब सागर है और दूसरी ओर बंगाल की खाड़ी। दोनों में उष्णकटिबंधीय चक्रवात पैदा होते हैं, लेकिन ऐतिहासिक रूप से बंगाल की खाड़ी उत्तर हिंद महासागर में चक्रवातों की उत्पत्ति और उनके भारतीय उपमहाद्वीप के तटों पर पहुंचने का प्रमुख क्षेत्र रही है। इसकी कई भौगोलिक और मौसमी वजहें हैं। बंगाल की खाड़ी में गर्म समुद्री जल, मानसूनी हवाओं से जुड़ी कम दबाव की प्रणालियां और अनुकूल मौसमी परिस्थितियां कई अवसरों पर चक्रवातों के विकास में सहायता करती हैं। गंगा, ब्रह्मपुत्र और दूसरी नदियों से आने वाले मीठे पानी के कारण भी समुद्र की ऊपरी परतों की संरचना प्रभावित होती है। कुछ परिस्थितियों में यह ऊपरी गर्म पानी को नीचे के ठंडे पानी से मिलने से रोक सकती है, जिससे तूफ़ान के दौरान समुद्री सतह का तापमान अपेक्षाकृत ऊंचा बना रह सकता है।
बंगाल की खाड़ी की उत्तरी दिशा में संकरी होती भौगोलिक बनावट और गंगा-ब्रह्मपुत्र का विशाल डेल्टा तूफ़ानी समुद्री उछाल के खतरे को बढ़ा सकते हैं। यही कारण है कि बांग्लादेश, पश्चिम बंगाल और ओडिशा के निचले तटीय क्षेत्रों में अतीत में समुद्री जल के प्रवेश से भारी जनहानि हुई है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि अरब सागर सुरक्षित है। हाल के दशकों में अरब सागर में भी अनेक शक्तिशाली चक्रवात विकसित हुए हैं। किसी एक वर्ष में चक्रवातों की संख्या या तीव्रता सामान्य ऐतिहासिक प्रवृत्ति से अलग भी हो सकती है।
भारत में चक्रवातों के लिए अप्रैल से जून और अक्टूबर से दिसंबर के आसपास के समय विशेष महत्वपूर्ण माने जाते हैं। मानसून के चरम समय में हवाओं के ऊर्ध्वाधर अंतर के कारण कई प्रणालियां पूर्ण विकसित चक्रवात नहीं बन पातीं। मानसून की वापसी के बाद अक्टूबर और नवंबर में बंगाल की खाड़ी में कई बार ऐसी परिस्थितियां बनती हैं, जो चक्रवातों के संगठन और उनकी तीव्रता बढ़ने के लिए अनुकूल होती हैं। अर्नब इसी मानसूनोत्तर अवधि में विकसित हुआ है।
क्या जलवायु परिवर्तन से चक्रवाती तूफ़ान अधिक विनाशकारी हो रहे हैं?
जलवायु परिवर्तन और चक्रवातों के संबंध को समझते समय दो अलग प्रश्नों को देखना आवश्यक है। पहला, क्या चक्रवातों की कुल संख्या बढ़ रही है? दूसरा, क्या अत्यंत शक्तिशाली चक्रवातों और उनसे होने वाली भारी वर्षा का जोखिम बढ़ रहा है? वैज्ञानिक अध्ययनों का व्यापक निष्कर्ष यह है कि गर्म होते वातावरण और समुद्र के कारण कई क्षेत्रों में तीव्र चक्रवातों से जुड़ी वर्षा और विनाशकारी क्षमता बढ़ सकती है। लेकिन दुनिया के हर समुद्री क्षेत्र में चक्रवातों की कुल संख्या लगातार बढ़ रही है, ऐसा निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। क्षेत्रीय स्तर पर परिवर्तन अलग-अलग हो सकते हैं।
वायुमंडल का तापमान बढ़ने पर उसमें अधिक जलवाष्प समा सकती है। एक सामान्य भौतिक सिद्धांत के अनुसार तापमान में प्रत्येक एक डिग्री सेल्सियस वृद्धि पर हवा की जलवाष्प धारण करने की क्षमता लगभग सात प्रतिशत बढ़ सकती है, हालांकि इससे हर जगह वास्तविक वर्षा में सात प्रतिशत वृद्धि होना जरूरी नहीं है। जब गर्म समुद्र से अधिक नमी किसी संगठित चक्रवात में पहुंचती है, तो उससे अत्यंत तीव्र वर्षा की संभावना बढ़ सकती है। समुद्र के औसत स्तर में दीर्घकालिक वृद्धि भी तूफ़ानी समुद्री उछाल के प्रभाव को अधिक गंभीर बना सकती है। हालांकि किसी एक चक्रवात, जैसे अर्नब, की उत्पत्ति को सीधे जलवायु परिवर्तन का परिणाम घोषित करने के लिए अलग वैज्ञानिक विश्लेषण आवश्यक होगा।
भारत ने पहले भी झेले हैं अत्यंत विनाशकारी चक्रवात
भारत के चक्रवाती इतिहास में 1999 का ओडिशा सुपर साइक्लोन विशेष रूप से याद किया जाता है। अक्टूबर 1999 में आए इस चक्रवात ने ओडिशा में भारी तबाही मचाई थी। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार इसमें लगभग दस हजार लोगों की मृत्यु हुई थी। लंबे समय तक चले तेज तूफ़ान, समुद्री जल के तटवर्ती क्षेत्रों में प्रवेश और व्यापक बाढ़ ने इस आपदा को और भयावह बना दिया था। 2013 में आए चक्रवात 'फैलिन' ने फिर ओडिशा और आंध्र प्रदेश के सामने गंभीर संकट खड़ा किया, लेकिन बड़े पैमाने पर लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाए जाने के कारण संभावित जनहानि को काफी सीमित रखा जा सका।
2019 में 'फानी' ने ओडिशा में भारी नुकसान पहुंचाया। 2020 में 'अम्फान' ने पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश में व्यापक तबाही मचाई। 2021 में 'ताउते' ने अरब सागर से उठकर भारत के पश्चिमी तट को प्रभावित किया, जबकि उसी वर्ष 'यास' ने पूर्वी तट पर संकट पैदा किया। 2023 में 'मिचौंग' ने दक्षिण भारत में भारी बारिश और बाढ़ की स्थिति उत्पन्न की। इन घटनाओं से एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है। समुद्र में पैदा होने वाले किसी चक्रवात का खतरा केवल उसकी अधिकतम हवा की गति से निर्धारित नहीं होता। लगातार वर्षा, तटीय बाढ़, समुद्री जल का प्रवेश, कमजोर मकान, बिजली की व्यवस्था और जनसंख्या का घनत्व उसके प्रभाव को कई गुना बढ़ा सकते हैं।
भारत की चक्रवात चेतावनी प्रणाली में पिछले दशकों में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। उपग्रहों, समुद्री मौसम प्रेक्षणों, डॉप्लर रडार, संख्यात्मक मौसम पूर्वानुमान मॉडलों और आपदा प्रबंधन की बेहतर तैयारी के कारण अब तटीय इलाकों को पहले से चेतावनी देना संभव हुआ है। इसके परिणामस्वरूप कई हालिया चक्रवातों में बड़ी संख्या में लोगों को समय रहते सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जा सका है। हालांकि आर्थिक क्षति, कृषि नुकसान और बुनियादी ढांचे की तबाही अब भी गंभीर चुनौती बनी हुई है।
अर्नब को लेकर अगले 48 घंटे क्यों महत्वपूर्ण हैं?
अर्नब के संदर्भ में 27 अक्टूबर की शाम से लेकर 29 अक्टूबर तक का समय विशेष महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पहली चुनौती तूफ़ान के समुद्र तट से टकराने की है। इसके बाद दूसरी चुनौती अत्यधिक वर्षा और जलभराव की होगी। संभावित लैंडफॉल क्षेत्र में कच्चे मकानों, पेड़ों, बिजली के खंभों, संचार व्यवस्था और मछली पकड़ने वाले जहाजों को नुकसान पहुंचने का खतरा है। तेज बारिश के कारण निचले इलाकों में पानी भर सकता है और कुछ स्थानों पर सड़क तथा रेल यातायात प्रभावित हो सकता है। समुद्र तट से दूर छत्तीसगढ़, झारखंड, बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में मुख्य खतरा तेज चक्रवाती हवाओं की अपेक्षा भारी वर्षा, आकाशीय बिजली और उससे उत्पन्न बाढ़ या जलभराव का रहेगा।
एक और चिंता इस तूफ़ान के संभावित दूरगामी प्रभाव को लेकर सामने आई है। रॉयटर्स की 27 अक्टूबर की रिपोर्ट के मुताबिक नेपाल ने भी हिमालय के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पर्यटकों को सतर्क रहने की चेतावनी दी है। आशंका है कि तूफ़ान की नमी से जुड़े मौसम परिवर्तन के कारण 29 अक्टूबर की रात से अगले कुछ दिनों तक भारी बारिश, बर्फबारी और हिमस्खलन जैसी परिस्थितियां पैदा हो सकती हैं। हिमालयी क्षेत्र में किसी चक्रवात के अवशेष जब दूसरी मौसमी प्रणालियों के संपर्क में आते हैं, तो स्थानीय मौसम तेजी से बदल सकता है। हालांकि ऐसे परिणाम कई अन्य वायुमंडलीय कारकों पर निर्भर करते हैं। 
सितंबर में भी चर्चा में आया था अर्नब का नाम, लेकिन तब चक्रवात नहीं बना था
इस तूफ़ान के संबंध में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि सितंबर 2026 में 'अर्नब' नाम सोशल मीडिया और कुछ समाचार माध्यमों में चर्चा में आया था। उस समय बंगाल की खाड़ी में विकसित एक गहरा अवदाब आंध्र प्रदेश और ओडिशा के तट की ओर बढ़ रहा था। आशंका जताई जा रही थी कि यदि यह प्रणाली चक्रवाती तूफ़ान की श्रेणी में पहुंच गई, तो उसे अर्नब नाम दिया जाएगा। लेकिन 23 सितंबर के आसपास वह मौसम प्रणाली चक्रवाती तूफ़ान की आवश्यक तीव्रता तक नहीं पहुंच सकी। वह गहरे अवदाब के रूप में ही तट की ओर बढ़ी। इसलिए सितंबर की उस घटना को आधिकारिक तौर पर चक्रवाती तूफ़ान अर्नब नहीं कहा जाना चाहिए। वर्तमान अर्नब अक्टूबर 2026 में विकसित हुई अलग मौसम प्रणाली है, जिसे 26 अक्टूबर को आधिकारिक रूप से यह नाम मिला। पुरानी तस्वीरों और खबरों को वर्तमान तूफ़ान से जोड़ने में यह अंतर विशेष रूप से ध्यान रखने योग्य है।
अर्नब से सबसे बड़ा सबक : तूफ़ान समुद्र में पैदा होता है, लेकिन उसका असर दूर तक जाता है
अर्नब की सबसे बड़ी विशेषता उसके प्रभाव का विस्तृत भौगोलिक क्षेत्र है। किसी समुद्री चक्रवात के बारे में आम धारणा यही होती है कि उसका सबसे अधिक असर उसी राज्य पर पड़ेगा जहां वह समुद्र तट से टकराता है। यह धारणा पूरी तरह सही नहीं है। भले ही तेज हवाओं और समुद्री उछाल का सबसे गंभीर खतरा तट के आसपास रहता हो, लेकिन चक्रवात अपने साथ विशाल मात्रा में नमी लेकर भूमि के भीतर दूर तक बढ़ सकता है। उसकी मूल संरचना कमजोर पड़ जाने के बाद भी बादल समूह और वर्षा पैदा करने वाली वायुमंडलीय परिस्थितियां बनी रह सकती हैं। यही कारण है कि अर्नब की निगरानी आंध्र प्रदेश और ओडिशा के अतिरिक्त उत्तर और मध्य भारत के राज्यों के लिए भी महत्वपूर्ण हो गई है।
फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि 28 अक्टूबर की सुबह अर्नब का केंद्र वास्तव में किस स्थान से समुद्र तट को पार करेगा, उस समय उसकी अधिकतम हवा की गति कितनी होगी और क्या वह अनुमान से अधिक या कम वर्षा उत्पन्न करेगा। इन प्रश्नों के उत्तर अगले मौसम बुलेटिनों के साथ अधिक स्पष्ट होंगे। मौजूदा पूर्वानुमान में गंभीर जोखिम का संकेत अवश्य है, लेकिन जनहानि और वास्तविक नुकसान का आकलन तूफ़ान गुजरने के बाद ही संभव होगा। समुद्र तट पर रहने वाले लोगों के लिए प्रशासनिक चेतावनियों का पालन करना, मछुआरों के लिए समुद्र से दूर रहना और संभावित बाढ़ वाले क्षेत्रों में समय पर सुरक्षित स्थानों तक पहुंचना सबसे आवश्यक कदम हैं।


